Sunday, 28 February 2016

सरकार सलाह दे चुकी, इलाज की चिंता आप करें


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-नहीं थम रहा स्वाइन फ्लू, सलाह जारी कर सेहत महकमा बेफिक्र
-घोषणा के बाद भी मेडिकल कालेजों में जांच सुविधा नहीं
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : ठंड जा रही और गर्मी दस्तक दे रही। मौसम बदलाव के इस दौर में संक्रमण समस्या बन सकता है। आप स्वयं सावधान रहिये क्योंकि सरकारी मशीनरी तैयार नहीं है। स्वाइन फ्लू पहले ही थम नहीं पा रहा है और सेहत महकमा सलाह जारी कर बेफिक्र बैठा है। बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बाद भी मेडिकल कालेजों में स्वाइन फ्लू जांच की सुविधा नहीं शुरू हो सकी है।
चिकित्सकों के मुताबिक इस समय संक्रामक रोगों की संभावना अत्यधिक होती है। बच्चों व बुजुर्गों के लिए यह मौसम अत्यधिक संवेदनशील होता है। अस्पतालों में उनकी संख्या तेजी से बढ़ भी रही है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि इस मौसम में मलेरिया, संक्रामक ज्वर, टायफाइड, हिपेटाइटिस, गैस्ट्रोइन्ट्राइटिस जैसी बीमारियों का खतरा रहता है। तेज बुखार, उल्टी, दस्त या बेहोशी होने पर निकटतम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या मेडिकल कालेज अस्पताल में तुरंत पहुंचे।
वैसे सावधानियां बरतना मजबूरी भी है। सरकारी मशीनरी संक्रामक रोगों से निपटने के लिए सिर्फ कागजों पर है। यह हालत तब है, जबकि स्वाइन फ्लू के मरीज लगातार अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। संयुक्त स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ.बीवी पाठक स्वीकार करते हैं कि अभी मार्च-अप्रैल तक स्वाइन फ्लू के मरीज सामने आ सकते हैं। उन्होंने बताया कि स्वाइन फ्लू के लिए दवाएं सभी जिला अस्पतालों व अन्य अस्पतालों में मुहैया करा दी गयी हैं। हालांकि इस सच का दूसरा पहलू यह भी है कि सेहत महकमा महज एक सलाह जारी कर चुप बैठ गया है। स्वाइन फ्लू जांच की सुविधा प्रदेश में सिर्फ तीन स्थानों लखनऊ के केजीएमयू व संजय गांधी संस्थान और सैफई (इटावा) के ग्र्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान में ही है। यह स्थिति तब है, जबकि स्वाइन फ्लू के मरीज सामने आना शुरू होते ही चिकित्सा शिक्षा महकमे ने हर मेडिकल कालेज में स्वाइन फ्लू की जांच कराने का दावा किया था। यह दावा अब तक धरातल पर नहीं उतर सका है। डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि गोरखपुर, इलाहाबाद, कानपुर, आगरा व मेरठ मेडिकल कालेजों में जांच के लिए पीसीआर मशीनें खरीद ली गयी हैं। लैब टेक्नीशियन व अन्य कर्मचारी नियुक्त कर दिये गए हैं। आइसीएमआर से एमओयू शेष है। यह प्रक्रिया पूरी होते ही जांच शुरू हो जाएगी।
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जरूरी सावधानियां
-बच्चे को भीड़भाड़ वाले इलाकों में न ले जाएं।
-खाने-पीने में सावधानी बरतें, साफ पानी लें।
-खाना ताजा खाएं और ढंक कर रखें।
-मच्छरों से बचाव के बंदोबस्त सुनिश्चित करें।
-घर के आसपास किसी भी हालत में पानी न ठहरने दें।

Friday, 26 February 2016

आइआइटी की साझेदारी से लहराएंगे डिजाइन का परचम

-नोएडा के स्कूल ऑफ डिजाइन को आइआइटी गुवाहाटी की मदद
-बीडेस व एमडेस पाठ्यक्रमों के लिए जल्द होंगे एमओयू पर हस्ताक्षर
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश में डिजाइन क्षेत्र में मजबूती के लिए प्राविधिक शिक्षा विभाग विशेषज्ञ तैयार करने की मशक्कत में जुट रहा है। इसके लिए एक अलग स्कूल ऑफ डिजाइन की स्थापना का प्रस्ताव है। इसमें आइआइटी की साझेदारी से दुनिया में सूबे की डिजाइन का परचम लहराने की तैयारी है।
प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग ने डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) के नोएडा कैम्पस में स्कूल ऑफ डिजाइन की स्थापना का फैसला किया है। इस काम में उत्कृष्टता बनाए रखने के लिए आइआइटी गुवाहाटी की मदद ली जाएगी। इस बाबत मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जल्द ही प्रदेश शासन, एकेटीयू और आइआइटी गुवाहाटी के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। उसके बाद पाठ्यक्रम संरचना से लेकर अन्य बिंदुओं को मूर्त रूप दिया जाएगा।
प्रमुख सचिव (प्राविधिक शिक्षा) मुकुल सिंघल के मुताबिक इस डिजाइन संस्थान के माध्यम से सूबे की प्रतिभा तराशने का काम किया जाएगा। आइआइटी गुवाहाटी व कानपुर में सफलतापूर्वक डिजाइन में स्नातक व परास्नातक कार्यक्रम चल रहे हैं, इसलिए इन संस्थानों से सहयोग लेने का फैसला हुआ है। इसके बाद यूपी में बैचलर ऑफ डिजाइन (बीडेस) व मास्टर ऑफ डिजाइन (एमडेस) पाठ्यक्रम शुरू किये जाएंगे। इन पाठ्यक्रमों का नियोजन विभिन्न विधाओं की विशिष्टताओं को जोड़ कर किया जाएगा। इसके लिए उद्योगों की मदद तो ली ही जाएगी, दुनिया के प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय डिजाइन संस्थानों से भी हाथ मिलाए जाएंगे। इस बाबत प्रक्रियागत शुरुआत कर दी गयी है। अगले सत्र तक यह संस्थान मूर्त रूप ले लेने की उम्मीद है। स्कूल ऑफ डिजाइन की स्थापना के लिए समन्वयक बनाए गए डॉ.वीके सिंह के मुताबिक आइआइटी गुवाहाटी इस संस्थान का मेंटर संस्थान होगा। यही कारण है कि संस्थान की स्थापना के लिए बनाई गयी कोर कमेटी में आइआइटी गुवाहाटी के निदेशक गौतम विश्वास को शामिल किया गया है। उनके साथ आइआइटी कानपुर के सात्यकी रे भी इस कोर कमेटी का हिस्सा हैं। 

यातायात अराजकता पर अंकुश को ई-चालान की तैयारी

-लखनऊ व नोएडा से शुरुआत, फिर पूरे प्रदेश में होगा लागू
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : यदि आपने गाड़ी बीच सड़क पर खड़ी कर दी है या फिर टैम्पो चालक अराजकता के साथ वाहन चला रहा है, तो परिवहन विभाग उसके रुकने का इंतजार नहीं करेगा। लखनऊ व नोएडा से शुरू कर पूरे प्रदेश में यातायात अराजकता पर अंकुश के लिए ई-चालान प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी है।
तकनीकी उन्नयन के साथ परिवहन विभाग यातायात अराजकता पर ऑनलाइन सक्रियता बढ़ाने जा रहा है। परिवहन आयुक्त के. रविन्द्र नायक ने अधिकारियों के साथ बैठक कर ई-चालान प्रणाली लागू करने की तैयारियों की समीक्षा की। बताया गया कि सड़क पर वाहनों की अराजकता की शिकायतें आती रहती हैं किन्तु परिवहन विभाग के अफसरों के रोकने से वाहन चालक रुकते तक नहीं है। इस पर नियंत्रण के लिए ई-चालान प्रणाली बेहद प्रभावी साबित होगी। इसके अंतर्गत परिवहन विभाग के कर्मचारियों के पास टेबलेट होगा, जिस पर ऑनलाइन सभी वाहनों का ब्योरा उपलब्ध होगा। अराजकता का हिस्सा बने वाहन का नंबर डालते ही उक्त वाहन के मालिक का पता व अन्य ब्योरा सामने आ जाएगा। यही नहीं, उसके अपराध का कोड नंबर डालते ही अपराध व जुर्माने सहित पूरा ब्योरा आ जाएगा। इसके साथ ही चालान बनकर तैयार होगा। यदि वाहन चालक रुकेगा, तो उसे वहीं चालान की राशि भुगतान की तिथि के साथ चालान सौंप दिया जाएगा। वाहन चालक के न रुकने पर वाहनस्वामी के घर के पते पर चालान भेजा जाएगा। लखनऊ व नोएडा में जल्द ही इस परियोजना की प्रायोगिक शुरूआत होगी। इसके बाद पूरे प्रदेश में इसे लागू कर दिया जाएगा।

35 हजार से ज्यादा को मिल गयी दोगुनी छात्रवृत्ति


-फेल हुए चौकसी के दावे, 11 करोड़ की वसूली के निर्देश
-शासन ने बनाई जांच समिति, चिह्नित होंगे दोषी अधिकारी
डॉ.संजीव, लखनऊ
छात्रवृत्ति भुगतान को लेकर तमाम हाईटेक प्रबंधन व सावधानी बरतने के दावे फेल होते नजर आ रहे हैं। तमाम चौकसी के बावजूद 35 हजार से अधिक विद्यार्थियों को दोगुनी छात्रवृत्ति दे दी गयी। अब इन सभी से 11 करोड़ रुपये की वसूली के निर्देश दिये गए हैं। साथ ही मामले की जांच के लिए शासन ने समिति गठित कर दी है, ताकि दोषी अधिकारियों को चिह्नित कर दंडित किया जा सके।
दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजना के अंतर्गत अन्य पिछड़े वर्ग के 11वीं व 12वीं के छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति दी जाती है। पिछले कुछ वर्षों से इस छात्रवृत्ति वितरण में तमाम अनियमितताओं व अराजकता की जानकारी मिल रही थी। इस कारण पूरी व्यवस्था ऑनलाइन कर दी गयी थी। इसके बावजूद हाल ही में वित्तीय वर्ष 2014-15 की दशमोत्तर छात्रवृत्ति के वितरण में बड़ी गड़बड़ी का पता चला। पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने उपनिदेशक शैलेश श्रीवास्तव की अध्यक्षता में समिति बनाकर जांच कराई तो पता चला कि 35528 छात्र-छात्राओं के खाते में दोगुनी छात्रवृत्ति का भुगतान कर दिया गया। कुल मिलाकर यह राशि 10,90,90,970 रुपये यानी लगभग 11 करोड़ रुपये है। शासन स्तर तक मामले की जानकारी पहुंची तो पिछड़ा वर्ग विभाग के सचिव डॉ.हरिओम ने निदेशक पुष्पा सिंह की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की है। इस पूरे प्रकरण राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआइसी) की राज्य इकाई के कर्मचारी भी कठघरे में हैं, इसलिए जांच समिति में वहां के एक अधिकारी को भी शामिल करने की बात कही गयी है। निदेशक पुष्पा सिंह ने सभी जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारियों को अतिरिक्त भुगतान का ब्योरा भेजते हुए छात्र-छात्राओं से 11 करोड़ रुपये की वसूली के निर्देश दिये हैं। उन्होंने कहा है कि संबंधित शिक्षण संस्थान के माध्यम से विद्यार्थियों से संपर्क किया जाए और उनसे अतिरिक्त राशि वापस लेकर जमा कराई जाए। इसमें शिथिलता बरतने पर संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी मानते हुए कार्रवाई होगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर मेहरबानी
उस पूरी गड़बड़ी में सर्वाधिक लाभान्वित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विद्यार्थी हुए हैं। मुजफ्फर नगर के 3224 विद्यार्थियों को 94.45 लाख, सहारनपुर के 2941 को 93.64 लाख, बिजनौर के 2596 को 82.27 लाख, अमरोहा के 2075 को 66.35 लाख, बागपत के 1706 को 49.86 लाख, अलीगढ़ के 1299 को 39.91 लाख, मथुरा के 1207 को 38.2 लाख, फिरोजाबाद के 1166 को 25.89 लाख, आगरा के 1158 को 52.62 लाख व मेरठ के 1005 विद्यार्थियों को 31.72 लाख रुपये ज्यादा दिये गए। इनके अलावा वाराणसी के 1264 विद्यार्थियों को 45.66 लाख, गोरखपुर के 1199 को 43.64 लाख, झांसी के 1178 को 28.5 लाख व  पीलीभीत के 1064 विद्यार्थियों को 30.28 लाख रुपये के भुगतान की पुष्टि हुई है।
24 जिलों में सब ठीक-ठाक
पड़ताल में पता चला कि प्रदेश के 24 जिलों में एक भी छात्र-छात्रा को अतिरिक्त भुगतान नहीं हुआ है। ये जिले उन्नाव, संत रविदास नगर, सोनभद्र, संत कबीर नगर, सीतापुर, शाहजहांपुर, प्रतापगढ़, मिर्जापुर, मऊ, महोबा, महाराजगंज, लखनऊ, कुशीनगर, कौशांबी, कानपुर देहात, जौनपुर, जालौन, गाजीपुर, चित्रकूट, बांदा, बहराइच, आजमगढ़, औरैया व अम्बेडकर नगर हैं। बरेली व चंदौली में एक-एक, बुलंदशहर में चार, रायबरेली में पांच, गोंडा व सुल्तानपुर में छह-छह विद्यार्थियों के खातों में दोगुनी छात्रवृत्ति भेज दी गयी।

