Thursday, 28 April 2016

पॉलीटेक्निक के 33 पाठ्यक्रम बदले, कम्युनिकेशन पर जोर


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-आइआइएम की मदद से बदला डिप्लोमा में पढ़ाई का प्रारूप
-हर विधा के विद्यार्थियों के लिए जरूरी होगा कंप्यूटर का पर्चा
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश में पॉलीटेक्निक की पढ़ाई अब नए रूप में होगी। प्राविधिक शिक्षा विभाग ने आइआइएम की मदद से 33 पाठ्यक्रमों में व्यापक बदलाव किया है। कम्युनिकेशन पर पूरे जोर के साथ हर विधा के विद्यार्थियों के लिए कंप्यूटर का पर्चा जरूरी कर दिया गया है।
प्रदेश के पॉलीटेक्निक कॉलेजों में डिप्लोमा के लिए हर साल औसतन 50 हजार विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं। इन सभी को रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराने के लिए पाठ्यक्रम में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही थी। इसके लिए लखनऊ स्थित भारतीय प्रबंध संस्थान (आइआइएम) के प्रो.निशांत उप्पल की अध्यक्षता में विषय विशेषज्ञों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों व प्लेसमेंट अधिकारियों ने मिलकर पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर सुझाव दिये थे। प्राविधिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव मुकुल सिंहल के मुताबिक उद्योगों की मंशा के अनुरूप 33 पाठ्यक्रमों में पुनरीक्षण का काम कराया गया। इन सभी में शैक्षिक सत्र 2016-17 से नए पाठ्यक्रमों के अनुरूप पढ़ाई शुरू हो जाएगी। इसके अलावा एक व दो वर्ष के दस नए पाठ्यक्रम भी तैयार कराए जा रहे हैं, जिन्हें जल्द ही शुरू किया जाएगा। इस बदलाव में कम्युनिकेशन स्किल, पर्सनॉलिटी व लीडरशिप जैसे गुणों को विकसित करने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा कंप्यूटर को हर पाठ्यक्रम के लिए अनिवार्य करते हुए एक नया विषय 'इंट्रोडक्शन टू कंप्यूटर' शैक्षिक सत्र 2016-17 से शुरू किया जाएगा।
तेरह साल बाद बदलाव
डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में औद्योगिक मंशा के अनुरूप 13 वर्ष बाद इस तरह बदलाव किया गया है। इसमें इंडस्ट्रियल मैनेजमेंट एंड इंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट विषय की अनुपयोगी विषयवस्तु हटा दी गयी है। इसी तरह अब डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के तीनों वर्षों में कम्युनिकेशन पढ़ाया जाएगा। प्रथम वर्ष में फाउंडेशनल कम्युनिकेशन, द्वितीय वर्ष में फंक्शनल कम्युनिकेशन व तृतीय वर्ष में इंटीग्र्रेटिव कम्युनिकेशन पढ़ाया जाएगा। कम्युनिकेशन पाठ्यक्रमों में यह बदलाव सबसे पहले सिविल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रानिक्स व मैकेनिकल ग्र्रुप के 13 पाठ्यक्रमों में लागू किया जाएगा।
मूल्यों संग समय प्रबंधन
नए विषयों में मूल्यों के संरक्षण के साथ समय प्रबंधन के सूत्र भी पढ़ाए जाएंगे। व्यक्तित्व निखारने के लिए  नए विषयों में फैक्टर्स इन्फ्लुएंसिंग एंड शेपिंग पर्सनॉलिटी, सेल्फ एवेयरनेस, इंटरपर्सनल स्किल्स, बॉडी लैंग्वेजेज स्किल्स को शामिल किया गया है। वहीं लीडरशिप ट्रेट्स एंड स्किल्स, कान्फ्लिक्ट मोटीवेशन एंड रेज्यूलेशन, नेगोशिएशन एंड इन्फ्लुएंसिंग स्किल्स के साथ नेतृत्व क्षमता विकसित की जाएगी। सेवायोजन का पथ प्रशस्त करने के लिए एटीट्यूडस, समय प्रबंधन व साक्षात्कार के तौर तरीके भी पाठ्यक्रम का हिस्सा होंगे। इसके साथ मूल्य आधारित जीवन जीने की सीख देते लाइफ स्किल्स, वैल्यूज कोड एंड एथिक्स को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
बढ़ेंगे रोजगार के अवसर
इन बदलावों से डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों का आत्मविश्वास व मनोबल बढ़ेगा। उन्हें प्रवेश के पहले वर्ष से ही रोजगार व कैम्पस साक्षात्कार के लिए तैयार किया जा सकेगा। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और इन पाठ्यक्रमों की ओर विद्यार्थियों का रुझान बढ़ेगा। -मुकुल सिंहल, प्रमुख सचिव (प्राविधिक शिक्षा)

इल्जामों के फंदे में वाहनों की पहचान!


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-फिर रुक गयी हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट्स के टेंडर की प्रक्रिया
-अगले सप्ताह मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समिति करेगी विचार
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सूबे के वाहनों को पहचान देने वाली हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट इल्जामों के फंदे में जकड़ती जा रही है। कुछ माह पूर्व परिवहन विभाग द्वारा नए सिरे से टेंडर प्रक्रिया शुरू होने के बाद अब तमाम शिकायतें आ गयी हैं। इस पर मामला मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित हाई पावर कमेटी को सौंपा गया है।
केंद्र सरकार ने देश भर में वाहनों में नंबर प्लेट्स को एकरूपता देने व उनकी विशिष्टता सुनिश्चित करने के लिए 2001 में हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लागू करने का फैसला किया था। अधिकांश पड़ोसी राज्यों में हाई सिक्योटिरी नंबर प्लेट लगाना अनिवार्य भी किया जा चुका है। वर्ष 2002 में उत्तर प्रदेश में हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगाने की मुहिम शुरू हुई थी किंतु उसमें इस कदर भ्रष्टाचार के आरोप लगे कि एक आइएएस सहित कई अफसर फंस गए थे। तब हाईकोर्ट ने मामले की सीबीआइ जांच के आदेश दिये थे। इसके बाद पूरी टेंडर प्रक्रिया ही निरस्त कर दी गयी थी।
बीते वर्ष 10 नवंबर को परिवहन आयुक्त ने एक बार फिर इसके लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू कराई। 4 जनवरी तक टेंडर भी मांगे गए थे। यही प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही तमाम शिकायतों के साथ प्रश्नचिह्न लगा दिये गए। अब अधिकारी पुरानी टेंडर प्रक्रिया पर यह व्यवस्था लागू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। परिवहन आयुक्त के.रविन्द्र नायक ने बताया कि शिकायतें आने पर टेंडर प्रक्रिया स्थगित कर दी गयी है। सभी शिकायतों का परीक्षण करा रहे हैं। इस बार शत प्रतिशत छानबीन के बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा। शिकायतों पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित हाई पॉवर कमेटी विचार करेगी। अगले सप्ताह इस कमेटी की बैठक होगी। कमेटी के फैसले के बाद ही आगे की कार्रवाई निर्धारित की जाएगी।
हाईकोर्ट उठा चुका सवाल
उत्तर प्रदेश में हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट व्यवस्था न लागू करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट भी सवाल उठा चुका है। इसी वर्ष फरवरी में याचिका की सुनवाई करते समय मुख्य न्यायाधीश डॉ.डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा था कि यहां हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट का प्रावधान क्यों नहीं है? कहा गया था कि इसके अभाव में ही लोग अराजकता करते हुए मनमाने ढंग से नंबर प्लेट लगवाते हैं और उसमें कुछ भी लिखवा लेते हैं।

समाजवादी पेंशनरों के घर वाले सीखेंगे पढऩा-लिखना


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-साल भीतर साक्षरता के लिए 31 मई तक नामांकन के निर्देश
-स्कूलों में उपस्थिति व सेहत की चिंता को तय होगी जिम्मेदारी
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: समाजवादी पेंशन पाने वालों के घरों के बच्चों को स्कूल भेजना सुनिश्चित करने के साथ 35 वर्ष आयु तक के निरक्षरों को साल भीतर पढऩा-लिखना सिखाया जाएगा। मुख्य सचिव आलोक रंजन ने इसके साथ स्कूलों में उपस्थिति व सेहत की चिंता के लिए जिम्मेदारी निर्धारित करने के निर्देश दिये हैं।
सभी जिलाधिकारियों, मंडलायुक्तों के साथ बेसिक शिक्षा विभाग के सचिव और बाल विकास एवं पुष्टाहार व चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिवों को जारी आदेश में मुख्य सचिव ने कहा है कि समाजवादी पेंशन योजना प्रदेश सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता वाली योजना है। वर्ष 2015-16 में इस योजना से लाभान्वित परिवारों के छह से 14 वर्ष आयु वर्ग वाले सभी बच्चों को स्कूल पहुंचाना सुनिश्चित किया जाए। इन परिवारों के 15 से 35 वर्ष आयु के निरक्षर व्यक्तियों का सर्वेक्षण कर उन्हें एक वर्ष के भीतर साक्षर बनाया जाए। इसके लिए सर्वेक्षण 31 मई तक पूरा कर लिया जाए। 31 मई तक ही सभी प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों व शिक्षकों का डेटा उपस्थित मॉड्यूल में अपलोड कर दिया जाए। ऐसा न होने पर संबधित बेसिक शिक्षा अधिकारी व खंड शिक्षा अधिकारी का व्यक्तिगत उत्तरदायित्व निर्धारित कर कार्रवाई की जाएगी।
मुख्य सचिव ने कहा है कि टीकाकरण व संस्थागत प्रसव से संबंधित विवरण भी अविलंब अंकित कराए जाएं। 15 मई तक यह काम पूरा करने पर स्वयं जिलाधिकारी नजर रखें। ऐसा न होने पर संबंधित जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारी व ब्लाकों के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी की जवाबदेही होगी। वित्तीय वर्ष 2014-15 में समाजवादी पेंशन पाने वाले सभी लाभार्थियों का सर्वेक्षण कराने के निर्देश देते हुए कहा गया है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी लाभार्थी अपने द्वारा बताए गए पते पर रहते हों। निर्धारित पते पर न रहने वाले किसी भी व्यक्ति को 2016-17 में पेंशन का भुगतान न किया जाए। ऐसा पाए जाने पर संबंधित जिला समाज कल्याण अधिकारी की जिम्मेदारी तय कर गलत भुगतान की वसूली उनके वेतन से की जाएगी।

