Sunday, 31 January 2016

शुरू हो गया मेडिकल कालेजों का इलाज


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-एमसीआइ की सख्ती से हो रहा समयबद्ध जीर्णोद्धार
-लगाए जाएंगे आधुनिक फायर फाइटिंग सिस्टम
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : वर्षों से बीमार चल रहे प्रदेश के मेडिकल कालेजों का इलाज शुरू हो गया है। भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) की सख्ती और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ कदमताल की जरूरत ने इनके समयबद्ध जीर्णोद्धार की राह खोल दी है।
प्रदेश में नए मेडिकल कालेज खुलना शुरू होने के साथ ही पुराने कालेजों के जर्जर हालात पर सवाल भी खड़े हो रहे थे। एमसीआइ के सालाना निरीक्षण में लगभग हर साल आपत्तियां लग रही थीं। इस पर शासन स्तर हर कालेज से जीर्णोद्धार के लिए व्यापक प्रस्ताव मांगे गए। इन प्रस्तावों के अनुपालन में चिकित्सा शिक्षा विभाग की तकनीकी समिति ने व्यापक जीर्णोद्धार को मंजूरी दे दी है। इसमें नर्सिंग व पैरामेडिकल व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है। इलाहाबाद, मेरठ, आगरा व कानपुर मेडिकल कालेजों के फार्मेसी व नर्सिंग संस्थानों का जीर्णोद्धार कराने का फैसला हुआ है। इसके साथ पुस्तकालयों को समृद्ध करने पर जोर दिया जा रहा है। इलाहाबाद, मेरठ, झांसी व कानपुर में फायर एलार्म के साथ आधुनिक फायर फाइटिंग सिस्टम की स्थापना होगी।
इलाहाबाद के लिए मंजूर 63.12 करोड़ रुपये में 17.71 करोड़ से पुस्तकालय भवन के निर्माण के साथ फायर फाइटिंग सिस्टम लगाने, गैस पाइप लाइन के उच्चीकरण सहित टेलीमेडिसिन सेंटर को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा। मेरठ के लिए मंजूर 31.71 करोड़ रुपये से स्त्री एवं प्रसूति विभाग में मॉड्यूलर ऑपरेशन थियेटर के साथ बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट व गैस पाइप लाइन का उच्चीकरण किया जाएगा। आगरा मेडिकल कालेज के एसपीएम भवन की मरम्मत के साथ मैकेनाइज्ड लांड्री की स्थापना भी होगी। यहां 29.52 करोड़ रुपये के कार्यों को मंजूरी मिली। कानपुर मेडिकल कालेज में 23.97 करोड़ रुपये, झांसी में 19.58 करोड़ रुपये व गोरखपुर में 14.62 करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला हुआ है। सभी कालेजों के माइक्रोबायलॉजी विभाग में प्रीफैब्रीकेटेड बायोसेफ्टी लैबोरेटरी की स्थापना का फैसला हुआ है। इसके लिए हर कालेज को पांच करोड़ रुपये आवंटित हुए हैं।
बेड से बजेगी घंटी, आएंगी नर्स
कालेजों से संबद्ध अस्पतालों में हर वार्ड में बेड से नर्सिंग स्टेशन को जोडऩे वाले नर्स कॉल सिस्टम को चालू करने का फैसला हुआ है। इसमें मरीज के बेड पर एक स्विच होगा, जिसे दबाते ही नर्सिंग स्टेशन पर घंटी बजने के साथ बेड नंबर के साथ डिस्प्ले आने लगेगा। इसके बाद बेड के पास पहुंचकर नर्स उसे स्विच को ऑफ करेंगी, तभी डिस्प्ले बंद होगा। इलाहाबाद, मेरठ, आगरा, कानपुर, झांसी, गोरखपुर मेडिकल कालेजों में तत्काल नर्सिंग कॉल सिस्टम की स्थापना का जिम्मा उत्तर प्रदेश राज्य निर्माण एवं श्रम विकास सहकारी संघ को दिया गया है। हर कालेज के लिए इस मद में दो करोड़ 36 लाख 26 हजार रुपये आवंटित किये गए हैं।
लटकती बोतलें, घिसटते पर्दे
मेडिकल कालेजों में आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के लिए आइवी सिस्टम विद हैंगर की स्थापना की जाएगी। इसमें हर बेड के साथ जुड़े हैंगर होंगे, जिसमें ग्लूकोज आदि की बोतलें लटकाने के इंतजाम होंगे। उनके स्टैंड खिसकाने का झंझट खत्म हो जाएगा। इसी तरह आधुनिक पर्दे लगाए जाएंगे, जो बार-बार धोने नहीं पड़ेंगे। ये घिसटते पर्दे मरीजों को अलग सा एहसास कराएंगे। इलाहाबाद, मेरठ, आगरा, कानपुर, झांसी व गोरखपुर मेडिकल कालेजों के लिए इस कर्टेन ट्रैक सिस्टम व आइवी सिस्टम विद हैंगर की स्थापना का जिम्मा उत्तर प्रदेश राज्य निर्माण एवं श्रम विकास सहकारी संघ को सौंपा गया है। हर कालेज में इसकी स्थापना पर औसत खर्च सवा दो करोड़ रुपये आएगा। 

Friday, 29 January 2016

...फिर भी नहीं पहुंचे शुल्क प्रतिपूर्ति के डेढ़ लाख फार्म


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-आवेदन फॉरवर्ड करने के लिए सात फरवरी तक का समय
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : कई बार मौका देने के बावजूद दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के डेढ़ लाख फार्म अब तक जिलों से राज्य मुख्यालय नहीं पहुंचे हैं। अब ऐसे सभी संस्थानों को आवेदन फॉरवर्ड करने के लिए सात फरवरी तक का समय दिया गया है।
प्रदेश में दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति छात्र-छात्राओं के खातों में भेजने के लिए 31 जनवरी तक की तारीख निर्धारित की गयी थी। इस दौरान कई बार फार्म भेजने के मौके दिये जाने के बावजूद तमाम संस्थानों ने छात्र-छात्राओं के आवेदन ही नहीं भेजे। शुक्रवार को इस बाबत हुई समीक्षा में पता चला कि 1,45,984 छात्र-छात्राओं के आवेदन डेटा वेरीफाई होने के बावजूद फॉरवर्ड नहीं किये गए। इसे संस्थानों की लापरवाही माना गया किन्तु कहा गया कि इसमें विद्यार्थियों की कोई गलती नहीं है। संस्थानों की लापरवाही का खामियाजा विद्यार्थियों को न भुगतना पड़े, इसलिए इन सभी को आवेदन फॉरवर्ड करने के लिए एक से सात फरवरी तक का समय और दे दिया गया है। इसके बाद आठ से 14 फरवरी तक एनआइसी की राज्य इकाई में सभी आवेदनों की स्क्रुटनी होगी और उसके बाद दूसरे दौर में इन विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की राशि उनके खातों में भेज दी जाएगी। इस बीच दस लाख विद्यार्थियों के आवेदन अंतिम रूप से डिजिटली लॉक हो चुके हैं। इन सभी को फरवरी के दूसरे सप्ताह में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

स्वास्थ्य विभाग को स्वाइन फ्लू के महामारी बनने का इंतजार!