Monday, 22 February 2016

...तो खत्म हो जाएगी आरटीओ दफ्तर जाने की जरूरत


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-राष्ट्रीय परिवहन रजिस्टर से जुड़ेंगे सूबे के परिवहन कार्यालय
-बाराबंकी, लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद व नोएडा से शुरुआत
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
आपको अपनी गाड़ी के संबंध में संभागीय परिवहन अधिकारी कार्यालय से अनापत्ति प्रमाण लेना है, किन्तु वहां जाना नहीं चाहते तो चिंता की कोई बात नहीं है। जल्द ही प्रदेश के सभी परिवहन कार्यालय राष्ट्रीय परिवहन रजिस्टर से जुड़ जाएंगे। उसके बाद परिवहन संबंधित अधिकांश कार्यों के लिए दफ्तर जाने की जरूरत खत्म हो जाएगी।
परिवहन विभाग अपने पूरे तंत्र को ऑनलाइन करने के लिए लंबे समय से प्रयासरत है, किन्तु अब तक इसमें सफलता नहीं मिली है। संभागीय परिवहन कार्यालयों के कंप्यूटरीकरण का काम तो किया गया किन्तु ये दफ्तर आपस में देश की परिवहन प्रणाली से नहीं जुड़ सके। अभी देश का एक राष्ट्रीय परिवहन रजिस्टर है। इस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से देश के तमाम राज्य जुड़े हैं। उत्तर प्रदेश के इस प्लेटफॉर्म का हिस्सा न होने से तमाम गड़बडिय़ां सामने आ रही थीं। कई बार फर्जी अनापत्ति प्रमाणपत्र से अलग-अलग जिलों में वाहनों का रजिस्ट्रेशन तक करा लिया जाता है। परिवहन आयुक्त के. रविन्द्र नायक के अनुसार अब प्रदेश के सभी परिवहन कार्यालयों को सीधे राष्ट्रीय परिवहन रजिस्टर से जोड़ दिया जाएगा। इसके बाद किसी भी तरह के फर्जीवाड़े की संभावना समाप्त हो जाएगी। इसका पायलट प्रोजेक्ट बाराबंकी में चल रहा है, वहीं लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद व नोएडा के परिवहन कार्यालयों को जल्द ही इससे जोड़ा जाएगा। इसके लिए वेबबेस्ड इंटीग्र्रेटेड सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है। इन पांच जिलों के बाद समयबद्ध ढंग से पूरे प्रदेश को इस नेटवर्क से जोड़ा जाएगा।
बीएसएनएल से दोहरा नेटवर्क
परिवहन विभाग में तकनीकी कामकाज के प्रभारी अधिकारी एसएन झा के मुताबिक शुरुआत में इन पांच जिलों को बीएसएनएस के दोहरे नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इसके अंतर्गत 4 एमबीपीएस की ऑप्टिकल फाइबर लाइन के साथ बैकअप में 4 एमबीपीएस की रेडियो फ्रिक्वेंसी का नेटवर्क भी रहेगा, ताकि किसी कारणवश ऑप्टिकर फाइबर लाइन कट जाने पर नेटवर्क संकट न उत्पन्न हो। बीएसएनएल ने पूरे प्रदेश में इस नेटवर्क के लिए नौ करोड़ रुपये मांगे हैं। इसमें साढ़े तीन करोड़ रुपये तो शुरुआत में ही खर्च होंगे। इसके बाद हर साल साढ़े पांच करोड़ रुपये देने होंगे। फिलहाल पांच दफ्तरों के लिए 32 लाख रुपये का भुगतान बीएसएनएल को कर दिया गया है, ताकि प्रक्रिया में अवरोध न आए।
सीधे कारखानों से जुड़ेंगे दफ्तर
राष्ट्रीय परिवहन रजिस्टर से संबद्धता के साथ ही प्रदेश में परिवहन विभाग के सभी दफ्तर सीधे वाहन कारखानों से जुड़ जाएंगे। अभी कारखानों से वाहन बनकर निकलने के साथ ही उनका पूरा ब्योरा होमोलोगेशन पोर्टल पर डालना होता है। अब उससे सीधे पूरा ब्योरा परिवहन विभाग के पास आ जाएगा। इसके अनापत्ति प्रमाण पत्र से लेकर किसी ऋण के कारण दृष्टिबंधन (हाइपोथिकेशन) की जानकारी भी सुलभ होगी। इसी तरह अन्य सेवाएं भी ई-सर्विस के रूप में उपलब्ध हो जाएंगी। 

Sunday, 21 February 2016

सवा साल में हुई नियुक्तियों की पड़ताल


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आयुर्वेद भर्ती घोटाला
-कुछ और अफसरों-कर्मियों पर गिर सकती कार्रवाई की गाज
-एक सेवानिवृत्त अफसर की पेंशन व अन्य लाभ रोके गए
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : आयुर्वेद भर्ती घोटाला सामने आने के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने सवा साल में हुई नियुक्तियों की पड़ताल का फैसला किया है। इस बाबत आदेश जारी कर दिये गए हैं।
प्रदेश के आयुर्वेद विभाग की भर्तियों में हुए घोटाले को शासन ने सख्त रुख अख्तियार किया है। एक क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी को निलंबित करने के साथ ही पूरे मामले की जांच संयुक्त निदेशक स्तर के एक अधिकारी को सौंपी गयी थी। इस बीच प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने सवा साल में हुई नियुक्तियों की पड़ताल के निर्देश दिये हैं। दिसंबर 2014 से अब तक पूरे प्रदेश में जहां भी, जिस भी कर्मचारी-अधिकारी ने ज्वाइन किया है, उसका पूरा ब्योरा तलब किया गया है। माना जा रहा है कि जिस तरह कर्मचारियों के फर्जी नियुक्ति पत्र जारी हुए हैं, उसी तरह चिकित्सकों के तबादले आदि को लेकर भी फर्जीवाड़ा किया जा सकता है। इसलिए निदेशालय स्तर पर पूरी तरह पारदर्शी व्यवस्था बनाने के निर्देश दिये गए हैं।
उधर संयुक्त निदेशक जेएस मिश्रा ने विभागीय जांच में सुनवाई पूरी कर ली है। अब तक हुई जांच में कुछ और अधिकारी-कर्मचारी भी फंसते नजर आ रहे हैं। तय है कि फर्जी नियुक्ति का यह नेटवर्क बड़े पैमाने पर फैला  है। बुंदेलखंड से लेकर मध्य उत्तर प्रदेश तक तो इस नेटवर्क ने पांव मजबूती से पसार रखे हैं। ललितपुर, झांसी, उरई, जालौन, फतेहपुर, कानपुर, उन्नाव और लखनऊ तक इस नेटवर्क के एजेंट सक्रिय रहते हैं। निलंबित किये जा चुके कार्यालय प्रभारी मोहम्मद मियां ने एक अन्य कर्मचारी का नाम भी लिया है। बताया गया कि ज्वाइनिंग के स्तर पर इस कर्मचारी के साथ ही पैसे का लेनदेन हुआ। ऐसे में उस कर्मचारी के खिलाफ भी कार्रवाई तय है। इस नेटवर्क के मुखिया के रूप में फतेहपुर में तैनात एक आयुर्वेद चिकित्सक का नाम सामने आया है, जिसकी ससुराल कानपुर में है। उस चिकित्सक के साथ झांसी में रहने वाले एक अन्य आयुर्वेद चिकित्सक के जुड़े होने की बात भी प्रकाश में आयी है। इन दोनों के खिलाफ भी कार्रवाई तय मानी जा रही है। निलंबित क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ.डीके जैन के साथ उनकी अनुपस्थिति में काम संभाले हुए डॉ.धनीराम चंचल के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की गयी है। उनकी पेंशन व सेवानिवृत्ति से जुड़े अन्य लाभ रोक दिये गए हैं। 

विभाग के पास नहीं 672 फार्मासिस्टों का हिसाब


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-जानकारी न दे पाने पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपनाया सख्त रुख
-मुख्य सचिव ने सभी प्रमुख सचिवों को दिये ब्योरा सहेजने के निर्देश
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सरकार के पास वर्ष 2000 के पहले सृजित फार्मासिस्ट पदों का ब्योरा ही नहीं है। उच्च न्यायालय में पेश आंकड़ों में 672 फार्मास्सिटों का हिसाब गड़बड़ा गया। इस पर उच्च न्यायालय के सख्त रुख के बाद शासन ने सभी प्रमुख सचिवों को सभी सृजित पदों का ब्योरा सहेजने के निर्देश जारी किये हैं।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में फार्मासिस्टों की नियुक्ति से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान गत दिनों न्यायालय ने प्रदेश सरकार पर सख्त टिप्पणी की थी। न्यायालय ने फार्मासिस्टों की नियुक्ति व पद सृजन के बारे में ब्योरा मांगा था। इसके जवाब में शासन की ओर से बताया गया कि वर्ष 2000 से पहले फार्मासिस्टों के पद सृजन से जुड़ा कोई भी ब्योरा या शासनादेश चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग, स्वास्थ्य निदेशालय या सरकार के वित्त विभाग के पास नहीं है। यह जरूर बताया गया कि उत्तरांचल राज्य गठन के बाद वर्ष 2000 में उत्तरांचल को 688 व उत्तर प्रदेश को 5035 फार्मासिस्ट के पद आवंटित हुए थे। प्रदेश के अलग-अलग जिलों में नियुक्त फार्मासिस्टों के आंकड़े जुटाने पर यह संख्या 4889 निकलती है। अदालत को सौंपी जानकारी के मुताबिक वर्ष 2000 में उपलब्ध फार्मासिस्ट पदों और अक्टूबर 2014 तक हुए पद सृजन को मिलाकर 5561 फार्मासिस्ट उत्तर प्रदेश में होने चाहिए। इस तरह इन दोनों आंकड़ों में 672 पदों का अंतर है और इनका हिसाब नहीं मिल पा रहा है। अदालत ने इस तथ्य को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है कि वर्ष 2000 से पहले पदों के सृजन के संबंध में वित्त सहित किसी भी विभाग में कोई ब्योरा उपलब्ध नहीं है। नीतिगत फैसलों जैसे शासनादेश भी संभालकर नहीं रखे जाने को अदालत ने दुखद बताया है। यदि कोई वित्तीय अनियमितता हो जाए तो फैसला लेने में भी दिक्कत होगी।
अदालत ने मुख्य सचिव के संज्ञान में यह आदेश लाने का निर्देश देते हुआ कहा कि वे नीतिगत फैसलों वाले शासनादेशों को संभाल कर रखने के निर्देश जारी करें। भविष्य में ऐसी स्थिति न उत्पन्न हो, यह भी सुनिश्चित करें। अदालत में इस मसले पर अगली सुनवाई 24 फरवरी को होनी है। उससे पहले ही मुख्य सचिव आलोक रंजन ने सभी प्रमुख सचिवों व सचिवों को व्यापक दिशा निर्देश जारी कर दिये हैं। अदालत के आदेश के अंशों को जोड़ते हुए जारी निर्देशों में कहा गया है कि सचिवालय नियमावली व प्रशासनिक सुधार अनुभाग के शासनादेशों में पद सृजन सहित अन्य अभिलिखित पत्रावलियों के रख-रखाव की व्यवस्था है। उक्त व्यवस्था का अनुपालन न हो पाने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। उन्होंने सभी अभिलेखों का समुचित रखरखाव सुनिश्चित करने के साथ इसके लिए दायित्व निर्धारण के निर्देश भी दिये हैं।

Friday, 19 February 2016

इतनी जल्दबाजी कि घर से ही करा दिया ज्वाइन


--आयुर्वेद भर्ती घोटाला--
-जांच में अफसरों-कर्मचारियों ने कबूली वसूली नेटवर्क की बात
-कठघरे में आए एक अफसर सेवानिवृत्त, रुके तमाम भुगतान
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
आयुर्वेद विभाग में फर्जी नियुक्तियों के घोटाले की जांच में अफसरों व कर्मचारियों ने बड़े नेटवर्क की बात कबूली है। पता चला कि एक अफसर तो इतनी जल्दी में था कि उसने घर से ही फर्जी कर्मचारी को ज्वाइन करा दिया।
आयुर्वेद विभाग में फर्जी नियुक्तियों के मामले में शुक्रवार को राजधानी लखनऊ के इंदिरा भवन स्थित आयुर्वेद निदेशालय में संयुक्त निदेशक जेएस मिश्रा ने कठघरे में आए कार्यालय प्रभारी व दो चिकित्सकों से पूछताछ की। पूरी पूछताछ की वीडियोग्र्राफी भी कराई गयी। निलंबित हो चुके कार्यालय प्रभारी मोहम्मद मियां ने इस मामले में सीधे तौर पर एक चिकित्सा अधिकारी पर अंगुली उठाई है। उनका कहना है कि उक्त चिकित्सा अधिकारी ने ऊपर तक संबंध होने का हवाला देकर उनकी मदद ली। वैसे जांच के दौरान एक अधिकारी ने उक्त कर्मचारी पर भी रिश्वत लेने का आरोप लगाया है।
फर्जी नियुक्ति पत्र के आधार पर ज्वाइन करने वाले कानपुर के कर्नलगंज निवासी अनूप कुमार सोनकर के बहनोई फतेहपुर जनपद के बिजौली स्थित डिस्पेंसरी के चिकित्सा अधिकारी डॉ.वीरेंद्र सोनकर को भी जांच के लिए बुलाया गया है। वीरेंद्र सोनकर ने ही अनूप के तमाम कागजात वेरीफाई किये थे। सबसे पहले सामने आए सात लोगों के फर्जी नियुक्ति आदेश वाले मामले में गवाही के लिए आए एक अभ्यर्थी ने उन पर आरोप लगाए थे और कहा था कि वे अपने साले का वेतन निकलवाने का दावा कर रहे हैं। सोनकर ने कुछ अन्य लोगों पर वसूली के आरोप लगाए हैं। उधर अनूप की ज्वाइनिंग के समय क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी का काम संभाले डॉ.धनीराम चंचल भी पूछताछ के लिए आए हैं। हाल ही में वे सेवानिवृत्त हुए हैं और इस घोटाले में फंसने के बाद उनके तमाम भुगतान रुक गये हैं। उनसे पूछताछ इसलिए भी हुई क्योंकि उन्होंने ज्वाइनिंग में बेहद जल्दबाजी दिखाई। कार्यालय प्रभारी ने ताबड़तोड़ अनूप को एक डिस्पेंसरी एलॉट करने का ऑर्डर बनाया तो डॉ.चंचल ने घर में बैठकर अनूप की ज्वाइनिंग व अन्य कागजातों पर हस्ताक्षर किया। उनकी यह जल्दबाजी सवालों के घेरे में है।
उरई में लिखाया मुकदमा
आयुर्वेद निदेशक की तहरीर के बाद भी राजधानी लखनऊ की पुलिस भले ही मुकदमा न लिखा उरई में एक मुकदमा कायम करा दिया गया है। मामले में निलंबित चल रहे जालौन के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी ने उरई कोतवाली में फर्जी ढंग से ज्वाइन करने वाले अनूप सोनकर व उसका साथ देने वालों के खिलाफ मुकदमा कायम कराया है। इसके बाद से अनूप फरार चल रहा है और ड्यूटी पर भी नहीं आया है।

