Sunday, 29 May 2016

चिकित्सा शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग आमने-सामने


--पीजीएमईई --
-पुन: मेरिट आदेश के लिए सेहत महकमे को ठहराया जिम्मेदार
-पीएमएस संवर्ग के सिर्फ 133 चिकित्सकों को मिली एनओसी
राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के मेडिकल कालेजों की परास्नातक सीटों की प्रवेश परीक्षा पीजीएमईई काउंसिलिंग को लेकर बढ़े विवाद में चिकित्सा शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग आमने-सामने आ गए हैं। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने जहां दोबारा मेरिट आदेश के लिए स्वास्थ्य विभाग को जिम्मेदार ठहराया है, वहीं स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि हमने मदद न की होती तो स्थितियां बिल्कुल अलग होतीं।
पीजीएमईई की काउंसिलिंग लगातार दूसरे दिन भी संभव नहीं हो सकी है। इस बीच चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से स्वास्थ्य विभाग को एक पत्र लिखकर सर्वोच्च अदालत में विभाग की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। कहा गया है कि यदि स्वास्थ्य विभाग के वकील द्वारा दोबारा मेरिट बनाए जाने की बात न कही गयी होती तो स्थितियां बिल्कुल अलग होतीं। अदालत में चिकित्सा शिक्षा विभाग ने पीएमएस संवर्ग के लिए इस वर्ष कोटा पूरी तरह समाप्त करने तक का प्रस्ताव रख दिया था। वैसे इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि पीएमएस से जुड़े चिकित्सकों के वकील अलग थे। वैसे भी अदालत के भीतर की स्थितियां बिल्कुल अलग होती हैं, जिनमें तात्कालिक स्तर पर जवाब दिये जाते हैं। इस बीच पीएमएस संवर्ग के 576 चिकित्सकों में से 133 को अनापत्ति प्रमाण पत्र दिये गए हैं। सभी को अनापत्ति न मिलने के कारण मूल मेरिट सूची के अधिक छात्र-छात्राओं को प्रवेश मिलने क उम्मीद बढ़ गयी है। चिकित्सा शिक्षा विभाग अब अगले दो दिनों में हर हाल में काउंसिलिंग करने की रणनीति बना रहा है, ताकि सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना जैसी नौबत न आ सके।
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सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में काउंसिलिंग कराई जा रही है। पहले प्रवेश ले चुके छात्र आंदोलित हैं। अगले दो दिनों में कोई न कोई रास्ता निकालकर काउंसिलिंग को मूर्त रूप दिया जाएगा।
-डॉ.अनूप चंद्र पांडेय, प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा)
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पीएमएस संवर्ग के जिन चिकित्सकों ने नियमानुसार आवेदन किया था, उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र दे दिया गया था। अब छात्र-छात्राओं को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप काम करना चाहिए। वे अनावश्यक गतिरोध उत्पन्न कर रहे हैं, जिससे तनाव बढ़ रहा है।
-अरविंद कुमार, प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य)

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