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-23 मरीज मिल चुके, मेडिकल कालेजों में नहीं शुरू हुआ परीक्षण
-न कर्मचारियों की वैक्सीन आयीं, न किट मिली
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में स्वाइन फ्लू के 23 मरीज मिल चुके हैं। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग स्वाइन फ्लू पर नियंत्रण को लेकर गंभीर नहीं है और इसके सूबे में महामारी बनने का इंतजार किया जा रहा है। मेडिकल कालेजों में परीक्षण शुरू नहीं हुआ है। कर्मचारियों के लिए जरूरी वैक्सीन व किट भी अब तक नहीं आयी हैं।
स्वाइन फ्लू जैसी जानलेवा बीमारी को लेकर स्वास्थ्य महकमे की लापरवाही लगातार बढ़ती जा रही है। बीते दिनों लखनऊ व कानपुर में एक-एक मरीज का पता चलते ही सभी मेडिकल कालेजों व हर जिला अस्पताल में आइसोलेशन वार्ड बनाकर स्वाइन फ्लू से निपटने की घोषणाएं की गयी थीं। इसके बाद अब तक इस दिशा में कोई भी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं। शुक्रवार को औपचारिकता के लिए स्वास्थ्य महानिदेशक ने प्रांतीय टास्क फोर्स की बैठक भी बुलाई किन्तु उसमें कोई ठोस फैसला नहीं किया जा सका। इस बैठक में हुई चर्चा के दौरान हर कदम पर ढिलाई सामने आयी, किन्तु उससे निपटने की कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई गयी। यह स्थिति तब है, जबकि प्रदेश में स्वाइन फ्लू तेजी से बढ़ रहा है। अब तक 23 मरीजों में स्वाइन फ्लू होने की पुष्टि हो चुकी है।
प्रदेश के छह मेडिकल कालेजों में स्वाइन फ्लू परीक्षण शुरू करने की बात कही गयी थी, किन्तु एक में भी शुरुआत नहीं हुई है। किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में ही स्वाइन फ्लू परीक्षण की व्यवस्था हो सकी है। इसके अलावा स्वाइन फ्लू के लिए वार्ड बनाने की घोषणा तो हो गयी किन्तु उसमें तैनात होने वाले डॉक्टरों व अन्य कर्मचारियों के लिए जरूरी वैक्सीन अब तक नहीं खरीदी जा सकी है। भारत सरकार से मास्क व किट आदि मिलती है किन्तु अब तक उसका इंतजाम भी नहीं हुआ है।  इस कारण आइसोलेशन वार्ड प्रभावी रूप से सक्रिय नहीं हो पा रहे हैं। इस संबंध में स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ.योगेंद्र कुमार का कहना है कि सभी जिला अस्पतालों में अलग वार्ड बनाना सुनिश्चित किया जा रहा है। दवाएं उपलब्ध करा दी गयी हैं और वैक्सीन खरीदने की प्रक्रिया चल रही है। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने कहा कि छह मेडिकल कालेजों में स्वाइन फ्लू परीक्षण की सुविधा सुनिश्चित कराने की प्रक्रिया चल रही है। ऐसा न करने वाले कालेजों के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी।

अब यूपी से ज्यादा बनेंगे विशेषज्ञ डॉक्टर


-अभी प्रदेश में परास्नातक पाठ्यक्रमों की 751 सीटें
-एमसीआइ से मांगी गयी 172 सीटें बढ़ाने की अनुमति
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : मार्च में यूपीपीजीएमईई की घोषणा के साथ प्रदेश में विशेषज्ञ चिकित्सा शिक्षा के नए सत्र का बिगुल बज गया है। परास्नातक सीटें बढ़ाने की मुहिम के साथ प्रदेश का चिकित्सा शिक्षा विभाग यूपी से ज्यादा विशेषज्ञ डॉक्टर बनाने की तैयारी कर रहा है। अभी प्रदेश में परास्नातक पाठ्यक्रमों की 751 सीटें हैं। एमसीआइ से 172 सीटें बढ़ाने की अनुमति मांगी गयी है।
प्रदेश के मेडिकल कालेजों व परास्नातक संस्थानों में एमडी, एमएस व परास्नातक डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए राज्य कोटे की सीटों के लिए प्रवेश परीक्षा कराने की जिम्मेदारी किंग जार्जेज चिकित्सा विश्वविद्यालय को सौंपी गयी है। 13 मार्च को प्रस्तावित इस परीक्षा के साथ ही चिकित्सा शिक्षा विभाग इस बार प्रदेश से परास्नातक सीटों की संख्या बढ़ाने के प्रयास शुरू किये गए हैं। इस समय प्रदेश में परास्नातक की कुल 751 सीटें हैं। इनमें से इलाहाबाद में 77, गोरखपुर में 54, झांसी में 55, कानपुर में 113, केजीएमयू लखनऊ में 181, मेरठ में 70, आगरा में 102, क्षेत्रीय नेत्र चिकित्सा संस्थान (आरआइओ) सीतापुर में 15, ग्र्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान सैफई में 48, डॉ.राम मनोहर लोहिया संस्थान में 14 व संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में 22 सीटें हैं। इनमें से आधी सीटें अखिल भारतीय परास्नातक मेडिकल प्रवेश परीक्षा (एआइपीजीईई) से भरी जाती हैं।
प्रदेश में एमडी, एमएस व डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की सीटें कई वर्षों से 751 पर अटकी हुई हैं। प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि अब पूरा जोर परास्नातक सीटें बढ़ाने पर है। इसके लिए भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) के समक्ष अलग-अलग कालेजों को मिलाकर कुल 172 सीटों पर आवेदन किया गया है। एमसीआइ की टीमें सभी कालेजों का निरीक्षण भी कर चुकी हैं। अब कोशिश है कि यूपीपीजीएमईई की काउंसिलिंग के पहले इनकी अनुमति मिल जाए, ताकि प्रदेश से अधिक विशेषज्ञ चिकित्सक निकल सकें।
अब डिप्लोमा उत्तीर्ण भी बनेंगे सीनियर रेजीडेंट
राब्यू, लखनऊ : प्रदेश के मेडिकल कालेजों व परास्नातक शिक्षा संस्थानों में डिप्लोमा उत्तीर्ण भी सीनियर रेजीडेंट बन सकेंगे। परास्नातक की पढ़ाई के दौरान रेजीडेंट या जूनियर डॉक्टर कहे जाने वाले विद्यार्थी परास्नातक डिग्र्री लेने के बाद सीनियर रेजीडेंट के रूप में काम करते हैं। अभी तक सीनियर रेजीडेंट के रूप में काम करने के लिए परास्नातक डिग्र्री यानी एमडी या एमएस करना जरूरी होता था। अब डिप्लोमा यानी डीसीएच, डीजीओ या डीऑर्थ जैसे पाठ्यक्रम उत्तीर्ण करने वाले डॉक्टर भी सीनियर रेजीडेंट के रूप में काम कर सकेंगे। इस बाबत आदेश जारी कर दिये गए हैं। 

Thursday, 28 January 2016

कैदियों तक पहुंचेंगी एचआइवी संक्रमण की दवाएं

-सलाखों के पीछे पहुंचते ही बंद हो जाता है एंटी रेट्रोवाइरल ट्रीटमेंट
-जेल डॉक्टरों को प्रशिक्षित कर 352 संक्रमितों का करेंगे पूरा इलाज
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : राज्य एड्स नियंत्रण संगठन एचआइवी संक्रमण से ग्रस्त लोगों के जेल पहुंचने की स्थिति में उनका इलाज बंद हो जाने की समस्या से जूझ रहा है। इससे निपटने के लिए अब जेल के चिकित्सकों को प्रशिक्षित कर संक्रमित कैदियों तक दवाएं पहुंचाने की तैयारी है।
प्रदेश में एचआइवी संक्रमण के शिकार लोगों को सभी मेडिकल कालेजों व चुनिंदा जिला अस्पतालों में एंटी रेट्रोवाइरल ट्रीटमेंट (एआरटी) दिया जाता है। यह ट्रीटमेंट नियमित लेने से उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और उन्हें लंबी जिंदगी जीने का मौका मिलता है। एचआइवी संक्रमण का पता लगते ही संबंधित व्यक्ति को एआरटी सेंटर रेफर कर दिया जाता है और वहां से नियमित दवाएं मिलने लगती हैं। यदि कोई एचआइवी संक्रमित किसी कारणवश जेल पहुंच जाता है तो उसका एंटी रेट्रोवाइरल ट्रीटमेंट बंद हो जाता है। उन्हें नियमित एआरटी सेंटर लाना खासा दुष्कर हो जाता है। इसके लिए विशेष अनुमति से लेकर पुलिसकर्मियों की तैनाती तक का मामला होता है और इस कारण एचआइवी संक्रमित कैदी का उपचार रुक जाता है।
उत्तर प्रदेश एड्स नियंत्रण संगठन के परियोजना निदेशक आलोक कुमार इस तथ्य को स्वीकार करते हैं। उन्होंने बताया कि इस समय उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में 352 कैदी एचआइवी संक्रमित हैं। उनमें से अधिकांश का एंटी रेट्रोवाइरल ट्रीटमेंट चल रहा था, किन्तु जेल पहुंचने के कारण बंद हो गया है। अब इस समस्या से निदान के लिए एआरटी सेंटर्स से जेल अस्पतालों को जोडऩे का फैसला हुआ है। उत्तर प्रदेश एड्स नियंत्रण संगठन जेल अस्पतालों के चिकित्सकों को विशेष प्रशिक्षण देकर उनके माध्यम से एचआइवी संक्रमित कैदियों को एंटी रेट्रोवाइरल ट्रीटमेंट दिलाना सुनिश्चित करेगा।
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Wednesday, 27 January 2016