जान बचाती नहीं, मुआवजे में भी बाधा बनती पुलिस


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-'हिट एंड रन' मामलों में हर साल जान गंवाते ढाई हजार लोग
-पुलिस की ढिलाई से नहीं मिल पा रही 95 फीसद को कोई मदद
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
पुलिस के जिम्मे लोगों की जान बचाने का काम है। उत्तर प्रदेश की पुलिस यह काम कितनी ईमानदारी से करती है, इसके बारे में आम जनता के बीच किसी से भी बात की जा सकती है। जान बचाने में तत्परता न दिखाने वाली सूबे की पुलिस अचानक मौत के मुंह में जाने वाले लोगों को मिलने वाले मुआवजे में भी बाधा बनती नजर आ रही है। 'हिट एंड रन' मामलों में जान गंवाने वालों में से 95 फीसद के परिजनों को पुलिस की ढिलाई के कारण कोई मदद नहीं मिल पाती।
उत्तर प्रदेश में हर साल औसतन 16 हजार लोगों की मौत मार्ग दुर्घटनाओं में होती है। इनमें से लगभग साढ़े तेरह हजार लोगों की मृत्यु के बाद दुर्घटना में शामिल वाहन आदि का ब्योरा उपलब्ध होता है। शेष ढाई हजार के आसपास लोगों को मार कर वाहन सवार भाग जाते हैं। ऐसे 'हिट एंड रन' मामलों के शिकार लोगों में अधिकांशत: पैदल चलने वाले, साइकिल सवार या रिक्शा चालक और मजदूर आदि होते हैं। कई बार हाईवे पर स्थित फैक्ट्रियों से निकलने वाले मजदूरों को कुचलकर तेज वाहन चालक भाग जाते हैं और उन वाहनों का पता ही नहीं चल पाता।
परिवहन आयुक्त के. रविन्द्र नायक के मुताबिक 'हिट एंड रन' मामलों में मृत्यु के बाद संबंधित व्यक्ति के परिवारीजन को 25 हजार रुपये मुआवजा देने की व्यवस्था है। इसके लिए हर जिले में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति है, जिसके सदस्य सचिव नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के प्रतिनिधि होते हैं। थाना प्रभारियों के स्तर पर समय से रिपोर्ट भेजी जानी चाहिए, ताकि मुआवजे के लिए उक्त समिति की बैठक हो सके। बीते कई वर्षों से प्रदेश के अधिकांश जिलों में इन समितियों की बैठकें ही नहीं हुई हैं। हाल ही में पड़ताल कराने पर पता चला कि थाना प्रभारी इस बाबत रिपोर्ट ही नहीं लगाते हैं। अब  पुलिस महानिदेशक सहित सभी जिलों के पुलिस प्रमुखों को पत्र लिखकर ऐसे लापरवाह थानाध्यक्षों को निलंबित करने के साथ ढिलाई की जांच कराने की संस्तुति की गई है। पुष्टि होने पर ऐसे थानाध्यक्षों के खिलाफ मुकदमा भी कराया जाना चाहिए।
करेंगे मुआवजा बढ़ाने की मांग
परिवहन आयुक्त के. रविन्द्र नायक ने बताया कि 'हिट एंड रन' मामलों में मृत्यु की स्थिति में अभी 25 हजार रुपये मुआवजा देने की व्यवस्था है। यह राशि काफी कम है। 1994 के बाद से इस राशि में वृद्धि नहीं हुई है। वे सोमवार को दिल्ली में होने वाली सड़क सुरक्षा परिषद की बैठक में यह मुआवजा बढ़ाने की मांग करेंगे। साथ ही इस मामले में ढिलाई बरतने वाले पुलिसकर्मियों व अन्य अधिकारियों के खिलाफ कठोर दंड की सिफारिश भी करेंगे।

Thursday, 18 February 2016

आयुर्वेद भर्ती घोटाले में मुकदमा नहीं लिख रही पुलिस


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-निदेशालय की दो तहरीरों के बाद थाना प्रभारी ने किया इनकार
-कहा, घटना स्थल हमीरपुर और उरई में जाकर लिखाओ मुकदमा
-चल रही विभागीय जांच, छुïट्टा घूम रहे फर्जीवाड़ा करने वाले लोग
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
मुख्यमंत्री से लेकर पुलिस महानिदेशक तक भले ही तुरंत मुकदमा कायम करने की बात कहें किन्तु उनके अधीनस्थ पुलिसकर्मी उनकी सुनने को तैयार नहीं हैं। आम आदमी की तो छोडिय़े, सरकारी धोखाधड़ी व फर्जीवाड़े के मुकदमे भी नहीं दर्ज किये जा रहे हैं। इसकी ताजा मिसाल आयुर्वेद भर्ती घोटाले में सामने आयी है। आयुर्वेद महानिदेशालय द्वारा एक सप्ताह के भीतर दो तहरीरें देने के बाद भी पुलिस ने मुकदमा नहीं लिखा है।
आयुर्वेद विभाग में पिछले दिनों फर्जी नियुक्तियों के बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ था। पहले चार फरवरी को सात लोगों का एक फर्जी नियुक्ति आदेश सामने आया था, जिसमें एक युवक फतेहपुर के अमौली का रहने वाला आशीष कुमार तो बाकायदा क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी हमीरपुर के कार्यालय में ज्वाइन करने भी पहुंच गया था। इस पर आयुर्वेद निदेशक ने हजरतगंज थाने में तहरीर देकर उन सातों युवकों के खिलाफ मुकदमा कराने के साथ मामले की जांच कर अन्य दोषियों की पड़ताल भी करने को कहा था। इसी बीच विभागीय स्तर पर जांच शुरू हुई तो 11 फरवरी को एक ऐसा मामला सामने आया, जिसमें कानपुर के मूल निवासी अनूप सोनकर को जालौन के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी ने ज्वाइन कराकर उसका वेतन भी निकाल दिया था। इस पर क्षेत्रीय आयुर्वेद अधिकारी व एक अन्य कर्मचारी को निलंबित करने के साथ इन सबके खिलाफ मुकदमे के लिए पुन: हजरतगंज थाने में तहरीर दी गयी थी।
एक सप्ताह के भीतर दो तहरीर दिये जाने के बाद भी हजरतगंज पुलिस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। दोनों में से किसी मामले में मुकदमा दर्ज करने तक की जरूरत नहीं समझी गयी। यह स्थिति तब है जबकि मामला राजधानी का है जहां मुख्यमंत्री से लेकर डीजीपी तक सभी बैठते हैं। दूसरे ओर मामला एक सरकारी विभाग में फर्जीवाड़े का होने के कारण भी गंभीर हो जाता है किन्तु पुलिस ने इसे कतई गंभीरता से नहीं लिया। इस पर आयुर्वेद निदेशक ने हजरतगंज क्षेत्राधिकारी व लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर मुकदमा कायम कराने को कहा फिर भी हजरतगंज थाने की पुलिस ने मुकदमा नहीं लिखा। ऊपर से आयुर्वेद निदेशालय को यह जवाब लिखकर भेज दिया कि दोनों घटनाएं हमीरपुर व जालौन में हुई हैं, इसलिए वहीं मुकदमा कायम कराया जाए। अब आयुर्वेद विभाग के अधिकारी परेशान हैं और फर्जीवाड़ा कर नौकरी बांटने का गिरोह चला रहे लोग छुïट्टा घूम रहे हैं।
मुकदमा तो लिखना चाहिए
पुलिस द्वारा मुकदमा न लिखने की बात बेहद गंभीर है। सामान्य परिस्थितियों में भी कहीं भी तहरीर दी जाए, तो मुकदमा तुरंत दर्ज किया जाना चाहिए। यहां तो सरकारी विभाग के साथ धोखाधड़ी व कूटरचना का मामला है, इसलिए मुकदमा लिखने में विलंब नहीं होना चाहिए। मैं इस मामले में पूछताछ कर मुकदमा लिखने को कहूंगा। -एम. सतीश गणेश, पुलिस महानिरीक्षक, लखनऊ जोन

चौखट व परिसर तक जाकर सहेजा जाएगा खून


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-हर मंडल मुख्यालय पर मोबाइल ब्लड कलेक्शन यूनिट की स्थापना
-रक्तदान बढ़ाने को स्वास्थ्य विभाग की पहल, टेंडर प्रक्रिया हुई शुरू
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : स्वास्थ्य विभाग अब चौखट व परिसर तक जाकर खून सहेजने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए हर मंडल मुख्यालय पर दो बेड की मोबाइल ब्लड कलेक्शन यूनिट की स्थापना की जाएगी।
प्रदेश में रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने अब महज रक्त कोषों के सहारे न रहने का फैसला किया है। तय हुआ है कि जनता के बीच, विद्यालयों आदि में जाकर रक्त संग्र्रह किया जाएगा। इससे न सिर्फ रक्तदान के प्रति जागरूकता आएगी, बल्कि ऐसे लोग भी रक्तदान के लिए आगे आएंगे, जो मन में इच्छा होने के बावजूद घर के आसपास रक्तकोष न होने के कारण रक्तदान नहीं कर पाते हैं। ऐसे में जरूरत पर चौखट तक जाकर खून सहेजने के लिए मोबाइल रक्त संग्र्रह इकाइयों (ब्लड कलेक्शन यूनिट्स) की स्थापना का फैसला किया गया है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार के अनुसार विद्यालयों में रक्तदान के प्रति जागरूकता बहुत आवश्यक है। इसलिए इन इकाइयों का प्रयोग परिसर तक जाकर रक्त संग्र्रह में किया जाएगा। प्रदेश के सभी 18 मंडल मुख्यालयों पर ये मोबाइल यूनिट तैनात होंगी। इसके लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है। अगले माह के अंत तक इन वाहनों की खरीद प्रक्रिया पूरी कर लेने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ये इकाइयां मंडल मुख्यालयों के जिला अस्पतालों पर मौजूद रहेंगी और योजनाबद्ध ढंग से इनका प्रयोग होगा।
32 लाख की होगी एक यूनिट
इस बाबत जारी विशिष्टताओं के अनुसार 18 से 22 फीट लंबी मोबाइल गाड़ी पूरी तरह वातानुकूलित होगी। एक गाड़ी औसतन 32 लाख की होगी। इसमें एक साथ दो लोग रक्तदान कर सकें, इसके इंतजाम होंगे। इसमें रक्त भंडारण के साथ तापमान बनाए रखने के पूरे बंदोबस्त होंगे। प्रकाश व्यवस्था, फर्श व छत आदि भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होगी। ब्लड रीजेंट्स, सर्जिकल डिस्पोजेबल, पोर्टेबल मेडिकल इक्विपमेंट्स आदि के लिए 15 कैबिनेट वाला वुडेन फर्नीचर लगाया जाएगा। वाश बेसिन व पाइप लाइन आदि के लिए अलग हिस्सा निर्धारित होगा। रक्त दाता के विश्राम के लिए विशेष डोनर रेस्टिंग चेयर भी वैन में होगी। जरूरत पर बाहर से बिजली लेने के लिए एक्स्ट्रा केबिल का प्रबंध भी करना होगा।

Wednesday, 17 February 2016

सीपीएमटी का हिस्सा नहीं होंगे दागी परीक्षा केंद्र


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-डीएम-एसपी व खुफिया विभाग की मदद लेने का फैसला
-तैनात की जाएगी एसटीएफ, पारदर्शिता पर होगा पूरा जोर
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
प्रदेश के मेडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए होने वाली संयुक्त प्रवेश परीक्षा, सीपीएमटी से इस बार दागी परीक्षा केंद्रों को दूर रखा जाएगा। केंद्रों के चयन के लिए डीएम-एसपी व खुफिया की मदद लेने के साथ एसटीएफ भी तैनात होगी।
सीपीएमटी कराने के लिए इस बार फैजाबाद के डॉ.राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय को जिम्मेदारी सौंपी गयी है। पिछले वर्षों में कई बार सीपीएमटी पर न सिर्फ दाग लगे हैं, बल्कि परीक्षा तक दोबारा करानी पड़ी है। प्रदेश सरकार इस बार ऐसा कुछ भी नहीं होने देना चाहती। इसीलिए प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय व अवध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जीसीआर जायसवाल सहित चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों के बीच हुई बैठक में इस विषय पर व्यापक विचार विमर्श हुआ। बैठक में कहा गया कि इस बार किसी भी हालत में कोई भी दागी संस्थान परीक्षा केंद्र नहीं बनेगा। इसके लिए जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक व खुफिया विभाग की मदद भी ली जाएगी। ऐसे विद्यालय भी केंद्र नहीं बनेंगे, जो यूपी बोर्ड की परीक्षा के दौरान कभी भी काली सूची में डाले गए हैं या संदिग्ध रहे हैं। प्रमुख सचिव ने बताया कि परीक्षा में शुचिता सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं बाकी रखी जाएगी। हर स्तर पर पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। कुलपति ने बताया कि केंद्रों के स्तर पर होने वाली गड़बड़ी रोकने के लिए एसटीएफ तैनात करने का प्रस्ताव किया गया है। आवेदन के स्तर से ही पूर्ण पारदर्शिता पर जोर रहेगा।
परीक्षा 10 से 17 मई के बीच
इस बार सीपीएमटी का आयोजन 10 से 17 मई के बीच किया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार एक जून तक हर हाल में परीक्षा परिणाम निकाल दिया जाएगा। छह जुलाई से 15 जुलाई के बीच काउंसिलिंग का पहला चक्र पूरा हो जाएगा। 22 जुलाई तक पहली काउंसिलिंग में आवंटित मेडिकल कालेजों में प्रवेश लेना जरूरी होगा। 10 से 22 अगस्त तक दूसरे राउंड की काउंसिलिंग होगी। इस काउंसिलिंग में आवंटन के अनुरूप 28 अगस्त तक प्रवेश लेना होगा। इस बीच एक अगस्त से शैक्षिक सत्र शुरू हो जाएगा। 31 अगस्त तक सभी छात्र-छात्राओं के प्रवेश समाप्त हो जाएंगे। अखिल भारतीय कोटे की सीटों पर नौ अगस्त तक प्रवेश न लेने की स्थिति में वे सीटें राज्य कोटे में बदल जाएंगी।

