Monday, 30 May 2016

प्रोन्नति के लिए खत्म होगा खाली पद का इंतजार


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-आयुर्वेद कालेज बचाने को बदलेगी सेवा नियमावली
-सीसीआइएम ने छीन रखी है छह कालेजों की मान्यता
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डॉ.संजीव, लखनऊ
आयुर्वेद कालेजों की मान्यता बचाने के लिए आयुर्वेद शिक्षा सेवा नियमावली बदलने का फैसला हुआ है। अब शिक्षकों को प्रोन्नति के लिए खाली पदों का इंतजार नहीं करना होगा। इसके लिए शासन को भेजे गए प्रस्ताव को जल्द ही कैबिनेट के समक्ष रखने की तैयारी है।
प्रदेश के सरकारी आयुर्वेदिक कालेज मान्यता संकट से जूझ रहे हैं। इससे निपटने के लिए आयुर्वेदिक शिक्षकों की सेवा नियमावली बदलने का फैसला हुआ है। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन (सीसीआइएम) की शर्तों के अनुरूप बदलाव को हरी झंडी दे दी है। इनमें सबसे बड़ा बदलाव अनिवार्य प्रोन्नति के रूप में होगा। अभी प्रोन्नति के लिए पद रिक्त होने की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। नयी नियमावली में पद रिक्ति की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी है। अब लेक्चरर के रूप में मूल नियुक्ति के तीन साल बाद असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में पदोन्नति मिल जाएगी। इसके तीन वर्ष (कुल छह वर्ष) बाद एसोसिएट प्रोफेसर और फिर पांच वर्ष बाद प्रोफेसर के रूप में प्रोन्नति हो जाएगी। सीसीआइएम की अन्य शर्तों को सीधे अंगीकार करने की बात भी नयी नियमावली में शामिल की गयी है। प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने बताया कि सीसीआइएम की शर्तों का अनुपालन आसान करने को जल्द ही इस पर फैसला होगा।
छह कालेजों में सत्र शून्य
लखनऊ, पीलीभीत, बांदा, झांसी, बरेली, मुजफ्फर नगर, इलाहाबाद व वाराणसी के आयुर्वेदिक कालेजों में बीएएमएस की 320 सीटें हैं। पिछले वर्ष सीसीआइएम ने लखनऊ व वाराणसी की 90 सीटों को सशर्त मंजूरी दी और शेष की मान्यता ही छीन ली। इससे शैक्षिक सत्र 2015-16 में छह कालेजों में सत्र शून्य हो गया।
आठ प्राचार्य, 550 शिक्षक मांगे
विभाग ने प्रस्ताव के साथ आठ प्राचार्यों व 550 शिक्षकों के पदों पर नियुक्ति की बात भी कही है। इस बाबत उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग को अधियाचन भेजा जा चुका है। इस समय चार कालेज तो पूरी तरह कार्यवाहक प्राचार्यों के सहारे चल रहे हैं। दो प्राचार्य निदेशालय में तैनात हैं और दोहरा कार्यभार होने के कारण कामकाज भी निश्चित रूप से प्रभावित होता है।

सरकारी विभागों में कंप्यूटर ऑपरेटरों का अलग कैडर

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-इलेक्ट्रानिक डाटा प्रोसेसिंग संवर्ग सेवा नियमावली जारी
-'ओ लेवल' प्रमाणपत्र या सरकारी डिप्लोमा होगा जरूरी
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: सरकारी विभागों में कंप्यूटर ऑपरेटरों का अब अलग कैडर होगा। वित्त विभाग ने इलेक्ट्रानिक डाटा प्रोसेसिंग संवर्ग सेवा नियमावली जारी कर दी है। इसमें भर्ती के लिए सरकारी डिप्लोमा के साथ 'ओ लेवल' प्रमाणपत्र जरूरी होगा।
प्रदेश सरकार से जुड़े विभागों में कंप्यूटर का कामकाज बढऩे के कारण कंप्यूटर ऑपरेटरों के लिए अलग से कैडर बनाने की मांग लंबे समय से चल रही थी। वित्त सचिव अजय अग्र्रवाल ने सोमवार को इस संवर्ग के लिए नियमावली भी जारी कर दी। इसमें कंप्यूटर ऑपरेटर श्रेणी क, श्रेणी ख व श्रेणी ग के रूप में तीन श्रेणियां परिभाषित की गयी हैं। श्रेणी क में आयोग के माध्यम से सीधी भर्ती होगी, उसके छह वर्ष बाद श्रेणी ख व बारह वर्ष बाद श्रेणी ग में प्रोन्नति हो जाएगी। इसके लिए इंटरमीडिएट के साथ किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से कंप्यूटर विज्ञान में डिप्लोमा या भारत सरकार के इलेक्ट्रानिक्स विभाग का 'ओ लेवलÓ डिप्लोमा होना जरूरी होगा। इसके साथ ही डॉस, यूनिक्स, विंडोज इन्वायरनमेंट में एमएस ऑफिस, लोटस व स्मार्ट सूट आदि में डेटा इंट्री का ज्ञान और ङ्क्षहदी व अंग्र्रेजी टाइपिंग में 25 व 40 शब्द प्रति मिनट की न्यूनतम गति जरूरी होगी। कंप्यूटर ऑपरेटर श्रेणी क को 5200-20200 वेतन बैंड में 2400 ग्र्रेड पे के हिसाब से, श्रेणी ख को 5200-20200 वेतन बैंड में 2800 ग्र्रेड पे के हिसाब से, श्रेणी ग को 9300-34800 वेतन बैंड में 4200 ग्र्रेड पे के हिसाब से वेतन देय होगा। 

Sunday, 29 May 2016

नीट बनाम सीपीएमटी पर अटका फैसला


-केंद्र की छूट के बावजूद प्रदेश में असमंजस
-उत्तराखंड के भी नीट स्वीकारने से बढ़ा दबाव
राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सरकारी मेडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए राज्यों द्वारा अपनी प्रवेश परीक्षा कराने या नीट में शामिल होने की छूट का रास्ता खोलने के बावजूद प्रदेश में अभी असमंजस की स्थिति है। आसपास के अन्य राज्यों के बाद उत्तराखंड भी नीट के साथ जाने का फैसला कर चुका है। इससे विद्यार्थी परेशान हैं।
उत्तर प्रदेश के सभी मेडिकल व डेंटल कालेजों में एमबीबीएस व बीडीएस कक्षाओं में प्रवेश के लिए 17 मई को प्रस्तावित सीपीएमटी निरस्त की जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंटरेंस टेस्ट (नीट) की अनिवार्यता के बाद यह फैसला हुआ था। इस बीच केंद्र सरकार ने सरकारी कालेजों के लिए नीट या अपनी प्रवेश परीक्षा में से एक चुनने का विकल्प दे दिया है। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा महकमे की मुख्य सचिव के साथ बैठक हुई और नीट के पक्ष में तर्क देते हुए 25 मई को प्रस्ताव मुख्यमंत्री के पास भेज दिया गया था। चार दिन बाद भी मुख्यमंत्री कार्यालय से इस पर कोई फैसला नहीं हो सका है।
सीपीएमटी बनाम नीट पर फैसला न हो पाने से प्रदेश के छात्र-छात्राओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। प्रदेश के सरकारी मेडिकल व डेंटल कालेजों में प्रवेश पाने के लिए डेढ़ लाख छात्र-छात्राओं ने सीपीएमटी का फार्म भरा था। वे सभी छात्र-छात्राएं परेशान हैं। सीपीएमटी निरस्त करते समय उसका फॉर्म भरने वाले छात्र-छात्राओं को शुल्क वापसी का फैसला भी हुआ था। सीपीएमटी का आयोजन करने वाले डॉ.राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद ने शासन से इस बाबत धनराशि मांगने के लिए पत्र भी लिख दिया था। इस बीच सीपीएमटी और नीट में मामला फंसने के कारण वह प्रक्रिया भी रोक दी गयी। नीट-2 की परीक्षा 24 जुलाई को होनी है। इसके लिए सीबीएसई ने ऑनलाइन आवेदन स्वीकार करने शुरू भी कर दिये हैं। ऐसे में छात्र-छात्राएं परेशान हैं कि वे नीट-2 के लिए आवेदन करें या सीपीएमटी की प्रतीक्षा करें। इस संबंध में प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने कहा कि जल्द ही इस पर फैसला हो जाएगा। विद्यार्थियों का हित सर्वोपरि है और उसी के अनुरूप शासन स्तर पर निर्णय लिया जाएगा।

चिकित्सा शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग आमने-सामने


--पीजीएमईई --
-पुन: मेरिट आदेश के लिए सेहत महकमे को ठहराया जिम्मेदार
-पीएमएस संवर्ग के सिर्फ 133 चिकित्सकों को मिली एनओसी
राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के मेडिकल कालेजों की परास्नातक सीटों की प्रवेश परीक्षा पीजीएमईई काउंसिलिंग को लेकर बढ़े विवाद में चिकित्सा शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग आमने-सामने आ गए हैं। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने जहां दोबारा मेरिट आदेश के लिए स्वास्थ्य विभाग को जिम्मेदार ठहराया है, वहीं स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि हमने मदद न की होती तो स्थितियां बिल्कुल अलग होतीं।
पीजीएमईई की काउंसिलिंग लगातार दूसरे दिन भी संभव नहीं हो सकी है। इस बीच चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से स्वास्थ्य विभाग को एक पत्र लिखकर सर्वोच्च अदालत में विभाग की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। कहा गया है कि यदि स्वास्थ्य विभाग के वकील द्वारा दोबारा मेरिट बनाए जाने की बात न कही गयी होती तो स्थितियां बिल्कुल अलग होतीं। अदालत में चिकित्सा शिक्षा विभाग ने पीएमएस संवर्ग के लिए इस वर्ष कोटा पूरी तरह समाप्त करने तक का प्रस्ताव रख दिया था। वैसे इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि पीएमएस से जुड़े चिकित्सकों के वकील अलग थे। वैसे भी अदालत के भीतर की स्थितियां बिल्कुल अलग होती हैं, जिनमें तात्कालिक स्तर पर जवाब दिये जाते हैं। इस बीच पीएमएस संवर्ग के 576 चिकित्सकों में से 133 को अनापत्ति प्रमाण पत्र दिये गए हैं। सभी को अनापत्ति न मिलने के कारण मूल मेरिट सूची के अधिक छात्र-छात्राओं को प्रवेश मिलने क उम्मीद बढ़ गयी है। चिकित्सा शिक्षा विभाग अब अगले दो दिनों में हर हाल में काउंसिलिंग करने की रणनीति बना रहा है, ताकि सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना जैसी नौबत न आ सके।
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सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में काउंसिलिंग कराई जा रही है। पहले प्रवेश ले चुके छात्र आंदोलित हैं। अगले दो दिनों में कोई न कोई रास्ता निकालकर काउंसिलिंग को मूर्त रूप दिया जाएगा।
-डॉ.अनूप चंद्र पांडेय, प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा)
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पीएमएस संवर्ग के जिन चिकित्सकों ने नियमानुसार आवेदन किया था, उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र दे दिया गया था। अब छात्र-छात्राओं को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप काम करना चाहिए। वे अनावश्यक गतिरोध उत्पन्न कर रहे हैं, जिससे तनाव बढ़ रहा है।
-अरविंद कुमार, प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य)