बिना फीस जमा किये बीटेक करेंगे दिव्यांग


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-बड़ी राहत-
-प्रवेश के समय शुल्क जमा करने से मिलेगी मुक्ति
-कानपुर के डॉ.अंबेडकर इंस्टीट्यूट से शुरुआत
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश में दिव्यांग अब बिना फीस जमा किये बीटेक कर सकेंगे। उन्हें प्रवेश के समय शुल्क जमा करने से मुक्ति मिलेगी। इसकी शुरुआत कानपुर के डॉ.अंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी फॉर हैंडीकैप्ड से हो रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मन की बात में दिव्यांगों की चिंता किये जाने और वाराणसी में विशेष आयोजन कर दिव्यांगों की मदद करने के बाद देश भर में दिव्यांगों के पक्ष में वातावरण बन रहा है। प्रदेश सरकार भी अब उनकी पढ़ाई का बोझ कम करने में जुट गयी है। दिव्यांगों को बीटेक करने के लिए अब शुरुआत में फीस जुटाने की मशक्कत से निजात दिला दी जाएगी। तय हुआ है कि शुल्क प्रतिपूर्ति के दायरे में आने वाले दिव्यांगों को अब प्रवेश के समय कोई शुल्क नहीं देना होगा। उन्हें सीधे प्रवेश दे दिया जाएगा और उनकी शुल्क प्रतिपूर्ति शासन स्तर पर हो जाएगी। इसकी शुरुआत कानपुर के डॉ.अंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी फॉर हैंडीकैप्ड से हो रही है। इसके बाद अन्य सरकारी कालेजों में भी इस योजना के अमल का प्रस्ताव है।
राजकीय इंजीनियङ्क्षरग कालेजों में अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्र-छात्राओं को प्रवेश के समय कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है। उन्हें बिना फीस जमा किये, प्रवेश मिल जाता है और बाद में शासन स्तर से उनकी शुल्क प्रतिपूर्ति संबंधित कालेज को कर दी जाती है। दो लाख से कम आय वर्ग वाले परिवारों के सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को भी छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के माध्यम से उनके द्वारा जमा की गयी फीस वापस मिल जाती है। अभी दिव्यांगों के मामले में यही नियम लागू है। कानपुर के डॉ.अंबेडकर इंस्टीट्यूट की स्थापना ही दिव्यांगों के लिए विशेष रूप से हुई थी। वहां डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में दिव्यांगों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता और शासन से सीधे अनुदान मिलता है। बीटेक पाठ्यक्रम शुरू होने पर वहां अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्र-छात्राओं से तो शुल्क नहीं लिया जा रहा था, पर दिव्यांगों से पूरा शुल्क जमा कराया जा रहा है। प्रमुख सचिव (प्राविधिक शिक्षा) मुकुल सिंघल के मुताबिक अगले शैक्षिक सत्र से शुल्क प्रतिपूर्ति के दायरे में आने वाले दिव्यांगों को भी शुरुआत में कोई शुल्क नहीं देना होगा। वे बिना फीस जमा किये बीटेक करेंगे। इस बाबत आए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गयी है। डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय के कुलपति विनय पाठक ने बताया कि इसे अन्य कालेजों में दिव्यांग कोटे से प्रवेश पाने वाले छात्र-छात्राओं के लिए भी लागू किया जाएगा।

Sunday, 24 January 2016

सरकारी अस्पतालों की जांच रिपोर्ट अब ऑनलाइन


-प्रदेश के 40 जिला अस्पतालों में हुई शुरुआत, 25 हजार को लाभ
-तीन माह में दस और चिकित्सालयों को जोडऩे की हो रही तैयारी
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डॉ.संजीव, लखनऊ : प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में होने वाली पैथोलॉजी व अन्य जांच रिपोर्टें अब ऑनलाइन उपलब्ध होंगी। इसकी शुरुआत 40 जिला अस्पतालों से की गयी है। स्वास्थ्य विभाग तीन माह में दस और चिकित्सालयों को जोडऩे की तैयारी कर रहा है।
उत्तर प्रदेश हेल्थ सिस्टम स्ट्रेंथनिंग परियोजना (यूपीएचएसएसपी) के अंतर्गत 40 जिला पुरुष, महिला या संयुक्त अस्पतालों में निजी क्षेत्र की मदद से हाई-एंड लैबोरेटरी टेस्ट्स की शुरुआत दो दिसंबर से की गयी है। परियोजना निदेशक आलोक कुमार के मुताबिक इन अस्पतालों में मरीजों को नि:शुल्क पैथोलॉजी परीक्षणों का लाभ मिलना शुरू हो गया है। मरीजों को हाई एंड कोडिंग के साथ पर्ची मिलती है। उसमें उनकी रिपोर्ट मिलने का समय लिखा होता है। उस समय के साथ ही उनकी पूरी जांच रिपोर्ट पेशेंट डायग्नोस्टिक इनफॉर्मेशन सिस्टम पर अपलोड कर दी जाती है। इसके बाद मरीज अपने जिले और नाम के साथ रिपोर्ट देख सकते हैं। वे अपने पेशेंट आइडी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। वे चाहें तो अस्पताल जाए बिना रिपोर्ट का प्रिंटआउट भी निकाल सकते हैं। फॉलोअप के लिए यह रिपोर्टें    सुरक्षित भी रहेंगी। फिलहाल इतना लोड नहीं है, किन्तु बाद में भी इन रिपोट्र्स को कम से कम एक साल सुरक्षित रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होंने बताया कि पचास दिनों में 25 हजार से अधिक लोग इस सुविधा का लाभ उठा चुके हैं। चालीस अस्पतालों में इस सुविधा के लागू होने के बाद अब दूसरे चरण में तीन माह में दस और अस्पतालों में यह सुविधा मुहैया हो जाएगी। इनमें राजधानी के राम मनोहर लोहिया संस्थान, झलकारी बाई अस्पताल व लोकबंधु अस्पताल के साथ आगरा, गाजियाबाद, मेरठ, आजमगढ़, फैजाबाद, कानपुर व वाराणसी के नए अस्पताल भी शामिल किये जाएंगे। इसके लिए प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसके बाद अगले वित्तीय वर्ष में राज्य के अन्य जिला अस्पतालों से शुरुआत कर बड़े अस्पतालों में पैथोलॉजी परीक्षण रिपोर्ट की ऑनलाइन उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।
इन जिलों से शुरुआत
बांदा, अलीगढ़, वाराणसी, कानपुर, मेरठ, झांसी, फतेहपुर, जौनपुर, रामपुर, इलाहाबाद, गोरखपुर, इटावा, लखनऊ, सुलतानपुर, गौतमबुद्ध नगर, बस्ती, मीरजापुर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, आगरा, हमीरपुर, मथुरा, बदायूं, उन्नाव, फैजाबाद, मैनपुरी, मुरादाबाद, बहराइच, कुशीनगर, गोंडा, बरेली, अंबेडकर नगर, हरदोई, कन्नौज, आजमगढ़, रायबरेली
हल्के हरे एप्रेन वाले मैनेजर!
यदि आप किसी सरकारी अस्पताल में जाएं और वहां हल्के हरे एप्रेन पहले कोई सर या मैडम मिल जाएं तो आप उनसे अस्पताल की गंदगी से लेकर अन्य समस्याओं की शिकायत बेझिझक कर सकते हैं। ये हॉस्पिटल मैनेजर आपकी समस्याओं का तत्काल समाधान सुनिश्चित कराएंगे। यूपीएचएसएसपी के परियोजना निदेशक आलोक कुमार ने बताया कि 40 में से 28 जिलों में हमें हॉस्पिटल मैनेजर मिल गए हैं। इनमें से कई एमबीबीएस के बाद मास्टर्स इन हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन कोर्स करके आए हैं। उनका कामकाज उत्साह जनक है और शासन स्तर पर सभी  जिला अस्पतालों में इन मैनेजर्स की नियुक्ति को हरी झंडी मिल गयी है। 