Tuesday, 16 February 2016

गलती संस्थाओं की, सजा भुगत रहे हजारों छात्र


--दशमोत्तर छात्रवृत्ति में गड़बड़ी--
-एक से दस रुपये तक भरा गया नॉन रिफंडेबल शुल्क
-पिछड़ा वर्ग विभाग ने संस्थाओं से पुन: परीक्षण को कहा
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डॉ.संजीव, लखनऊ
तमाम तकनीकी उन्नयन व दावों के बावजूद शैक्षिक संस्थाओं की लापरवाही दशमोत्तर छात्रवृत्ति की आस लगाए हजारों छात्र-छात्राओं पर भारी पड़ रही है। आवेदन करते समय इन छात्र-छात्राओं ने नॉन रिफंडेबल शुल्क एक से दस रुपये तक भरा है। जांच में मामला पकड़े जाने पर पिछड़ा वर्ग विभाग ने संस्थाओं से ऐसे सभी मामलों का पुन: परीक्षण करने को कहा है। साथ ही शासन से छात्र-हित में फैसला लेने की संस्तुति भी की है।
फरवरी में दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के भुगतान की प्रक्रिया शुरू हुई है। पिछड़ा वर्ग विभाग लगभग ढाई लाख आवेदनों के औचक परीक्षण में निदेशक पुष्पा सिंह ने पाया कि आठ हजार से अधिक छात्र-छात्राओं ने ऑनलाइन फार्म के कॉलम 25 में वार्षिक अनिवार्य नॉन रिफंडेबल शुल्क के रूप में 0, 1, 2, 3 से 10 रुपये तक की राशि भरी है। साथ ही वास्तविक धनराशि के कालम में अधिक राशि भरी है। सभी आवेदन छात्र-छात्राओं के बाद कालेज के स्तर पर, फिर जिला समिति के स्तर पर जांचे गए किन्तु किसी ने इस गलती को नहीं पकड़ा। इस कारण इन छात्र-छात्राओं के खाते में शून्य से दस रुपये तक की राशि ही छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के रूप में जाएगी। निदेशक के मुताबिक ढाई लाख आवेदनों में यह संख्या आठ हजार से अधिक है, तो कुल मिलाकर संख्या काफी अधिक होने की उम्मीद है। वे सभी आवेदनों की जांच करा रही हैं, ताकि सही संख्या सामने आ सके।
इस बीच छात्रों का नुकसान होने से बचाने के लिए उन्होंने शासन को पत्र लिखकर यह समस्या उठाई है। पत्र में लिखा गया है कि एनआइसी की पेमेंट शीट में छात्र-छात्राओं द्वारा नॉनरिफंडेबल अनिवार्य शुल्क कॉलम में भरी गयी धनराशि ही प्रदर्शित की गयी है। उपरोक्त अत्यंत न्यून धनराशि हस्तांतरित करना न्यायसंगत प्रतीत नहीं हो रहा है। संस्तुति की गयी है कि ऐसे मामलों में संबंधित शिक्षण संस्थान के पाठ्यक्रम हेतु मास्टर डाटाबेस में भरी गयी फीस की धनराशि को संबंधित छात्रों के खाते में भुगतान का आदेश किया जाए। इसके साथ ही सभी संस्थानों को पत्र लिखकर त्रुटियों का निराकरण अनिवार्य रूप से सुनिश्चित करने को कहा है।
पांच लाख विद्यार्थी अधर में
दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में पांच लाख से अधिक विद्यार्थियों के आवेदन अधर में लटके हैं। ये सभी आवेदन संदिग्ध के रूप में चिह्नित किये गए हैं। प्रमुख सचिव (समाज कल्याण) सुनील कुमार ने ऐसे सभी मामलों में 20 फरवरी तक हर हाल में फैसला लेने के निर्देश दिये हैं। ऐसा न होने पर इन अफसरों की सत्यनिष्ठा संदिग्ध मानकर इसकी प्रविष्टि चरित्र पंजिका में कर दी जाएगी। 

पांच लाख दो, वार्ड ब्वाय बनो


--आयुर्वेद भर्ती घोटाला--
-सुनवाई में आया फर्जी नियुक्ति पाया बस एक युवक
-कहा, चिकित्सा अधिकारी ने दिया था भर्ती का भरोसा
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
आयुर्वेद अस्पतालों में फर्जी नियुक्ति के लिए सक्रिय नेटवर्क ने वार्ड ब्वाय की नौकरी दिलाने के लिए पांच लाख का रेट खोल रखा था। मामले की जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया है।
बीते दिनों आयुर्वेद विभाग में फर्जी नियुक्तियों का पूरा नेटवर्क पकड़ा गया है। मामले में जालौन के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डॉ.डीके जैन और एक लिपिक मो.मियां को निलंबित किया जा चुका है। पूर्व क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ.धनीराम चंचल और ज्वाइन करने वाले युवक अनूप कुमार सोनकर के कागजातों का वेरीफिकेशन करने वाले बिजौली के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ.वीरेंद्र कुमार सोनकर से जवाब-तलब के साथ 19 फरवरी को सुनवाई के लिए राजधानी तलब किया गया है। घोटाले की जांच कर रहे संयुक्त निदेशक जेएस मिश्र ने फर्जी नियुक्ति पाने वाले सभी आठ युवकों को सुनवाई के लिए मंगलवार को राजधानी स्थित आयुर्वेद निदेशालय तलब किया था। इनमें से सिर्फ एक युवक फतेहपुर के अमौली निवासी धर्मेन्द्र प्रसाद ने ही सुनवाई में अपना पक्ष प्रस्तुत किया। धर्मेन्द्र ने बताया कि वह फर्जी नियुक्ति पाने वाले कुछ और युवकों को जानता है। एक चिकित्सक का नाम लेते हुए उसने बताया कि उन सबसे पांच-पांच लाख रुपये लिये गए थे। साथ ही कुछ अन्य लोगों से मिलवाकर उनके ज्वाइन करने व वेतन उठाने का हवाला दिया गया था। संयुक्त निदेशक ने बताया कि जिन चिकित्सकों व कर्मचारियों के नाम सामने आये हैं, उन्हें भी तलब किया गया है।
मेरा साला तो वेतन ले चुका
जांच पड़ताल में पता चला कि एक चिकित्सा अधिकारी ने भी फर्जी नियुक्ति पाने वाले युवकों से एक-एक कर मुलाकात की। दलालों का निशाना दलित युवक ज्यादा थे और उन्हें अपना सजातीय बताकर उक्त अधिकारी ने कहा कि वह सबको भर्ती कराएगा। अपनी बात साबित करने के लिए कहा कि वह अपने साले की भी नौकरी लगवा चुका है और वह तीन माह का वेतन भी ले चुका है। अब उक्त चिकित्सक को तलब करने के साथ उसके साले का ब्योरा भी जुटाया जा रहा है।
तीन लोग करते थे दलाली
फर्जी नियुक्ति पत्र पाने वाले एक युवक ने बताया कि कानपुर, फतेहपुर व जालौन में तीन लोग भर्ती के लिए दलाली का काम करते थे। रिजवान, असलम व मन्नू नाम के ये तीनों लोग मामले का खुलासा होने के बाद से गायब हैं। इन लोगों ने ही बेरोजगार युवकों को आयुर्वेद विभाग के अफसरों व कर्मचारियों से मिलवाया। भरोसा दिलाने के लिए लखनऊ में निदेशालय तक लेकर आए और यहां बात कराई। बाद में सब ओर से आश्वस्त कर घूस की रकम ली गयी।

आयुर्वेद भर्ती घोटाले में एक और निलंबित

-दो और डॉक्टर कठघरे में, सुनवाई को राजधानी तलब
-पुलिस नहीं लिख रही मुकदमा, एसएसपी से शिकायत
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
आयुर्वेद विभाग में फर्जी नियुक्तियों के घोटाले में क्षेत्रीय अधिकारी के बाद अब एक और कर्मचारी निलंबित किया गया है। अब तक की जांच में दो और डॉक्टर कठघरे में हैं, जिन्हें सुनवाई के लिए राजधानी तलब किया गया है। तहरीर दिये जाने के बाद भी हजरतगंज पुलिस मुकदमा नहीं लिख रही है, इसलिए एसएसपी से मामले की शिकायत की गयी है।
बीते दिनों आयुर्वेद विभाग में फर्जी नियुक्तियों के बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है। जालौन के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डॉ.डीके जैन को निलंबित किया जा चुका है। मामले की जांच कर रहे संयुक्त निदेशक जेएस मिश्र के मुताबिक डॉ.जैन को निदेशालय से संबद्ध करने के साथ कार्यालय प्रभारी मो.मियां को भी निलंबित कर दिया गया है। अब तक की जांच में दो अन्य चिकित्सक भी कठघरे में आ रहे हैं। पूर्व क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ.धनीराम चंचल और ज्वाइन करने वाले युवक अनूप कुमार सोनकर के कागजातों का वेरीफिकेशन करने वाले बिजौली के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ.वीरेंद्र कुमार सोनकर से जवाब-तलब के साथ 19 फरवरी को सुनवाई के लिए राजधानी तलब किया गया है। उधर फर्जी नियुक्ति का स्पष्ट प्रमाण मिलने के बाद भी मामले में अब तक मुकदमा कायम नहीं हुआ है। 11 फरवरी को आयुर्वेद निदेशालय से हजरतगंज थाने में तहरीर दी गयी थी किन्तु अब तक पुलिस तहरीर सहेज कर रखे हुए है। दस दिन पहले लिखाए गए मुकदमे में भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है। आयुर्वेद निदेशक डॉ.सुरेश चंद्र ने चार दिन बाद भी मुकदमा न लिखे जाने पर सोमवार को लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और हजरतगंज क्षेत्राधिकारी को पत्र लिखकर मामले की शिकायत की है। उन्होंने बताया कि मुकदमा न लिखे जाने से अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे। पहले मुकदमे में भी पुलिस की जिम्मेदारी है कि गिरफ्तारी कर दोषियों को जेल भेजे।
बड़े गैंग के स्पष्ट संकेत
अब तक की जांच में सामने आये तथ्यों से स्पष्ट है कि इन फर्जी नियुक्तियों के पीछे बड़ा गैंग काम कर रहा है। जांच अधिकारी के मुताबिक क्षेत्रीय आयुर्वेद अधिकारी डॉ.डीके जैन चार नवंबर को डॉ.धनीराम चंचल को कार्यभार सौंप कर छुïट्टी पर गए थे। पांच नवंबर को अनूप सोनकर की नियुक्ति का पहला फर्जी नियुक्ति आदेश सामने आया और आनन-फानन में नौ नवंबर को ज्वाइन भी करा दिया गया। बाद में डॉ.जैन वापस आए तो उन्होंने वेतन भी निकाल दिया। इससे स्पष्ट है कि बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है। जिन लोगों के नाम-पते पर फर्जी नियुक्ति आदेश जारी हुए हैं, उन्हें भी नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए लखनऊ बुलाया गया है।

Monday, 15 February 2016

किशोरों की सुधरी सेहत, देगी बढ़ती आबादी से राहत


--अपनी समस्याएं, अपने समाधान--
-मुख्य सचिव के सामने रखा गया नयी जनसंख्या नीति का प्रारूप
-जीवन चक्र की समीक्षा के साथ जरूरतों के अनुरूप आए सुझाव
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: उत्तर प्रदेश की नयी जनसंख्या नीति में किशोरों की सेहत सुधारने पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाएगा। अगले 15 वर्षों के लिए प्रस्तावित इस नीति का प्रारूप सोमवार को मुख्य सचिव आलोक रंजन के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इस दौरान मातृ मृत्यु दर घटाने व शत प्रतिशत टीकाकरण पर जोर दिया गया।
उत्तर प्रदेश क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का दूसरा बड़ा राज्य तथा जनसंख्या के आधार पर सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है। इस समय प्रदेश की जनसंख्या 19.98 करोड़ और जनसंख्या वृद्धि दर 20.23 प्रतिशत है। प्रदेश सरकार ने 2016 से 2030 तक 15 वर्षों के लिए प्रदेश की जरूरतों के अनुरूप नयी जनसंख्या नीति बनाने का जिम्मा सिफ्सा और पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया को सौंपा। सोमवार को सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी केशव देसी राजू, प्रो. रवि वर्मा व डॉ.संजय पांडेय ने मुख्य सचिव आलोक रंजन की उपस्थिति में प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार, प्रमुख सचिव (नियोजन) आरपी सिंह, एनएचएम निदेशक अमित घोष, यूपीएचएसडीपी निदेशक आलोक कुमार, टीएसयू प्रभारी विकास गोथलवाल के समक्ष नयी नीति का प्रारूप प्रस्तुत किया। इसमें किशोर व किशोरियों के स्वास्थ्य पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। वजह बतायी गयी कि किशोर-किशोरियां ही भविष्य के माता-पिता होते हैं और उनकी जागरूकता से स्थितियां बदल सकती हैं। जीवनचक्र की समीक्षा के सुझाव भी दिये गए हैं।
लड़के की चाह से मिले मुक्ति
नयी नीति में सर्वाधिक जोर लड़के की चाह से मुक्ति दिलाने पर है। लैंगिक समानता पर जोर देने के साथ महिला सशक्तीकरण को इसका एकमात्र उपाय बताया गया है। हर नागरिक तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित कर बिना भेदभाव के सबकी जरूरतों का ध्यान रखा जाए। छात्र-छात्राओं को शिक्षा में समान मौके देने के साथ सामाजिक रूप से छात्राओं को सुरक्षित महसूस कराने पर भी जोर दिया गया है।
शत प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य
नयी नीति में 2020 तक 80 फीसद और 2030 तक शत प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है। इस समय प्रदेश की मातृ मृत्यु दर 258 प्रति लाख है, इसे 2022 तक 165 व 2030 तक 100 प्रति लाख करने का लक्ष्य रखा गया है। संपूर्ण प्रसव पूर्ण चेकअप को सुनिश्चित करने व परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रभावी रूप से लागू करने की बात भी नीति का हिस्सा है।