नई पेंशन को शिक्षा विभाग में मशक्कत


-किसी पेंशन योजना से नहीं जुड़े 50 हजार से अधिक शिक्षक
-17 हजार पुलिस वालों को भी नहीं मिल रही सामाजिक सुरक्षा
राज्य ब्यूरो, लखनऊ : नयी पेंशन योजना से अधिकाधिक कर्मचारियों को जोडऩे के लिए वित्त विभाग ने सबसे पहले शिक्षा विभाग में मशक्कत शुरू करने का फैसला लिया है। अगले माह शिक्षा विभाग के अफसरों के साथ वित्त विभाग के अफसर बैठक करेंगे।
उत्तर प्रदेश में एक अप्रैल 2005 के बाद सेवा में आए सभी कर्मचारियों के लिए नयी पेंशन योजना लागू की गयी है। इसमें दस फीसद अंशदान कर्मचारी के वेतन से लेने और दस फीसद ही राज्य सरकार की ओर से जमा किये जाने का प्रावधान है। एक अप्रैल के बाद सेवा में आने वाले राज्य सरकार के 3.72 लाख कर्मचारियों में से अब तक महज 2.72 लाख कर्मचारी ही इसके दायरे में आ सके हैं। इस तरह एक लाख राज्य कर्मचारी अभी पेंशन योजना से जोड़े जाने हैं। इनके अलावा स्वायत्त व अन्य संस्थानों के कर्मचारी भी हैं। हालात ये हैं कि विभिन्न विभागों के एक लाख कर्मचारियों का पंजीकरण भी नयी पेंशन योजना के लिए हो चुका है किंतु उनके अंशदान जमा होने शुरू नहीं हुए हैं।
अब सरकार ने अगले एक साल में नयी पेंशन योजना से जुड़े कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर पांच लाख करने का फैसला किया है। प्रमुख सचिव (वित्त) राहुल भटनागर ने इसके लिए विभागीय स्तर पर जिम्मेदारियां तय करने के निर्देश दिये हैं। नयी पेंशन योजना से जुड़ाव के मामले में शिक्षा विभाग सबसे पीछे है। बेसिक शिक्षा विभाग के 43,146 व माध्यमिक शिक्षा विभाग के 11,013 कर्मचारी अब तक पेंशन के दायरे में नहीं आ सके हैं। शिक्षकों के बाद पुलिस विभाग के 17,192 कर्मचारी भी सामाजिक सुरक्षा की इस महत्वपूर्ण योजना का हिस्सा नहीं बन सके हैं। वित्त सचिव अजय अग्रवाल ने बताया कि नई पेंशन योजना से जोडऩे के लिए विभागवार सक्रियता बढ़ाई जाएगी। जिला स्तर पर कार्यशालाएं तो होंगी ही, केंद्रीय स्तर पर अभियान चलाने की पहल भी हो रही है। सबसे पहले शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ वित्त विभाग के अधिकारी बैठक करेंगे। अगले माह प्रस्तावित इस बैठक में हर शिक्षक को पेंशन योजना से जोडऩे के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाएगी। इसके बाद इसी तर्ज पर पुलिस अधिकारियों व पंचायती राज सहित अन्य विभागों के अधिकारियों को बुलाकर पेंशन योजना से सभी कर्मचारियों को जोडऩे की मुहिम चलाई जाएगी।

Tuesday, 24 May 2016

...तो उप्र में सीपीएमटी की जरूरत ही नहीं!

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-चिकित्सा शिक्षा महकमे में उठ रहे नीट के पक्ष में स्वर
-अध्यादेश का इंतजार, शासन को बताएंगे फायदा-नुकसान
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : मेडिकल व डेंटल कालेजों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तावित नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंटरेंस टेस्ट (नीट) के पक्ष में चिकित्सा शिक्षा महकमे में भी स्वर उठ रहे हैं। केंद्र द्वारा अध्यादेश जारी कर राज्यों को फैसला लेने की छूट दिये जाने के बाद शासन को फायदा-नुकसान का विश्लेषण कर जानकारी देने की तैयारी है। वैसे उत्तर प्रदेश में सीपीएमटी की जरूरत न होने के तर्क भी दिये जा रहे हैं।
नीट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश ने इस वर्ष नीट की अनिवार्यता का विरोध किया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश ने सीपीएमटी रद कर दिया था। अब इस मसले पर केंद्र सरकार द्वारा अध्यादेश जारी कर सरकारी कालेजों के लिए अपनी परीक्षा कराने की छूट दिये जाने के बाद सीपीएमटी पर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गयी है। इस बीच प्रदेश में विद्यार्थियों द्वारा नीट के समर्थन में खड़े होने की सूचनाएं भी मिल रही हैं। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा महकमे के कुछ अफसर सीपीएमटी की जरूरत को ही खारिज कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिन राज्यों ने नीट का विरोध कर अपनी परीक्षा कराने की बात कही थी, उनका बड़ा तर्क नीट के पर्चे की भाषा को लेकर था। केंद्र सरकार ने अध्यादेश के पक्ष में भी यही तर्क सबसे ऊपर रखा है। अब कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में तो हिंदी व अंग्र्रेजी में ही पर्चे होते हैं और नीट इन दोनों भाषाओं में होगी। ऐसे में यहां सीपीएमटी की जरूरत ही नहीं है। नीट के माध्यम से प्रवेश लेने पर छात्र-छात्राओं को अधिक परीक्षा से मुक्ति मिल जाएगी।
चिकित्सा शिक्षा विभाग में मंगलवार को इस मसले पर कई दौर चर्चा हुई। देर शाम तक अध्यादेश की प्रति न मिलने के कारण इस पर कोई फैसला नहीं हो सका। बुधवार तक अध्यादेश जारी होने की उम्मीद है। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग शासन को सीपीएमटी पर विस्तृत प्रस्ताव भेजेगा। वैसे सूत्रों के मुताबिक विभाग के भीतर सीपीएमटी के खिलाफ स्वर उठने के कारण अब शासन को दोनों पहलुओं पर विस्तृत प्रस्ताव भेजा जाएगा। बताया जाएगा कि छात्र-छात्राएं भी नीट ही चाहते हैं। यदि अब सीपीएमटी कराई गयी तो जुलाई से पहले नहीं हो पाएगी, इसलिए नीट के माध्यम से सूबे के सरकारी कालेजों में प्रवेश का विकल्प खुला है। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि अध्यादेश आने के बाद ही शासन स्तर पर कोई फैसला हो सकेगा।

इसी साल अपने 'घर' जाएं इंजीनियरिंग कालेज

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-मंत्री ने दिये निदेशकों को स्वयं सक्रियता बढ़ाने के निर्देश
-नए कालेजों में जल्द भरे जाएंगे शिक्षकों के 330 पद
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : दूसरे कालेजों में 'शरण' पाए राजकीय इंजीनियरिंग कालेजों को इसी साल अपने 'घर' भेज दिया जाएगा। इसके लिए प्राविधिक शिक्षा मंत्री ने निदेशकों को स्वयं सक्रियता बढ़ाने के निर्देश दिये हैं। नए कालेजों में शिक्षकों के 330 पद भी जल्द भरे जाएंगे।
प्रदेश में ताबड़तोड़ इंजीनियरिंग कालेज तो खोल दिये गए लेकिन उनके लिए आधारभूत ढांचा मुहैया नहीं कराया गया। इसके परिणामस्वरूप आज भी कई इंजीनियरिंग कालेज पराये 'घर' में संचालित हो रहे हैं। मैनपुरी व कन्नौज के इंजीनियरिंग कालेज एचबीटीआइ कानपुर में चल रहे हैं। मैनपुरी में अभी सिविल इंजीनियङ्क्षरग की पढ़ाई हो रही है और नए सत्र में दो और शाखाओं में बीटेक की शुरुआत होनी है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के साथ खुले कन्नौज कालेज में इस वर्ष तीन नयी शाखाओं में प्रवेश का प्रस्ताव है। सोनभद्र कालेज कंप्यूटर साइंस में पढ़ाई के साथ केएनआइटी सुलतानपुर में चल रहा है और इस वर्ष वहां दो और शाखाओं में पढ़ाई शुरू होनी है। इन कालेजों के लिए अलग निदेशक नियुक्त किये जा चुके हैं और भवन भी बन चुके हैं।
कई बार कोशिशों के बावजूद यह कालेज अपने परिसरों में स्थानांतरित नहीं हो पाए हैं। इस पर प्राविधिक शिक्षा मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) फरीद महफूज किदवई ने सख्त रुख अख्तियार किया है। उन्होंने सभी कालेजों के निदेशकों को बुलाकर साफ कहा है कि अगले दो महीने में रहा-सहा कामकाज निपटाकर हर हाल में सभी कालेज सत्र शुरू होने से पहले अपने नये परिसर में स्थानांतरित हो जाने चाहिए। इसके लिए इन कालेजों में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया तेज करने को कहा है। इन तीनों कालेजों में 46-46 शिक्षकों के साथ बांदा, बिजनौर, आजमगढ़ व अंबेडकर नगर में शिक्षकों के 48-48 पद सृजित किये जा चुके हैं। मंत्री ने इन सभी कालेजों के लिए 330 शिक्षकों की नियुक्ति समयबद्ध ढंग से जल्द करने के निर्देश दिये। नए कालेजों के स्थानांतरण व अन्य कामकाज के लिए मैनपुरी के निदेशक प्रो.एनबी सिंह को नोडल अधिकारी बनाया गया है। उन्होंने बताया कि सभी कालेजों में जो थोड़ा-बहुत काम बाकी है, उसे तेज रफ्तार से पूरा कराया जा रहा है। ये सभी कालेज वाई-फाई व हाइ-एंड हॉस्टल सहित उत्कृष्ट सुविधाओं से लैस होंगे। इन्हें जल्द ही अपने परिसरों में शिफ्ट किया जाएगा।