Friday, 22 January 2016

इंजीनियरिंग कालेजों में विभागवार होगा आरक्षण


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-दूर होंगे आरक्षण को लेकर भ्रम, तेज होगी भर्ती की प्रक्रिया
-प्रोन्नति व चयन के लिए विभागवार समितियों का हुआ गठन
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों में अब आरक्षण विभागवार लागू किया जाएगा। प्राविधिक शिक्षा विभाग ने इस बाबत शासनादेश जारी कर दिया है। अधिकारियों का मानना है कि इससे आरक्षण को लेकर भ्रम दूर होंगे और भर्ती प्रक्रिया तेज की जा सकेगी।
सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों में आरक्षण को लेकर भ्रम की स्थिति लगातार बनी हुई थी। कालेज को एक इकाई मानते हुए आरक्षण की गणना करने पर विरोध होता था और इस कारण मामले अदालत तक पहुंच रहे थे। प्रमुख सचिव (प्राविधिक शिक्षा) मुकुल सिंघल के मुताबिक सीधी भर्ती के शैक्षणिक पदों पर आरक्षण को लेकर जारी इस गतिरोध पर शासनादेश जारी कर स्थिति स्पष्ट कर दी गयी है। प्राविधिक शिक्षा विभाग के अंतर्गत स्थापित व संचालित शिक्षण संस्थाओं के पद आपस में स्थानांतरणीय नहीं हैं। विभिन्न विभागों के पदों पर नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता का पैमाना भी अलग-अलग है। इस दृष्टि से इन संस्थाओं के पदों का समूहीकरण नहीं किया जा सकता। ऐसे में हर संस्था में विभागवार आरक्षण दिया जाएगा। इसमें कुल पदों की संख्या के अनुरूप आरक्षण प्रतिशत के अनुसार आरक्षण अनुमन्य होगा।
प्रमुख सचिव ने बताया कि इससे शिक्षकों की रुकी भर्ती के काम में रफ्तार आएगी। अब विभागवार पदों की गिनती कर तदनुरूप भर्ती शुरू करने के निर्देश दिये गए हैं। लोक सेवा आयोग को उसी के अनुरूप अधियाचन भेजे जा रहे हैं। तमाम कालेजों में प्रोन्नति के लिए समितियां ही नहीं बनी थीं, जिससे प्रोन्नतियां रुकी थीं। अब विभागवार समितियां गठित कर दी गयी हैं। साथ ही इन सभी से समयबद्ध ढंग से प्रोन्नतियां पूरी करने को कहा गया है। वर्तमान शैक्षिक सत्र के अंत तक यह प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।
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निदेशकों के लिए चयन समिति
प्रमुख सचिव मुकुल सिंघल ने बताया कि राजकीय इंजीनियरिंग कालेजों में निदेशकों के पद रिक्त होने के कारण भी तमाम नीतिगत फैसले लेने में दिक्कत आती है। इस समस्या का समाधान करने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में चयन समिति गठित कर दी गयी है। यह चयन समिति समयबद्ध ढंग से निदेशकों का चयन करेगी। इससे भी फैकल्टी चयन व अन्य कार्यों में रफ्तार आएगी। 

Wednesday, 20 January 2016

स्वाइन फ्लू की दस्तक, हर जिले में आइसोलेशन वार्ड


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-पीएचसी-सीएचसी को लक्षण देखते ही मरीज रेफर करने के निर्देश
-मेडिकल कालेज में आइसीयू अलर्ट, मुफ्त जांच और दवाएं
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
मौसम बदलने के साथ ही प्रदेश में स्वाइन फ्लू ने दस्तक दी है। कानपुर व लखनऊ में स्वाइन फ्लू के मरीजों की पुष्टि होने के साथ ही स्वास्थ्य विभाग ने हर जिले में आइसोलेशन वार्ड स्थापित करा दिये हैं। मेडिकल कालेजों में भी अलग वार्ड के साथ आइसीयू अलर्ट कर दिये गए हैं।
अचानक मौसम के करवट बदलने के साथ ही अस्पतालों में सर्दी व बुखार के मरीजों की संख्या बढ़ गयी है। एच1वी1 संक्रमण के साथ स्वाइन फ्लू का खतरा भी बढ़ा है। कानपुर व लखनऊ में स्वाइन फ्लू का एक-एक मरीज सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में इस बाबत सक्रियता बढ़ गयी है। स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ.योगेंद्र कुमार ने बताया कि हर जिले में एक आइसोलेशन वार्ड स्थापित किया गया है, जो स्वाइन फ्लू के मरीजों के लिए होगा। हर जिला अस्पताल में स्थापित होने वाले इस वार्ड के लिए अलग से डॉक्टर भी मुस्तैद रहेंगे, दवाइयां भी उपलब्ध कराई गयी हैं। जिला अस्पतालों के चिकित्सा अधीक्षकों से जरूरत के अनुरूप दवाइयां खरीद कर रख लेने को कह दिया गया है। प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्वाइन फ्लू के लक्षणों वाले मरीज पहुंचने पर उन्हें तुरंत जिला अस्पताल रिफर किया जाए। जरूरत पर एंबुलेंस मंगाकर उन्हें भेजा जाए।
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि बांदा सहित सभी 14 सरकारी मेडिकल कालेजों में अलग वार्ड के साथ आइसीयू भी अलर्ट कर दिये गए हैं। इनमें वेंटिलेटर, मॉनीटर के साथ पल्स ऑक्सीमीटर की पड़ताल करने के साथ ऑक्सीजन व टेमीफ्लू जैसी दवाओं की सतत उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी प्राचार्यों को सौंपी गयी है। सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों व मेडिकल कालेज प्राचार्यों से स्वाइन फ्लू के मरीज सामने आने पर तुरंत जानकारी प्रदेश मुख्यालय भेजने को कहा गया है।
मेडिकल कालेजों में होगी जांच
राजधानी लखनऊ के किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय व संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के अलावा कानपुर, गोरखपुर, सैफई, आगरा व मेरठ मेडिकल कालेजों में स्वाइन फ्लू की जांच की सुविधाएं उपलब्ध हैं। कन्नौज व अम्बेडकर नगर में भी रियल टाइम पीसीआर मशीनें लग गयी हैं, जल्द ही वहां जांच की सुविधा उपलब्ध होगी। जिन कालेजों में जांच की सुविधा नहीं उपलब्ध है, वहां आने वाले मरीजों के रक्त के नमूने लेकर निकट के मेडिकल कालेज भेजकर उनकी जांच कराई जाएगी।
जच्चा-बच्चा व बुजुर्ग सावधान
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक व बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि स्वाइन फ्लू का सर्वाधिक खतरा गर्भवती महिलाओं, पांच साल से कम उम्र के बच्चों व बुजुर्गों में होता है। इसलिए उन्हें अतिरिक्त सावधान रहना चाहिए। तेज बुखार, जुकाम, सिर दर्द, आंखों में पानी आने, बदन में दर्द होने या तेज सांस चलने जैसी समस्या यदि पांच दिन से अधिक रहे तो तुरंत स्वाइन फ्लू की जांच कराई जानी चाहिए। 

