Sunday, 27 March 2016

पहले स्वीकृतियां कम, फिर खर्च और कम


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-बजट प्रावधान के अनुरूप धन स्वीकृत करने में हुई ढिलाई
-धन मिला तो विभाग खर्च के लिए मार्च का इंतजार करते रहे
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : वित्तीय वर्ष खत्म होने को है और आखिरी 15 दिनों में सभी विभागों में ताबड़तोड़ स्वीकृतियों व खर्चों को अंतिम रूप देने की मशक्कत चली है। आंकड़े बताते हैं कि पहले तो शासन स्तर से धन स्वीकृत करने में हाथ कसा गया और फिर विभागों ने खर्च करने में ढिलाई बरती।
प्रदेश सरकार आम बजट में ही अलग-अलग विभागों के लिए धन आवंटित कर प्रावधान कर देती है। उसके बाद आवश्यकतानुरूप इसमें बदलाव होते रहते हैं। अफसरों की लापरवाही व ढिलाई से सामान्यत: देखा गया है कि मार्च आते-आते यह पूरी धनराशि खर्च ही नहीं हो पाती है। इस साल भी कमोवेश यही स्थिति है और सभी विभाग आनन-फानन स्वीकृत धन खर्च करने के लिए खरीद या निर्माण आदेश आदि जारी करने में जुटे हैं। मार्च के आखिरी पखवाड़े यह मशक्कत तेज हो गयी है। 14 मार्च तक के आंकड़ों को देखें तो प्रदेश के 21 विभागों को कुल बजट प्रावधान 1058 अरब रुपये के विपरीत 69.7 फीसद राशि यानी 738 अरब रुपये ही स्वीकृत किये गए थे। स्वीकृत राशि के साथ सीधे प्राप्त केंद्रांश व एक अप्रैल 2015 को बैंक पड़ी अप्रयुक्त धनराशि को जोड़ लिया जाए तो इन विभागों के पास खर्च के लिए 931 अरब रुपये थे, किन्तु खर्च हुए केवल 718 अरब रुपये। इस तरह उपलब्ध धनराशि में भी 23 फीसद धन तमाम सरकारी विभाग खर्च ही नहीं कर पाए।
खर्च में अल्पसंख्यक कल्याण पीछे
धन खर्च करने में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग सबसे पीछे रहा। 2284 करोड़ रुपये बजट प्रावधान के विपरीत महज 39 प्रतिशत धनराशि स्वीकृत हुई और उसमें भी मात्र 36 फीसद खर्च की गयी। न्याय विभाग को स्वीकृति भले ही 61 फीसद की मिली, किन्तु जितना मिला, पूरा खर्च कर लिया। इसी तरह ग्राम्य विकास विभाग भी खर्च के मामले में 98 फीसद के साथ अव्वल है। पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग को शासन ने तो 98.8 फीसद राशि स्वीकृत कर दी, किन्तु 14 मार्च तक खर्च हो सकी महज 40 फीसद।
शिक्षा विभाग को न्यूनतम स्वीकृति
स्वीकृति के मामले में शिक्षा विभाग सबसे पीछे रहा है। 14 मार्च तक माध्यमिक शिक्षा विभाग को 2187 करोड़ के बजट प्रावधान की तुलना में महज 31.3 फीसद राशि ही स्वीकृत की गयी थी। विभाग ने कुल प्राप्त धन में 61 फीसद खर्च कर लिया था। इसी तरह बेसिक शिक्षा के 17014 करोड़ प्रावधान के विपरीत महज 47 फीसद राशि की स्वीकृतियां ही जारी हुई थीं। बेसिक शिक्षा विभाग ने भी 78 फीसद धनराशि खर्च कर डाली।
मुख्य सचिव सख्त, बुलाई बैठक
विभागों के कामकाज की इस गति पर मुख्य सचिव आलोक रंजन ने सख्त रुख अख्तियार किया है। उन्होंने 30 मार्च को वित्तीय वर्ष के दौरान धनराशि के उपयोग की समीक्षा करने के लिए सभी विभागों की बैठक बुलाई है। 22 विभागों के प्रमुख सचिवों व सचिवों को स्वयं उपस्थित रहने के निर्देश के साथ सभी को एक प्रोफार्मा भेजा गया है। उनसे वित्तीय वर्ष 2015-16 के लिए बजट प्रावधानों के सापेक्ष जारी स्वीकृतियों, भारत सरकार से प्राप्त सहायता व अप्रयुक्त धनराशि के उपयोग संबंधी जानकारियां इस प्रोफार्मा में भरकर 28 मार्च तक नियोजन विभाग को उपलब्ध कराने को कहा गया है।

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