Monday, 23 May 2016

न पैसा खर्च कर पाए, न मरीज बुला सके


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-जारी हुई जिलावार रैंकिंग-
-राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों का 50.6 फीसद बजट ही सूबे में हुआ खर्च
-56 प्रतिशत तक घट गयी अस्पताल पहुंचे व भर्ती मरीजों की संख्या
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डॉ.संजीव, लखनऊ
बड़े-बड़े अस्पताल, अरबों रुपये खर्च, इसके बावजूद सेहत महकमा लक्ष्य नहीं पूरा कर सका है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में सेहत पर न तो पैसे खर्च पाए, न ही अस्पतालों तक मरीज बुला सके। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी जिलों की रैंकिंग को आधार माने तो राष्ट्रीय कार्यक्रमों का 50.6 फीसद बजट ही खर्च हो सका। अस्पताल में पहुंचे मरीजों की संख्या कुछ जिलों में 56 प्रतिशत तक घट गयी।
स्वास्थ्य विभाग ने 2015-16 में 25 अलग-अलग सूचकांकों को आधार बनाकर सभी 75 जिलों की रैंकिंग जारी की है। समग्र्र आंकड़ों के मुताबिक कुछ जिलों में तो 15 फीसद से कम बजट ही खर्च हो सका। निर्माण कार्यों के लिए मिले बजट का 81 फीसद धन खर्च हो सका। कुछ जिलों ने सौ फीसद खर्च किया तो कुछ दस फीसद पर ही सिमट गए। अस्पताल पहुंचे मरीजों की संख्या भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ सकी। कुल मरीजों की संख्या भले ही पिछले वर्ष 2014-15 की तुलना में 25.9 फीसद बढ़ी है, किन्तु औसतन 81 फीसद बेड ही भरे रह सके। कुछ जिलों में बाह्यï रोगी विभाग (ओपीडी) में मरीजों की संख्या 22 फीसद तक घटी, वहीं भर्ती होने पहुंचे मरीजों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 56 फीसद तक घट गयी है। अस्पताल तक प्रसव के लिए महज 75 फीसद महिलाएं ही पहुंच सकी हैं।
आयुष में अविश्वसनीयता
स्वास्थ्य विभाग ने अन्य बिन्दुओं के साथ आयुष विधा की ओपीडी में मरीजों की संख्या के आंकड़े भी मांगे थे। रिपोर्ट के मुताबिक आयुष ओपीडी के आंकड़े अत्यधिक अविश्वसनीय थे, इसलिए उन्हें स्वीकार ही नहीं किया गया। 73 जिलों के आंकड़ों को अविश्वसनीय मानकर खारिज कर दिया। इसलिए पूरी रिपोर्ट में आयुष ओपीडी के आंकड़े जोड़े ही नहीं गये।
28 बिन्दुओं पर रैंकिंग
स्वास्थ्य विभाग ने जिलावार रैंकिंग के लिए 28 बिन्दुओं को आधार बनाया। इनमें बाह्यï रोगी विभाग व भर्ती मरीजों की संख्या, पैथोलॉजी परीक्षण, संस्थागत प्रसव, टीकाकरण, नेत्र शल्य चिकित्सा, कंप्यूटरीकरण सहित 17 आधारों को बाह्यï सूचकांक और निर्माण व बजट के इस्तेमाल से जुड़े सात आधारों को आंतरिक सूचकांक माना गया। मातृत्व स्वास्थ्य के आधार पर चार सूचकांक थे।
ललितपुर रहा अव्वल
सर्वाधिक 107 अंकों के साथ ललितपुर जिला अव्वल पाया गया। शेष कोई जिला सौ अंकों तक नहीं पहुंच सका। दूसरे स्थान पर रहे बरेली को 99 अंक मिले हैं। 98 अंक के साथ फीरोजाबाद तीसरे स्थान पर रहा। चौथे स्थान पर झांसी को 97 व पांचवें स्थान पर मथुरा को 96 अंक मिले हैं।
कानपुर देहात फिसड्डी
रैंकिंग में सबसे पीछे रहा कानपुर देहात महज 57 अंक अर्जित कर सका है। सबसे नीचे की पांच रैंक में छह जिले हैं। बांदा को 59, कुशीनगर को 61 व फैजाबाद को 64 अंक मिले हैं। नीचे से पांचवें स्थान पर 65 अंक के साथ दो जिले चित्रकूट व फतेहपुर आए हैं।
ढीले अफसरों से मांगा जवाब
रैंकिंग के दौरान अलग-अलग बिन्दुओं पर आकलन हुआ है। इसमें पिछडऩे के लिए अफसरों की ढिलाई भी जिम्मेदार है। उनसे जवाब मांगा गया है। शासन, स्वास्थ्य निदेशालय व राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के स्तर पर सभी बिन्दुओं की मॉनीटङ्क्षरग हो रही है, ताकि मौजूदा वित्तीय वर्ष में उन्हें सुधारा जा सके।
-अरविंद कुमार, प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य)

Sunday, 22 May 2016

सूबे में नौ फर्जी विवि, जांच एसआइटी को


-यूजीसी की घोषणा के बाद भी नहीं लग पा रहा प्रभावी अंकुश
-इस बार फिर एलान के बाद सक्रिय हुआ उच्च शिक्षा महकमा
राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश में नौ फर्जी विश्वविद्यालय धड़ल्ले से सक्रिय हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इनकी स्पष्ट घोषणा के बाद भी उच्च शिक्षा विभाग इन पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। इस बार फिर यूजीसी के एलान के बाद सक्रिय हुए महकमे ने जांच एसआइटी को सौंप दी है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग हर साल पूरे देश के फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी करता है। इस बार भी आयोग ने पूरे देश में 22 फर्जी विश्वविद्यालयों की घोषणा की है, जिनमें नौ उत्तर प्रदेश के हैं। गंगा, यमुना के साथ सरस्वती का संगम सहेजे इलाहाबाद और भगवान कृष्ण की धरती मथुरा-वृन्दावन में सर्वाधिक दो-दो फर्जी विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं। इनके अलावा वाराणसी, कानपुर, अलीगढ़, प्रतापगढ़ व नोएडा में एक-एक फर्जी विश्वविद्यालय का संचालन हो रहा है। यूजीसी ने राजधानी लखनऊ के भारतीय शिक्षा परिषद को भी अवैध विश्वविद्यालय घोषित किया था किंतु परिषद ने अदालत की शरण ली और मामला अभी अदालत में है। यही कारण है कि यूजीसी ने अपनी फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची में लखनऊ के संस्थान को मुख्य सूची में न शामिल कर अलग से शामिल कर अदालत में मामला लंबित होने की बात कही है।
यूजीसी ने पहली बार इन फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची आम नहीं की है। हर साल यह प्रक्रिया होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में फर्जी विश्वविद्यालयों की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही है। इन विश्वविद्यालयों से फर्जी डिग्री लेकर लोग जनता को ठग रहे हैं और उन पर रोक नहीं लग पा रही है। इस बार फिर यह सूची आने पर उच्च शिक्षा विभाग सक्रिय हुआ है। उच्च शिक्षा विभाग के विशेष सचिव बीबी सिंह ने बताया कि फर्जी विश्वविद्यालय किसी एक निश्चित पते से संचालित नहीं होते, इसलिए दिक्कत होती है। हर बार इन पर अंकुश के लिए अभियान चलता है, किन्तु ये फिर गायब हो जाते हैं। इस बार मामले की जांच एसआइटी को दी गयी है। उच्च शिक्षा विभाग भी एसआइटी के साथ समन्वय कर रहा है। फर्जी कालेज बंद कराने के साथ उनके संचालकों को जेल भेजना सुनिश्चित किया जाएगा।
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यहां मिलती फर्जी डिग्री
-वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
-महिला ग्राम्य विद्यापीठ विश्वविद्यालय (महिला विश्वविद्यालय) प्रयाग, इलाहाबाद
-गांधी हिंदी विद्यापीठ प्रयाग, इलाहाबाद
-नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ इलेक्ट्रोकॉम्प्लेक्स होम्योपैथी, कानपुर
-नेताजी सुभाष चंद्र बोस मुक्त विश्वविद्यालय अचलताल, अलीगढ़
-उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय कोसीकला, मथुरा
-महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन विश्वविद्यालय, प्रतापगढ़
-इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद, नोएडा
-गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृन्दावन

Wednesday, 18 May 2016

पीजीएमईई : मेरिट बदली तो टॉप 200 में 189 पर पीएमएस


-सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर प्रस्तावित नयी मेरिट सूची
-खासे पीछे हुए मूल टॉपर, मंडरा रहा सीटें छिनने का खतरा
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डॉ.संजीव, लखनऊ
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर परास्नातक मेडिकल प्रवेश परीक्षा (पीजीएमईई) की प्रस्तावित मेरिट के टॉप 200 में 189 सीटों पर पीएमएस का कब्जा दिख रहा है। इस तरह फ्रेशर्स के लिए महज टॉप रैंकिंग की 11 सीटें ही बच रही हैं। ऐसे में मूल मेरिट सूची के टॉपर्स के खासे पीछे होने उनकी सीटें छिनने की आशंका है।
राज्य के मेडिकल कालेजों में परास्नातक सीटों पर ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा करने वाले सरकारी डॉक्टरों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ग्रामीण क्षेत्रों की सेवा के तीन वर्षों के लिए 30 अंक देकर नए सिरे से मेरिट बनाने के आदेश दिये हैं। इस पर विभाग ने  प्रस्ताव तैयार कर मुख्यमंत्री को भेजा है। प्रदेश की 779 सीटों में से आधी केंद्रीय कोटे से भरी जाती हैं। 390 सीटों के लिए प्रदेश स्तर पर परास्नातक प्रवेश परीक्षा कराई जाती है। इनमें से डिप्लोमा की 220 में 110 सीटों पर प्रांतीय चिकित्सा सेवा (पीएमएस) से नामांकन के आधार पर सीधे भरी जाती हैं। एमडी, एमएस की 171 में से 51 सीटें पीएमएस के लिए आरक्षित थीं। यूपी कोटे की शेष 120 सीटों के लिए अप्रैल में हुई काउंसिलिंग से प्रवेश लिए विद्यार्थी एक मई से मेडिकल कालेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। नई मेरिट में टॉप-200 में 189 में पीएमएस का कब्जा दिख रहा है। प्रवेश ले चुके 11 विद्यार्थी छात्र-छात्राएं ही इसमें शामिल हैं। ऐसे में शेष 109 विद्यार्थियों के प्रवेश निरस्त होने का खतरा है। इस बाबत 12 बिंदुओं के साथ सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से अपील के तर्क दिये गए हैं। जिनमें पहले ही प्रवेश ले चुके छात्र-छात्राओं का भविष्य खतरे में पडऩे, निजी क्षेत्र में सुपरस्पेशलिस्ट का संकट उत्पन्न होने जैसे तर्क भी शामिल हैं। डीजीएमई डॉ.वीएन त्रिपाठी ने कहा कि कोर्ट का फैसला सर्वोपरि है।
टॉपर की रैंक हो जाएगी 129
मौजूदा मेरिट सूची के टॉप 200 रैंकर्स ने 160 से 176 के बीच अंक पाए हैं। पीएमएस के 540 अभ्यर्थियों के अंकों में 30 फीसद अंक जोडऩे पर 15 के तो नंबर 200 से अधिक हो जाएंगे, जबकि पेपर ही कुल 200 नंबर का था। टॉपर की रैंक 129 हो जाएगी।

Tuesday, 17 May 2016

सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों में 'फोर स्टार' हॉस्टल-मेस


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-निदेशकों की बैठक में मुख्य सचिव ने दिये निर्देश
-सौर ऊर्जा के साथ वाई-फाई कैम्पस पर भी जोर
-इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट की लेंगे मदद
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों के हॉस्टल व मेस का स्वरूप अब बदलने वाला है। जल्द ही ये किसी 'फोर स्टार' होटल की तरह नजर आएंगे। मंगलवार को यहां सभी निदेशकों की बैठक में यह फैसला हुआ।
प्रदेश में सरकारी क्षेत्र के 14 इंजीनियरिंग कालेज संचालित हैं। प्राविधिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव मुकुल सिंघल ने मंगलवार को इन सभी के निदेशकों की बैठक बुलाई थी। बैठक में कहा गया कि सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों के सामने साख का संकट है और उन्हें कड़ा मुकाबला करना है। पढ़ाई-लिखाई मजबूत करने के साथ ही वहां पढऩे वाले छात्र-छात्राओं को उत्कृष्ट वातावरण मुहैया कराना भी जरूरी है। इसके लिए उनके खान-पान का स्तर ऊंचा करने पर जोर दिया गया। तय हुआ कि सभी कालेजों के छात्रावासों व मेस को आकर्षक स्वरूप दिया जाए। इनमें रहन-सहन व भोजन आदि का स्तर भी सुधारा जाए। इसके लिए केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय की संस्था लखनऊ स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट (आइएचएम) का सहयोग लिया जाएगा। बैठक में मौजूद आइएचएम के निदेशक से प्रमुख सचिव ने कहा कि इन कालेजों के हॉस्टल व मेस किसी भी 'फोर स्टार' होटल से कम न लगें। इसके लिए डिजाइन व अन्य प्रारूप समयबद्ध ढंग से तैयार किये जाने को कहा।
हर कालेज के पूरे कैम्पस को वाई-फाई करने की बात कही गयी। तय हुआ कि महज शैक्षणिक परिसर ही नहीं, छात्रावासों तक को वाई-फाई से कनेक्ट किया जाएगा, ताकि छात्र-छात्राओं को कोई समस्या न हो। सभी परिसरों को सौर ऊर्जा से जोडऩे के काम को तेज करने की बात भी कही गयी। बताया गया कि हर इंजीनियरिंग कालेज का औसत बिजली बिल डेढ़ से दो लाख रुपये प्रति माह के आसपास आता है। सौर ऊर्जा के माध्यम से यह राशि बचाई जा सकती है। इन सभी कामों पर होने वाला खर्च डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय वहन करेगा। प्रमुख सचिव ने कहा कि ये सभी काम अगले शैक्षिक सत्र की शुरुआत से पहले पूरी कर ली जाएं, ताकि नवप्रवेशी छात्र-छात्राओं को उसका लाभ मिल सके।
शिक्षक नियुक्ति दो माह में
इस ब ठक के लिए भेजी गयी सूचना में निदेशकों से शिक्षकों के खाली पदों का ब्योरा लेकर आने को कहा गया था। इसके बावजूद अधिकांश निदेशक यह ब्योरा लेकर नहीं आए थे। इस पर प्रमुख सचिव ने आक्रोश जाहिर किया। कहा कि संस्थानों के नेतृत्व की लापरवाही से उनके विकास में संकट आता है। उन्होंने अगले दो दिनों में पूरा ब्योरा भेजने को कहा, ताकि प्राविधिक विश्वविद्यालय के स्तर पर समय से भर्ती की प्रक्रिया शुरू हो सके। अगले दो माह में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।