Saturday, 23 April 2016

छोडऩी होगी गंभीर मरीज देखते ही रिफर करने की आदत


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-सरकारी डॉक्टर सीखेंगे ट्रॉमा, प्लास्टिक सर्जरी व बर्न मैनेजमेंट
-स्वास्थ्य विभाग उत्कृष्ट संस्थानों से दिलाएगा विशेष प्रशिक्षण
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: सरसौल के पास मार्ग दुर्घटना में घायल एक युवक को लेकर लोग कानपुर के उर्सला अस्पताल पहुंचे तो उसे गंभीर हालत में देख इमरजेंसी में डॉक्टर ने इलाज शुरू किये बिना ही मेडिकल कालेज रिफर कर दिया। यह स्थिति महज उर्सला की नहीं है। प्रदेश भर के जिला अस्पतालों में गंभीर अवस्था में पहुंचने वाले मरीजों को डॉक्टर उपयुक्त इलाज न होने का हवाला देकर पास के मेडिकल कालेज या लखनऊ में एसजीपीजीआइ के लिए रिफर कर देते हैं। अब उन्हें यह आदत छोडऩी होगी। स्वास्थ्य विभाग ने सभी सरकारी डॉक्टरों को ट्रॉमा, प्लास्टिक सर्जरी और बर्न मैनेंजमेंट का विशेष प्रशिक्षण दिलाने का फैसला किया है।
प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में तो दूर, अभी जिला अस्पतालों तक में विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में जलने या दुर्घटना आदि की स्थिति में गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों का प्रारंभिक इलाज तक नहीं हो पाता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक आलोक कुमार ने बताया कि इस स्थिति से निपटने के लिए प्रांतीय चिकित्सा सेवा से जुड़े चिकित्सकों को प्रमुख मेडिकल कालेजों व एसजीपीजीआइ सहित उत्कृष्ट संस्थानों में प्रशिक्षण दिलाया जाएगा। समयबद्ध ढंग से चिकित्सकों को ट्रॉमा व जलने की स्थिति में तात्कालिक चिकित्सकीय प्रबंधन के गुर तो सिखाए ही जाएंगे, उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की प्रारंभिक जानकारियों से भी जोड़ा जाएगा। इसे शासन स्तर से मंजूरी मिल गयी है। पहले चरण में इसके लिए डेढ़ करोड़ रुपये की धनराशि निर्धारित की गयी है।
साल भीतर 37 ट्रॉमा सेंटर
प्रदेश में दुर्घटना व अन्य आकस्मिक स्थितियों में इलाज के लिए 37 जिलों में विशिष्ट ट्रॉमा सेंटर्स का निर्माण किया जा रहा है। इनमें से 18 बन चुके हैं और 19 को इसी साल अक्टूबर तक बनाकर चालू करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। हर ट्रॉमा सेंटर पर दो एनेस्थीशिया, दो अस्थि रोग व दो सर्जरी विशेषज्ञों के साथ तीन आकस्मिक चिकित्सा अधिकारी तैनात होंगे। इन चिकित्सकों के साथ 24 नर्सिंग स्टाफ सहित कुल 50 लोगों के पद सृजित किये गए हैं।
44 प्लास्टिक सर्जरी व बर्न यूनिट
आग से जुड़ी आपदाओं या दुर्घटना में गंभीर रूप से जख्मी होने पर प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत से निपटने के लिए 44 प्लास्टिक सर्जरी व बर्न यूनिट स्थापित की जा रही हैं। इनमें से 29 जिलों कुशीनगर, बरेली, उन्नाव, औरैया, संत रविदास नगर, अमरोहा, मऊ, सोनभद्र, बागपत, इटावा, मुरादाबाद, लखनऊ, सीतापुर, अंबेडकर नगर, सिद्धार्थ नगर, गोरखपुर, देवरिया, वाराणसी, चंदौली, कानपुरनगर, फिरोजाबाद, रामपुर, मेरठ, बुलंदशहर, गाजियाबाद, सहारनपुर, मुजफफरनगर, जौनपुर व प्रतापगढ़ की प्लास्टिक सर्जरी व बर्न यूनिट के लिए तो एक प्लास्टिक सर्जन, दो जनरल सर्जन, तीन आकस्मिक चिकित्सा अधिकारियों सहित 22 पद सृजित भी हो चुके हैं। इनके अलावा 15 अन्य जिलों में भी इन इकाइयों को मंजूरी मिल गयी है और इन्हें मौजूदा वित्तीय वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य है।

Wednesday, 20 April 2016

'सीपीएमटी के लिए आएं, बिस्तर साथ लाएं'


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-परीक्षा के बाद सुरक्षा जांच के लिए पड़ सकता है रुकना
-फार्म भरते समय स्कैन कराया अंगूठा, कई बार होगी जांच
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में एमबीबीएस, बीडीएस, बीएएमएस व बीएचएमएस में प्रवेश के लिए आगामी 17 मई को प्रस्तावित संयुक्त प्रवेश परीक्षा (सीपीएमटी) को लेकर इस बार अतिरिक्त सावधानी बरती जा रही है। विद्यार्थियों से कहा गया है कि वे परीक्षा देने के लिए पूरी तैयारी से आएं, क्योंकि परीक्षा के बाद जांच आदि के लिए रुकना पड़ सकता है।
उत्तर प्रदेश में सीपीएमटी कई बार विवादों में घिर चुकी है। तमाम शुचिता के दावों के बावजूद वर्ष 2015 में हुई सीपीएमटी को लेकर आज भी वाद उच्च न्यायालय में लंबित हैं। इस बार सीपीएमटी कराने का जिम्मा डॉ.राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद को सौंपा गया है। कोई गड़बड़ी न होने देने के लिए प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने का फैसला हुआ है। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने शासन से सीपीएमटी के दौरान जिलाधिकारियों व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों की भूमिका सुनिश्चित करने और परीक्षा केंद्रों पर एसटीएफ तक तैनात करने को कहा है। यही कारण है मुख्य सचिव ने 28 अप्रैल को अधिकारियों की बैठक बुलाई है।
इस बार सर्वाधिक जोर फर्जी परीक्षार्थियों पर अंकुश को लेकर है। फॉर्म भरते समय ही दाएं हाथ के अंगूठे की छाप स्कैन कर ऑनलाइन अपलोड कराई गयी है। 17 मई को परीक्षा केंद्र पर अभ्यर्थी के पहुंचते ही उसकी फोटो खिंचेगी और साथ ही बायोमैट्रिक डेटा, फिंगर प्रिंट आदि लिया जाएगा। परीक्षार्थी के अंगूठे की छाप से भी मिलान किया जाएगा। इसके बाद सफल होने पर काउंसिलिंग के समय, प्रवेश के समय और फिर छह माह पढ़ाई के बाद भी अंगूठे की छाप व अन्य बायोमैट्रिक डेटा का सत्यापन कराया जाएगा। छात्र-छात्राओं को परीक्षा के बाद बायोमीट्रिक व अन्य जांचों के लिए रोकने की भी तैयारी है। प्रॉस्पेक्टस में स्पष्ट कर दिया गया है कि उन्हें परीक्षा के बाद रुकना पड़ सकता है, इसलिए लौटने का रिजर्वेशन या अन्य प्रबंध उसी के अनुरूप कराएं। स्पष्ट लिखा गया है कि यह प्रक्रिया अनिवार्य रहेगी और इसमें हिस्सा न लेने वाले परीक्षार्थी की उम्मीदवारी निरस्त कर दी जाएगी। वैसे इस परीक्षा से जुड़े रहे लोग छात्र-छात्राओं को बिस्तर-चादर आदि लेकर जाने की सलाह दे रहे हैं, ताकि केंद्र के आसपास यदि ज्यादा देर रुकना पड़े तो दिक्कत न हो।
15 शहरों में परीक्षा
आगरा, अलीगढ़, इलाहाबाद, बरेली, फैजाबाद, गाजियाबाद, गोरखपुर, झांसी, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, मुरादाबाद, नोएडा, सहारनपुर, वाराणसी
एक घंटा पहले पहुंचें
परीक्षा मंगलवार, 17 मई 2016 को सुबह नौ से बारह बजे तक होगी। जंतु विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, रसायन विज्ञान व भौतिक विज्ञान का एक पेपर होगा। परीक्षार्थियों को केंद्र पर एक घंटा पहले रिपोर्ट करना होगा। परीक्षा तिथि नहीं बदलेगी, भले ही उस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित हो जाए।