Tuesday, 19 January 2016

सात जिला अस्पतालों में 150 उच्चस्तरीय जांचें निजी क्षेत्र को

-आगरा, गाजियाबाद, मेरठ, आजमगढ़, फैजाबाद, कानपुर व वाराणसी शामिल
-राष्ट्रीय स्तर पर निविदाएं आमंत्रित, शामिल किये जाएंगे सभी जरूरी परीक्षण
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के सात जिला अस्पतालों में डेढ़ सौ उच्चस्तरीय जांचों का काम निजी क्षेत्र को सौंपने का फैसला हुआ है। आगरा, गाजियाबाद, मेरठ, आजमगढ़, फैजाबाद, कानपुर व वाराणसी के जिला अस्पतालों में सभी जरूरी परीक्षणों को शामिल कर आउटसोर्सिंग के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निविदाएं आमंत्रित की गयी हैं।
उत्तर प्रदेश हेल्थ सिस्टम स्ट्रेंथेनिंग प्रोजेक्ट के तहत स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए चिकित्सकीय परीक्षणों को हाई एंड लैबोरेटरी सर्विसेज के हवाले करने का फैसला लिया गया है। मंगलवार को इस बाबत राष्ट्रीय प्रतियोगी निविदा प्रपत्र जारी किया गया। 20 जनवरी से निविदा बिक्री शुरू कर 22 फरवरी तक निविदा प्रपत्र जमा करने का मौका दिया गया है। 22 को ही निविदाएं खोली जाएंगी। तय हुआ है कि राष्ट्रीय स्तर की छवि व कामकाज वाली संस्था को इन अस्पतालों में अपनी पैथोलॉजी लैब स्थापित करनी होगी। वहां कलेक्शन सेंटर भी बनाने होंगे। स्वास्थ्य विभाग ने डेढ़ सौ जांचों की एक सूची भी जारी की है, जो हर जिला अस्पताल में उपलब्ध होगी। इनमें डीएनए व आरएनए जैसी महंगी जांचें तो शामिल की ही गयी हैं, बोनमैरो, प्रेग्नेंसी टेस्ट और यूरीन एल्बुमिन जैसी जांचें भी की जाएंगी। स्वास्थ्य विभाग ने सभी चिकित्सकीय विशेषज्ञताओं की प्रमुख जांचों को इसका हिस्सा बनाया है, ताकि मरीजों को भटकना न पड़े। हर जिला अस्पताल के लिए संबंधित लैब को एक टेरीटरी मैनेजर नियुक्त करना होगा। साथ ही लैब टेक्नीशियन, लैब सुपरवाइजर जैसे पदों की नियुक्ति भी शासन के मापदंडों के अनुरूप करनी होगी। लैब हर माह गंभीर बीमारियों के बारे में रिपोर्ट भी शासन को भेजेगी, जिसमें मलेरिया, टीबी, एचआइवी आदि को शामिल किया गया है। 

12 हजार संस्थानों को नहीं मिलेगी छात्रवृत्ति

-दशमोत्तर शुल्क प्रतिपूर्ति-
-गायब हो गए 18,309 शैक्षिक संस्थानों के 18,87,666 विद्यार्थी
-गुमशुदगी का कारण नहीं बता सकने वाले संस्थान कठघरे में
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के 12 हजार शैक्षिक संस्थानों को इस बार दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति नहीं दी जाएगी। ये संस्थान बीते वर्ष की तुलना में इस बार अचानक छात्र-छात्राओं के गायब हो जाने का जवाब नहीं दाखिल कर सके हैं।
दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की सामान्य पढ़ाई के साथ प्रोफेशनल कोर्स करने के लिए शासन स्तर पर छात्रवृत्ति के साथ शुल्क प्रतिपूर्ति का प्रावधान है। दो लाख रुपये तक वार्षिक आय वाले  अभिभावकों के बच्चों को यह छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति देने का प्रावधान है। कुछ वर्षों में शुल्क प्रतिपूर्ति में तमाम गड़बडिय़ां सामने आने पर इस बार समाज कल्याण विभाग, पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग व अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने आवेदनों की जांच-पड़ताल के स्तर पर ही सख्ती शुरू की तो न सिर्फ छात्र संख्या कम हुई, बल्कि पिछले वर्ष आवेदन करने वालों की तुलना में इस वर्ष आवेदन करने वाले विद्यार्थी आधे से कम रह गए।
वर्ष 2014-15 में 36,45,258 छात्र-छात्राओं के फार्म शैक्षिक संस्थानों ने छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए अग्र्रसारित किये थे। इन्होंने वर्ष 2014-15 में 11वीं या स्नातक या किसी अन्य प्रोफेशनल पाठ्यक्रम के प्रथम वर्ष के विद्यार्थी के रूप में आवेदन किया था। ऐसे में इनमें से उत्तीर्ण होने वाले छात्र-छात्राओं को इस बार वर्ष 2015-16 में पुन: छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन करना था। आंकड़ों के मुताबिक इनमें से इस वर्ष सिर्फ 17,57,592 विद्यार्थियों ने पुन: आवेदन किया है। इस तरह पिछले वर्ष की तुलना में 18,87,666 विद्यार्थियों ने आवेदन ही नहीं किया। यह संख्या पिछले वर्ष आवेदन करने वालों में से 51.78 प्रतिशत है। अधिकारियों के मुताबिक सिर्फ अनुत्तीर्ण छात्र-छात्राओं को ही आवेदन नहीं करना था और 51.78 प्रतिशत छात्र-छात्राओं का अनुत्तीर्ण होना चौंकाता है। इसलिए ऐसे 18,309 शैक्षिक संस्थानों से इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों के पुन: आवेदन न करने के बारे में जवाब तलब किया गया। माना जा रहा है कि पिछले वर्ष आवेदन के समय बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ, जिसमें ये संस्थाएं भी शामिल रही हैं। समाज कल्याण विभाग के उपनिदेशक पीके त्रिपाठी के अनुसार इनमें से महज छह हजार ने ही जवाब दाखिल किया है। अब शेष बारह हजार संस्थानों को छात्रवृत्ति नहीं दी जाएगी। शासनादेश में भी स्पष्ट जिक्र कर दिया गया था कि गड़बड़ी पाए जाने पर संबंधित संस्थान के सभी विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति रोकी जा सकती है। अब उसी के अनुरूप कार्रवाई होगी।

आयुर्वेद, यूनानी व होम्योपैथी दवाओं के लिए केंद्रीय मदद

-हर आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी को 80 हजार व अस्पताल को तीन लाख
-यूनानी में एक लाख व होम्योपैथिक डिस्पेंसरी में 50 हजार की दवाएं
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के आयुर्वेदिक, यूनानी व होम्योपैथी अस्पतालों को दवाओं की कमी से निपटने के लिए केंद्रीय मदद मिली है। केंद्र सरकार ने इन अस्पतालों को तत्काल दवाओं की आपूर्ति के लिए 31.42 करोड़ रुपये मंजूर किये हैं।
ये अस्पताल अन्य अवस्थापना सुविधाओं के साथ दवाओं के संकट से जूझ रहे हैं। इससे निपटने के लिए प्रदेश के आयुष महकमे ने केंद्र सरकार के पास 31.42 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा था, जिसे केंद्र सरकार ने मंजूर कर लिया है। अब आयुष सोसायटी ने इस राशि से दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने का फैसला लिया है। इस समय प्रदेश में 2116 आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी चल रही हैं। हर डिस्पेंसरी को 80 हजार रुपये की दवाएं मिल जाएंगी। इसी तरह 15 व 25 बेड वाले 136 आयुर्वेदिक अस्पतालों को तीन-तीन लाख रुपये मूल्य की दवाएं आपूर्ति करने का फैसला लिया गया है। 254 यूनानी डिस्पेंसरी संचालित हो रही हैं। इन सभी को एक-एक लाख रुपये की दवाएं मुहैया कराई जाएंगी। इसी तरह सभी 1575 होम्योपैथी डिस्पेंसरी में 50-50 हजार रुपये की दवाएं पहुंचाने के निर्देश दिये गए हैं, ताकि मरीजों को निराश न लौटना पड़े।
स्कूल जाएंगे आयुष चिकित्सक
राज्य आयुष सोसायटी ने दस जिलों के दो-दो ब्लाकों के प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में आयुष चिकित्सकों को भेजकर बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण कराने का फैसला लिया है। सोमवार को इसकी प्रायोगिक शुरुआत राजधानी लखनऊ के मोहनलालगंज ब्लाक स्थित भदसेवा गांव के प्राथमिक विद्यालय से हुई। आयुर्वेदिक, यूनानी व होम्योपैथी चिकित्सकों ने 171 बच्चों का परीक्षण किया। चिकित्सा शिक्षा विभाग की विशेष सचिव कुमुदलता श्रीवास्तव ने बताया कि दस जिलों से शुरुआत करने के बाद इसे प्रदेश के अन्य जिलों में भी लागू किया जाएगा।
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ड्राइवर 6954, 1090 को दिखता कम