आशा करें सबकी चिंता, उनकी चिंता को बना कोष

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-आपात स्थितियों में सहायता कोष से मदद
-सभी का बीमा भी कराएगा स्वास्थ्य विभाग
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य विभाग में जच्चा-बच्चा की चिंता करने वाली पहली कड़ी हैं। अब स्वास्थ्य विभाग उनकी चिंता की भी पहल कर रहा है। इसलिए उनका बीमा कराने के साथ अलग सहायता कोष भी बनाया जा रहा है।
प्रदेश में डेढ़ लाख आशा कार्यकर्ताओं के पद सृजित हैं। इनमें से एक लाख तीस हजार काम कर रही हैं। शेष की भर्ती प्रक्रिया चल रही है, जिनमें से सात हजार की नियुक्ति शहरी क्षेत्रों में की जानी है। आशा कार्यकताओं के जिम्मे न सिर्फ प्रसूतावस्था व उसके बाद जच्चा-बच्चा की देखरेख की जिम्मेदारी होती है, बल्कि संभावित प्रसूताओं की काउंसिलिंग भी उन्हें ही करनी होती है। इस कारण लंबे समय से मांग उठ रही थी कि जो आशा कार्यकर्ता सबकी चिंता करती हैं, उनकी चिंता भी की जानी चाहिए। इस पर स्वास्थ्य विभाग ने सभी आशा कार्यकर्ताओं का बीमा कराने का फैसला लिया है। इस बाबत व्यापक प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने बताया कि आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य विभाग के कामकाज की मजबूत कड़ी हैं। उनका बीमा करने के फैसले को मुख्य सचिव की हरी झंडी मिल गयी है। जल्द ही इस पर अमल किया जाएगा। आशा कार्यकर्ताओं को कामकाज के दौरान कई बार प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अभी कोई आपात स्थिति आने पर जिला स्तर पर मदद के साथ जिलाधिकारी की संस्तुति पर शासन स्तर से मदद कराई जाती है। अब आशा कार्यकर्ताओं के लिए अलग से 'आशा सहायता कोष' बनाने की तैयारी है। इस सहायता कोष से किसी भी आपात स्थिति में आशा कार्यकर्ताओं की मदद आसान हो जाएगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक आलोक कुमार ने बताया कि आशा बीमा व आशा सहायता कोष के लिए चालू वित्तीय वर्ष में 1.60 करोड़ रुपये की राशि आवंटित कर दी गयी है। दोनों योजनाओं के लागू होने से उनके कामकाज की रफ्तार बढ़ेगी।
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संगिनी की भूमिका का विस्तार
परिवार कल्याण कार्यक्रमों में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका और बढ़ाने की बात भी इस कार्ययोजना का हिस्सा है। आशा कार्यकर्ताओं की मजबूती के साथ हर 20 से 25 आशा कार्यकर्ताओं के बीच संगिनी की तैनाती तो कर दी गयी किन्तु अब उनकी भूमिका को विस्तार देने का फैसला हुआ है। अब यह सुनिश्चित किया जाएगा कि संगिनी सामान्य कार्यों के साथ अपनी टीम की आशा कार्यकर्ताओं की पूरी चिंता करें। उन्हें हर माह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की बैठक में भी जाना होगा। इसके लिए उन्हें अलग से प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। संगिनी के लिए 3.34 करोड़ रुपये मंजूर भी कर दिये गए हैं।

Monday, 16 May 2016

चार साल लूटी छात्रवृत्ति, अफसर जाएंगे जेल


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- पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 36 संस्थानों को काली सूची में डालने के आदेश
- मान्यता होगी वापस, अधिकारी और कर्मचारियों पर भी दर्ज होंगे मुकदमे
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के नए-नए मामले सामने आ रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 36 संस्थानों द्वारा चार साल तक छात्रवृत्ति लूटने की पुष्टि होने पर अफसरों व कर्मचारियों को निलंबित कर जेल भेजने का फैसला हुआ है। ऐसे 36 संस्थानों को काली सूची में डालकर उनकी मान्यता वापस लेने के आदेश भी हुए हैं।
पिछले वर्ष अगस्त में दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में गड़बड़ी करने वाले 200 संस्थान चिन्हित किये गए थे। हाल ही में इनमें से 36 संस्थानों में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में करोड़ों रुपये के घोटाले की पुष्टि हुई है। इन सभी में वित्तीय वर्ष 2011-12 से 2014-15 के बीच गड़बड़ी करने के आरोप हैं। समाज कल्याण निदेशक सुनील कुमार ने इस पर समाज कल्याण निदेशक को भेजे निर्देशों में कहा है कि 36 शिक्षण संस्थाओं में बड़े पैमाने पर फर्जी व छद्म विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश दर्शाकर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की करोड़ों रुपये की शासकीय धनराशि का अनियमित रूप से भुगतान प्राप्त किये जाने की पुष्टि हुई है। इनमें से अधिकांश शिक्षण संस्थान सहारनपुर व उसके आसपास के हैं। प्रमुख सचिव ने ऐसी सभी शिक्षण संस्थाओं को तत्काल काली सूची में डालने, मान्यता वापस लेने, शासकीय धनराशि की वसूली करने और प्रकरण में संलिप्त अधिकारियों व कर्मचारियों के विरुद्ध एफआइआर दर्ज कराकर आवश्यक विधिक कार्यवाही करने के निर्देश दिये हैं। साथ ही वित्तीय वर्ष 2011-12 से 2014-15 के बीच वहां तैनात जिला समाज कल्याण अधिकारियों को चिन्हित कर उन्हें निलंबित करने के निर्देश दिये हैं। यह भी कहा है कि उनके खिलाफ आरोप पक्ष गठित कर 15 दिन के अंदर शासन को उपलब्ध कराएं। प्रकरण में दोषी लिपिकों व अन्य कर्मचारियों के खिलाफ भी दंडात्मक कार्रवाई कर आख्या शासन को भेजें।
कई विभागों की मिलीभगत
जांच में सरकारी अफसरों की मिलीभगत की भी पुष्टि हुई है। प्रमुख सचिव के मुताबिक शिक्षण संस्थाओं द्वारा शिक्षा विभाग एवं सोशल सेक्टर के विभिन्न कल्याण अधिकारियों की मिलीभगत से अभिलेखों में गड़बड़ी कर फर्जी व छद्म छात्र-छात्राओं को अनुमन्य सीट से अधिक संख्या में नामांकन दर्शाकर गबन किया गया है। इतने बड़े पैमाने पर डाटा सत्यापित व अग्रसारित होना शिक्षा, समाज कल्याण, पिछड़ा वर्ग कल्याण व अल्पसंख्यक कल्याण विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है।
ऐसी-ऐसी गड़बडिय़ां
-12 शिक्षण संस्थानों के 179 छात्र-छात्राएं ऐसे पाए गए जिनका प्रवेश फर्जी व संदिग्ध अंक पत्रों के आधार पर किया गया। उनके नाम पर अनियमित तरीके से छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की राशि प्राप्त की गई।
-15 शिक्षण संस्थानों में कुल प्रवेश पाए विद्यार्थियों में 70 फीसद से अधिक अनुसूचित जाति के मिले। यह संख्या असामान्य रूप से अत्यधिक थी। बाद में अगली कक्षा में इनमें से 25 फीसद से भी कम छात्र-छात्राओं ने प्रवेश लिया।
-17 शिक्षण संस्थाओं ने वर्ष 2014-15 के दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति संबंधी छात्र-छात्राओं के आवेदन पत्रों में अपने संस्थान का मोबाइल नंबर दर्ज कराया, जो प्रकरण को पूर्णतया संदिग्ध बनाता है।
-10 शिक्षण संस्थानों में 131 छात्र-छात्राएं ऐसे पाए गए जिनका विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में दो-दो बार प्रवेश दर्शाया गया। दो संस्थानों ने स्वीकृत सीटों के दोगुने प्रवेश लिये तथा तीन ने ऐसे पाठ्यक्रमों में भी प्रवेश लिये, जिनकी मान्यता ही नहीं थी।
-दो आइटीआइ ऐसे मिले, निकी शुल्क प्रतिपूर्ति दर 480 रुपये प्रति विद्यार्थी निर्धारित थी। इसके विपरीत विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों की मदद से प्रति छात्र 36 हजार रुपये की दर से भुगतान कर 2.45 करोड़ रुपये का गबन किया गया।
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अब सरकारी पॉलीटेक्निक से बंटेगा पर्चा