विश्वविद्यालयों में आरक्षण पर प्रमुख सचिव तलब


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-राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अपील को कहा
-विश्वविद्यालय की जगह विभाग को इकाई मानकर आरक्षण देने का मामला
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सूबे के राज्य विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की आरक्षण व्यवस्था में विभाग व पदनाम को एक इकाई माने जाने के मसले पर राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने आपत्ति जाहिर की है। आयोग अध्यक्ष ने इस मसले पर प्रमुख सचिव (उच्च शिक्षा) को तलब किया है।
विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू करने में सभी प्रवक्ताओं (असिस्टेंट प्रोफेसर) को सम्मिलित करते हुए एक अलग संवर्ग और इसी प्रकार एसोसिएट प्रोफेसर के सभी पदों को शामिल करते हुए अलग संवर्ग माना जाता था। मामला पहले उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, जहां से मिले निर्देशों के अनुपालन में अब विश्वविद्यालय की जगह विभाग को एक इकाई मानते हुए असिस्टेंट प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर के पदों के लिए आरक्षण लागू करने की व्यवस्था लागू की गयी थी।
बीते वर्ष 30 नवंबर 2015 को इस बाबत शासनादेश जारी होने के बाद इसका असर अब दिखने लगा है। विश्वविद्यालयों द्वारा भर्ती के लिए जारी हो रहे विज्ञापनों में विभाग को इकाई मानकर आरक्षण लागू किया जा रहा है। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने इस पर आपत्ति की है। आयोग के अध्यक्ष राम आसरे विश्वकर्मा ने उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को इस मसले पर तलब किया है। उनका कहना है कि विभाग को इकाई मान आरक्षण देने से पिछड़े वर्ग के अभ्यर्थियों को नुकसान हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में ऐसा होने के कारण इस मामले में सबसे पहले सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अपील के लिए याचिका दाखिल की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में ठीक से पैरवी न किये जाने के कारण यह स्थिति आयी है। विशेष अपील के साथ ही इसकी जोरदार पैरवी की तैयारी भी होनी चाहिए। इन सभी बिंदुओं पर प्रमुख सचिव से तो वार्ता होगी। उन्होंने बताया कि इसके साथ ही मसले पर ध्यानाकर्षण कराते हुए मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखा है, ताकि पिछड़े वर्गों के हित पूरी तरह संरक्षित रहे। इस पत्र में उन्होंने सिद्धार्थ नगर की सिद्धार्थ यूनिवर्सिटी का हवाला भी दिया है, जहां हाल ही में असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन निकला है और नये नियमों के चलते आरक्षित पदों की संख्या बहुत कम रह गयी है।

नर्स-एएनएम 'बर्थ अटेंडेंट', सीएमओ होंगे 'एक्जीक्यूटिव'


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-अभी महज 30 प्रतिशत नर्स प्रशिक्षित
-आइआइएम-एसजीपीजीआइ से मदद
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डॉ.संजीव, लखनऊ
स्वास्थ्य विभाग अब सुरक्षित प्रसव के लिए नर्स व एएनएम का 'मेकओवर' करने जा रहा है। इसके तहत उन्हें प्रशिक्षण देकर 'बर्थ अटेंडेंट' के रूप में तैयार किया जाएगा। सीएमओ, सीएमएस आदि वरिष्ठ सरकारी डॉक्टरों को प्रबंधन का प्रशिक्षण देकर उन्हें 'एक्जीक्यूटिव' बनाया जाएगा।
प्रदेश में परिवार कल्याण कार्यक्रमों को रफ्तार देने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने प्रसव के स्तर पर सर्वाधिक सतर्कता बरतने का फैसला किया है। इसके अंतर्गत संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने की मुहिम तो चल रही है किन्तु प्रशिक्षित स्टॉफ न होने के कारण दिक्कत होती है। 24 घंटे चिकित्सकों की उपलब्धता संभव नहीं होती और नर्स व एएनएम प्रशिक्षित नहीं हैं। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार महज 30 फीसद नर्स व एएनएम ही प्रसव के लिए पूर्णतया प्रशिक्षित हैं। अब इन नर्स व एएनएम का 'मेकओवर' कर उनके कामकाज में आमूलचूल बदलाव लाने की तैयारी है। उन्हें 'बर्थ अटेंडेंट' के रूप में विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस पर तात्कालिक रूप से 2.64 करोड़ रुपये मंजूर कर दिये गए हैं और पूरे कार्यक्रम में पैसे की कमी न पडऩे देने को कहा गया है। स्वास्थ्य विभाग की तकनीकी सहयोग इकाई के मुखिया विकास गोथलवाल के मुताबिक इन प्रशिक्षण केंद्रों में नर्स व एएनएम को हर परिस्थिति में सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करना सिखाया जाएगा। वे महज चिकित्सकों की सहयोगी न बनकर प्रसूता की सहयोगी के रूप में सक्रिय रहेंगे। तकनीक व अन्य पहलुओं की भी पूरी जानकारी दी जाएगी।
प्रशिक्षण के मोर्चे पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) व अस्पतालों के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) भी अपग्र्रेड किये जाएंगे। इस स्तर पर पहुंचने वाले चिकित्सक प्रबंधकीय मसलों में पूरी तरह तैयार नहीं होते हैं जबकि निजी क्षेत्र के अस्पतालों में इनकी भूमिका 'एक्जीक्यूटिव' यानी अधिशासी की होती है। प्रदेश के सभी सीएमओ व डेढ़ सौ से अधिक सीएमएस को पहले चरण में विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इनके लिए 'हेल्थ केयर एक्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्र्राम' का प्रस्ताव है। इसके लिए शासन ने डेढ़ करोड़ रुपये भी मंजूर कर दिये हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक आलोक कुमार के मुताबिक इस प्रशिक्षण का मॉड्यूल एसजीपीजीआइ व आइआइएम सहित देश के प्रमुख चिकित्सा व प्रबंधन संस्थानों की मदद से तैयार किया जाएगा। इसकी मदद से सीएमओ व सीएमएस की प्रबंधकीय क्षमता निखारी जाएगी और उन्हें प्रबंधन के गुर सिखाए जाएंगे। इसकी शुरुआत भी इसी साल करने का प्रस्ताव है।
हर जिले में प्रशिक्षण केंद्र
नर्स व एएनएम को प्रभावी भूमिका में लाने के लिए प्रदेश के सभी 75 जिलों में प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना करने का फैसला हुआ है। इनकी स्थापना के लिए सरकार ने 1.14 करोड़ रुपये मंजूर कर दिये हैं। इन प्रशिक्षण केंद्रों में नर्स व एएनएम के लिए 21-21 दिन के प्रशिक्षण मॉड्यूल बनाए जाएंगे। छोटे मॉड्यूल से प्रशिक्षण भी समयबद्ध ढंग से पूरा हो जाएगा और उनका कामकाज भी प्रभावित नहीं होगा।

Monday, 18 April 2016

पूर्वदशम् छात्रवृत्ति को 15 मई तक पंजीकरण कराएं संस्थान

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- पिछड़े वर्ग की नयी नियमावली का शासनादेश जारी
- अगले साल से 15 अप्रैल तक दर्ज कराना होगा नाम
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : पिछड़े वर्ग के नौवीं व दसवीं के विद्यार्थियों को पूर्वदशम् छात्रवृत्ति का लाभ दिलाने के लिए संबंधित संस्थानों को 15 मई तक मास्टर डेटाबेस में अपना पंजीकरण कराना होगा। अगले साल से सभी को 15 अप्रैल तक ही नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
बीती 30 मार्च को राज्य मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर 'उत्तर प्रदेश अन्य पिछड़ा वर्ग पूर्वदशम् छात्रवृत्ति नियमावली 2016' के शासनादेश के अनुसार शासकीय, सहायता प्राप्त, मान्यता प्राप्त या निजी शिक्षण संस्थानों को हर वर्ष 15 अप्रैल तक मास्टर डेटाबेस में अपना पूरा ब्योरा दर्ज कराना होगा। इसमें संस्थान का नाम, मान्यता की तिथि व वैधता सीमा, स्वीकृत पाठ्यक्रम, वर्गवार स्वीकृत सीटों की संख्या आदि ऑनलाइन भरनी होगी। मास्टर डेटाबेस में निर्धारित तिथि तक सम्मिलित होने वाले संस्थानों के छात्र-छात्राएं ही छात्रवृत्ति के लिए आवेदन कर सकेंगे। नियमावली लागू होने के बाद पहला वर्ष होने के कारण सिर्फ 2016-17 के लिए 15 मई तक समय दिया गया है। मास्टर डेटाबेस में हर साल सिर्फ वही शिक्षण संस्थान शामिल हो सकेंगे, जिनकी मान्यता व संबद्धता 31 मार्च तक हो चुकी हो। 31 मार्च के पश्चात मान्यता वाले अगले साल शामिल होंगे।
मिलेगी तीन गुना छात्रवृत्ति
कक्षा नौ व दस में पढऩे वाले पिछड़े वर्गों के विद्यार्थियों को अभी 750 रुपये वार्षिक छात्रवृत्ति मिलती थी। अब इन्हें दस माह के लिए 150 रुपये प्रति माह और वार्षिक तदर्थ अनुदान के रूप में 750 रुपये मिलाकर वार्षिक 2250 रुपये का एकमुश्त भुगतान होगा। तीस हजार रुपये आय सीमा को बढ़ाकर दो लाख रुपये वार्षिक कर दिया गया है। जिन बच्चों के माता-पिता जीवित नहीं हैं, उन सभी को छात्रवृत्ति मिलेगी। तहसील से जारी आय व जाति प्रमाण पत्र में अंकित निवास विवरण के आधार पर ही छात्रवृत्ति दे दी जाएगी।
सरकारी स्कूलों से शुरुआत
छात्रवृत्ति वितरण के लिए शिक्षण संस्थानों का वरीयता क्रम भी निर्धारित कर दिया गया है। इसमें पहले नवीनीकरण वाले यानी दसवीं के विद्यार्थियों को, फिर नौवीं के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति मिलेगी। सबसे पहले सरकारी स्कूलों, इसके बाद सहायता प्राप्त और फिर धन बचने पर निजी विद्यालयों के बच्चों को छात्रवृत्ति मिलेगी। बजट की राशि का वितरण 'ए' से 'जेड' तक 'अल्फाबेटिकल' क्रम में किया जाएगा। एक ही क्रम होने पर अधिक आयु वाले विद्यार्थी को वरीयता मिलेगी। यह भी समान होने पर पहले पंजीकरण कराने वाले को ऊपर रखा जाएगा।