-परिवहन निगम की जांच में 15 फीसद चालकों की आंखें खराब मिलीं
-1090 को घर बिठाया, पूरा इलाज कराए बिना नहीं बहाल होगी नौकरी
डॉ.संजीव, लखनऊ
आप यूपी रोडवेज की बस से यात्रा करने जा रहे हैं तो सावधान! हो सकता है कि आप जिस बस में सवार हुए हों, उसके ड्राइवर को कम दिखाई देता हो। रोडवेज की अपनी जांच-पड़ताल तो यही कहती है। हाल ही में अभियान चलाकर 6954 बस चालकों की आंखों की जांच की गयी तो उनमें से 1090 की रोशनी कम निकली। 15 फीसद से अधिक चालकों की आंखें कमजोर देखकर रोडवेज प्रबंधन ने इन सभी को घर बिठाने के साथ स्पष्ट कर दिया है कि पूरा इलाज कराए बिना नौकरी बहाल नहीं होगी।
उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम प्रदेश व आसपास के राज्यों के लिए नौ हजार बसों का संचालन करता है। इनके लिए दस हजार चालक तैनात हैं। आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं के मद्देनजर बीते माह हर क्षेत्रीय कार्यालय में अभियान चलाकर चालकों का नेत्र परीक्षण कराया गया। इसमें देखा गया था कि छह मीटर दूर तक चालकों को स्पष्ट दिखना चाहिए। साथ ही गाड़ी चलाते हुए विजन का परीक्षण भी किया गया। अब परीक्षण के परिणाम चौंकाने वाले आए हैं। निगम के प्रबंध निदेशक के. रविन्द्र नायक के मुताबिक अभियान में कुल 6954 चालकों की आंखों का परीक्षण किया गया। इनमें से 1090 चालकों की आंखें अत्यधिक कमजोर मिलीं। ये किसी भी हाल में बस चलाने की स्थिति में नहीं हैं। इनमें से 1041 का तो उपचार संभव है, किन्तु 49 तो चिकित्सकों द्वारा पूरी तरह अक्षम करार दिये गए हैं। अब इन सभी चालकों को ड्यूटी से हटाकर घर बिठा दिया गया है। इनसे इलाज कराने को कहा गया है। स्पष्ट कर दिया गया है कि बिना पूरा इलाज कराए उन्हें ड्यूटी पर वापस नहीं लिया जाएगा। दरअसल 1041 चालक ऐसे हैं, जिन्हें इलाज के बाद चश्मा लगाकर दिखने की उम्मीद बनी हुई है। इसलिए इन्हें एक मौका दिया जा रहा है किन्तु ड्यूटी पर लेने से पहले दुबारा न सिर्फ इनका विजन टेस्ट होगा, बल्कि इनसे गाड़ी चलवाकर देखी भी जाएगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाल खराब
इस जांच-पड़ताल में पता चला कि सबसे खराब स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों की है। गाजियाबाद क्षेत्र में सर्वाधिक 226 चालकों की आंखें खराब थीं। आगरा में 132 व बरेली में 103 चालकों को नहीं दिख रहा था। मेरठ क्षेत्र में 72, इटावा में 66, सहारनपुर में 65, मुरादाबाद में 64 व अलीगढ़ में 62 चालकों को बस चलाने भर का नहीं दिखाई दे रहा था।
वाराणसी-नोएडा-देवीपाटन फिट
केवल वाराणसी, नोएडा व देवीपाटन क्षेत्रों में सभी चालक पूरी तरह फिट मिले। वाराणसी में 281, नोएडा में 230 व देवीपाटन में 102 चालकों का परीक्षण हुआ और सभी को पूरी तरह दिखाई दे रहा था। गोरखपुर में भी 335 में से महज दो और हरदोई में 354 में तीन चालकों की आंखें खराब मिलीं। इलाहाबाद क्षेत्र में 210 में से सिर्फ 25 चालकों की आंखों की रोशनी कम थी, वहीं बांदा क्षेत्र में 119 में से 13 की आंखें कमजोर थीं।
अक्षमता में कानपुर रहा अव्वल
पूरी तरह अक्षम होने के बावजूद बसें चलाने के सर्वाधिक 37 मामले कानपुर में मिले। इस तरह के कुल मिले 49 मामलों में से 70 फीसद से अधिक कानपुर क्षेत्र के ही थे। कानपुर में 292 चालकों का परीक्षण हुआ, जिनमें से 185 ही पूरी तरह फिट पाए गए। इसके लिए कानपुर क्षेत्र के अधिकारियों को भी चेतावनी दी गयी है। इसके अलावा मेरठ, मुरादाबाद, हरदोई व झांसी क्षेत्रों में तीन-तीन और इटावा में एक व अलीगढ़ में दो चालक इस श्रेणी के मिले। झांसी में कुल 271 में से 249 चालक फिट मिले।

Saturday, 9 January 2016

चार मेडिकल कालेजों को केंद्र की मंजूरी, एक फंसा


-फैजाबाद, शाहजहांपुर, फीरोजाबाद व बस्ती को मिली हरी झंडी
-दस किलोमीटर से ज्यादा दूर अस्पताल के कारण बहराइच लंबित
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में केंद्रीय मदद से प्रस्तावित पांच मेडिकल कालेजों में से चार को केंद्र सरकार से मंजूरी मिल गयी है। फैजाबाद, शाहजहांपुर, फीरोजाबाद और बस्ती के कालेजों को मंजूरी के साथ ही बहराइच के कालेज को तकनीकी कारणों से रोक दिया गया है। चिकित्सा शिक्षा विभाग विसंगति दूर करने के प्रयासों में जुटा है।
केंद्र सरकार ने विशेष आर्थिक सहायता देकर पूरे देश में 50 नए मेडिकल कालेज खोलने का प्रस्ताव किया है। इनमें से पांच मेडिकल कालेज उत्तर प्रदेश में खोले जाने हैं। इनके निर्माण व संचालन में आने वाले खर्च का 70 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी और शेष 30 प्रतिशत की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश सरकार की होगी। प्रदेश सरकार ने बहराइच, फैजाबाद, शाहजहांपुर, फीरोजाबाद व बस्ती में मेडिकल कालेज खोलने का प्रस्ताव किया था। इसमें तय हुआ है कि इन जिलों के जिला अस्पतालों को मेडिकल कालेज से संबद्ध कर मेडिकल कालेज अस्पताल का दर्जा दे दिया जाएगा। इसे प्रदेश सरकार अपने हिस्से के तीस फीसद खर्चे में समायोजित करेगी। इस तरह नये मेडिकल कालेज की स्थापना केंद्र सरकार के धन से ही हो जाएगी।
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय ने इन सभी प्रस्तावित मेडिकल कालेजों की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) बनाकर भेजी थी। इनमें से फैजाबाद, शाहजहांपुर, फीरोजाबाद और बस्ती के मेडिकल कालेजों को केंद्र सरकार से हरी झंडी भी मिल गयी है। सिर्फ बहराइच का प्रस्तावित मेडिकल कालेज फंसा है। भारतीय चिकित्सा परिषद के नए मानकों के अनुसार मेडिकल कालेज के दस किलोमीटर परिधि के भीतर अस्पताल होने पर संबंधित संस्थान को मंजूरी दे दी जाती है। अन्य जिलों के प्रस्तावित मेडिकल कालेज परिसर जिला अस्पताल से दूर नहीं हैं। बहराइच का प्रस्तावित परिसर जिला अस्पताल से दस किलोमीटर से अधिक दूरी पर है। इस कारण उसे अभी मंजूरी नहीं मिली है। इस संबंध में प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने बताया कि जिन चार मेडिकल कालेजों को मंजूरी मिली है, उनके जमीन आदि के कागजात भेजकर जल्द ही उन्हें धरातल पर लाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। बहराइच में अस्पताल दूर होने का तर्क रखा गया है। प्रतिवेदन देकर इस समस्या का समाधान खोजा जाएगा। अस्पताल से निर्धारित दूरी पर जमीन भी तलाशी जाएगी।
एक कालेज पर 500 करोड़ खर्च
एक मेडिकल कालेज बनाने में औसत खर्च 500 करोड़ रुपये के आसपास आने की उम्मीद है। केंद्र से इस राशि का बड़ा हिस्सा मिल जाने से इनका निर्माण आसान हो जाएगा। हाल ही में बने या निर्माणाधीन कालेजों की बात करें तो सहारनपुर मेडिकल कालेज के लिए 510 करोड़, बांदा के लिए 404 करोड़, जालौन के लिए 388 करोड़, बदायूं के लिए 542 करोड़, आजमगढ़ के लिए 497 करोड़, अम्बेडकर नगर के लिए 496 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गयी है।