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-'आउट' पर्चों ने बदली व्यवस्था-
-शासन के पर्यवेक्षक पर्चे लेकर निजी संस्थानों में जाएंगे
-इसी सप्ताह परीक्षा समिति की बैठक में होगा फैसला
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: पॉलीटेक्निक का पर्चा आउट होने की लगातार हो रही घटनाओं ने प्राविधिक शिक्षा विभाग को पर्चा वितरण की पूरी व्यवस्था बदलने पर मजबूर कर दिया है। अब निजी पॉलीटेक्निक संस्थानों को इस व्यवस्था से दूर कर सरकारी पॉलीटेक्निक से ही पर्चे बांटने की तैयारी है।
प्रदेश में चल रहे कुल 460 पॉलीटेक्निक में से 341 निजी क्षेत्र द्वारा संचालित हैं। सरकारी क्षेत्र के 101 व सहायता प्राप्त 18 पॉलीटेक्निक संचालित हो रहे हैं। पिछले दिनों वार्षिक परीक्षा में पहले एप्लाइड फिजिक्स, फिर एप्लाइड मैथ्स का पर्चा आउट होने के बाद समूचे प्राविधिक शिक्षा महकमे में हड़कंप है। प्रथमदृष्ट्या जांच में यह बाद स्पष्ट हो गयी है कि निजी पॉलीटेक्निक ही पर्चा आउट होने की प्रक्रिया के सबसे बड़े संवाहक हैं। अब निजी पॉलीटेक्निक पर शिकंजा कसते हुए पर्चा वितरण प्रक्रिया बदलने के साथ परीक्षा के दौरान अतिरिक्त बंदोबस्त करने की तैयारी है।
प्राविधिक शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार इसी सप्ताह होने वाली परीक्षा समिति की बैठक में पर्चों के वितरण की नयी व्यवस्था को मंजूरी के लिए रखा जाएगा। तब तक विशेष सचिव याद अली की अध्यक्षता में गठित जांच समिति की रिपोर्ट भी आ जाएगी। उक्त रिपोर्ट की संस्तुतियों को शामिल करते हुए पूरी व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा। इतना तय है कि अब पर्चों के वितरण की व्यवस्था से निजी पॉलीटेक्निक पूरी तरह दूर कर दिये जाएंगे। अब हर जिले में राजकीय पॉलीटेक्निक को नोडल केंद्र बनाकर पर्चे वहीं रखे जाएंगे। शासन स्तर पर हर पॉलीटेक्निक के लिए एक पर्यवेक्षक की नियुक्ति की जाती है। राजकीय पॉलीटेक्निक से पर्चों के पैकेट लेकर ये पर्यवेक्षक निजी पॉलीटेक्निक जाएंगे, जहां पर्चे खोलकर परीक्षा कराई जाएगी। प्राविधिक शिक्षा परिषद के सचिव एसके सिंह ने बताया कि परीक्षा समिति की बैठक में इस पर फैसला होते ही अमल कर दिया जाएगा।
एक पॉलीटेक्निक 'ब्लैकलिस्टेड'
पर्चा आउट होने के प्रकरण में संदिग्ध पायी गयी मथुरा के सहजादपुर पौड़ी फराह स्थित संस्था एडीफाई इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलीटेक्निक को 'ब्लैकलिस्टेड' कर दिया गया है। प्राविधिक शिक्षा निदेशक ओपी वर्मा ने बताया कि 13 मई को एप्लाइड फिजिक्स व एप्लाइड मैथ्स के पर्चे आउट होने के बाद उक्त संस्था को नोटिस दिया गया था। 15 मई को संस्था से मिले जवाब के बाद संबद्धता समिति की बैठक हुई। इसमें स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना गया। इसके बाद उक्त संस्था को 'ब्लैकलिस्टेड' करते हुए वहां प्रथम वर्ष के प्रवेश शून्य करने का फैसला हुआ है।

Sunday, 15 May 2016

परिवार कल्याण कार्यक्रमों पर अब रहेगी 'बाहरी नजर'


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-स्वास्थ्य विभाग कराएगा 'थर्ड पार्टी' मूल्यांकन, शासन से मिली मंजूरी
-प्रसव पूर्व से लेकर बाद तक के विविध आयामों पर मिलेगी निरपेक्ष रिपोर्ट
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डॉ.संजीव, लखनऊ
प्रदेश में परिवार कल्याण कार्यक्रमों के क्रियान्वयन व उनके संचालन से जुड़े तमाम आयामों पर अब 'बाहरी नजर' भी रहेगी। स्वास्थ्य विभाग ने इस वर्ष से इन कार्यक्रमों के 'थर्ड पार्टी' मूल्यांकन का प्रस्ताव किया था, जिसे शासन से मंजूरी मिल गयी है।
परिवार कल्याण से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों के संचालन में तमाम गड़बडिय़ों की शिकायतें मिलती रहती हैं। दरअसल अभी इनके क्रियान्वयन से लेकर निगरानी तक का पूरा जिम्मा स्वास्थ्य विभाग के पास ही है। पिछले वर्ष से निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाने की मुहिम शुरू हुई है किन्तु अभी उस पर प्रभावी अमल नहीं हो सका है। अब स्वास्थ्य विभाग अपनी निगरानी प्रणाली के साथ विभाग से बाहर के लोगों को जोडऩे की पहल कर रहा है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार के अनुसार प्रसव पूर्व सुविधाओं से लेकर प्रसव के बाद फॉलोअप व परिवार कल्याण कार्यक्रमों की जागरूकता तक सभी बिंदुओं पर बाहरी आकलन कराने का फैसला लिया गया है। इसके लिए स्वयंसेवी संगठनों, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे संगठनों व उनसे जुड़े लोगों का सहयोग लिया जाएगा। इसे 'थर्ड पार्टी इवैलुएशन सर्वे' नाम दिया गया है। पिछले दिनों मुख्य सचिव ने इस बाबत प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। साथ ही शुरुआती तौर पर इस कार्ययोजना के लिए एक करोड़ रुपये खर्च को हरी झंडी मिली है। जल्द ही इस पर अमल शुरू हो जाएगा। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग की कमियां निरपेक्ष रूप में सामने आएंगी, जिनका समाधान सुनिश्चित होगा।
क्षमता बढ़ाने पर रहेगा जोर
परिवार कल्याण कार्यक्रमों के निरपेक्ष मूल्यांकन के साथ ही इस पूरे अभियान से जुड़े लोगों की क्षमता बढ़ाने पर भी जोर रहेगा। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक आलोक कुमार के अनुसार हर मंडल मुख्यालय पर 'क्लीनिकल आउटरीच टीम्स' सक्रिय की जाएंगी। ये टीमें जरूरत पर दूरस्थ अंचलों तक जाकर परिवार कल्याण सेवाओं को मूर्त रूप देंगी। पहले चरण में 2.72 करोड़ रुपये आवंटित भी कर दिये गए हैं। सिफ्सा की मदद लेकर सेवा प्रदाताओं की क्षमता वृद्धि के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलेंगे। इसके लिए भी 1.05 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं। सारी प्रक्रिया ऑनलाइन करने के लिए 'लॉजिस्टिक मैनेजमेंट इनफॉर्मेशन सिस्टम' विकसित किया जा रहा है।
हर जिले में छह टीमें
प्रदेश सरकार में इस तरह 'थर्ड पार्टी' मूल्यांकन की पहल तकनीकी सहयोग इकाई के माध्यम से हुई है। इकाई के मुखिया विकास गोथलवाल के मुताबिक 25 जिलों से इसकी शुरुआत के लिए 150 टीमें बनायी गयीं। दूसरे चरण में 50 जिलों में इस योजना पर अमल का प्रस्ताव है। हर जिले में औसतन छह टीमें तैनात होंगी और वे ब्लॉक व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्तर तक योजनाओं के क्रियान्वयन व उसमें आ रही बाधाओं पर अपनी रिपोर्ट देंगी।

Thursday, 12 May 2016

'नीट' से चुने जाएंगे सूबे के 6500 'डॉक्टर'


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-अलग स्टेट रैंक से भरा जाएगा सरकारी कालेजों का 85 फीसद कोटा
-सौ सीटों संग बांदा का कालेज बढ़ा, अगले साल नौ और की तैयारी
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मेडिकल व डेंटल कालेजों में पढऩे वाले भविष्य के 6500 'डॉक्टर' नेशनल एलिजिबिलिटी कम इंटरेंस टेस्ट ('नीट') से चुने जाएंगे। इस वर्ष बांदा में एक नया मेडिकल कालेज शुरू हो जाने के साथ ही प्रदेश में सरकारी क्षेत्र में एमबीबीएस की 1860 सीटें हो जाएंगी।
प्राइवेट मेडिकल व डेंटल कालेजों की प्रवेश परीक्षा के बाद अब सरकारी कालेजों में प्रवेश के लिए होने वाले कंबाइंड प्री मेडिकल टेस्ट (सीपीएमटी) भी निरस्त होने के बाद प्रदेश में एमबीबीएस व बीडीएस की सभी सीटें सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार 'नीट' से भरी जाएंगी। इस समय निजी कालेजों में एमबीबीएस व बीडीएस की 4540 सीटें हैं। सरकारी क्षेत्र में बीडीएस की 100 सीटें हैं। प्रदेश में चल रहे 13 सरकारी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में एमबीबीएस की 1760 सीटें हैं। इस साल बांदा में नया मेडिकल कालेज शुरू होने जा रहा है। इसकी सौ सीटें मिलाकर एमबीबीएस की 1860 सीटें हो जाएंगी। ये सभी सीटें 'नीट' से भरी जाएंगी। इनमें 15 फीसद सीटें 'नीट' की आल इंडिया रैंकिंग से भरी जाएंगी, 85 फीसद सीटें 'नीट' की स्टेट रैंकिंग से भरी जाएंगी। उसके लिए अलग काउंसिलिंग भी संभावित है। शैक्षिक सत्र 2017-18 में चिकित्सा शिक्षा महकमा नौ और सरकारी मेडिकल कालेजों की तैयारी कर रहा है। इनमें बदायूं का निर्माण तेजी से चल रहा है, ग्र्रेटर नोएडा का आधारभूत ढांचा लगभग तैयार है और लोहिया संस्थान को बस कुछ मंजूरियों व एक भवन बनने का इंतजार है। फैजाबाद, बस्ती, शाहजहांपुर, फीरोजाबाद व बहराइच के जिला अस्पतालों से जोड़कर मेडिकल कालेजों को केंद्र सरकार की मंजूरी मिल चुकी है, वहीं बिजनौर के नजीबाबाद में मेडिकल कालेज की स्थापना प्रदेश सरकार के विकास एजेंडा का हिस्सा है।
एमसीआइ में करनी पड़ी मशक्कत
सरकारी मेडिकल कालेजों की मान्यता बचाए रखने के लिए चिकित्सा शिक्षा महकमे को भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) में खासी मशक्कत करनी पड़ी है। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने इस साल बांदा के साथ बदायूं के लिए भी आवेदन किया था, किन्तु कालेज का भवन तक न बने होने के कारण एमसीआइ ने खारिज कर दिया। अन्य कालेजों के लिए भी स्वयं प्रमुख सचिव डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय व महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी को दिल्ली जाकर एमसीआइ में शपथ पत्र देना पड़ा, तब पाठ्यक्रमों को हरी झंडी मिली। इलाहाबाद व मेरठ की आपत्तियों के निस्तारण के लिए ये लोग शुक्रवार को फिर एमसीआइ की शरण में जा रहे हैं।
कहीं मरीज कम, कहीं डॉक्टर
एमसीआइ ने सरकारी मेडिकल कालेजों का आकलन किया तो कहीं मरीज कम मिले तो कहीं डॉक्टर। इन आपत्तियों के साथ सरकार को चेतावनी भी दी गयी और दोबारा स्थितियां सही होने पर ही अनुमति मिल सकी है। सीटी स्कैन मशीनें तो ज्यादातर जगह नहीं हैं। सभी जगह लगवाने का शपथ पत्र देना पड़ा है। इलाहाबाद में आठ प्रतिशत डॉक्टर कम मिले और ईपीबीएक्स मशीन तक नहीं थी। आगरा में दस फीसद शिक्षक कम थे तो उनके आवास तक नहीं थे। मेरठ में मरीजों के इलाज के लिए पर्याप्त बेड के साथ 14 फीसद जूनियर डॉक्टर कम थे। सहारनपुर में महज 58.5 फीसद बेड भरे थे, तो कन्नौज में क्षमता के विपरीत 60 फीसद मरीज ही भर्ती हो रहे थे। जालौन व आजमगढ़ में 15 फीसद शिक्षक कम मिले।