Sunday, 14 February 2016

बेटे की चाह और बहू पर अंकुश


डॉ.संजीव, लखनऊ
उत्तर प्रदेश जल्द ही नयी जनसंख्या नीति के साथ देश के समक्ष अगले कुछ वर्षों की पटकथा लिखेगा। नीति के स्तर पर बड़े बदलाव की तैयारी भले ही की जा रही है किन्तु चूल्हे तक मानसिक बदलाव आजादी के 68 साल बाद भी नहीं आ सका है। आज भी परिवार कल्याण पर बेटे की चाह और बहू पर अंकुश का फलसफा हावी है। आज भी बहुएं बेटे की आस में बच्चे पैदा करती जाती हैं और कई बार तो सासें तय करती हैं कि वे परिवार कल्याण का कौन सा साधन इस्तेमाल करेंगी।
उत्तर प्रदेश में परिवार कल्याण कार्यक्रमों की तमाम कोशिशें प्रभावी रूप से सफल नहीं हो रही हैं। पूरे देश में जहां प्रजनन दर 2.1 है, वहीं उत्तर प्रदेश आज भी 3.1 प्रजनन दर के साथ आगे बढ़ रहा है। यह स्थिति तब है, जबकि प्रदेश में परिवार कल्याण कार्यक्रमों को लागू करने व उनके प्रभावी अनुश्रवण के लिए अलग से महानिदेशक सहित पूरा महकमा सक्रिय है। परिवार कल्याण कार्यक्रमों व परियोजनाओं के विविधीकरण के लिए गठित स्टेट इनोवेशन्स इन फैमिली प्लानिंग सर्विसेज प्रोजेक्ट एजेंसी (सिफ्सा) ने हाल ही में प्रदेश में महिलाओं, सासों, आशा कार्यकर्ताओं व एएनएम के बीच एक सर्वे कर स्टेटस रिपोर्ट तैयार की है। यह रिपोर्ट तमाम चौंकाने वाले तथ्य सामने लाती है। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में महज 37.3 फीसद महिलाएं ही गर्भनिरोधक साधनों का इस्तेमाल करती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक संवादहीनता की स्थितियों के कारण भी प्रदेश परिवार कल्याण लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं कर पा रहे है। परिवारों के अंदर निर्णय क्षमता में बच्चे पैदा करने वाली यानी बहू की भूमिका नगण्य है।
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बहू की सुनवाई बस दो फीसद
सर्वे के मुताबिक केवल चार फीसद सासें चाहती हैं कि बच्चों की पढ़ाई में मां की बात सुनी जाए। घरवालों की सेहत पर फैसला लेना हो तो बस औसतन दो फीसद बहुओं की ही सुनी जाती है। बरेली में सर्वाधिक आठ फीसद और मऊ में तीन फीसद बहुओं की सुनी जाती है, वहीं मैनपुरी व पीलीभीत में यह आंकड़ा 1.7 फीसद मिला। 14 फीसद सासों ने गर्व के साथ स्वीकार किया कि घर की सेहत से जुड़े फैसले वे करती हैं। परिवार कल्याण के साधन इस्तेमाल करने के लिए अधिकांश बहुओं को आज भी सास की अनुमति लेनी पड़ती है। सर्वे के मुताबिक तीस फीसद सासों ने बहुओं को अनुमति दी तो उन्होंने परिवार कल्याण के साधन इस्तेमाल किये। नारी सशक्तीकरण के इस दौर में भी बेटे की चाह सास की ओर से कुछ ज्यादा ही सामने आती है। 85 फीसद सासें चाहती हैं कि उनके बेटे-बहू को कम से कम एक पुत्र की प्राप्ति जरूर हो। इनमें भी 36 प्रतिशत बेटा होने तक बच्चे पैदा करते रहने की पक्षधर मिलीं, भले ही इस कारण घर व देश की आबादी कितनी भी बढ़ जाए।
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15 फीसद परिवार कल्याण से दूर
परिवार नियोजन की तमाम कोशिशों के बावजूद उत्तर प्रदेश के 15 फीसद से अधिक दंपती परिवार कल्याण की किसी भी पद्धति का इस्तेमाल नहीं करते हैं। नियमित तौर पर 36 प्रतिशत दंपती ही परिवार कल्याण तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें भी महज 14.5 फीसद ने नसौंदी कराई। सूबे में नसबंदी मूल रूप से महिलाओं के भरोसे ही है क्योंकि 14.5 में से पुरुष सिर्फ 0.2 प्रतिशत ही हैं। नसबंदी के स्थान पर अस्थायी परिवार कल्याण साधनों का इस्तेमाल करने वालों में से 52 फीसद से अधिक दंपतियों के तीन या तीन से अधिक बच्चे मिले। इनमें से 70 प्रतिशत तो अब भी नसबंदी कराने को तैयार नहीं हैं। जिन 14.5 फीसद ने नसबंदी को चुना, उन्होंने निजी क्षेत्र की बजाय सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन कराने को वरीयता दी। इनमें भी 28 फीसद आशा या एएनएम कार्यकर्ताओं के साथ गयी थीं। अन्य जिलों में 93 फीसद ने सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन कराया, बस एटा एकमात्र जिला था, जहां 23 फीसद महिलाएं निजी अस्पतालों में नसबंदी कराने पहुंचीं। पता चला कि आधे से अधिक दंपतियों ने गर्भनिरोधक गोली या कंडोम जैसे साधनों का इस्तेमाल शुरू तो किया किन्तु थोड़े ही दिनों में बंद कर दिया। इनमें 43.5 प्रतिशत ने बच्चे की चाहत में ऐसा किया, वहीं 10.6 फीसद गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल से संतुष्ट नहीं थे। 6.5 फीसद का मानना था कि इस्तेमाल के बाद भी गर्भनिरोधक प्रभावी नहीं हुए, इसलिए उन्होंने बंद कर दिया।
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अजब-गजब डर
नसबंदी न कराने के पीछे भी अजब-गजब डर सामने आए हैं। 31 प्रतिशत दंपति तो परिवार पूरा होने के बाद भी नसबंदी जैसा स्थायी गर्भनिरोधन रास्ता अख्तियार नहीं करना चाहते। इनमें से 23 प्रतिशत तो नसबंदी की प्रक्रिया से ही डरते हैं। उनका यह डर कम करने की कोशिशें भी सफल नहीं होतीं। 13 प्रतिशत को डर था कि नसबंदी के साथ उनकी क्षमता में कमी आ जाएगी और वे शारीरिक रूप से कमजोर हो जाएंगे। कुछ को तो इस कारण नपुंसक होने का भी डर सता रहा था। 13 प्रतिशत महिलाएं तो चाहकर भी नसबंदी नहीं करा पा रही थीं, क्योंकि उनके पति व अन्य घर वालों ने इसका विरोध किया था। पांच प्रतिशत महिलाओं ने नसबंदी न कराने के लिए धार्मिक आधार को कारण करार दिया।
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महिला नसबंदी से बचने के बहाने
-ऑपरेशन से कमजोरी व बीमारी
-ऑपरेशन से लगने वाला डर
-पति और परिवार का विरोध
-धर्म को आधार बनाकर विरोध
-बच्चे का बहुत छोटा होना
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पुरुष नसबंदी से बचने के बहाने
-ऑपरेशन के बाद काम न कर पाना
-पत्नी का विरोध व ऑपरेशन से डर
-पद्धति के बारे में जानकारी न होना
-कमजोरी और नपुसंकता का खतरा
-डॉक्टर की अनुपलब्धता का संकट
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छोटी सी मुलाकात
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पुरुषों को जोडऩा चुनौती, होंगी 7500 नयी भर्तियां
परिवार कल्याण कार्यक्रमों से पुरुषों को जोडऩा स्वास्थ्य विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण) अरविंद कुमार के मुताबिक इसके लिए प्रदेश में 7500 पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भर्ती प्राथमिकता के आधार पर की जाएगी।
-परिवार कल्याण के मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति कैसी है?
--हम सकल प्रजनन दर के मामले में राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं। पिछले कुछ वर्षों में नसबंदी के मामलों में कमी आई है। पहले शिविर लगाकर नसबंदी होती थी, जिनमें एक साथ 60-70 नसबंदी तक हो जाती थीं। न्यायालय के आदेश के बाद एक सर्जन के एक दिन में तीस से अधिक ऑपरेशन पर रोक लगी है। वर्ष 2014 में जहां 4933 पुरुषों व 1,36,627 महिलाओं ने नसबंदी कराई थी, वहीं 2015 में यह संख्या घटी और 2,576 पुरुषों व 1,07,531 महिलाओं ने नसबंदी कराई। अब नसबंदी के साथ परिवार कल्याण के अन्य संसाधनों पर जोर दिया जा रहा है और हमें इस दिशा में सफलता भी मिल रही है।
-कार्यक्रम क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा क्या है?
--हमने आंकलन किया तो पाया है कि आशा का योगदान पर्याप्त नहीं हो पा रहा है। अब आशा व एएनएम के योगदान को बढ़ाने व प्रशिक्षण पर जोर देने की पहल हो रही है। इसके लिए महिलाओं की काउंसिलिंग तो आशा व एएनएम से हो जाती है, पुरुषों की काउंसिलिंग नहीं हो पाती। पुरुष ही इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं। इसके लिए प्रदेश में 7500 पुरुष बेसिक हेल्थ वर्कर भर्ती किये जाएंगे। जल्द ही एक पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से यह काम होगा।
-प्रभावी परिवार कल्याण कार्यक्रमों के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं? 
-नसबंदी घटने के बाद हमारा जोर परिवार नियोजन के अन्य तरीकों पर है। प्रसव के तुरंत बाद परिवार नियोजन के तरीकों के इस्तेमाल की प्रक्रिया में तेजी आई है। वर्ष 2014 में 24,406 महिलाओं ने प्रसव के तुरंत बाद कॉपर-टी लगवाई, वहीं 2015 में यह संख्या 74,100 पहुंच गयी। इसके बावजूद अभी मात्र 20 फीसद महिलाएं ही इसके दायरे में आयी हैं। अब इसे बढ़ाकर परिवार कल्याण लक्ष्य प्राप्त करने की रणनीति बनाई गयी है। इसके लिए आशा व एएनएम को भी विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा है।
-क्या लक्ष्य निर्धारित किये हैं और क्या रणनीति बनाई है?
--प्रजनन दर को 2.1 तक पहुंचाना ही सीधा लक्ष्य है। सारी कोशिशें इसी दिशा में हो रही हैं। इसके लिए अधिकारियों को सक्रिय करने के साथ तकनीक के अधिकाधिक इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। पांच जिलों में एम-सेहत कार्यक्रम शुरू किया गया है, जिसमें विवाह के साथ ही दंपती की मॉनीटङ्क्षरग व काउंसिलिंग शुरू होगी। इसके अलावा अन्य दंपतियों के रेकार्ड भी ऑनलाइन होंगे। पांच जिलों में सफलता के बाद इसे सभी जिलों में लागू कर दिया जाएगा।
-उत्तर प्रदेश की विविधता को देखते हुए क्या कार्ययोजना है?
--हम अपनी जनसंख्या नीति बदल रहे हैं। इसके ड्राफ्ट को अंतिम रूप दिया जा रहा है। फरवरी माह में ही मुख्य सचिव के समक्ष इसका प्रारंभिक प्रदर्शन होगा। इसमें बालिका सुरक्षा पर सर्वाधिक जोर दिया जाएगा। महिला सशक्तीकरण के साथ निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर होगा। नई जनसंख्या नीति भी निश्चित रूप से परिवार कल्याण व जनसंख्या नियोजन की दिशा में सार्थक कदम साबित होगी। 

समाजवादी चोले में नयी योजनाओं का पिटारा


-सड़क से बीमा और सेहत तक की चिंता से समाजवाद को जोड़ा
-भाषण में समाजवादियों का जिक्र कर विधायकों का उल्लास बढ़ाया
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डॉ.संजीव, लखनऊ
'हम समाजवादियों की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं रहता है। हमें अपने वायदे पूरे करने में कठिनाइयां आयीं और परिस्थितियां हमारे अनुमान को झटका दे गयीं पर उससे हमारी हिम्मत में और उफान आया...।' इन पंक्तियों के साथ अपने मौजूदा कार्यकाल का आखिरी पूर्ण बजट पेश कर रहे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समाजवादी चोले में नयी योजनाओं का पिटारा खोल दिया।
अपने बजट भाषण में उन्होंने बीच-बीच में समाजवाद व समाजवादी योजनाओं की पोटली खोली तो सदन मेजों की थपथपाहट से गूंजता रहा। सबसे पहले उन्होंने बताया कि समाजवादी पेंशन योजना के लाभार्थियों की संख्या 45 लाख से बढ़ाकर 55 लाख कर दी गयी है। फिर उन्होंने कृषक दुर्घटना बीमा योजना के स्थान पर 'समाजवादी सर्वहित बीमा योजना' प्रस्तावित की तो सपा विधायक प्रफुल्लित हो उठे। सड़कों के विकास की बात करते हुए मुख्यमंत्री ने 'समाजवादी पूर्वांचल एक्सप्रेस वे' का प्रस्ताव रखा। इस बार उल्लास के क्षणों से जुड़ते अखिलेश एक बार फिर 'हम समाजवादियों का हमेशा से मानना रहा है....' कहते हुए समाजवाद के कसीदे पढऩे लगे।
समाजवादी चोले को किसानों से युवाओं की ओर ले जाते हुए मुख्यमंत्री 'समाजवादी युवा स्वरोजगार योजना' का एलान किया और कहा कि इससे निश्चित रूप से युवा वर्ग समाज की मुख्य धारा में जुड़ेगा। माध्यमिक विद्यालयों से भी समाजवाद को जोड़ते हुए मुख्यमंत्री ने प्रदेश के 18 मंडलों में 'समाजवादी अभिनव विद्यालयों' की स्थापना की घोषणा की।
मुख्यमंत्री ने ग्र्रामीण विकास की योजनाओं का जिक्र करते हुए समाजवाद के पहरुओं डॉ.राममनोहर लोहिया और जनेश्वर मिश्र के नाम पर चल रही समग्र्र ग्र्राम विकास योजनाओं का जिक्र किया। एक बार फिर योजनाओं का विस्तार से ब्योरा देते हुए उन्होंने सबसे पहले 'समाजवादी किसान एवं सर्वहित बीमा योजना' के लिए 897 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था की बात कही। सेहत की चिंता करते हुए उन्होंने 'समाजवादी स्वास्थ्य बीमा योजना' का एलान करते हुए कहा कि धनाभाव के कारण वे किसी को लाइलाज नहीं रहने देंगे। समाज के हर तबके तक समाजवाद को पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित करते हुए मुख्यमंत्री ने 'समाजवादी हथकरघा एवं बुनकर पेंशन योजना' का एलान किया तो वे अल्पसंख्यकों के साथ दूसरे वर्गों को भी सीधे खुद से जोड़ते दिखे। 