Thursday, 7 January 2016

ग्रामीण व सहकारी बैंक खाताधारकों की छात्रवृत्ति फंसी


-आइएफएससी कोड न होने के कारण खारिज हो रहे आवेदन
-नए सिरे से समाधान की कोशिश में समाज कल्याण विभाग
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: ग्रामीण व सहकारी बैंकों में खाता खोलने वाले ग्रामीण क्षेत्रों के दो लाख विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति मिलने के रास्ते में संकट आ रहा है। यह समस्या उनका आइएफएससी कोड न होने के कारण पैदा हुई है। अब समाज कल्याण विभाग बैंकों से विचार विमर्श कर समाधान की कोशिश में है।
समाज कल्याण विभाग, पिछड़ा वर्ग विभाग व अल्पसंख्यक कल्याण विभागों में इस समय भारी संख्या में वे छात्र-छात्राएं पहुंच रहे हैं, जिनकी छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। दरअसल सब कुछ ठीक होने के बावजूद लगभग दो लाख छात्र-छात्राएं ऐसे हैं, जिनकी छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के आवेदन महज बैंकों के आइएफएससी कोड न होने या सही न होने के कारण रिजेक्ट हो गए हैं। ध्यान रहे, ग्र्रामीण बैंकों व सहकारी बैंकों को अभी सीधे आइएफएससी कोड एलॉट नहीं होता है। ग्र्रामीण बैंकों के मामले में तो वे उस बैंक के पोषक बैंक के आइएफएससी कोड से काम चलाते हैं। सहकारी बैंकों में भी किसी अन्य राष्ट्रीयकृत बैंक के आइएफएससी कोड को दर्ज किया जाता है, जिसे छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का साफ्टवेयर स्वीकार नहीं कर रहा है।
ग्र्रामीण व सहकारी बैंकों में खाताधारक अधिकांश छात्र-छात्राएं ग्र्रामीण पृष्ठभूमि के हैं। हाल ही में जब भारी संख्या में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति आवेदन निरस्त हुए तो अन्य कारणों के अलावा दो लाख फार्म गलत आइएफएससी कोड के कारण रद हो गए। छात्र-छात्राएं निदेशालय आए, तो उन्हें वापस जिला कार्यालय भेज दिया गया। वे जिला कार्यालय पहुंचे तो वहां से इसे इंटरनेट व एनआइसी का मसला बताकर टाल दिया गया। बीते एक सप्ताह से तीनों कार्यालयों में ऐसे छात्र-छात्राएं भारी संख्या में नजर आ रहे हैं। तब कहीं जाकर समाज कल्याण विभाग व पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग सक्रिय हुआ।
समस्या समाधान की कोशिश
पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के उपनिदेशक शैलेश श्रीवास्तव के मुताबिक आइएफएससी कोड्स बैंक के नाम से शुरू होते हैं, इसलिए बैंक और कोड अलग होने के कारण रिजेक्ट हो रहे हैं। इसमें विद्यार्थी की गलती नहीं है, इसलिए अब इसका समाधान खोजा जा रहा है। छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का काम देख रहे समाज कल्याण विभाग के उपनिदेशक एसके त्रिपाठी के मुताबिक लगभग दो लाख छात्र-छात्राओं के आइएफएससी कोड सही कराए जा रहे हैं, ताकि उन सभी को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति दिलाई जा सके। जिला स्तर पर भी ऐसी किसी समस्या पर तत्काल प्रतिवेदन लेकर कार्रवाई के निर्देश दिये गए हैं। 

उप्र में भी दस साल से मिलें मुफ्त सेनेटरी नैपकिन

-सीएफएआर ने की संस्तुति-
-अब नौ वर्ष की आयु में भी होने लगे बालिकाओं को पीरियड्स
-राजस्थान ने की शुरुआत, यहां भी उम्र आधारित हो वितरण
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : राजस्थान की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी दस साल की उम्र में मुफ्त सेनेटरी नैपकिन बांटने की शुरुआत की जानी चाहिए। प्रदेश के 25 उच्च प्राथमिकता वाले जिलों में स्वास्थ्य विभाग के साथ काम कर रही संस्था सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च (सीएफएआर) ने इस आशय की संस्तुति की है।
उत्तर प्रदेश में कक्षा छह से बारह तक की छात्राओं को मुफ्त सेनेटरी नैपकिन बांटने की शुरुआत हाल ही में की गयी है। अब सीएफएआर ने इसे कक्षा की जगह उम्र आधारित बनाकर दस वर्ष से अधिक आयु की सभी छात्राओं को इस परिधि में लाने की मांग की है। सीएफएआर की अधिशासी निदेशक अखिला शिवदास के मुताबिक पूरे देश में छात्राओं को पीरियड्स की शुरुआती आयु में बदलाव आया है। पहले 13 वर्ष की आयु में बालिकाओं को पीरियड्स शुरू होते थे। इसके बाद 11 वर्ष की आयु में इसकी शुरुआत हुई और अब नौ वर्ष आयु तक में पीरियड्स की शुरुआत हो जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर यह तथ्य स्वीकारा जा चुका है कि खानपान में बदलाव व हारमोंस की जटिलताओं के कारण यह स्थितियां उत्पन्न हुई हैं। इस बदलाव के बाद राजस्थान सहित कुछ राज्यों ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है। राजस्थान ने मुफ्त सेनेटरी नैपकिन बांटने के लिए दस वर्ष की न्यूनतम आयु निर्धारित की है। उत्तर प्रदेश सरकार को भी इसी तर्ज पर उम्र आधारित नैपकिन वितरण सुनिश्चित कराना चाहिए। प्रदेश के जिन 25 उच्च प्राथमिकता वाले जिलों में सीएफएआर काम कर रहा है, वहां से भी लगातार यही फीडबैक मिल रहा है कि इस समय सेनेटरी नैपकिन की उपलब्धता सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रही है। स्कूलों में वितरण तो शुरू हुआ है, फिर भी तमाम बालिकाएं स्कूल जाती ही नहीं हैं या फिर वे चौथी-पांचवीं में पढ़ रही होती हैं, तभी पीरियड्स शुरू हो जाते हैं। आशा व एएनएम को सस्ते नैपकिन बांटने का जिम्मा दिया गया है किन्तु वह भी पर्याप्त साबित नहीं हो रहा है। इसीलिए वर्ष 2016 में सीएफएआर ने अपने लक्ष्य के रूप में सेनेटरी नैपकिन की उपलब्धता को फोकस किया है।