Sunday, 17 April 2016

बदली प्रोन्निति पर लाभ की नीति

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-अंतिम आहरित की जगह अंतिम निर्धारित वेतन बनेगा आधार
-दस हजार से अधिक पेंशनरों को मिलेगा बदली नीति का लाभ
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : राज्य सरकार ने पुनरीक्षित वेतन के लाभ देने के मामले में नीति बदली है। अब अंतिम आहरित वेतन के स्थान पर अंतिम निर्धारित वेतन को आधार बनाकर एरियर व पेंशन आदि का निर्धारण होगा।
प्रदेश में कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग का लाभ जनवरी 2006 से देने का आदेश दिसंबर 2008 में जारी किया गया था। इसमें तय हुआ था कि एक दिसंबर 2008 या प्रोन्नति की तिथि से नये वेतनमान का लाभ मिलेगा। तमाम ऐसे कर्मचारी ऐसे भी थे, जो सेवानिवृत्त हो गए और उन्हें पुरानी तारीख से लाभ नहीं मिला। इस पर पेंशनर्स व राज्य कर्मचारियों की ओर से सिविल सर्विसेज विनियमावली में संशोधन की मांग की जा रही थी। राज्य संयुक्त संयुक्त परिषद के प्रदेश उपाध्यक्ष हेमंत श्रीवास्तव के मुताबिक पेंशनर्स को अंतिम आहरित वेतन को आधार बनाकर पेंशन दिये जाने से वे उन्हें एक जनवरी 2006 से रिवाइज वेतनमान के आधार पर पेंशन का लाभ नहीं मिल पा रहा था। तमाम वार्ताओं व आंदोलनों में भी यह मुद्दा उठा।
प्रमुख सचिव (वित्त) राहुल भटनागर ने उत्तर प्रदेश सिविल सेवा (संशोधन) नियमावली, 2016 जारी कर इसे तुरंत लागू करने के निर्देश दिये हैं। इसके अंतर्गत प्रोन्नति पर लाभ की पूरी नीति ही बदल दी गयी है। अब अंतिम आहरित वेतन के स्थान पर अंतिम निर्धारित वेतन को आधार बनाकर पेंशन की गणना की जाएगी। कई बार सेवानिवृत्ति के समय तक प्रोन्नत वेतनमान नहीं दिये जाने के कारण उसे पुरानी तिथि से प्रोन्नत माना जाता है। नई नियमावली में पेंशन निर्धारित करते समय प्रोन्नत वेतनमान मिलने की तारीख को आधार बनाकर उसका निर्धारण किया जाएगा। इस आदेश के बाद कोषागार निदेशक लोरिक यादव ने सभी जिला कोषागारों को नयी व्यवस्था के तहत पेंशन पुनरीक्षित करने व तदनुरूप एरियर देने के निर्देश जारी किये हैं। प्रदेश में दस हजार से अधिक पेंशनरों को इस परिवर्तन का लाभ मिलने की उम्मीद है। 

शुरुआती इलाज में भी नहीं होगा दवाओं का टोटा


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- पीएचसी स्तर तक दवाओं का ऑनलाइन प्रबंधन
- सी-डैक से करार, सौ करोड़ रुपये होंगे खर्च
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डॉ.संजीव, लखनऊ : मरीजों को अब शुरुआती इलाज में भी दवाओं की कमी नहीं पडऩे दी जाएगी। स्वास्थ्य विभाग इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) स्तर तक दवाओं का ऑनलाइन प्रबंधन करने जा रहा है। इस प्रक्रिया पर सौ करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके लिए सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस कंप्यूटिंग (सी-डैक) से करार हो गया है।
राज्य के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के न मिलने की समस्या तो है ही, डॉक्टर मिलने पर दवाएं उपलब्ध न होने की शिकायत भी आम है। दवाएं खरीदने व आपूर्ति की जिम्मेदारी अभी जिलों के स्तर पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी को सौंपी गयी है किन्तु सामान्य मरीजों के पहले अस्पताल यानी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के स्तर तक दवाएं न मिलने की समस्या समाप्त नहीं हो रही है। यह स्थिति तब है जबकि शुरुआती इलाज की पूरी जिम्मेदारी औसतन ब्लॉक स्तर पर खुले इन स्वास्थ्य केंद्रों की है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार के अनुसार पीएचसी के स्तर तक दवाओं की कमी न होने देने के लिए दवा उपलब्धता की पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन किया जा रहा है। इस बाबत दवाओं की 'सप्लाई चेन मैनेजमेंट' प्रणाली विकसित करने का जिम्मा सी-डैक को सौंपा गया है। सीडैक से समझौता भी हो चुका है। अब मरीजों की जरूरत के अनुरूप प्रारंभिक दवाओं की पूरी सूची व उसका खर्च ऑनलाइन सहेजा जाएगा। राजधानी लखनऊ में एक कंट्रोल रूम होगा और जिलों में मुख्य चिकित्सा अधिकारी के माध्यम से निगरानी होगी। जैसे ही कोई जरूरी दवा प्राथमिक या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में समाप्त होने वाली होगी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय स्थित कंट्रोल रूम को पता चल जाएगा और वहां से समय रहते संबंधित स्वास्थ्य केंद्र में दवा पहुंचा दी जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया पर सौ करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसे शासन से मंजूरी मिल गयी है और मौजूदा वित्तीय वर्ष 2016-17 में अमल हो जाएगा।
833 दवाएं हैं सूचीबद्ध
प्रदेश में सरकारी अस्पतालों में खरीद के लिए 833 दवाएं सूचीबद्ध की गयी हैं। यह 'मास्टर ड्रग लिस्टÓ जिला अस्पतालों या विशिष्टता वाले संयुक्त चिकित्सालयों के लिए प्रभावी होती है। प्रारंभिक रूप से जरूरी दवाओं की 'इसेंशियल ड्रग लिस्टÓ में कुल 597 दवाएं शामिल की गयी हैं। मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए 364 दवाएं खरीदने का रेट कांट्रैक्ट हो चुका है और शेष की प्रक्रिया चल रही है।
निजी लैब को देंगे मान्यता
प्रमुख सचिव ने बताया कि दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में अभी दिक्कत आती है। अभी एनएबीएल प्रमाणपत्र के साथ रैंडम परीक्षण भी कराया जाता। पर्याप्त संख्या में सरकारी लैब्स न होने के कारण समस्या होती है। अब निजी लैब को भी मान्यता देने का फैसला हुआ है। दवा आपूर्ति के समय तीन नमूने भरे जाएंगे। ये नमूने मान्यता प्राप्त निजी लैब में भेज कर उनकी जांच कराई जाएगी और गुणवत्ता युक्त होने पर ही दवा की आपूर्ति होगी।

Wednesday, 13 April 2016

चार लाख से ज्यादा को नहीं हुई शुल्क प्रतिपूर्ति

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-बचे विद्यार्थियों में 90 फीसद से अधिक पिछड़े वर्ग के
-शासन से इन्हें भुगतान के लिए 421 करोड़ की जरूरत
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: तमाम दावों व कोशिशों के बावजूद चार लाख से ज्यादा विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति राशि नहीं मिल सकी है। इनमें 90 फीसद से अधिक पिछड़े वर्ग के छात्र-छात्राएं हैं। इन सभी को भुगतान के लिए 421 करोड़ रुपये की जरूरत है, जिसे शासन के संज्ञान में लाया जा रहा है।
छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में तमाम गड़बडिय़ों के आरोपों के बाद पिछले वित्तीय वर्ष 2015-16 की शुरुआत में ही शासन स्तर पर वितरण के लिए पूरी समय सारिणी बना दी गयी थी। इसके बावजूद समय पर न तो छात्रवृत्ति बांटी जा सकी, न ही शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान हुआ। 31 मार्च तक यह भुगतान हुआ भी तो चार लाख से अधिक विद्यार्थी छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति से वंचित रह गए। इनमें भी सर्वाधिक साढ़े तीन लाख से अधिक विद्यार्थी पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं। पिछड़े वर्ग के 13 लाख विद्यार्थियों ने छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया था। इनमें से 10.44 लाख को छात्रवृत्ति व 9.69 लाख को शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान किया जा सका। पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के आंकड़ों को अनुसार अभी भी 2,56,958 को छात्रवृत्ति व 3,32,573 विद्यार्थियों को शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान होना बाकी है। तमाम विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति दोनों का भुगतान करना होता है, इसलिए अधिकारियों का मानना है कि औसत साढ़े तीन लाख से अधिक विद्यार्थी अभी भी ऐसे हैं, जिन्हें छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान नहीं हुआ है।
अनुसूचित जाति के शत प्रतिशत विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान वरीयता पर किया जाता है। इसलिए प्रदेश में अनुसूचित जाति के 6,74,105 विद्यार्थियों को 1161.69 करोड़ रुपये वितरित किये गए हैं। सामान्य वर्ग के 4,28,229 विद्यार्थियों को 565 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। इसके बावजूद सामान्य वर्ग के 35 हजार विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति नहीं मिल सकी है। इस तरह पिछड़े व सामान्य वर्ग को मिलाकर चार लाख से अधिक विद्यार्थी ऐसे हैं, जिन्हें छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान नहीं हुआ है। सामान्य वर्ग के लिए 40 करोड़ रुपये की आवश्यकता है। इसी तरह पिछड़े वर्ग की छात्रवृत्ति के लिए 90 करोड़ और शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए 291 करोड़ रुपये की जरूरत है। अब बचे हुए विद्यार्थियों को शुल्क प्रतिपूर्ति व छात्रवृत्ति के लिए कुल 421 करोड़ रुपये की आवश्यकता है। पिछड़ा वर्ग विभाग के सचिव डॉ.हरिओम ने बताया कि छात्रवृत्ति के लिए आवंटित बजट में वरीयता के अनुसार अधिकाधिक विद्यार्थियों को लाभान्वित किया गया है। अब जो विद्यार्थी बचे हैं, उनके लिए शासन से अतिरिक्त धनराशि आवंटन का आग्र्रह किया जाएगा।