Thursday, 11 February 2016

आयुर्वेद विभाग में पकड़ा फर्जी नियुक्ति का नेटवर्क


-वार्ड ब्वाय को ज्वाइन करा तीन माह का वेतन भी दिया
-जालौन का क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी निलंबित
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डॉ.संजीव, लखनऊ
आयुर्वेद विभाग में फर्जी नियुक्ति का एक बड़ा नेटवर्क पकड़ा गया है। बीते दिनों सात लोगों का फर्जी नियुक्ति आदेश आने के बाद हुई पड़ताल में इसका राजफाश हुआ। पता चला कि एक वार्ड ब्वाय को तो ज्वाइन कराकर तीन माह का वेतन भी दे दिया गया। मामले में जालौन के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी को निलंबित कर दिया गया है।
चार फरवरी को आयुर्वेद विभाग में सात फर्जी नियुक्तियों का एक मामला सामने आया था। इसकी जांच संयुक्त निदेशक जेएस मिश्रा को सौंपी गयी थी। इस दौरान सभी क्षेत्रीय आयुर्वेदिक व यूनानी अधिकारियों को पत्र लिखकर हाल ही में ज्वाइन करने वाले लोगों का ब्योरा मांगा गया। जिसमें पता चला कि निदेशालय से लेकर जिलों तक फर्जी नियुक्ति का नेटवर्क चल रहा है। उरई में तो कानपुर के कर्नलगंज निवासी अनूप कुमार सोनकर को बाकायदा वार्ड ब्वाय के रूप में ज्वाइन करा लिया गया। उसके लिए पांच नवंबर को फर्जी नियुक्ति आदेश जारी हुआ और नौ नवंबर को ही उसे कार्यभार ग्रहण करा दिया गया। ऐसे ही कुछ और मामले भी सामने आए, जिनकी पड़ताल जारी है।
यह मामला पता चलने पर जालौन के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ.डीके जैन ने आठ फरवरी को आयुर्वेद निदेशक को पत्र लिखकर दावा किया किनौ दिसंबर को उन्होंने अनूप सोनकर के नियुक्ति आदेश के सत्यापन के लिए निदेशालय को पत्र भेजा था किन्तु अब तक उसका सत्यापन नहीं हुआ है। साथ ही उन्होंने नियुक्ति आदेश भी भेजा। यहां जांच हुई तो उक्त नियुक्ति आदेश तो फर्जी निकला ही, सत्यापन के लिए कोई पत्र भी नहीं आने की बात सामने आयी। इस पर भी सवाल उठे कि नौ नवंबर को ज्वाइन कराने के एक माह बाद उन्होंने सत्यापन क्यों कराया? इस बीच तीन माह का वेतन भी निकाल दिया गया। आयुर्वेद निदेशक ने मामले में क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी व उक्त कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा कायम कराने के आदेश दिये और आयुर्वेदिक अधिकारी के निलंबन की संस्तुति की। प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने बताया कि डॉ. जैन को निलंबित कर दिया गया है।
बैकलॉग तो 12 साल से बंद
फर्जी नियुक्ति आदेशों में बैकलॉग नियुक्ति को आधार बनाया गया है। अधिकारियों के मुताबिक 29 अगस्त 2003 के बाद से बैकलॉग नियुक्तियां बंद हैं। इसके अलावा सभी आदेश आयुर्वेद निदेशक प्रो.सुरेश चंद्र के हस्ताक्षरों से जारी हुए हैं। इनमें निदेशालय में प्रयोग होने वाले पत्रांकों का हवाला भी दिया गया है। ऐसे में जांच के दायरे में निदेशालय को लाने की मांग भी उठ रही है।
कानपुर-फतेहपुर से जुड़े तार
फर्जी नियुक्तियों के मामले के तार कानपुर-फतेहपुर से जुड़े होने की पुष्टि हुई है। गुरुवार को जिस वार्ड ब्वाय को ज्वाइन कराया गया, वह कानपुर का रहने वाला है। इससे पहले जारी सात लोगों के नियुक्ति आदेश में तीन फतेहपुर, तीन कानपुर व एक उन्नाव के थे। फतेहपुर का एक डॉक्टर इस नेटवर्क के संचालन की कमान संभाले है और उसने बुंदेलखंड व कानपुर में अपने एजेंट तैनात कर रखे हैं।

बसों का बेड़ा बढ़ाने के साथ हाईटेक प्रबंधन


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-यूरो-4 प्रणाली से लैस तीन हजार नयी बसों का प्रस्ताव
-तकनीक में सुधार के साथ जनता से जुड़ेंगे आरटीओ
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : परिवहन विभाग अब बसों का बेड़ा बढ़ाने के साथ हाईटेक प्रबंधन पर जोर दे रहा है। नए बजट प्रस्तावों को इसी परिकल्पना के साथ मूर्त रूप दिया गया है।
वित्तीय वर्ष 2016-17 के बजट के लिए परिवहन विभाग ने लगभग एक हजार करोड़ रुपये के प्रस्ताव तैयार किये हैं। इनमें लोहिया बसों के बेड़े को मजबूत करने के साथ राज्य परिवहन निगम के पूरे बस बेड़े को नौ हजार से बढ़ाकर बारह हजार करने की तैयारी है। अगले वित्तीय वर्ष में तीन हजार नयी बसें खरीदने के साथ परिवहन निगम ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश के भीतर, बल्कि आसपास के राज्यों से जुड़े नए मार्गों पर छा जाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। ये बसें सभी आधुनिक सुविधाओं से लैस होने के साथ यूरो-4 उत्सर्जन प्रणाली वाली होंगी। इससे ईंधन का खर्च भी कम होगा और प्रदूषण भी नियंत्रित रहेगा। इसके अलावा बसों में स्पीड बैरियर सहित आधुनिकतम संचार उपकरण लगाए जाएंगे, ताकि उन पर नजर रखी जा सके। परिवहन निगम ने बजट प्रस्तावों में बस अड्डों के उन्नयन की बात भी कही है। सुविधाओं से लैस अड्डों में यात्री लाउंज सहित तमाम आधुनिक बंदोबस्त होंगे। कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी, मेरठ, आगरा, नोएडा, गाजियाबाद आदि के बस अड्डों का विस्तार व विकास इस तरह से किया जाएगा कि देश-विदेश में प्रसिद्ध कॉफी व फूड चेन भी वहां अपने आउटलेट्स खोलने का प्रस्ताव करें।
परिवहन विभाग भी अगले वित्तीय वर्ष में तकनीकी रूप से मजबूत होने की तैयारी में है। वाहन व सारथी सॉफ्टवेयर्स के साथ प्रदेश के सभी वाहनों का ब्योरा ऑनलाइन जुटाने के साथ संभागीय परिवहन अधिकारी (आरटीओ) कार्यालयों का शत प्रतिशत कम्प्यूटरीकरण सुनिश्चित किया जाएगा। परिवहन विभाग ने इसके लिए बजट में डेढ़ सौ करोड़ रुपये आवंटित किये जाने की मांग की है। इसके तहत परिवहन कार्यालयों का अधिकाधिक कामकाज ऑनलाइन करने का प्रस्ताव है, जिससे लोगों को इन दफ्तरों में कम से कम जाना पड़े। इससे दलालों पर उनकी निर्भरता घटेगी और भ्रष्टाचार में भी निश्चित रूप से कमी आएगी। ओवरलोडिंग जैसी समस्याओं से निपटने के लिए भी तकनीकी स्तर पर मजबूत ढांचा बनाने का प्रस्ताव भी किया गया है। इसके लिए राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के साथ समन्वय बिठाने और सड़कों पर वाहनों के चलते हुए उनका वजन करने और चालान करने की प्रणाली लागू करने का प्रस्ताव है।
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इंजीनियरिंग के साथ स्किल डेवलपमेंट पर फोकस


-साल भीतर खुलेंगे 41 नए पॉलीटेक्निक
-सात इंजीनियरिंग कालेज होंगे मजबूत
-स्किल डेवलपमेंट सेंटर का भी प्रस्ताव
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: उत्तर प्रदेश भी अब स्किल डेवलपमेंट पर फोकस की तैयारी कर रहा है। प्रदेश के बजट में इस बार नए इंजीनियरिंग कालेजों के साथ स्किल डेवलपमेंट व वोकेशनल पाठ्यक्रमों की मजबूती पर जोर दिया जाएगा।
प्राविधिक शिक्षा विभाग अगले वित्तीय वर्ष को स्किल डेवलपमेंट व शैक्षिक उन्नयन को समर्पित कर रहा है। बजट के लिए सरकार से उम्मीदें भी उसी के अनुरूप की गयी हैं। प्रदेश में एक उच्च स्तरीय स्किल डेवलपमेंट सेंटर विकसित करने का प्रस्ताव किया गया है। बजट में इस सेंटर के लिए वित्तीय प्रबंध सुनिश्चित किये जाने की उम्मीद है। इस केंद्र के माध्यम से प्रदेश के इंजीनियरिंग कालेजों व पॉलीटेक्निक संस्थानों में पढऩे वाले छात्र-छात्राओं को नियमित इंजीनियरिंग व डिप्लोमा की पढ़ाई के साथ स्किल डेवलपमेंट के कोर्सेज से जोड़ा जाएगा। इसके अलावा नोएडा में प्रस्तावित स्कूल ऑफ डिजाइन भी अगले वित्तीय वर्ष से शुरू होने की उम्मीद है। विभाग ने वोकेशनल शिक्षा में उच्च डिग्र्री पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए एक संस्थान की परिकल्पना की है, वहीं सेंटर फॉर इनोवेशन एंड इनक्यूबेशन की स्थापना भी अगले वित्तीय वर्ष में ही करने का प्रस्ताव है। इस सेंटर को प्रदेश के इंजीनियरिंग कालेजों में प्रस्तावित इनोवेशन एंड इनक्यूबेशन नेटवर्क से जोड़ कर उसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप में विकसित किया जाएगा।
वित्तीय वर्ष 2016-17 में प्रदेश में 41 नए पॉलीटेक्निक संस्थानों के मूर्त रूप ले लेने की उम्मीद है। नए संस्थानों में डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की शुरुआत के साथ पुराने पॉलीटेक्निक संस्थानों को आधुनिक संसाधनों से जोडऩे के लिए भी बजट में अनुदान की अपेक्षा की गयी है। मौजूदा सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों में एचबीटीआइ को इस साल विश्वविद्यालय का दर्जा दिये जाने की तैयारी है। इसके लिए इस समय चल रहे विधानसभा के बजट सत्र में प्रस्ताव तो आना ही है, बजट में एचबीटीयू की स्थापना के लिए आर्थिक सहयोग की उम्मीद भी लगायी गयी है। सात इंजीनियरिंग कालेजों का विस्तार कर उन्हें मजबूती प्रदान किये जाने की भी तैयारी है। बांदा, बिजनौर व अम्बेडकर नगर इंजीनियरिंग कालेजों का ढांचागत सुधार करने के साथ अभी दूसरे परिसरों में चल रहे आजमगढ़, मैनपुरी, कन्नौज व सोनभद्र के राजकीय इंजीनियरिंग कालेजों को उनके अपने परिसरों में स्थानांतरित कर वहां उनका विस्तार किया जाएगा। इसके लिए भी बजट में वित्तीय प्रबंधन की तैयारी है।

Tuesday, 9 February 2016

नौवीं-दसवीं में ज्यादा को मिलेगी ज्यादा छात्रवृत्ति


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-पहली बार बनेगी पूर्वदशम छात्रवृत्ति की औपचारिक नियमावली
-आय सीमा दो लाख और छात्रवृत्ति तीन गुना करने का प्रस्ताव
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डॉ.संजीव, लखनऊ : प्रदेश में पूर्व दशम छात्रवृत्ति के नियम बदले जा रहे हैं। अब नौवीं-दसवीं में भी आय सीमा बढ़ाकर ज्यादा विद्यार्थियों को इसके दायरे में लाया जाएगा। साथ ही छात्रवृत्ति बढ़ाकर तीन गुना करने का प्रस्ताव है।
उत्तर प्रदेश में नौवीं व दसवीं के छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति दिये जाने का प्रावधान है, ताकि धनाभाव में उनकी पढ़ाई न रुक सके। वर्ष 2015-16 में भी 28,204 शैक्षिक संस्थानों के 10,96,146 विद्यार्थियों ने इस छात्रवृत्ति के लिए पंजीकरण कराया था। इनमें से 6,81,666 ने फार्म पूरी तरह भरे और उनमें भी 4,63,975 के फार्म सभी औपचारिकताओं के बाद छात्रवृत्ति के लिए राज्य मुख्यालय भेजे गए। भारी संख्या में आवेदनों के बावजूद पूर्व दशम छात्रवृत्ति के लिए अब तक कोई औपचारिक नियमावली नहीं थी। पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की निदेशक पुष्पा सिंह के मुताबिक पहली बार पूरी नियमावली को औपचारिक रूप से लिपिबद्ध किया जा रहा है। अभी छात्र-छात्राओं को महज 720 रुपये प्रति वर्ष की दर से छात्रवृत्ति मिलती थी। अब इसे तीन गुना से अधिक बढ़ाकर 2250 रुपये प्रति वर्ष करने का प्रस्ताव है। इसी तरह अभी तक तीस हजार रुपये वार्षिक आय वाले परिवारों के विद्यार्थियों को ही छात्रवृत्ति मिलती थी। अब आय सीमा बढ़ाकर दो लाख रुपये की जा रही है। समाज कल्याण विभाग के उपनिदेशक पीके त्रिपाठी के अनुसार सामान्य वर्ग के लिए भी अभी आय सीमा गरीबी रेखा ही थी, जिसे बढ़ाकर दो लाख किये जाने से लाभान्वितों की संख्या बढ़ेगी। इस तरह कुल मिलाकर नौवीं-दसवीं के अधिक विद्यार्थी आवेदन करेंगे और उन्हें छात्रवृत्ति भी अधिक मिल सकेगी।
निवास प्रमाण पत्र जरूरी नहीं
नियमावली में निवास प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं रहेगी। अधिकारियों का मानना है कि आय प्रमाण पत्र में निवास का जिक्र होता ही है, ऐसे में अलग से निवास प्रमाण पत्र की मांग के कारण विद्यार्थियों व उनके परिजनों को अत्यधिक परेशान होना पड़ता है। आए दिन तहसील में उनके उत्पीडऩ की शिकायतें भी आती हैं। यह अनिवार्यता समाप्त होने से इन स्थितियों में भी सुधार होगा।
बतानी होगी नामांकन संख्या
नौवीं व दसवीं में छात्रवृत्ति के लिए आवेदन करने के साथ ही विद्यार्थियों को अपने बोर्ड की नामांकन संख्या बतानी होगी। किसी भी बोर्ड का विद्यार्थी भले ही क्यों न हो, बिना नामांकन संख्या के उसका आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा। नामांकन संख्या के माध्यम से ऑनलाइन निस्तारण के समय बोर्ड से उनका परीक्षण भी कराया जाएगा। इससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होगी और फर्जीवाड़ा रुकेगा।
प्राप्तांक की बाध्यता समाप्त
अभी छात्रवृत्ति के लिए वरीयता सूची बनाते समय आठवीं व नौवीं के प्राप्तांक देखे जाते हैं। नियमावली में प्राप्तांक की शर्त समाप्त कर दी गयी है। अधिकारियों का मानना है कि आठवीं व नौवीं की परीक्षाओं के प्राप्तांकों को आधार बनाने से कई बार वास्तविक जरूरतमंदों को लाभ नहीं मिलता है। नयी व्यवस्था से प्रतीक्षा सूची भी समाप्त होगी और अधिक लोग लाभान्वित हो सकेंगे। 