Tuesday, 10 May 2016

पैसा बचा तो निजी संस्थानों तक पहुंचेगी छात्रवृत्ति

-पिछड़ा वर्ग विभाग नए सिरे से बना रहा दशमोत्तर नियमावली
-निजी संस्थानों को भी वरीयता के लिए तीन हिस्सों में बांटा
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : पिछड़ा वर्ग विभाग दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए नए सिरे से नियमावली बना रहा है। अब पहले सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति मिलेगी। इसके बाद पैसा बचा तो निजी संस्थानों के विद्यार्थी लाभान्वित होंगे।
पिछले वित्तीय वर्ष में कई कोशिशों के बावजूद भारी संख्या में छात्र-छात्राएं दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति पाने से वंचित रह गए थे। पिछड़ा वर्ग विभाग ने इस बार अभी से नियमावली में संशोधन प्रस्तावित किया है, ताकि शुरू से ही स्थिति स्पष्ट रहे। अभी तक संस्थान महज तीन हिस्सों में विभाजित थे, सरकारी, सहायता प्राप्त व निजी और इसी क्रम में उन्हें छात्रवृत्ति का वितरण होता था। अब इन्हें पांच हिस्सों में विभाजित किया गया है। पहली श्रेणी पूर्ण रूप से सरकारी संस्थानों की है, तो दूसरी श्रेणी सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों की है। सबसे पहले इन दोनों श्रेणियों के छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान होगा। इनसे बचने पर निजी संस्थानों के विद्यार्थी लाभान्वित होंगे, किंतु उनमें भी वरीयता सूची बनाते समय तीन श्रेणियां होंगी। सबसे पहले ऐसे संस्थानों के विद्यार्थियों को भुगतान होगा, जिन्हें सरकारी मान्यता प्राप्त है और जिनका शुल्क भी सरकार द्वारा निर्धारित किया गया है। इसके बाद उन संस्थानों की बारी आएगी, जिन्हें सरकारी मान्यता तो मिली हुई है किन्तु शुल्क शासन द्वारा निर्धारित नहीं है। सबसे अंत में निजी क्षेत्र के उन संस्थानों पर विचार होगा, जो अपना शुल्क स्वयं निर्धारित करते हैं।
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आय नहीं अंक बनेंगे आधार
वरीयता सूची बनाने में आय की जगह अंकों को आधार बनाने का प्रस्ताव भी नियमावली में किया गया है। अभी तक वार्षिक आय के आधार पर स्लैब बनाकर उसका 'वेटेज' निर्धारित किया जाता था। सिके साथ ही पिछली कक्षाओं के प्राप्तांक प्रतिशत के पांच स्लैब बनाकर उनके 'वेटेज' अंक निर्धारित किये गए थे। अब इसे भी बदलने का फैसला हुआ है। अब आय के आधार को समाप्त करते हुए प्राप्तांक प्रतिशत के स्लैब के आधार पर 'वेटेज' की व्यवस्था भी खत्म कर दी गयी है। अब प्राप्तांक प्रतिशत को ही आधार बनाकर वरीयता सूची बनाई जाएगी। अभी तक 33 फीसद तक दो, 33 से 45 तक चार, 45 से 60 तक छह 60 से 75 तक आठ व 75 फीसद से अधिक अंकों पर दस 'वेटेज' अंक मानकर वरीयता सूची बनती थी। अब जितने अंक होंगे, उतने ही 'वेटेज' अंक मानकर वरीयता का निर्धारण किया जाएगा। भुगतान करते समय पहले 11वीं व 12वीं के विद्यार्थियों की चिंता की जाएगी, उसके बाद अन्य छात्र-छात्राओं का भुगतान होगा।

...तो दान पाकर मजबूत होंगे मेडिकल कालेज

-चिकित्सा शिक्षा विभाग दान के लिए बना रहा नियमावली
-आइआइटी की तर्ज पर पूर्व छात्रों को भी जोडऩे की पहल
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश में एक आइआइटी है और 14 मेडिकल कालेज। एसजीपीजीआइ और लोहिया संस्थान जैसे उच्च स्तरीय केंद्र अलग। इसके बावजूद आइआइटी को पूर्व छात्रों से मिलने वाली मदद करोड़ों रुपये में है और मेडिकल कालेजों को नगण्य। अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पहल के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग दान पाकर मेडिकल कालेजों को मजबूत करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए नियमावली बनाने की शुरुआत की गयी है।
आइआइटी कानपुर में हर साल होने वाले पूर्व छात्र सम्मेलन कई गतिविधियों के साथ पूर्व छात्र-छात्राओं द्वारा अपने संस्थान को करोड़ों रुपये की मदद देने का माध्यम भी बनते हैं। वहां परिसर की कई नई इमारतें व गेस्ट हाउस आदि भी पूर्व छात्र-छात्राओं ने धन एकत्र कर बनवाई हैं। इसके विपरीत लगभग सभी मेडिकल कालेजों में हर साल पूर्व छात्र सम्मेलन होते हैं। इस दौरान मस्ती भी होती है और उल्लास भी किंतु ये सम्मेलन अपने संस्थान को कुछ 'वापस' करने का माध्यम नहीं बन पाते। इसके लिए कुछ वर्ष पूर्व नियोजित पहल भी हुई। तब शासनादेश भी जारी हुआ था ताकि दानदाताओं को परेशानी न हो। इसके बावजूद स्थितियां जस की तस रहीं।
अब रविवार को केजीएमयू में मुख्यमंत्री द्वारा मेडिकल कालेजों में दान स्वीकार किये जाने की घोषणा के बाद स्थितियां बदलने की उम्मीद जगी है। प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय के मुताबिक मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप मेडिकल कालेजों को दान के प्रति जागरूकता व इसे बढ़ावा देने के लिए नियमावली बनाई जाएगी। उन्होंने अधिकारियों से पहले बनी नियमावली ढूंढऩे को कहा है। उसे तात्कालिक जरूरतों के अनुरूप विस्तार दिया जाए। इसमें आयकर छूट जैसे बिंदु भी जोड़े जाएंगे, ताकि अधिक से अधिक लोग दान देने की प्रक्रिया से जुड़ सके। अगले कुछ दिनों में विस्तृत नियमावली बनाकर मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी, फिर उसे सभी मेडिकल कालेजों में लागू किया जाएगा।
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'गिव बैक' की होगी पहल
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने कहा कि किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए उसके पूर्व छात्र-छात्राएं बड़े दानदाता होते हैं। इसलिए दान के लिए नियमावली बनने के साथ ही सभी कालेजों की एल्युमिनी एसोसिएशन के माध्यम से पूर्व छात्र-छात्राओं से संवाद किया जाएगा। आइआइटी की तर्ज पर यहां भी 'गिव बैक' की पहल होगी और देश-दुनिया में छाए उत्तर प्रदेश के मेडिकल कालेजों के पूर्व छात्र-छात्राएं इसमें पीछे नहीं रहेंगे।

Thursday, 5 May 2016

सीपीएमटी 17 को होगी, भले ही सिर्फ आयुष सीटें भरें


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-डेढ़ लाख आवेदकों में असमंजस पर शासन को भेजा प्रस्ताव
-बीएचएमएस, बीएएमएस और बीयूएमएस में इस्तेमाल होगी रैंकिंग
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मेडिकल व डेंटल कॉलेजों में प्रवेश के लिए नेशनल एलिजिबिलिटी कम इंटरेंस टेस्ट ('नीट') की अनिवार्यता के बाद उत्तर प्रदेश कंबाइंड प्री मेडिकल टेस्ट (सीपीएमटी) का आयोजन तो 17 मई को होगा, भले ही उससे सिर्फ आयुष की सीटें भरी जाएं। सीपीएमटी के लिए आवेदन करने वाले डेढ़ लाख छात्र-छात्राओं का असमंजस समाप्त करने के लिए चिकित्सा शिक्षा विभाग ने शासन को इस आशय का प्रस्ताव भेजा है।
प्रदेश में सरकारी व निजी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए सीपीएमटी 17 मई को प्रस्तावित है। इस बीच 'नीट' का आदेश होने के बाद छात्र-छात्राओं में इस परीक्षा को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही थी। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने मामले में विधिक राय ली, तो कहा गया कि एमबीबीएस व बीडीएस की सीटें यदि 'नीट' से भर भी ली जाती हैं तो सरकारी होम्योपैथी, आयुर्वेदिक व यूनानी कालेजों में बीएचएमएस, बीएएमएस व बीयूएमएस की 800 सीटों के लिए तो सीपीएमटी की उपयोगिता बनी ही रहेगी। वैसे यह भी माना जा रहा है कि अभी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, इसलिए इस वर्ष के लिए अदालत के फैसले की प्रतीक्षा की ही जानी चाहिए। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने शासन को विधिक राय के साथ पूरा प्रस्ताव भेजा है। इसमें कहा गया है कि सीपीएमटी 17 मई को ही कराई जाए। इस संबंध में प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने बताया कि सीपीएमटी की तैयारियां पूरी हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान करते हुए ही हर फैसला होगा। 'नीट' से एमबीबीएस व बीडीएस भरने के बावजूद सरकारी कालेजों में आयुष पाठ्यक्रमों (बीएएमएस, बीएचएमएस व बीयूएमएस) में प्रवेश के लिए सीपीएमटी की रैंकिंग का प्रयोग किया जा सकेगा।
बचे छात्र भरेंगे 'नीट-2'
यूपीसीपीएमटी के लिए पौने दो लाख विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया था। इनमें से डेढ़ लाख ने फॉर्म भरा है। इनमें से अधिकांश ने एक मई को हुए ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट (एआइपीएमटी) का फॉर्म भरा था। इसे ही 'नीट-1' का दर्जा दे दिया गया है। जो विद्यार्थी 'नीट-1' में नहीं भाग ले सके, उन्हें 24 जुलाई को प्रस्तावित 'नीट-2' में भाग लेने का मौका मिलेगा। 'नीट-2' की आवेदन प्रक्रिया सीपीएमटी के बाद 21 मई से शुरू होगी। माना जा रहा है कि सीपीएमटी के बाद ही विद्यार्थी 'नीट-2' का फार्म भरेंगे। वैसे चिकित्सा शिक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में ऐसे छात्रों की संख्या बहुत कम रहेगी।

तीन सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों को स्वायत्तता


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-बिजनौर, अंबेडकर नगर व बांदा में सोसायटी बनाकर संचालन
-एआइसीटीई से मान्यता की प्रक्रिया शुरू, छह माह में अमल
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : गोरखपुर के एमएमएमआइटी और कानपुर के एचबीटीआइ को विश्वविद्यालय का दर्जा देने के बाद प्रदेश सरकार तीन राजकीय इंजीनियरिंग कालेजों को जल्द स्वायत्तता मिल जाएगी। बिजनौर, अंबेडकर नगर व बांदा इंजीनियरिंग कालेजों के संचालन को सोसायटी बनाकर स्वायत्तता देने पर अमल शुरू हो गया है।
उत्तर प्रदेश में तकनीकी शिक्षा के बड़े हिस्से की कमान डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) के पास है। ढाई साल पहले एकेटीयू से संबद्ध गोरखपुर के मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज को प्राविधिक विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया था। इस वर्ष कानपुर के हरकोर्ट बटलर टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट को प्राविधिक विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया है। अब एकेटीयू से सरकारी क्षेत्र के 13 इंजीनियरिंग कालेज संबद्ध हैं। इनमें से आइईटी लखनऊ के साथ बांदा, बिजनौर, आजमगढ़ व अंबेडकर नगर के राजकीय इंजीनियरिंग कालेज एकेटीयू के घटक कालेज के रूप में संचालित हो रहे हैं।
घटक संस्थान होने के कारण इनसे जुड़े फैसले एकेटीयू ही लेता है। आइईटी व एकेटीयू की खींचतान तो आम बात हो गयी है, अन्य कालेजों के फैसलों में भी कई दफा विलंब की शिकायत आती रहती है। प्रदेश सरकार ने अब बिजनौर, अंबेडकर नगर व बांदा के इंजीनियरिंग कालेजों को स्वायत्तता देने का फैसला किया है। प्राविधिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव मुकुल सिंहल के मुताबिक इन तीनों संस्थाओं को सोसायटी बनाकर संचालित किया जाएगा। इससे वे तात्कालिक फैसले ले सकेंगे और कामकाज की रफ्तार भी बढ़ेगी। इन तीनों कालेजों को अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) से मान्यता की प्रक्रिया शुरू हो गयी है। एआइसीटीई की टीम इनका निरीक्षण भी कर चुकी है। इस बाबत सकारात्मक रिपोर्ट आई है और अगले छह माह में स्वायत्तता की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। इन तीनों के बाद आजमगढ़ के राजकीय इंजीनियरिंग कालेज को स्वायत्तता की पहल होगी।
शुरू होंगे 26 नए पॉलीटेक्निक
प्रदेश के 26 नए पॉलीटेक्निक संस्थानों को एआइसीटीई की मान्यता मिल गयी है। अब इनका संचालन शैक्षिक सत्र 2016-17 से शुरू हो जाएगा। खुर्द मवाना (मेरठ), छपरौली (बागपत), कोटवन (मथुरा), डिबाई (बुलंदशहर), सुंदुरिया व चोपन (सोनभद्र), राजगढ़ व चुनार (मिर्जापुर), बिंदकी (फतेहपुर), संतकबीर नगर, चरियांव (देवरिया), किनौरा (सुलतानपुर), अलिया (सीतापुर), पूरनपुर (पीलीभीत), बीघापुर (उन्नाव) के राजकीय पालीटेक्निक इस साल शुरू होंगे। इसी तरह कासगंज, अलीगढ़, माती (कानपुर देहात), दिबियापुर (औरैया), कन्नौज, कुशीनगर, महाराजगंज, संत कबीर नगर, सिद्धार्थ नगर, कौशांबी व श्रावस्ती में महामाया पॉलीटेक्निक ऑफ इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी को भी एआइसीटीई की हरी झंडी मिल गयी। प्राविधिक शिक्षा विभाग ने ढोलना (हापुड़), शामली, खीरी व चंदौली में भी नए पॉलीटेक्निक के लिए एआइसीटीई में आवेदन किया था, किन्तु इन्हें मंजूरी नहीं मिली है।