पीएमएस कोटे की 51 मेडिकल परास्नातक सीटें फंसी

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- हाईकोर्ट ने तीस फीसद सीटें देने पर उठाया सवाल
- पूछा, डिप्लोमा दिया जा सकता डिग्री में प्रवेश क्यों
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के सरकारी मेडिकल कालेजों की परास्नातक डिग्री सीटों पर प्रांतीय चिकित्सा सेवा संवर्ग को तीस फीसद आरक्षण देने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सवाल उठाया है। अदालत ने पूछा है कि जब एमसीआइ मान्यता के अनुसार ऐसे चिकित्सकों को डिप्लोमा दिया जा सकता है, तो डिग्र्री में प्रवेश क्यों मिल रहा है। ऐसे में पीएमएस कोटे की 51 सीटें फंस गयी हैं।
प्रदेश में प्रांतीय चिकित्सा सेवा के प्रति चिकित्सकों को आकर्षित करने व उन्हें रोके रखने के लिए तीन साल या अधिक ग्रामीण क्षेत्र के किसी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में काम करने वाले चिकित्सकों को मेडिकल कालेजों की परास्नातक सीटों पर 30 फीसद आरक्षण की व्यवस्था की गयी है। इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी। बीते सप्ताह उच्च न्यायालय ने इन सीटों पर डिग्री पाठ्यक्रमों में आरक्षण पर रोक लगा दी है। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने स्वास्थ्य महानिदेशक को इस बाबत पत्र लिखा है। उनके मुताबिक हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) मानकों के अनुसार पीएमएस कोटे से आने वालों को सिर्फ डिप्लोमा ही दिया जा सकता है, फिर डिग्री में प्रवेश क्यों दिया जा रहा है। लिखा है कि यह मसला संज्ञान में आया है इसलिए तदनुरूप रणनीति बनाई जाए ताकि अगली काउंसिलिंग से पहले इस पर अंतिम निर्णय हो सके।
दरअसल इस मसले पर अब राज्य सरकार की ओर से स्वास्थ्य विभाग को बड़ी बेंच या सर्वोच्च न्यायालय में स्थगनादेश पाने के लिए अपील करनी होगी। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक का पत्र उसी परिप्रेक्ष्य में है। प्रदेश के मेडिकल कालेजों की परास्नातक डिप्लोमा सीटों को हटा दिया जाए तो एमडी, एमएस की 51 सीटें पीएमएस कोटे में आती हैं। पिछले दिनों हुई पीजीएमईई काउंसिलिंग में पीएमएस कोटे में सफल चिकित्सक विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र समय पर न मिलने के कारण शामिल नहीं हो सके थे। अब 16 मई से दूसरे दौर की काउंसिलिंग है। तब तक स्थगनादेश न मिला तो ये सीटें पीजीएमईई में सफल अन्य छात्र-छात्राओं को आवंटित कर दी जाएंगी।
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Tuesday, 12 April 2016

कॉमन मेडिकल टेस्ट से बचेंगे पैसे, घटेंगे झंझट

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-रुकेगी निजी कॉलेजों की अराजकता
-एक दर्जन फॉर्म भरने से मिलेगी मुक्ति
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : कॉमन मेडिकल टेस्ट कराए जाने से चिकित्सा शिक्षा जगत में पारदर्शिता व शुचिता के पक्षधर उत्साहित हैं। उनका मानना है कि इससे निजी कॉलेजों की मनमानी और अराजकता तो रुकेगी ही, तमाम फॉर्म भरने के झंझट से मुक्ति पाकर विद्यार्थी तनावमुक्त होंगे, अभिभावकों के पैसे बचेंगे।
भारतीय चिकित्सा परिषद ने वर्ष 2009 से एक संयुक्त प्रवेश परीक्षा के माध्य से देश के सभी मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में प्रवेश के प्रयास शुरू किये थे। वर्ष 2013 में इस पर अमल का फैसला भी हो गया था किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश से वह रुक गया था। अब सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने अपना पुराना आदेश वापस ले लिया तो फिर से कॉमन मेडिकल टेस्ट की राह खुली है। अभी परीक्षा की तैयारी के समय छात्र-छात्राओं को भारी संख्या में फॉर्म भरने, उनके लिए शुल्क का ड्राफ्ट बनवाने या ऑनलाइन चालान जैसी तमाम दिक्कतों से जूझना पड़ता है। इसमें काफी समय बर्बाद होने के साथ औसतन दस से बारह हजार रुपये खर्च आता है। इस फैसले से यह बचेगा। देश भर में अलग-अलग राज्यों में निजी मेडिकल कॉलेजों के संगठन अलग-अलग प्रवेश परीक्षाएं कराते हैं। इनमें भी औपचारिकता होती है और भारी डोनेशन के साथ प्रवेश होते हैं। साझा परीक्षा से निजी कॉलेजों की यह अराजकता भी रुकेगी।
एक विद्यार्थी, दर्जन भर फॉर्म
मेडिकल प्रवेश की तैयारी करने वाला एक विद्यार्थी औसतन दर्जन भर फॉर्म भरता है। इनमें अपने प्रदेश की प्रवेश परीक्षा (जैसे उत्तर प्रदेश में यूपीसीपीएमटी) के अलावा एम्स, एएमयू, एएफएमसी, बीएचयू, जवाहरलाल इंस्टीट्यूट पुडुचेरी, सीएमसी वेल्लोर, महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट वर्धा, इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय दिल्ली के फॉर्म तो लगभग हर छात्र भरता है।
बचेगी दौड़भाग, न होगा टकराव
देश में एक मेडिकल प्रवेश परीक्षा की लंबे समय से पैरोकारी कर रहे धीरज शुक्ला का मानना है कि इस फैसले से परीक्षार्थियों की दौड़भाग बचेगी। वे तनावमुक्त तो होंगे ही, उनके पैसे भी बचेंगे। सबसे बड़ा आराम तो परीक्षा की तारीखों में टकराव से मुक्ति के रूप में सामने आएगा। अभी कई बार तो एक ही दिन दो प्रवेश परीक्षाएं पड़ जाती हैं, तो परीक्षार्थी उनमें से कोई एक परीक्षा छोडऩे पर विवश होता है। कई बार एक दिन परीक्षा बंगलुरू में होती है तो अगले दिन लखनऊ में। ऐसे में भी उनके सामने परीक्षा छोडऩे या बिना तैयारी परीक्षा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है।
बढ़ेगी प्रवेश में पारदर्शिता
चिकित्सा शिक्षा महकमा भी कॉमन मेडिकल टेस्ट ही चाहता है। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला स्वागत योग्य है। एक प्रवेश परीक्षा से मेडिकल व डेंटल कॉलेजों की प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी। विद्यार्थियों को तो लाभ होगा ही, निजी मेडिकल व डेंटल कॉलेजों पर प्रशासनिक नियंत्रण भी और मजबूत होगा।

निजी मेडिकल कालेजों पर नहीं कोई अंकुश

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-चिकित्सा शिक्षा विभाग नहीं कर सका शुल्क निर्धारण
-नया सत्र आते ही शुरू हुई मनमानी दरों पर 'बुकिंग'
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश सरकार तमाम घोषणाओं के बावजूद निजी मेडिकल व डेंटल कालेजों पर कोई अंकुश नहीं लगा सकी है। हालात ये हैं कि चिकित्सा शिक्षा विभाग शुल्क तक निर्धारित नहीं कर सका है। नया सत्र नजदीक आते ही एक बार फिर मनमानी दरों पर 'बुकिंग' शुरू हो गयी है।
प्रदेश में निजी क्षेत्र के 14 मेडिकल कालेज, 25 डेंटल कालेज व 14 आयुर्वेदिक कालेज संचालित हो रहे हैं। इनके प्रवेश से लेकर शुल्क तक पर कहीं भी शासन का अंकुश न होने के कारण लगातार आर्थिक अराजकता की शिकायतें आती रहती हैं। तमाम शिकायतों के बाद पिछले वर्ष प्रदेश सरकार ने निजी चिकित्सा संस्थानों का शुल्क तय करने का फैसला किया था। इसके लिए शुल्क निर्धारण प्रक्रिया शुरू कर सभी कालेजों से आय-व्यय का लेखा-जोखा भी मांगा जा सका था। यह प्रक्रिया भी 11 साल बाद शुरू हो सकी थी। इससे पहले वर्ष 2004 में निजी कालेजों का शुल्क निर्धारण हुआ था। तब तय हुआ था कि हर तीन साल में शुल्क निर्धारण होगा किन्तु उसके बाद से सत्ता-प्रतिष्ठान से नजदीकियों के आधार पर निजी कालेजों के संचालकों ने शुल्क निर्धारण ही नहीं होने दिया और लगातार मनमानी वसूली करते रहे।
बीते वर्ष शुल्क निर्धारण प्रक्रिया शुरू होने पर उम्मीद बंधी थी किन्तु निराशा ही हाथ लगी है। एक साल बीतने आए किन्तु अधिकांश निजी कालेजों ने यह लेखा-जोखा तक नहीं सौंपा है। एक साल बाद भी शुल्क निर्धारण न होने का परिणाम है कि अगले शैक्षिक सत्र के लिए निजी कालेजों ने 'बुकिंग' शुरू कर दी है। मनमाने तरीके से शुल्क की दरें निर्धारित कर दी गयी हैं। इस संबंध में चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डॉ.अनूपचंद्र पाण्डेय का कहना है कि जल्द ही नए सिरे से शुल्क निर्धारण प्रक्रिया शुरू की जाएगी। कोशिश होगी कि शैक्षिक सत्र 2016-17 की शुरुआत से पहले सभी निजी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों का शुल्क तय हो जाए।
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1500 करोड़ वार्षिक का 'खेल'
निजी कालेजों में शुल्क वसूली के नाम पर हर साल औसतन 1500 करोड़ रुपये का 'खेल' होता है। बीएएमएस के लिए तीन से चार लाख, बीडीएस के लिए पांच से छह लाख और एमबीबीएस के लिए दस से बारह लाख रुपये प्रतिवर्ष तक वसूले जाते हैं। कुल 53 निजी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में एमबीबीएस की 1500, बीडीएस की 2500 व बीएएमएस की 1000 सीटें हैं। इस तरह हर वर्ष इन कालेजों में औसतन 25 हजार विद्यार्थी पढ़ रहे होते हैं। इन सभी से कुल मिलाकर 1500 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष वसूले जाते हैं।
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Thursday, 7 April 2016