...तो बड़े वाहनों में अपने आप लग जाएंगे ब्रेक


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-मंत्रिमंडल के सामने आएगा स्पीड बैरियर का प्रस्ताव
-25 हजार खर्च कर नंबर पोर्टेबिलिटी का फायदा उठा सकेंगे
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
यदि आपका बच्चा स्कूल बस से जाता है और ड्राइवर उसकी स्पीड 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ाने की कोशिश करता है तो उसमें अपने आप ब्रेक लग जाएंगे। परिवहन विभाग बड़े वाहनों में स्पीड बैरियर लगवाने की तैयारी कर रहा है। जल्द ही इसे मंत्रिमंडल की मंजूरी दिलायी जाएगी।
वाणिज्यिक वाहनों की अधिक रफ्तार के कारण होने वाली दुर्घटनाओं की शिकायतें आम हैं। इन पर अंकुश लगाने के लिए परिवहन विभाग ने इन पर यांत्रिक अंकुश लगाने की तैयारी की है। परिवहन आयुक्त के. रविन्द्र नायक ने बताया कि इन वाहनों को बिना स्पीड बैरियर के सड़क पर चलने नहीं दिया जाएगा। स्पीड बैरियर वाहन में लगने वाला यांत्रिक उपकरण होता है, जो एक निर्धारित गति से अधिक रफ्तार में वाहन को पहुंचने ही नहीं देता है। आठ सीटों से अधिक वाले सभी वाणिज्यिक वाहनों पर इस स्पीड बैरियर का प्रयोग किया जाएगा। स्कूली बच्चों को लाने ले जाने के लिए प्रयोग होने वाली बसों व वैन आदि में 60 किलोमीटर प्रति घंटे का बैरियर लगाया जाएगा। अन्य बसों व यात्री वाहनों पर 80 किलोमीटर प्रति घंटे का बैरियर लगेगा। डंपर के लिए स्पीड बैरियर की सीमा 60 किलोमीटर प्रति घंटा व अन्य ट्रकों के लिए 80 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गयी है। इस बाबत विस्तृत प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है। मंत्रिमंडल की अगली बैठक में यह प्रस्ताव आने की उम्मीद है।
मंत्रिमंडल की बैठक में इसके अलावा नंबर पोर्टेबिलिटी का प्रस्ताव लाने की भी तैयारी है। केंद्रीय परिवहन विभाग ने राष्ट्रीय स्तर पर पोर्टेबिलिटी को हरी झंडी दे दी है। इसके अंतर्गत अपना जीवनकाल पूरा कर चुके वाहनों का प्रिय नंबर सहेज कर रखने के लिए नए वाहन पर वही नंबर प्रयोग किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में इसके लिए 25 हजार रुपये शुल्क का प्रावधान किया गया है। यह राशि जमा कर कोई भी व्यक्ति अपनी पुरानी कार या अन्य वाहन का नंबर सहेज सकेगा और उसे नए वाहन के लिए स्थानांतरित कर सकेगा। मंत्रिमंडल से मंजूरी के बाद इसे प्रदेश में लांच किया जाएगा।

Monday, 8 February 2016

बारह लाख गर्भवती ढूंढ़ीं, एक लाख गंभीर


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-मातृत्व सप्ताह के बाद लगातार फॉलोअप के निर्देश
-प्रदेश के 820 ब्लाकों के 97,800 गांवों में लगे शिविर
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : मातृत्व सप्ताह के दौरान गांव-गांव पड़ताल में 12 लाख गर्भवती महिलाएं ढूंढ़ी गयी हैं। इनमें से एक लाख गंभीर हालत में हैं। इन सभी के मामले में लगातार फॉलोअप किया जाएगा।
प्रदेश के 820 ब्लाकों के 97,800 गांवों में 27 जनवरी से 3 फरवरी तक मातृत्व सप्ताह का आयोजन किया गया था। हर गांव में गर्भवती महिलाओं को चिह्नित किया गया। राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार कुल 18,19,725 महिलाओं को ढूंढऩे का लक्ष्य था, इसके विपरीत 11,93,486 महिलाओं को ढूंढऩे में सफलता मिली। इन गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण कर उनकी प्रारंभिक स्वास्थ्य जांच हुई तो उनमें से एक लाख गंभीर अवस्था में पायी गयीं। पांच फरवरी को 849 चिकित्सा इकाइयों में इन सभी की जांच की गयी है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार के अनुसार गंभीर अवस्था में सामने आयी गर्भवती महिलाओं का विशेष फॉलोअप किया जाएगा। इन्हें पूरे प्रसव काल के दौरान स्वास्थ्य केंद्रों व चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुरक्षण में रखा जाएगा। इनमें भी हाई रिस्क श्रेणी की महिलाओं को अलग से चिह्नित करने के निर्देश दिये गए हैं।
प्रधानों की भी ली मदद 
इस अभियान के दौरान ग्र्राम प्रधानों की मदद भी ली गयी है। बाराबंकी जिले के सिद्दौर ब्लाक के मोहम्मदपुर गाँव में नवनिर्वाचित प्रधान चंद्रकुमार के घर पर बुलाकर गांव की 20 गर्भवती महिलाएं चिह्नित हुईं। घर-घर संपर्क का परिणाम था कि दो ऐसी गर्भवती महिलाएं भी पंजीकृत की गयीं जो फिलहाल मायके गयी हुई थीं। आठ माह की गर्भवती शशिबाला को खून की कमी थी और वह पहली दफा गर्भवती हुई हैं। उन्हें हाई रिस्क श्रेणी में पंजीकृत कर फॉलोअप करने को कहा है। गोंडा जिले के परसपुर विकास खंड के बेलवानोहर गांव की प्रधान बुधना देवी ने घूम-घूम कर 1272 आबादी वाले गांव में 16 गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण कराया।
इस बार बच्चा बचाना है
फैजाबाद जिले के मसौधा ब्लाक मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर गांव में रहने वाली संतोष सात माह की गर्भवती हैं। यह उनका तीसरा प्रसव है। दूसरा बच्चा विकृति के कारण बचाया नहीं जा सका था और इस बार भी अभी तक मायके में होने के कारण उनका पंजीकरण नहीं हो सका था। शिविर में न सिर्फ उनका पंजीकरण हुआ बल्कि डॉक्टरों ने भी उनसे स्वस्थ बच्चे का वादा किया। जांच में वजन कम निकला तो उन्हें दवाओं व टीकों के साथ फॉलोअप के लिए चिह्नित कर लिया गया। फर्रुखाबाद के बरों ब्लाक के सुंदर नगला गांव की 20 वर्षीय किरन पहली बार गर्भवती हुई हैं। वे सास के साथ जांच के लिए पहुंचीं तो खून की कमी के कारण उनका प्रसव भी हाई रिस्क श्रेणी में आ गया। सास ने ही उनका प्रसव अस्पताल में कराने की पहल की तो बहू का चेहरा खिल उठा।
दूरियां नजदीकियां बनीं
अभियान के दौरान दूरदराज के तमाम गांवों से लोग जांच कराने पहुंचे। अमेठी और प्रतापगढ़ की सीमा पर स्थित गांव पांडेय का पुरवा से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 20 किलोमीटर दूर है। गांव पहुंचने के लिए तीन किलोमीटर कच्चा रास्ता है और बीच में रेलवे लाइन का फाटक अक्सर बंद रहता है। डेढ़ हजार जनसंख्या वाले इस गांव में 256 घर हैं और यहां एएनएम तक नहीं आतीं। मातृत्व सप्ताह के दौरान वहां दो नर्स भेजी गयीं। आशा कार्यकर्ता मीरा व आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पुष्पा ने 11 महिलाओं का पंजीकरण कराया था। इनमें से चार अपने मायके चली गयी थीं। यहां भी दो महिलाएं गंभीर रूप में पंजीकृत हुईं, जिनका चिकित्सकीय फॉलोअप होगा।
परिवार ने किया विरोध
सरकार भले ही घर-घर जाकर जांच करे, तमाम परिवार ही जांच के लिए राजी नहीं होते। अमेठी ब्लाक के कुटरू का पुरवा गांव की 25 वर्षीय रुक्मिणी व 22 वर्षीय सकीना के घर वालों ने जांच कराने से मना कर दिया। इन दोनों ने परिवार का विरोध कर मातृत्व जांच शिविर में जाने का फैसला किया। वजन कम होने और खून की कमी होने के कारण रुक्मिणी की हालत भी अच्छी नहीं थी। उन्हें हाई रिस्क प्रसव की श्रेणी में पंजीकृत कर लिया गया।

Saturday, 6 February 2016

रोहतास ग्रुप के ठिकानों पर छापा, करोड़ों की चोरी पकड़ी


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-सेवा कर विभाग ने घर-दफ्तर सहित 18 परियोजनाओं की जांच
-तमाम अभिलेख जब्त, कर चोरी स्वीकार कर एक करोड़ जमा किए
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश व देश के कई हिस्सों में सक्रिय बिल्डर रोहतास ग्र्रुप के ठिकानों पर सेवाकर विभाग ने छापा मारकर करोड़ों रुपये की कर चोरी पकड़ी है। शुक्रवार रात तक समूह के दफ्तर व घर सहित 18 परियोजनाओं की जांच चल रही थी। तमाम अभिलेख जब्त किये गए हैं। बिल्डर ने कर चोरी स्वीकार कर जुर्माना स्वरूप एक करोड़ रुपये जमा भी किया है।
जानकारी के मुताबिक सेंट्रल एक्साइज इंटेलीजेंस महानिदेशालय (डीजीसीईआइ) की उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड शाखा पिछले कई महीनों से रोहतास समूह के कामकाज की खुफिया पड़ताल कर रही थी। उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के प्रभारी व अपर महानिदेशक राजेंद्र सिंह ने बताया कि शुक्रवार को चालीस अफसरों की छह टीमें बनाकर लखनऊ-दिल्ली सहित 18 परियोजनाओं की जांच कराई गयी। इनमें राजधानी की रोहतास गेटवे सिटी व रोहतास ओएसिस जैसी परियोजनाएं भी शामिल हैं। उपनिदेशक स्तर के एक अधिकारी को इनके पर्यवेक्षण पर लगाया गया। लखनऊ के मदन मोहन मालवीय मार्ग स्थित बिल्डर के आवासीय परिसर व कार्यालय में पड़ताल की गयी। इस दौरान करोड़ों रुपये की सेवा कर चोरी की पुष्टि हुई है। छापे के दौरान परिसर के आसपास पुलिस बल तैनात रहा और किसी को भी भीतर प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गयी।
दरअसल उक्त बिल्डर ने सेवा कर के लिए अपने प्रतिष्ठानों को दिल्ली में पंजीकृत करा रखा है और व्यवसाय उत्तर प्रदेश में भी कर रहा है। भवन निर्माताओं को कुल लागत का 75 फीसद सामग्र्री के रूप में हटा कर शेष 25 फीसद का 14 प्रतिशत सेवा कर के रूप में देना होता है। यह राशि कुल लागत की लगभग चार फीसद के आसपास होती है। पता चला कि बिल्डर उपभोक्ताओं से तो सेवाकर के मद में धन ले रहा था, किन्तु विभाग को इसका भुगतान नहीं कर रहा था।
अपर महानिदेशक ने बताया कि प्रथमदृष्ट्या बड़ी चोरी की पुष्टि हुई है। छापे की कार्रवाई कल तक जारी रहेगी। उसके बाद पूरी चोरी व जुर्माने आदि का आकलन किया जाएगा।

पुलिस ही नहीं चाहती असली मालिकों तक पहुंचें वाहन

-अफसरों की लापरवाही से थानों में लगा कबाड़ का अंबार
-नहीं ले रहे परिवहन विभाग से वाहनों के ब्यौरे का पासवर्ड
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
परिवहन विभाग की तमाम कोशिशों के बावजूद पुलिस चोरी के वाहन असली मालिकों तक नहीं पहुंचा रही है। अफसरों की लापरवाही से थानों में कबाड़ का अंबार लगा है। कई बार कहने के बावजूद पुलिस अधिकारी परिवहन विभाग से वाहनों के ब्यौरे से जुड़े साफ्टवेयर का पासवर्ड नहीं ले रहे हैं।
परिवहन विभाग ने आम जनता के लिए गाड़ी नंबर डालकर उसका पूरा ब्यौरा ऑनलाइन कर दिया है। वाहनों का ब्यौरा सहेजे जिस साफ्टवेयर के सहारे यह व्यवस्था की गयी है, उसमें गाड़ी के नंबर के साथ इंजन नंबर, चेचिस नंबर आदि का ब्यौरा भी है। उत्तर प्रदेश में इस समय कुल डेढ़ करोड़ वाहन सक्रिय अवस्था में हैं। इन सभी का ब्यौरा डिजिटाइज करके साफ्टवेयर से जोड़ दिया गया है। परिवहन आयुक्त के.रविन्द्र नायक ने बताया कि परिवहन विभाग कई बार पुलिस महानिदेशक स्तर पर यह पत्र लिखकर कह चुका है कि हर जिले के पुलिस प्रमुख (एसएसपी या एसपी) के स्तर पर उक्त साफ्टवेयर का पासवर्ड ले लिया जाए। इसके बावजूद अब तक ऐसा नहीं हुआ है। कई बार कहने के बाद 75 में से सिर्फ 38 जिलों के अफसरों ने उक्त साफ्टवेयर का पासवर्ड लिया है। शेष 37 जिलों में अब भी उक्त साफ्टवेयर का प्रयोग पुलिस ने नहीं शुरू किया है।
परिवहन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पुलिस अफसरों की ढिलाई से उक्त साफ्टवेयर का प्रयोग वाहन चोरी रोकने व वाहन चोरी के बाद मालिक तक सही वाहन पहुंचाने में नहीं हो पा रहा है। बताया गया कि परिवहन आयुक्त की ओर से कई बार पत्र लिखे जाने पर पूर्व पुलिस महानिदेशक जगमोहन यादव ने तो जवाब में लिखकर भेज दिया कि वे इस पर विचार करेंगे। इसे लेकर परिवहन विभाग में अफसरों में आक्रोश भी हुआ। उनका कहना था कि विभाग तो पुलिस की मदद करना चाहता है और वहां से ऐसे जवाब आ रहे हैं। दरअसल थानों में भारी संख्या में ऐसे वाहन डम्प हैं जो प्रदेश के किसी एक हिस्से में चोरी हुए और दूसरे हिस्से में पकड़े गए। उक्त साफ्टवेयर का प्रयोग कर वाहन के मालिक का सही पता लगाया जा सकता है किन्तु पुलिस ऐसा नहीं करती। इससे बीमा कंपनियों को भी भारी राशि का फायदा होगा, क्योंकि पुलिस अभी वाहन चोरी के मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा देती है और उसके बाद चोरी गए वाहन के बदले बीमा कंपनी को भुगतान करना पड़ता है। यदि पुलिस पकड़े गए वाहनों के बारे में साफ्टवेयर से पड़ताल कर उन्हें उनके सही मालिकों तक पहुंचा दे, तो स्थितियां बदल सकती हैं। 

