Friday, 19 February 2016

जान बचाती नहीं, मुआवजे में भी बाधा बनती पुलिस


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-'हिट एंड रन' मामलों में हर साल जान गंवाते ढाई हजार लोग
-पुलिस की ढिलाई से नहीं मिल पा रही 95 फीसद को कोई मदद
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
पुलिस के जिम्मे लोगों की जान बचाने का काम है। उत्तर प्रदेश की पुलिस यह काम कितनी ईमानदारी से करती है, इसके बारे में आम जनता के बीच किसी से भी बात की जा सकती है। जान बचाने में तत्परता न दिखाने वाली सूबे की पुलिस अचानक मौत के मुंह में जाने वाले लोगों को मिलने वाले मुआवजे में भी बाधा बनती नजर आ रही है। 'हिट एंड रन' मामलों में जान गंवाने वालों में से 95 फीसद के परिजनों को पुलिस की ढिलाई के कारण कोई मदद नहीं मिल पाती।
उत्तर प्रदेश में हर साल औसतन 16 हजार लोगों की मौत मार्ग दुर्घटनाओं में होती है। इनमें से लगभग साढ़े तेरह हजार लोगों की मृत्यु के बाद दुर्घटना में शामिल वाहन आदि का ब्योरा उपलब्ध होता है। शेष ढाई हजार के आसपास लोगों को मार कर वाहन सवार भाग जाते हैं। ऐसे 'हिट एंड रन' मामलों के शिकार लोगों में अधिकांशत: पैदल चलने वाले, साइकिल सवार या रिक्शा चालक और मजदूर आदि होते हैं। कई बार हाईवे पर स्थित फैक्ट्रियों से निकलने वाले मजदूरों को कुचलकर तेज वाहन चालक भाग जाते हैं और उन वाहनों का पता ही नहीं चल पाता।
परिवहन आयुक्त के. रविन्द्र नायक के मुताबिक 'हिट एंड रन' मामलों में मृत्यु के बाद संबंधित व्यक्ति के परिवारीजन को 25 हजार रुपये मुआवजा देने की व्यवस्था है। इसके लिए हर जिले में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति है, जिसके सदस्य सचिव नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के प्रतिनिधि होते हैं। थाना प्रभारियों के स्तर पर समय से रिपोर्ट भेजी जानी चाहिए, ताकि मुआवजे के लिए उक्त समिति की बैठक हो सके। बीते कई वर्षों से प्रदेश के अधिकांश जिलों में इन समितियों की बैठकें ही नहीं हुई हैं। हाल ही में पड़ताल कराने पर पता चला कि थाना प्रभारी इस बाबत रिपोर्ट ही नहीं लगाते हैं। अब  पुलिस महानिदेशक सहित सभी जिलों के पुलिस प्रमुखों को पत्र लिखकर ऐसे लापरवाह थानाध्यक्षों को निलंबित करने के साथ ढिलाई की जांच कराने की संस्तुति की गई है। पुष्टि होने पर ऐसे थानाध्यक्षों के खिलाफ मुकदमा भी कराया जाना चाहिए।
करेंगे मुआवजा बढ़ाने की मांग
परिवहन आयुक्त के. रविन्द्र नायक ने बताया कि 'हिट एंड रन' मामलों में मृत्यु की स्थिति में अभी 25 हजार रुपये मुआवजा देने की व्यवस्था है। यह राशि काफी कम है। 1994 के बाद से इस राशि में वृद्धि नहीं हुई है। वे सोमवार को दिल्ली में होने वाली सड़क सुरक्षा परिषद की बैठक में यह मुआवजा बढ़ाने की मांग करेंगे। साथ ही इस मामले में ढिलाई बरतने वाले पुलिसकर्मियों व अन्य अधिकारियों के खिलाफ कठोर दंड की सिफारिश भी करेंगे।

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