पिछला लक्ष्य पूरा नहीं, नये ढूंढऩे पर जोर

--समाजवादी पेंशन--
-प्रमुख सचिव ने वीडियो कांफ्रेंसिंग कर जिलों को सौंपे नए लक्ष्य
-पुराने ढाई लाख के साथ नए दस लाख पेंशनर तलाशने को कहा
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: अखिलेश सरकार भले ही समाजवादी पेंशन को अगले चुनाव में उतरने का बड़ा हथियार बताए, अफसरों की ढिलाई के चलते पुराना लक्ष्य ही पूरा नहीं हो सका है। अब नये पेंशनर ढूंढऩे पर जोर दिया जा रहा है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हर मंच पर समाजवादी पेंशन योजना की प्रशंसा करते हैं। अगले विधानसभा चुनाव में भी वे समाजवादी पेंशन को बड़ा मुद्दा बनाने वाले हैं, इसलिए चुनाव पूर्व आखिरी वर्ष में इस योजना के लाभार्थियों की संख्या एक साथ दस लाख बढ़ाकर 55 लाख कर दी गयी है। मुख्यमंत्री भले ही समाजवादी पेंशन को अपने सरकार की फ्लैगशिप योजना बताएं, पर आंकड़े बताते हैं कि योजना के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार समाज कल्याण विभाग दो वित्तीय वर्षों में लक्ष्य के अनुरूप लाभार्थी ढूंढऩे में सफल नहीं हो सका है। वित्तीय वर्ष 2014-15 में 40 लाख लोगों को समाजवादी पेंशन देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था किन्तु कुल मिलाकर 33 लाख 35 हजार लोगों को ही पेंशन का भुगतान किया गया। वित्तीय वर्ष 2015-16 में लाभार्थियों का लक्ष्य बढ़ाकर 45 लाख किया गया किन्तु पेंशन बमुश्किल 42 लाख 50 हजार लोगों तक ही मिल पायी।
बीते दो वर्षों में लक्ष्य से दूर रहने के कारण इस बार पुराने लक्ष्य के साथ दस लाख नए पेंशनर ढूंढऩा विभाग के लिए चुनौती ही है। इसीलिए समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव सुनील कुमार ने दो दिन तक हर जिले के समाज कल्याण अधिकारी से वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से बात की और पूरी योजना की समीक्षा की। इस दौरान उनके साथ संयुक्त निदेशक आरके सिंह व उप निदेशक पीके त्रिपाठी भी मौजूद थे। जिला समाज कल्याण अधिकारियों को बताया गया कि नए दस लाख पेंशन ढूंढऩे के साथ पिछले वित्तीय वर्ष के बकाया ढाई लाख पेंशनरों सहित कुल 12.5 लाख पेंशनरों की तलाश कर उन्हें लाभार्थी बनाना है। इसके लिए जिलावार मिले लक्ष्य की पूर्ति सुनिश्चित करने व अभी से जुट जाने को कहा गया है। लापरवाही होने पर कड़ी कार्रवाई के लिए तैयार रहने की हिदायत भी दी गयी।

गलती संस्थानों की, खमियाजा भुगत रहे विद्यार्थी

-तीन लाख से अधिक को नहीं मिली छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति
-गलत परिणाम अपलोड होने से हुआ संकट, विद्यार्थी हो रहे परेशान
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : समाज कल्याण विभाग द्वारा दी जाने वाली दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में संस्थानों की गलती का खमियाजा विद्यार्थी भुगत रहे हैं। प्रमाण पत्रों का मिलान न हो पाने से तीन लाख से अधिक छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान ही नहीं हो सका है।
दसवीं उत्तीर्ण करने के बाद पढ़ाई न रुकने देने के लिए छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति देने का प्रावधान है। इसके लिए आवेदन से लेकर प्रतिपूर्ति तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन है। बीते माह जब छात्रवृत्ति भुगतान की प्रक्रिया शुरू हुई तो एनआइसी के साफ्टवेयर ने साढ़े पांच लाख विद्यार्थियों के आवेदन निरस्त कर दिये। इनमें से तीन लाख से अधिक आवेदन सामान्य व अनुसूचित जाति वर्ग के विद्यार्थियों के थे, जिनकी छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति बांटने का जिम्मा समाज कल्याण विभाग के पास है। दरअसल विश्वविद्यालयों के परीक्षा परिणामों का ठीक से मिलान न होने के कारण यह दिक्कत आयी थी। विश्वविद्यालयों ने जो परिणाम भेजा, कहीं उसका क्रम सही नहीं था, तो कुछ में रोल नंबर तक नहीं थे। विभाग ने भी उसे सही कराने की जरूरत नहीं समझी और विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति न देने का फैसला कर लिया। अब ये विद्यार्थी समाज कल्याण विभाग के चक्कर लगा रहे हैं किन्तु उन्हें कोई सही जवाब भी नहीं मिल रहा है। विद्यार्थियों का कहना है कि उन्होंने प्रक्रिया का पालन करते हुए फॉर्म भरा, हर स्तर पर हुई स्क्रीनिंग में उनके फॉर्म को हरी झंडी मिली, फिर भी अचानक छात्रवृत्ति न मिलने से वे परेशान हैं। इस संबंध में समाज कल्याण विभाग के छात्रवृत्ति प्रभारी सिद्धार्थ मिश्र ने बताया कि विश्वविद्यालयों से सही परिणाम न आने व आंकड़ों का मिलान न होने की स्थिति में कम्प्यूटरीकृत व्यवस्था के तहत शुल्क प्रतिपूर्ति व छात्रवृत्ति रुकी है। इस बाबत पहले ही बता दिया गया था, इसलिए इसमें विभाग की कोई गलती नहीं है।
पिछड़ा वर्ग ने किया भुगतान
समाज कल्याण विभाग भले ही संस्थानों की इस गलती का खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतने के लिए विवश कर रहा हो किन्तु पिछड़ा वर्ग विभाग की तत्परता से इस वर्ग के विद्यार्थियों का भुगतान हो गया है। पिछड़े वर्ग के 2.4 लाख विद्यार्थियों के आंकड़े व परीक्षा परिणाम भी गलत आए थे। इस पर अधिकारियों ने उनका परीक्षण कराया तो वे सही निकले और सभी को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान कर दिया गया।