Thursday, 4 February 2016

आयुर्वेद विभाग में फर्जी नियुक्तियां


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-आदेश लेकर ज्वाइन करने पहुंचा अभ्यर्थी
-सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का भी हवाला
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : आयुर्वेद विभाग में फर्जी नियुक्तियों का मामला सामने आया है। सात लोगों को चार जिलों में नियुक्त करने का आदेश लेकर अभ्यर्थी ज्वाइन करने पहुंचा तो मामला पकड़ा गया। आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का भी हवाला दिया गया है।
फतेहपुर जिले के ग्र्राम अमौली का रहने वाला आशीष कुमार गुरुवार को क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी हमीरपुर के कार्यालय में ड्यूटी ज्वाइन करने पहुंचा। आशीष ने अपना नियुक्ति पत्र उनके समक्ष प्रस्तुत किया जिसमें उसके साथ छह और लोगों के नियुक्ति आदेश हैं। फतेहपुर के अमौली के ही धर्मेन्द्र प्रसाद को हमीरपुर व जगन सिंह सचान को उरई में नियुक्ति दी गयी है। इसके अलावा आनंद विहार कानपुर के अनुज सोनकर, कर्नेलगंज कानपुर के राजीव कुमार और नई बस्ती बजरंग बिहार कानपुर के श्रीलाल को क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी कानपुर और उन्नाव के गांव बिगहौरा चन्दनपुर के मिथलेश कुमार को उन्नाव में नियुक्ति का आदेश भी उसी पत्र में शामिल है। आयुर्वेद निदेशक प्रो.सुरेश चंद्र की ओर से 29 जनवरी 2016 को जारी उक्त नियुक्ति आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के सात मार्च 2014 के एक फैसले का हवाला देकर इन सभी को चतुर्थ श्रेणी कार्मिक के रूप में वेतनमान 5200-20200, ग्र्रेड पे 1800 के अंतर्गत तत्काल ज्वाइन कराने की बात कही गयी है। हमीरपुर के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी के पास मामला पहुंचा तो उन्हें शक हुआ। उन्होंने निदेशालय में उक्त नियुक्ति आदेश की प्रति भेज कर पूछा तो यहां पड़ताल शुरू हुई। पता चला कि यह आदेश फर्जी है। आदेश में जिस क्रमांक का जिक्र है, वह जारी ही नहीं हुआ है। निदेशक ने अपने हस्ताक्षर भी फर्जी होने की बात कही है।
मुकदमे व विभागीय जांच के आदेश
 प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने मामले में मुकदमा दर्ज कराने और विभागीय जांच के आदेश दिये हैं। उन्होंने बताया कि आयुर्वेद निदेशक ने उन्हें मामले की जानकारी दी है। उन्होंने तुरंत मुकदमा दर्ज कराने को कहा है। साथ ही विभागीय जांच भी कराई जाएगी, ताकि इसमें किसी नेटवर्क या विभागीय संलिप्तता का पता चल सके। 

Wednesday, 3 February 2016

मेडिकल कालेज प्राचार्यों की वरिष्ठता सूची पर विवाद


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- यूपी स्टेट पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल पहुंचा मामला
- नई सूची से चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक बाहर
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : मेडिकल कालेजों के प्राचार्यों की वरिष्ठता सूची पर विवाद हो गया है। पुरानी सूची पर विवादों के बाद बीती 27 जनवरी को जिस वरिष्ठता सूची को अंतिम रूप दिया गया, उस सूची के खिलाफ भी पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल में शिकायत की गयी है। नई सूची से चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक को बाहर कर दिया गया है।
प्रदेश के मेडिकल कालेजों के प्राचार्यों की वरिष्ठता सूची को लेकर तमाम आपत्तियां की गयी थीं। डॉ.केके गुप्ता व डॉ.आनंद स्वरूप ने वरिष्ठता सूची में चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक को ऊपर रखे जाने पर आपत्ति जताई थी। इस पर डॉ.त्रिपाठी को 31 अक्टूबर से 2014 से सेवानिवृत्त मानकर उन्हें सूची से बाहर कर दिया गया है। डॉ.गणेश कुमार ने कार्यवाहक प्राचार्य के रूप में काम को जोडऩे व डॉ.आरके सिंह ने नियुक्ति तारीखों में संशोधन पर आपत्ति जताई थी। डॉ.नवनीत कुमार ने ज्येष्ठता सूची में उनके आठवें स्थान पर रखे जाने पर आपत्ति जाहिर की थी। इन सभी आपत्तियों का निस्तारण करते हुए 27 जनवरी को चिकित्सा शिक्षा विभाग ने नयी वरिष्ठता सूची जारी कर दी। इसमें सबसे लंबी उछाल डॉ.नवनीत कुमार की रही और वे आठवें स्थान से पहले स्थान पर आ गए। इसमें डॉ.केके गुप्ता दूसरे, डॉ.एसपी सिंह तीसरे, डॉ.आनंद स्वरूप चौथे, डॉ.आरके सिंह पांचवें, डॉ.गणेश कुमार छठे और डॉ.एनके प्रजापति सातवें स्थान पर हैं।
उल्लेखनीय है कि शासन में आपत्ति के अलावा कानपुर मेडिकल कालेज के प्राचार्य रहे डॉ.आनंद स्वरूप ने राज्य पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल में वरिष्ठता सूची को अंतिम रूप देने की याचिका लगाई थी। इस बीच नयी वरिष्ठता सूची आ जाने पर ट्रिब्यूनल ने 29 जनवरी डॉ.स्वरूप की याचिका समाप्त कर दी थी। इसके बाद डॉ.स्वरूप नयी वरीयता सूची के खिलाफ पुन: ट्रिब्यूनल की शरण में गए हैं। उन्होंने 27 जनवरी की वरिष्ठता सूची को अवैध करार देते हुए इसके आधार पर कोई प्रोन्नतियां व नियुक्तियां न करने की मांग की है। ट्रिब्यूनल ने इस मसले पर प्रदेश शासन से जवाब मांगा है।

साल भीतर 70 चमचमाते बस अड्डे, 36 नए रूट

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-परिवहन निगम की बसों के टाइम टेबल को दिया जा रहा अंतिम रूप
-रूट्स के हिसाब से बसों की जरूरत का आंकलन कर मांगी रिपोर्ट
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
एक साल के भीतर प्रदेश में 70 बस अड्डे चमचमाते नजर आएंगे। प्रदेश में 36 नए रूट सृजित करने के साथ रूट्स के हिसाब से बसों की जरूरत का आंकलन कर अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी गयी है।
उत्तर प्रदेश में रोडवेज का व्यापक नेटवर्क होने के बावजूद न सिर्फ धड़ल्ले से डग्गामारी हो रही है, बल्कि बाकायदा समानांतर बस अड्डे संचालित हो रहे हैं। इस बाबत हुई समीक्षा में माना गया कि रोडवेज की बसें समय से नहीं चलती हैं और बस अड्डों की स्थितियां भी अच्छी नहीं हैं। इस कारण उन रूटों पर भी निजी बस संचालक आसानी से सवारियां पा जाते हैं, जिन पर रोडवेज बसें चलती हैं। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक के. रविन्द्र नायक ने बताया कि अब टाइम टेबल को ठीक प्रकार से लागू करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए मौजूदा रूट्स के बीच समन्वय स्थापित करने के साथ सभी क्षेत्रीय प्रबंधकों से हर रूट पर बसों की जरूरत का आकलन करने को भी कहा गया है। इसके बाद जल्द ही नए सिरे से टाइम टेबल बनाकर लागू किया जाएगा। पुराने रूट्स के अलावा 36 नए रूट्स के लिए शासन में प्रस्ताव भेजा गया है। अनुमति मिलते ही उन्हें भी शामिल कर लिया जाएगा। प्रबंध निदेशक ने बताया कि साल भर के भीतर प्रदेश के 70 बस अड्डों को उत्कृष्ट स्वरूप देने की तैयारी है। इस समय 28 पर काम चल रहा है। अगले दो माह में 12 और बस अड्डों पर काम शुरू हो जाएगा। इसके बाद दूसरे चरण में 30 और बस अड्डों का चयन कर उन्हें अत्याधुनिक रूप दिया जाएगा।
अब नहीं चलेंगी मिनी बसें
रोडवेज के बस बेड़े में अब मिनी बसों को शामिल नहीं किया जाएगा। अभी तक बस बेड़े को सुदृढ़ करने के लिए निजी बसों को परिवहन निगम के अधीन अनुबंधित कर संचालित किया जाता है। इनमें 22 से 54 सीट क्षमता तक की बसें शामिल हैं। हाल ही में की गयी समीक्षा में यह तथ्य प्रकाश में आया कि कम सीट क्षमता वाली मिनी बसों की संचालन लागत बड़ी बसों की तुलना में अधिक आती है और कई बार यात्रियों को खड़े होकर यात्रा कराने के कारण असुविधा भी होती है। प्रबंध निदेशक के. रविन्द्र नायक ने बताया कि तमाम मिनी बसों में तो कंडक्टर का खर्चा तक नहीं निकल पाता है। इसलिए अब 40 से कम सीटों वाली बसों को अनुबंधित करने पर रोक लगा दी गयी है। अब 40 या उससे अधिक सीट क्षमता वाली बसें ही रोडवेज बेड़े का हिस्सा बनेंगी।

Tuesday, 2 February 2016

एक प्लेटफार्म प्रतिभा का


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'मेड इन यूपी' पर फोकस
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-विश्वस्तरीय प्रयोगशालाओं में शोध व विकास पर होगा जोर
-आइआइटी व आइआइएम विशेषज्ञ भी जोडऩे की तैयारी
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डॉ.संजीव, लखनऊ : युवाओं के लिए अच्छी खबर। प्राविधिक शिक्षा महकमा इनोवेशन व इन्क्यूबेशन नेटवर्क बना कर सूबे की प्रतिभा को पंख लगाने की पहल कर रहा है। इस नेटवर्क से राज्य के आठ इंजीनियरिंग कालेज जोडऩे की तैयारी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारे 'मेड इन इंडिया' के जवाब में प्रदेश सरकार 'मेड इन यूपी' पर फोकस करने की रणनीति बना रही है। इसके तहत उद्यमियों व मेधावियों को वातावरण और शोध सुविधा मुहैया कराने की पहल प्राविधिक शिक्षा विभाग द्वारा की जा रही है। राजकीय इंजीनियरिंग कालेजों में प्रस्तावित इनोवेशन व इनक्यूबेशन नेटवर्क से तीन प्राविधिक विश्वविद्यालयों के साथ आठ संस्थान सीधे जोड़े जाएंगे। कानपुर के हरकोर्ट बटलर टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट को विश्वविद्यालय में बदलने का फैसला हो चुका है और एचबीटीयू इस नेटवर्क का प्रमुख केंद्र होगा। गोरखपुर का मदनमोहन मालवीय प्राविधिक विश्वविद्यालय और लखनऊ के डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय से जुड़े लखनऊ, झांसी व सुलतानपुर के इंजीनियरिंग कालेज नेटवर्क का हिस्सा होंगे। बांदा, बिजनौर, अंबेडकर नगर, आजमगढ़, मैनपुरी, कन्नौज व सोनभद्र के इंजीनियरिंग कालेजों में से तीन का चयन किया जाएगा।
प्राविधिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव मुकुल सिंघल ने बताया कि इन सभी संस्थानों में सेंटर फॉर इनोवेशन एंड इनक्यूबेशन की स्थापना कर उन्हें जोड़ा जाएगा। इनमें विश्वस्तरीय प्रयोगशालाएं तो होंगी ही, नवीन शोध कार्यों को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय विद्वानों को इस नेटवर्क का हिस्सा बनाया जाएगा। उत्तर प्रदेश में आइआइटी व आइआइएम जैसी संस्थाएं हैं। उनके विशेषज्ञों को भी इस नेटवर्क से जोड़ा जाएगा, ताकि  इंजीनियरिंग कालेजों के छात्र व शोधार्थी लाभ उठा सकें। चालू वित्तीय वर्ष के अंत तक हर हाल में इन केंद्रों व नेटवर्क का पूरा स्वरूप सामने आ जाएगा।
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निजी संस्थान भी उठाएंगे लाभ
प्रमुख सचिव ने बताया कि इस नेटवर्क का लाभ निजी संस्थान व उद्योग समूह भी उठा सकेंगे। तमाम प्रतिभाशील उद्यमी अपनी रचनाधर्मिता का सही उपयोग ढांचागत अभाव में नहीं कर पाते हैं। ये केंद्र उन्हें एक प्लेटफार्म के रूप में उपलब्ध होंगे। इसके अलावा निजी संस्थानों को छात्र-छात्राओं को कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर का इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं मिल पाता है। वे इन केंद्रों से जुड़कर उसका लाभ उठा सकेंगे।
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पेटेंट के साथ मानकीकरण
यह नेटवर्क प्रतिभा प्रोत्साहन के साथ पेटेंट व मानकीकरण को बढ़ावा भी देगा। नेटवर्क के विशिष्ट पेटेंट व मानकीकरण प्रकोष्ठ से देश-दुनिया में पेटेंट व मानकों के मामले में दिग्गज साबित हो चुके लोगों को जोड़ा जाएगा। कोशिश होगी कि उत्तर प्रदेश के खाते में ज्यादा से ज्यादा नए उत्पादों के पेटेंट आएं और मानकों का अनुपालन करते हुए प्रतिष्ठानों की स्थापना हो सके। इससे रोजगार के अधिक अवसर भी सृजित होंगे।