Wednesday, 4 May 2016

राज्यकर्मियों के आश्रित चुन सकेंगे नई या पुरानी पेंशन

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-नई योजना से ज्यादा कर्मचारियों को जोडऩे की है कोशिश
-पुलिस, शिक्षा व पंचायत विभागों में नहीं हुआ पूरा अमल
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : नई पेंशन योजना से ज्यादा कर्मचारियों को जोडऩे के लिए अब उनकी चिंताएं कम करने का लक्ष्य है। नई पेंशन चुनने वालों की आकस्मिक मृत्यु होने पर उनके आश्रित पुरानी पेंशन योजना के अनुरूप पारिवारिक पेंशन का लाभ उठाने या नई पेंशन योजना में ही बने रहने का फैसला कर सकेंगे। वित्त विभाग ने इस आशय का आदेश जारी कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में एक अप्रैल 2005 या उसके बाद नौकरी पाने वाले कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना लागू की गयी थी। इसमें कर्मचारियों के कुल वेतन का दस फीसद धनराशि पेंशन फंड में जमा होती है और उतनी ही धनराशि प्रदेश सरकार भी जमा करती है। इससे अभी दो लाख कर्मचारी लाभान्वित हैं, किंतु पुलिस, शिक्षा व पंचायत विभागों में पूरा अमल नहीं हो सका है। इन विभागों में एक लाख से अधिक कर्मचारी ऐसे हैं, जो किसी भी पेंशन योजना से आच्छादित नहीं हैं। वित्त विभाग के सचिव अजय अग्र्रवाल के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2016-17 के बजट में इन कर्मचारियों के सरकारी अंशदान के लिए धन का प्रावधान भी कर दिया गया है। अब प्रदेश सरकार के वित्त विभाग ने राष्ट्रीय स्तर पर नई पेंशन योजना के समन्वय की जिम्मेदारी संभाल रहे पेंशन निधि विनियामक एवं विकास प्राधिकरण के अधिकारियों के साथ इस योजना से अधिकाधिक कर्मचारियों को जोडऩे का अभियान शुरू किया है।
सरकार नई पेंशन योजना को लेकर कर्मचारियों की चिंता दूर करने की रणनीति बना रही है। अधिकारियों का मानना है कि हर व्यक्ति अपनी आकस्मिक मृत्यु की स्थिति में परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहता है। अभी तक नई पेंशन योजना से आच्छादित कर्मचारी की मृत्यु होने पर आश्रितों को पुरानी योजना के तहत आंकलन कर पारिवारिक पेंशन मिलने लगती थी। इस दौरान अब तक की नौकरी में जमा कर्मचारी व सरकारी अंशदान सरकार का हो जाता था। अब कर्मचारी के आश्रितों को चयन का मौका दिया जाएगा। आदेश में कहा गया है कि कर्मचारी के आश्रित यदि चाहें तो नई पेंशन योजना के लाभों से जुड़ सकते हैं। अभी तक की स्थितियों में इस योजना में दस फीसद से अधिक रिटर्न की दर से लाभ मिल रहे हैं। ऐसे में वे आकलन कर फैसला ले सकेंगे। यदि वे नई पेंशन योजना चुनते हैं तो उन्हें उनकी व सरकार की ओर से जमा पूरी धनराशि उन्हें दे दी जाएगी।
कर्मचारी निकाल सकेंगे धन
नई पेंशन योजना में अभी एक समस्या बीच में धन निकासी न होने की भी आ रही थी। इसके विपरीत पुरानी पेंशन योजना से जुड़े कर्मचारी जरूरत पर कर्मचारी भविष्य निधि (जीपीएफ) से पैसे निकाल लेते हैं। वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन कुमार के अनुसार अब नई पेंशन योजना के कर्मचारी भी जरूरत के अनुरूप धन निकासी कर सकेंगे। माना जा रहा है कि इन प्रावधानों से अधिक कर्मचारी नई पेंशन योजना से जुड़ेंगे। कुल मिलाकर चालू वित्तीय वर्ष में एक लाख से अधिक लाभार्थी बढऩे की उम्मीद की जा रही है।

Tuesday, 3 May 2016

पास को बताया फेल, नहीं मिली छात्रवृत्ति

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-दशमोत्तर शुल्क प्रतिपूर्ति में गड़बडिय़ों की भरमार
-विश्वविद्यालयों की गलती, सजा हजारों विद्यार्थियों को
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : पारदर्शिता के तमाम दावों के बावजूद दशमोत्तर छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति में गड़बडिय़ों की भरमार सामने आ रही है। ऐसे हजारों विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति नहीं मिल सकी, जिन्हें पास होने के बावजूद विश्वविद्यालयों ने फेल दिखा दिया।
वित्तीय वर्ष 2015-16 की शुरुआत से ही समाज कल्याण विभाग, पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग व अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति योजना में पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावे किये थे। इसके बावजूद वित्तीय वर्ष के आखिरी दिन तक छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति छात्र-छात्राओं के खाते में भेजने का उपक्रम चलता रहा। इसके बावजूद भारी संख्या में छात्र-छात्राएं शुल्क प्रतिपूर्ति पाने से वंचित रह गए। इस मामले में पड़ताल हुई तो पता चला कि विश्वविद्यालयों ने परीक्षा परिणाम भेजने में मनमानी की। तमाम विद्यार्थी उत्तीर्ण हो गए थे, किन्तु विश्वविद्यालयों ने उन्हें अनुत्तीर्ण दिखा दिया। पिछड़ा वर्ग विभाग ने मामले को गंभीरता से लेकर पड़ताल कराई तो ऐसे विद्यार्थियों की संख्या 35 हजार निकली है। सामान्य, अनुसूचित जाति व अल्पसंख्यक वर्ग के छात्र-छात्राओं की संख्या भी 60 हजार से ऊपर मानी जा रही है। ये सभी छात्र-छात्राएं संबंधित निदेशालयों के चक्कर लगा रहे हैं, किन्तु उन्हें निराशा ही हाथ लग रही है। वे जिला कार्यालय जाते हैं तो उन्हें लखनऊ जाने को कह दिया जाता है। अब इन सभी विद्यार्थियों से जिला स्थित विभागीय कार्यालयों में आवेदन करने को कहा गया है, ताकि उनके प्रमाण पत्रों का सत्यापन कराकर भुगतान की पहल हो सके।
पिछड़ा वर्ग विभाग में अनुमति
पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की निदेशक पुष्पा सिंह के अनुसार विश्वविद्यालयों द्वारा गलत परीक्षा परिणाम भेजे जाने के कारण विद्यार्थियों को दिक्कत हो रही थी। ऐसे में विभाग ने ऐसे सभी विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति देने का फैसला किया है। जो वास्तव में उत्तीर्ण हैं किन्तु विश्वविद्यालयों ने उन्हें अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया है। जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारियों से रिपोर्ट मांगकर ऐसे सभी विद्यार्थियों के खाते में धन भेजा जाएगा।
अन्य विद्यार्थी करें प्रत्यावेदन
समाज कल्याण विभाग में छात्रवृत्ति प्रभारी पीके त्रिपाठी के मुताबिक विश्वविद्यालयों से भेजे गए परीक्षा परिणाम ऑनलाइन मिलाए गए थे। जिनके गलत परिणाम विश्वविद्यालयों ने भेजे हैं, उनके साथ दिक्कत हुई है। विद्यार्थी जिला समाज कल्याण अधिकारी कार्यालयों में प्रत्यावेदन करें। उसके बाद उनके आवेदन पर विचार कर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति भुगतान पर फैसला किया जाएगा।

Monday, 2 May 2016

छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति आवेदन 31 अगस्त तक

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-पूर्वदशम् व दशमोत्तर छात्रवृत्ति की समय सारिणी जारी
-31 दिसंबर तक खातों में धनराशि पहुंचाने का लक्ष्य
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए पूर्वदशम् छात्रवृत्ति व दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की समय सारिणी जारी कर दी गयी है। इसके अंतर्गत छात्र-छात्राएं 31 अगस्त तक आवेदन कर सकेंगे। 31 दिसंबर तक प्रक्रिया पूर्ण कर खातों में धनराशि पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
समाज कल्याण, जनजाति विकास, पिछड़ा वर्ग कल्याण व अल्पसंख्यक कल्याण विभागों के लिए मुख्य सचिव द्वारा जारी शासनादेश में छात्र-छात्राओं के लिए आवेदन की तिथि एक जुलाई से 31 अगस्त तक निर्धारित की गयी है। पूर्वदशम् छात्रवृत्ति के मामले में जिला स्तर से सत्यापन की प्रक्रिया 17 सितंबर तक पूरी कर ली जाएगी। एनआइसी की राज्य इकाई पांच अक्टूबर तक सत्यापन पूरा कर डेटा वापस भेज देगी। जनपदीय छात्रवृत्ति समिति 15 अक्टूबर तक स्वीकृत डेटा लॉक कर देगी। कक्षा नौवीं व दसवीं के छात्र-छात्राओं को दस दिसंबर तक उनके खाते में धनराशि हस्तांतरित कर दी जाएगी।
दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के मामले में प्रदेश व प्रदेश के बाहर की संस्थाएं मास्टर डेटाबेस में शामिल होने के लिए एक मई से 15 जुलाई तक आवेदन कर सकेंगी। 31 अगस्त तक हर स्तर पर पाठ्यक्रमों व संस्थाओं के सत्यापन का काम पूरा कर लिया जाएगा। इस बीच छात्र-छात्राएं भी आवेदन कर चुके होंगे। 31 अक्टूबर तक जनपदीय छात्रवृत्ति समिति इन आवेदनों पर फैसला ले लेगी। इसके बाद प्रक्रिया पूरी कर 31 दिसंबर तक सभी छात्र-छात्राओं के खाते में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान हो जाएगा।
31 तक करें प्रत्यावेदन
समाज कल्याण विभाग ने दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति पाने से वंचित अनुसूचित जाति के लाभार्थियों को प्रत्यावेदन के लिए 31 मई तक का मौका दिया है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन करने वाले अनुसूचित जाति वर्ग के तमाम छात्र-छात्राओं के आवेदन निरस्त हो गए हैं। भारी संख्या में छात्र-छात्राएं समाज कल्याण निदेशालय पहुंच कर इसकी शिकायत कर रहे थे। इस पर विभाग ने उन्हें 31 मई तक अपने प्रत्यावेदन जिला समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में जमा करने का समय दिया है। इसके बाद जिला स्तर पर उनका पर्यवेक्षण कर फॉर्म भेजे जाएंगे और इन छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान हो सकेगा।