Wednesday, 6 April 2016

शोध के दायरे में बुनकर से कुम्हार तक


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-इनोवेशन व इन्क्यूबेशन केंद्रों की नीति निर्धारित
-कानपुर, लखनऊ व गोरखपुर में बनेंगे नोडल सेंटर
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सूबे के इंजीनियरिंग कालेज अब बुनकरों से कुम्हारों तक के लिए शोध करेंगे। शासन ने प्रस्तावित इनोवेशन व इन्क्यूबेशन केंद्रों की नीति निर्धारित करते हुए कानपुर, लखनऊ व गोरखपुर में नोडल सेंटर बनाने का एलान किया है।
प्रदेश सरकार ने डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय के आर्थिक संसाधनों से प्रदेश में इनोवेशन व इन्क्यूबेशन केंद्रों की स्थापना का फैसला किया है। प्राविधिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव मुकुल सिंहल ने बताया कि एचबीटीआइ कानपुर में सिविल व केमिकल इंजीनियरिंग, यूपीटीटीआइ कानपुर में टेक्सटाइल इंजीनियरिंग, आइईटी लखनऊ में इलेक्ट्रिकल व इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस और इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी, एमएमएमयूटी गोरखपुर में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विधाओं के नोडल सेंटर स्थापित किये जाएंगे। प्रदेश के अन्य जिलों के इंजीनियरिंग कालेजों को इन नोडल सेंटर्स से संबद्ध किया जाएगा। इन केंद्रों के माध्यम से शिल्पकारों, बुनकरों, किसानों के साथ बढ़ई व कुम्हारों तक के लिए उपयोगी शोध पर जोर दिया जाएगा।
उत्पादकता बढ़ाने पर जोर
नीति मेंं इन केंद्रों के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाने पर पूरा जोर दिया गया है। छह उद्देश्य परिभाषित करते हुए कहा गया है कि ये केंद्र नवीनतम तकनीकी एवं व्यावसायिक विचारों को वास्तविक उत्पाद एवं सेवाओं में परिवर्तित करेंगे। कृषि, विज्ञान, सेवाओं, तकनीकी आदि में नवीनतम अन्वेषण को मूर्त रूप में साकार करने पर जोर होगा। ऐसे उत्पाद विकसित किये जाएंगे जो वाणिज्यिक रूप से व्यावहारिक हों। लघु व मध्यम श्रेणी के उद्योगों में उत्पादकता बढ़ाने के उपाय किये जाएंगे। उद्योगों व अन्य संस्थाओं को परीक्षण सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। व्यावसायिक उत्पादन में जाने से पूर्व नए उत्पाद को बाजार से संबंधित सहायता भी प्रदान की जाएगी।
हर जिले में स्क्रीनिंग कमेटी
उत्तर प्रदेश के हर नागरिक या यहां पंजीकृत हर संस्था को इन इन्क्यूबेशन व इनोवेशन केंद्रों का लाभ उठाने का मौका मिलेगा। इसके लिए आवेदनों को मंजूरी देने के लिए हर जिले में स्क्रीनिंग कमेटी बनेगी। इस कमेटी के अध्यक्ष राजकीय इंजीनियरिंग कालेज के निदेशक और समन्वयक राजकीय पॉलीटेक्निक के प्रधानाचार्य होंगे। जिले में राजकीय इंजीनियरिंग कालेज न होने पर समन्वयक ही स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष भी होंगे। स्क्रीनिंग समिति के स्तर पर पारित प्रस्ताव तीनों नोडल सेंटर्स के पास भेजे जाएंगे, जहां उन पर अंतिम फैसला होगा।
पढ़ाई न बने आधार
नीति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी प्रस्ताव को निरस्त करने के लिए पढ़ाई को बिल्कुल आधार न बनाया जाए। तर्क दिया गया है कि धरती से जुड़ी आम आदमी की बहुत सी समस्याओं के अनपढ़ अथवा कम पढ़े लिखे लोगों व संसाधन विहीन व्यक्तियों के पास भी होते हैं। अत: यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी विचार या प्रस्ताव को अपेक्षाकृत कम पढ़े लिखे, कमजोर अथवा संसाधन विहीन व्यक्ति द्वारा दिये जाने के कारण निरस्त न कर दिया जाए। स्क्रीनिंग कमेटी ऐसे सभी प्रस्तावों का परीक्षण करे और उसमें संभावना दिखे तो उन्हें मूर्त रूप देना सुनिश्चित किया जाए। 

इंजीनियरिंग कालेज चाहते 'शट डाउन'


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-एकेटीयू ने शासन को भेजे 37 कालेजों के आवेदन
-बीटेक के साथ एमबीए-एमसीए भी चाहते बंदी
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : कुछ वर्ष पूर्व पूरे उत्तर प्रदेश में तेजी से खुले इंजीनियरिंग कालेज अब बंद होना चाहते हैं। एकेटीयू ने ऐसे 37 मामले शासन को संदर्भित किये हैं। इनमें बीटेक के साथ एमबीए व एमसीए पाठ्यक्रमों को बंद करने के आवेदन भी शामिल हैं।
इक्कीसवीं सदी शुरू होने के साथ ही उत्तर प्रदेश के शैक्षिक जगत में सबसे बड़ा बदलाव तेजी से इंजीनियरिंग कालेज खुलने के रूप में सामने आया था। कंप्यूटर विशेषज्ञों की मांग बढऩे के कारण एमसीए शिक्षण संस्थान और प्रबंधन शिक्षा देने वाले एमबीए शिक्षण संस्थान भी इसी रफ्तार से खुले। कुछ वर्षों में इंजीनियरिंग व प्रबंधन शिक्षा को लेकर घटे उत्साह से इन संस्थानों में प्रवेश के लाले पड़ रहे हैं। परिणाम है कि निजी इंजीनियरिंग व प्रबंधन संस्थान अब कालेज बंद कर उन परिसरों में पब्लिक स्कूल या सामान्य डिग्र्री कालेज खोलना चाहते हैं। इन संस्थानों को संबद्धता देने वाले डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम विश्वविद्यालय (एकेटीयू) ने हाल ही में शासन को 37 ऐसे आवेदन अग्र्रसारित किये हैं, जिन्होंने बीटेक, एमबीए या एमसीए पाठ्यक्रमों के संचालन से मुक्ति चाही है।
एक समय में लखनऊ व नोएडा के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले इंजीनियरिंग शिक्षा के बड़े केंद्र के रूप में उभरे थे। शिक्षा का स्तर बरकरार न रख पाने, उपयुक्त रोजगार के अवसर सृजित न कर पाने के कारण सर्वाधिक प्रभावित भी यही क्षेत्र हुए हैं। बंदी का आवेदन करने वालों में सर्वाधिक आवेदन लखनऊ के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ही हैं। मथुरा, बरेली, मेरठ, नोएडा, बुलंदशहर, गाजियाबाद, आगरा, हापुड़ के सर्वाधिक कालेजों ने पाठ्यक्रम बंदी के लिए आवेदन किये हैं। तमाम कालेजों ने सिविल इंजीनियरिंग, केमिकल इंजीनियरिंग, इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इंस्ट्रूमेंटेशन इंजीनियरिंग, आटोमोबाइल इंजीनियरिंग की शाखाओं में पढ़ाई बंद करने की अनुमति मांगी है। कुछ वर्ष पूर्व जहां विद्यार्थियों की बढ़ी संख्या के मद्देनजर तमाम संस्थानों ने दूसरी शिफ्ट भी शुरू कर दी थी, उन्होंने दूसरी शिफ्ट बंद करने के आवेदन भी दिये हैं। इसके अलावा सीटें कम करने के भी दर्जन भर आवेदन आए हैं। इस दौरान छात्राओं के लिए अलग से इंजीनियरिंग कालेज भी खोले गए थे, किन्तु उनमें पर्याप्त संख्या में प्रवेश न होने के कारण उनके स्वरूप में बदलाव कर छात्रों को भी प्रवेश देने की अनुमति मांगी गयी है।

Tuesday, 5 April 2016

बहुरेंगे पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम के दिन


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-कार्ययोजना को वित्त व सार्वजनिक उद्यम विभागों की सहमति
-राज्य सरकार से 50 करोड़ मांगे, केंद्र से मिलेंगे 500 करोड़
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डॉ.संजीव, लखनऊ
पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम के दिन जल्द बहुरने वाले हैं। पिछड़ा वर्ग विभाग ने निगम के पुनरुद्धार के लिए विस्तृत कार्ययोजना बनाई है। इस पर अमल के लिए शासन स्तर पर पहल भी शुरू कर दी गयी है।
राज्य में पिछड़ों को अपने पैरों पर खड़ा करने, उन्हें रोजगार के अवसर मुहैया कराने व उद्यमिता विकास के लिए 1989 में उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम की स्थापना की गयी थी। इसके अंतर्गत विभिन्न योजनाओं में ऋण देने का प्रावधान किया गया था। इसके लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम से क्रेडिट लिमिट के आधार पर धन मिलता है और फिर उसे लौटाकर ऋण वितरण की प्रक्रिया चलती रहती है। राष्ट्रीय निगम का बकाया 50 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच जाने पर वहां से ऋण मिलना बंद हो गया और क्रेडिट लिमिट भी समाप्त कर दी गयी। इस कारण निगम का कामकाज प्रभावित हो गया है। पिछड़ा वर्ग विभाग के सचिव डॉ.हरिओम ने बताया कि अब राज्य निगम के पुनरुद्धार के लिए विस्तृत कार्ययोजना बनायी गयी है। इस कार्ययोजना को वित्त व सार्वजनिक उद्यम विभाग की सहमति प्राप्त हो गयी है। जल्द ही कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत कर इसे अमल में लाने की पहल होगी। इसके अंतर्गत प्रदेश शासन से 50 करोड़ रुपये मांगे गए हैं। उक्त 50 करोड़ रुपये राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम में जमा करने के बाद वहां से 500 करोड़ रुपये की क्रेडिट लिमिट हो जाएगी। इस राशि से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए सकारात्मक दिशा में काम सुनिश्चित किया जाएगा। साथ ही ऋण वितरण के नियम सख्त किये जाएंगे, ताकि अधिकाधिक वसूली सुनिश्चित हो सके।
दो साल से काम बंद
पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम का काम दो साल से बिल्कुल बंद है। निगम पिछड़े वर्ग के लोगों को ऋण देने सहित उद्यमिता विकास के कार्यक्रम चलाता था, किन्तु धनाभाव में यह बिल्कुल बंद हो गया है। वर्ष 2014-15 व 2015-16 में बिल्कुल ऋण दिया ही नहीं गया। अन्य कार्यक्रमों व योजनाओं का संचालन भी बिल्कुल नहीं हो रहा है। इस तरह निगम के कर्मचारियों का वेतन भी एक तरह से बोझ बन गया है।
दस साल से वसूली रुकी
इन स्थितियों के लिए निगम के कर्मचारियों की लापरवाही भी जिम्मेदार है। बीते दस साल से 47.5 करोड़ रुपये की वसूली ही नहीं हुई है। पांच करोड़ तो उत्तराखंड में फंसा है। अधिकारी मानते हैं कि अब यह राशि नहीं मिलेगी। प्रदेश के पिछड़े वर्ग के लोगों में फंसे 42.5 करोड़ रुपये भी नहीं मिल पा रहे हैं। पुनरुद्धार के बाद यह राशि वसूलने की मशक्कत नए सिरे से शुरू की जाएगी।
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ये हैं पांच ऋण योजनाएं
मार्जिनमनी: पारंपरिक व तकनीकी व्यवसाय, लघु व कुटीर उद्योग के लिए छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर लागत का 50 फीसद ऋण मिलता है।
टर्मलोन: कृषि, दस्तकारी व अन्य सामान्य व्यवसायों की स्थापना के लिए छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर ऋण स्वीकृत किया जाता है।
शैक्षिक: गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले विद्यार्थियों को 75 हजार रुपये प्रति वर्ष की दर से तीन लाख रुपये तक चार फीसद वार्षिक ब्याज पर ऋण मिलता है।
न्यूस्वर्णिमा: महिलाओं को 50 हजार रुपये तक की परियोजनाएं स्थापित करने के लिए चार प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर ऋण मिलता है।
माइक्रोक्रेडिट: स्वयं सहायता समूहों को लघु व कुटीर उद्योग स्थापना के लिए 25 हजार रुपये तक ऋण पांच प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर दिया जाता है।

बीटेक की चाह घटी, डिप्लोमा में उछाल


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-एकेटीयू से जुड़े संस्थानों से विद्यार्थियों का मोहभंग
-एमबीए व एमसीए के आवेदनों में भी आयी गिरावट
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश में ताबड़तोड़ खुले इंजीनियरिंग कालेज अभ्यर्थियों को रिझाने में विफल हो रहे हैं। इस वर्ष प्रवेश के लिए आए आवेदन बताते हैं कि बीटेक की चाह घटी है, वहीं डिप्लोमा में उछाल आया है। यही नहीं, एमबीए व एमसीए के आवेदनों में भी गिरावट आई है।
एक दशक में इंजीनियरिंग कालेजों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। सरकारी क्षेत्र के राज्य इंजीनियरिंग कालेजों व निजी इंजीनियरिंग कालेजों को डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम विश्वविद्यालय (एकेटीयू) से संबद्ध किया जाता है। इन संस्थानों में प्रवेश लेकर बीटेक करने का क्रेज अब पहले जैसा नहीं रहा, यह बात इनमें प्रवेश के लिए आए आवेदनों से स्पष्ट हो रही है। इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली संयुक्त प्रवेश परीक्षा के आकड़ों को आधार बनाएं तो पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष अभ्यर्थियों की संख्या खासी कम हुई है। पिछले वर्ष जहां 1,72,197 विद्यार्थियों ने बीटेक में प्रवेश की आस लेकर संयुक्त प्रवेश परीक्षा का फॉर्म भरा था, इस बार यह संख्या घटकर 1,43,838 रह गयी है। इस तरह इस वर्ष बीटेक के लिए आवेदन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में महज 83.5 फीसद रह गयी है।
एकेटीयू से संबद्ध संस्थानों में एमबीए व एमसीए में प्रवेश चाहने वालों की संख्या भी घटी है। वर्ष 2015 में एमबीए में प्रवेश के लिए 10839 विद्यार्थियों ने आवेदन किया था। इस वर्ष आवेदन करने वालों की संख्या घटकर 9049 यानी 83.5 फीसद रह गयी है। प्रतिशत के आधार पर आकलन करें तो सर्वाधिक बुरी स्थिति एमसीए की है। पिछले वर्ष एमसीए के लिए 4258 छात्र-छात्राओं ने आवेदन किया था। इसके विपरीत इस वर्ष महज 56 फीसद यानी 2394 विद्यार्थियों ने ही आवेदन किया है। बीटेक, एमबीए व एमसीए के आवेदक भले ही घटे हों, डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश चाहने वालों की संख्या इस बार बढ़ी है। पिछले वर्ष 2015 में प्रदेश के पॉलीटेक्निक संस्थानों में प्रवेश के लिए 5,17,551 छात्र-छात्राओं ने आवेदन किया था। इस बार इसमें उछाल आया और आवेदकों की संख्या बढ़कर 5,31,152 हो गयी है। इस तरह इस वर्ष 2016 में पॉलीटेक्निक में प्रवेश चाहने वालों की संख्या 13,601 बढ़ी है।
गुणवत्ता व रोजगारपरक शिक्षा पर फोकस
पूरे देश में इंजीनियरिंग शिक्षा को लेकर ऐसा ही ट्रेंड है। उसी के अनुरूप बीटेक व अन्य पाठ्यक्रमों में आवेदकों की संख्या घटी है। हमारा फोकस गुणवत्ता व रोजगारपरक शिक्षा पर है। इसके बाद निश्चित रूप से यह संख्या बढ़ेगी और विद्यार्थी प्रदेश के इंजीनियरिंग कालेजों का रुख करेंगे। -प्रो.विनय पाठक, कुलपति, डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय
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रोजगार के अवसरों की संख्या भी बढ़ाई
हमारा पूरा जोर पॉलीटेक्निक संस्थानों में पढ़ाई की गुणवत्ता पर है। इन संस्थानों में रोजगार के लिए अवसरों की संख्या भी बढ़ाई गयी है। इसका परिणाम डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने के इच्छुक विद्यार्थियों की संख्या बढऩे के रूप में सामने आया है। इसमें सर्वाधिक सकारात्मक पहलू यह है कि छात्राओं की संख्या छात्रों की तुलना में अधिक बढ़ी है। -एफआर खान, सचिव, संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद

Sunday, 3 April 2016

बीटेक में सिखाएंगे खाने-पहनने का सलीका


-नए सत्र से बदलेगा इंजीनियरिंग कालेजों का पाठ्यक्रम
-दुनिया से मुकाबले को तैयार करने की पहल
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डॉ.संजीव, लखनऊ
प्राविधिक शिक्षा विभाग ने इंजीनियरिंग कालेजों में पाठ्यक्रम बदलाव की पहल की है। अब बीटेक छात्र-छात्राओं को इंजीनियरिंग के साथ कपड़े पहनने व खाने का सलीका भी सिखाया जाएगा। तीन माह के भीतर पहले सेमेस्टर का बदला पाठ्यक्रम तय हो जाएगा, उसके बाद धीरे-धीरे हर सेमेस्टर का पाठ्यक्रम बदलेगा।
प्रदेश में ताबड़तोड़ खुले इंजीनियरिंग कालेजों ने हर साल इंजीनियरों की संख्या तो बढ़ा दी किन्तु उन्हें स्तरीय रोजगार के अवसर नहीं मुहैया कराए। बीटेक के बाद भारी संख्या में छात्र-छात्राएं बीएड करके प्राइमरी शिक्षक बनने की कतार में खड़े हो गए तो कुछ लिपिक व चपरासी तक बनने के लिए आवेदन करने लगे। कैम्पस इंटरव्यू के दौरान विभिन्न कंपनियों को संतुष्ट न कर पाना भी एक समस्या है। प्रमुख सचिव प्राविधिक शिक्षा मुकुल सिंघल के मुताबिक इन संस्थानों से निकलने वाले छात्र-छात्राएं भावी सेवायोजकों के सामने स्वयं को ठीक से प्रस्तुत ही नहीं कर पाते, इसलिए अब उनकी 'प्रेजेंटेबिलिटी' पर फोकस करने की तैयारी है। ऐसा सिर्फ डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम यूनिवर्सिटी यानी एकेटीयू (पूर्व में यूपीटीयू) से संबद्ध कालेजों के साथ नहीं है कि उन्हें ग्रामीण या सामान्य पृष्ठभूमि के छात्र-छात्राएं मिलते हैं, आइआइटी जैसे संस्थानों में भी है। हालांकि वहां पहले सेमेस्टर से ही उनकी 'पर्सनॉलिटी' पर फोकस रहता है। जिस तरह वहां इन छात्र-छात्राओं के वैयक्तिक विकास को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है, उसी तर्ज पर एकेटीयू का पाठ्यक्रम बदलने की तैयारी है। एकेटीयू की पाठ्यक्रम समिति से इस बाबत प्रस्ताव मांगे गए हैं, साथ इसमें आइआइटी व अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञों की सलाह भी ली जा रही है। अगले तीन माह में पहले सेमेस्टर में प्रस्तावित बदलावों को मूर्त रूप दे दिया जाएगा ताकि जुलाई 2016 से शुरू होने वाले सत्र से बदला पाठ्यक्रम लागू किया जा सके। इसके बाद हर सेमेस्टर में नया पाठ्यक्रम होगा और यह पूरा बैच नए पाठ्यक्रम के साथ बीटेक करके निकलेगा। इसमें कपड़े पहनने व खाना खाने तक के तौर तरीके सिखाए जाएंगे। उनके 'कम्युनिकेशन स्किल' व 'निगोशियेशन स्किल' में सुधार को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा।
वे कर सकें मुकाबला
पाठ्यक्रम बदलाव में पूरा जोर बाजार की जरूरतों पर है। अभी बीटेक पाठ्यक्रम में सिर्फ इंजीनियरिंग व संबंधित ब्रांच की पढ़ाई ही होती है। इधर एमआइटी जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों व आइआइटी जैसे प्रमुख भारतीय संस्थानों ने अपने विद्यार्थियों को व्यापारिक जानकारी से लैस करना शुरू किया है। एकेटीयू के बीटेक पाठ्यक्रम में भी कामर्शियल एकाउंटिंग, कॉरपोरेट लॉ, कांट्रैक्ट लॉ व कम्पनी रूल्स को भी शामिल किया जाएगा।
बदलाव समय की मांग
बीटेक पाठ्यक्रमों में बदलाव के बाद दूसरे चरण में पॉलीटेक्निक पाठ्यक्रम में भी बदलाव किया जाएगा। वहां भी पूरा जोर सॉफ्ट स्किल्स पर रहेगा।
-मुकुल सिंघल, प्रमुख सचिव (प्राविधिक शिक्षा)