अब कसेगा निजी मेडिकल कालेजों पर शिकंजा

-शासन ने शुरू की फीस निर्धारण की प्रक्रिया
-ज्यादा फीस निर्धारण की कोशिश कर रहे कालेज
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : मेडिकल व डेंटल कॉलेजों में प्रवेश के लिए नेशनल एलिजिबिलिटी कम इंटरेंस टेस्ट (नीट) की अनिवार्यता के बाद निजी मेडिकल कॉलेजों पर शिकंजा कसेगा। शासन ने जहां उनके फीस निर्धारण की प्रक्रिया शुरू कर दी है, वहीं कॉलेज भी अब अपने सभी संपर्कों का प्रयोग अधिकाधिक फीस निर्धारण में करेंगे।
उत्तर प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में कुल 61 निजी कॉलेज हैं। इनमें सर्वाधिक 23 डेंटल कॉलेज हैं। इनके अलावा 17 मेडिकल, 11 यूनानी, आठ आयुर्वेदिक व दो होम्योपैथी कॉलेज भी निजी क्षेत्र द्वारा संचालित हैं। अभी तक इन सभी विधाओं के निजी कॉलेज अपनी-अपनी एसोसिएशन के माध्यम से अलग प्रवेश परीक्षा कराकर भर्ती कर लेते थे। इस कारण इनकी मनमानी भी चलती थी और फीस वसूली में तो कोई अंकुश ही नहीं था। नीट लागू होने के बाद इन कॉलेजों को अपनी प्रवेश परीक्षा के माध्यम से प्रवेश लेने का मौका नहीं मिलेगा, ऐसे में ये छात्र-छात्राओं के अभिभावकों से डीलिंग कर मनमानी फीस भी नहीं ले सकेंगे। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आते ही चिकित्सा शिक्षा विभाग ने निजी कॉलेजों की फीस तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
विभाग के प्रमुख सचिव डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने अधिकारियों के साथ बैठक कर फीस निर्धारण के लिए कमेटी बनाई है। इसके लिए निजी कॉलेजों का आर्थिक लेखा-जोखा मांगा गया है। अगले सप्ताह से दो बार में सभी मेडिकल कॉलेजों, तीन बार में सभी डेंटल कॉलेजों व फिर आयुर्वेदिक, होम्योपैथी व यूनानी कालेजों को अपने तीन साल के खर्च के ब्योरा के साथ तलब किये जाने की प्रक्रिया शुरू होगी। ऐसे में निजी कॉलेज संचालक भी अब अधिक से अधिक शुल्क निर्धारण की कोशिशों में लग गए हैं। इसके लिए राजनीतिक दबाव बनाने से लेकर अपने खर्च का ब्योरा पेशकर शुल्क निर्धारण तक की तैयारी हो रही है।
होती है चार गुना तक वसूली
वर्ष 2005 में निजी मेडिकल कालेजों कालेजों के एमबीबीएस पाठयक्रम में प्रवेश लेने वाले छात्र-छात्राओं के लिए 4.10 लाख रुपये प्रति वर्ष शुल्क निर्धारित किया गया था। प्रदेश का कोई भी निजी मेडिकल कॉलेज यह शुल्क नहीं लेता है। इसके विपरीत 12 से 16 लाख रुपये तक वार्षिक शुल्क लिया जाता है। बीडीएस पाठ्यक्रमों में पांच से छह लाख रुपये प्रति वर्ष तक शुल्क है। इसी तरह बीएचएमएस, बीएएमएस व बीयूएमएस पाठ्यक्रमों में मनमाने ढंग से दो से पांच लाख रुपये प्रति वर्ष तक शुल्क लिया जाता है।

Sunday, 1 May 2016

रैंकिंग से चुनिये अपना इंजीनियरिंग कालेज


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-निजी कालेजों की मनमानी रोकने को प्राविधिक शिक्षा विभाग की पहल
-जून में काउंसिलिंग से पहले विद्यार्थियों के सामने स्पष्ट होगी स्थिति

डॉ.संजीव, लखनऊ
केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न संस्थानों को रैंकिंग दिये जाने के बाद अब प्रदेश का प्राविधिक शिक्षा महकमा सूबे के इंजीनियरिंग कालेजों को रैंकिंग देने की तैयारी कर रहा है। जून में प्रवेश के लिए काउंसिलिंग शुरू होने से पहले रैंकिंग जारी कर स्थिति स्पष्ट कर दी जाएगी, जिससे छात्र-छात्राओं को अपना संस्थान चुनने में आसानी रहे।
प्रदेश में इस समय इंजीनियरिंग शिक्षा पर नियंत्रण का जिम्मा मूल रूप से डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) के पास है। विश्वविद्यालय से संबद्ध 292 इंजीनियरिंग कालेजों से बीटेक की 1,44,778 सीटें संबद्ध हैं। इसमें संयुक्त प्रवेश परीक्षा के माध्यम से प्रवेश होते हैं। देखा गया है कि कालेज स्थितियां स्पष्ट किये बिना छात्र-छात्राओं को भ्रमित करते हैं और वे उपयुक्त कालेज का चयन नहीं कर पाते हैं। अब प्राविधिक शिक्षा विभाग ने इन स्थितियों के समाधान का फैसला किया है। विभाग के प्रमुख सचिव मुकुल सिंहल के मुताबिक एकेटीयू से संबद्ध सभी कालेजों की रैंकिंग जारी की जाएगी। इस बार संयुक्त प्रवेश परीक्षा का परिणाम हर हाल में 31 मई के पहले घोषित कर दिया जाएगा और जून में पहली काउंसिलिंग करा दी जाएगी। इसके बाद दूसरी काउंसिलिंग जुलाई मध्य तक समाप्त हो जाएगी, ताकि एक अगस्त से हर कालेज में पहले सेमेस्टर की पढ़ाई शुरू हो सके। काउंसिलिंग के पहले कालेजों की रैंकिंग जारी कर दी जाएगी, ताकि विद्यार्थी कालेज चयन का फैसला कर सकें। इस साल इंजीनियरिंग कालेजों की रैंकिंग के बाद अगले साल से प्रबंधन व अन्य संस्थानों की रैंकिंग भी जारी की जाएगी।
आंतरिक मूल्यांकन से दूरी
रैंकिंग करते समय इन कालेजों के आंतरिक मूल्यांकन से दूरी बनाई जाएगी। अभी परीक्षा परिणाम में विश्वविद्यालय द्वारा कराई जाने वाली परीक्षाओं के साथ कालेजों का आंतरिक मूल्यांकन भी जोड़ा जाता है। देखा गया है कि तमाम कालेज मनमाने ढंग से आंतरिक मूल्यांकन में बहुत अंक दे देते हैं, वहीं विश्वविद्यालय की परीक्षा में उसके अनुपात में कम अंक होते हैं। रैंकिंग में सिर्फ विश्वविद्यालय के केंद्रीय मूल्यांकन में मिले अंकों के आधार पर कालेज के प्रदर्शन को आंका जाएगा।
तीन साल का विश्लेषण
इंजीनियरिंग कालेजों की रैंकिंग भले ही इसी साल से शुरू हो रही है किन्तु उसमें पिछले तीन साल के परीक्षा परिणामों का विश्लेषण किया जाएगा। इसमें कालेजों का स्थायित्व और परिणामों की निरंतरता का आकलन होगा। विषयवार शिक्षकों की संख्या व उनकी तत्परता का आकलन करते हुए हर ब्रांच को आधार बनाकर भी विश्लेषण करने की बात रैंकिंग प्रणाली में शामिल की गयी है।
नहीं दे सकेंगे धोखा
रैंकिंग के अभाव में इंजीनियरिंग कालेजों की मनमानी की शिकायतें मिलती थीं। अब काउंसिलिंग के दौरान प्रवेश के लिए कालेजों का ऑप्शन भरते समय ही विद्यार्थियों के पास कालेजों की रैंकिंग होगी। इससे कालेज विद्यार्थियों को धोखा नहीं दे सकेंगे और विद्यार्थी सही फैसला ले सकेंगे।
-मुकुल सिंहल, प्रमुख सचिव (प्राविधिक शिक्षा)

समाज कल्याण अधिकारियों का संकट


-काम विभाजन भी महज औपचारिकता
-28 अफसरों की कमी, चार जिलों में एक भी नहीं
राज्य ब्यूरो, लखनऊ : हर जिलों में दो समाज कल्याण अधिकारियों की अवधारणा को मजबूती प्रदान करने के लिए उनके बीच काम विभाजित कर दिया गया है। वैसे प्रदेश में 28 अफसरों की कमी के कारण यह विभाजन महज औपचारिकता ही है। हालात ये हैं कि चार जिलों में तो एक भी अधिकारी नहीं है।
समाज कल्याण विभाग में जिला स्तर पर दो अधिकारियों की सीधी जिम्मेदारी होती है। एक जिला समाज कल्याण अधिकारी के साथ एक जिला समाज कल्याण अधिकारी (विकास) की तैनाती का नियम है। इस तरह प्रदेश में 150 जिला समाज कल्याण अधिकारी होने चाहिए। इसके विपरीत इस समय प्रदेश में कुल 122 जिला समाज कल्याण अधिकारी ही हैं। 28 अफसरों की कमी तो है ही, चार जिलों ललितपुर, संभल, बलरामपुर व उन्नाव में तो एक भी जिला समाज कल्याण अधिकारी नहीं है। इस बीच जिन 43 जिलों में समाज कल्याण अधिकारी व समाज कल्याण अधिकारी (विकास) दोनों पदों पर अधिकारी नियुक्त हैं, वहां भी काम का विभाजन न होने से दिक्कत हो रही थी। अब विभाग ने दोनों पदों के लिए कामकाज का विभाजन कर दिया है।
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इस काम की जिम्मेदारी
जिला समाज कल्याण अधिकारी: समाजवादी पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन, पारिवारिक लाभ योजना, शादी योजना, अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार उत्पीडऩ योजना, वृद्ध एवं अशक्त गृह और उत्तर प्रदेश माता पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण से संबंधित कार्य, राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालय का रखरखाव, विमुक्ति जाति योजना से संबंधित कार्य, राजकीय उन्नयन बस्ती व औद्योगिक आस्थान, डिजिटल सिग्नेचर, आहरण वितरण अधिकारी का कार्य, पूर्व दशम व दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजना, अन्य अवशेष कार्य।
जिला समाज कल्याण अधिकारी (विकास): अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम से संबंधित कार्य, नि:शुल्क बोङ्क्षरग, स्वच्छकार विमुक्ति व पुनर्वास योजना, मेरिट उच्चीकृत योजना, अनुदानित विद्यालयों व संस्थाओं का रखरखाव, पॉलीटेक्निक, आइटीआइ, बुकबैंक योजना, डिजिटल सिग्नेचर।