खींचतान की भेंट चढ़ा भाजपा का संगठन महापर्व

- 69 जिला इकाइयों में चुनाव प्रक्रिया के बाद भी अध्यक्ष अघोषित
-16 जिलों में दस से अधिक नामांकन, प्रदेश समिति करेगी फैसला
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : भारतीय जनता पार्टी का संगठन महापर्व खींचतान की भेंट चढ़ रहा है। हालात ये हैं कि 69 जिला इकाइयों में चुनाव प्रक्रिया के बाद भी अध्यक्ष अघोषित हैं और प्रदेश चुनाव समिति से उनकी घोषणा की जाएगी। अध्यक्ष बनने की मारामारी इस कदर है कि कई जिलों में 50 से अधिक लोग अध्यक्ष बनना चाह रहे हैं। 16 जिलों में दस से अधिक नामांकन हुए हैं।
भाजपा संगठन चुनाव को महापर्व की संज्ञा देती है। इस बार भी इन चुनावों को विधानसभा चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं की एकजुट करने का माध्यम करार दिया गया था। संगठन की सोच के विपरीत जमीन पर चुनाव की शुरुआत हुई तो स्थितियां बिल्कुल विपरीत हो गयीं। एटा में तो फायङ्क्षरग हो गयी, वहीं लखनऊ में 76 लोगों ने नामांकन करा दिया। आधा दर्जन जिलों में अध्यक्ष बनने की इच्छा रखने वाले स्थानीय नेताओं की संख्या 50 के ऊपर बतायी गयी है। इस मारामारी के चलते प्रदेश चुनाव समिति जिलों में मतदान कराने से बची और आम सहमति के नाम पर नामांकन कराकर सभी नाम लखनऊ मंगा लिये गए। तय हुआ है कि अब लखनऊ से ही जिलाध्यक्षों की घोषणा की जाएगी। पार्टी के ही नेता इसे आंतरिक लोकतंत्र की हत्या करार दे रहे हैं किन्तु औपचारिक रूप से कुछ बोलने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। उनका कहना है कि जिलाध्यक्षों की घोषणा के बाद हर जिले में अंतर्विरोध मुखर होकर सामने आएगा।
बीते वर्ष पार्टी ने ऑनलाइन व मोबाइल तक से सदस्यता देने की मुहिम शुरू की तो प्रदेश में दो करोड़ से ऊपर सामान्य सदस्य बन गए। इसी तरह 70 हजार से ऊपर सक्रिय सदस्य बनाए गए। इन सदस्यों से 1,39,000 बूथ इकाइयों के चुनाव होने थे। वहीं सक्रिय सदस्य मंडल व जिला इकाइयों के लिए चुनाव लड़ सकते थे। प्रदेश के चुनाव प्रभारी सांसद महेंद्र नाथ पाण्डेय भी स्वीकार करते हैं कि भारी संख्या में कार्यकर्ता संगठन चुनाव में आगे आए हैं। 16 जिलों में अध्यक्ष बनने के लिए दस से अधिक नामांकन सामने आए हैं। गुरुवार तक 69 जिला इकाइयों की चुनाव प्रक्रिया पूरी हो गयी है। जिलों में ही परिणाम घोषित न किये जाने पर उनका कहना है कि चुनाव अधिकारियों व पर्यवेक्षकों ने निर्वाचन मंडल से बात कर अभिमत जाना है और तदनुसार अपनी रिपोर्ट दी है। 12 जनवरी तक सभी जिलों की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। उसके बाद प्रदेश समिति जिलाध्यक्षों की घोषणा कर देगी। उन्होंने दावा किया कि केवल भाजपा ही चुनाव आयोग की मंशा के अनुरूप आंतरिक लोकतंत्र के साथ चुनाव कराती है, फिर भी लोग अनावश्यक सवाल खड़े करते हैं।
प्रदेश अध्यक्ष चुनाव का इंतजार
उत्तर प्रदेश में कुल 90 जिला इकाइयां हैं। इनमें से आधी के चुनाव हो जाने के बाद प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव हो सकता है। प्रदेश चुनाव समिति ने इन मापदंडों के पूरा होने की जानकारी केंद्रीय चुनाव समिति को दे दी है। अब केंद्रीय चुनाव समिति प्रदेश अध्यक्ष चुनाव की तारीख घोषित करेगी।

Wednesday, 6 January 2016

अब जच्चा-बच्चा की पड़ताल का अभियान

-ऑनलाइन सहेजी जाएगी आठ फरवरी से सात मार्च तक की मुहिम
-गर्भवती महिलाओं व पांच साल तक के बच्चों की होगी पूरी ट्रैकिंग
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : स्वास्थ्य विभाग अगले महीने जच्चा-बच्चा की पड़ताल के लिए विशेष अभियान शुरू करेगा। इसके अंतर्गत एक माह तक प्रदेश की सभी गर्भवती महिलाओं और पांच साल तक के बच्चों की जानकारी एकत्र कर उसे ऑनलाइन सहेजा जाएगा। गर्भावस्था के दौरान जरूरी चिकित्सकीय सहायता व बच्चों के टीकाकरण की ट्रैकिंग भी की जाएगी।
स्वास्थ्य विभाग 27 जनवरी से पांच फरवरी तक मातृत्व सप्ताह का आयोजन कर रहा है। इसके बाद आठ फरवरी से सात मार्च तक मातृ एवं शिशु ट्रैकिंग सिस्टम (एमसीटीएस) को मजबूत करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने इस बाबत आदेश जारी कर कहा है कि इस दौरान हर जिले में सभी गर्भवती महिलाओं व पांच वर्ष तक के बच्चों का पंजीकरण किया जाएगा। इनमें उन महिलाओं को अलग से चिह्नित किया जाएगा, किनकी गर्भावस्था को गंभीर मानकर उनके लिए विशेषज्ञ प्रसव की आवश्यकता होगी। इसके अलावा ढाई किलोग्राम से कम वजन वाले बच्चों को भी चिह्नित किया जाएगा। जिला स्तर पर जिलाधिकारी स्वयं अभियान पर नजर रखेंगे और ब्लाक स्तर के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की बैठकों में स्वयं मौजूद रहेंगे। अभियान के दौरान गर्भवती महिलाओं की एएनसी सेवाओं की रिपोर्टिंग, प्रसव में जटिलता व रक्तअल्पता वाली गर्भवती महिलाओं की ट्रैकिंग एवं कम वजन वाले बच्चों की ट्रैकिंग के लिए ब्लाक स्तर पर आंकड़े ऑनलाइन अपडेट किये जाएंगे। साथ ही जच्चा-बच्चा के रक्त में हीमोग्लोबिन सात से कम होने पर उसे सतर्कता सूची में डाल दिया जाएगा।
...तो घट जाएगा बजट
अभियान के लिए जारी शासनादेश में लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सतर्क रहने को कहा गया है। बताया गया है कि एमसीटीएस पोर्टल में लक्ष्य के अनुरूप आंकड़े अपडेट न होने पर केंद्र सरकार वर्ष 2016-17 के बजट में पांच प्रतिशत की कटौती कर लेगी। इसलिए लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लक्ष्य न पूरा कर पाने वाले जिलों के प्रभारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी, वहीं सबसे अधिक लक्ष्य प्राप्त करने वाले पांच जिलों को पुरस्कृत किया जाएगा।

Tuesday, 5 January 2016

बढ़े दो डग, टूटे बाधाओं के बंधन


डॉ.संजीव, लखनऊ
जनसंख्या वृद्धि के साथ उसका नियोजन चुनौती है तो गांव-गांव तक आशा व एएनएम इस चुनौती से जूझ रही हैं। आशा व एएनएम ग्र्रामीण इलाकों में सरकार की पहली संदेश वाहक हैं। उन्हें तमाम समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है किंतु उनके बढ़ते कदम बाधाओं के बंधन तोड़ रहे हैं।
बहराइच के मिहिपुरवा ब्लॉक का फकीरपुरी गांव सीमा पर भारत का अंतिम गांव है। यहां पहुंचने के लिए 43 किलोमीटर का घना जंगल पार करना पड़ता है। थारू जनजाति की आबादी वाले इस गांव में जनसंख्या नियोजन की अलख जगाना बेहद मुश्किल था किन्तु इसे वहां आशा के रूप में तैनात हुई प्रेम कुमारी ने कर दिखाया है। प्रेम कुमारी 17 साल की उमर में ब्याह कर ससुराल आयीं तो कुछ दिन बाद ही आशा के रूप में गांव की सभी महिलाओं की जिम्मेदारी मिल गयी। महिलाओं व उनके बच्चों के नियोजन की पहल में कदम बढ़ाए तो परम्पराओं व मान्यताओं की बेडिय़ां आड़े आने लगीं। आशा के रूप में हमें लोगों को जागरूक करने, जनसंख्या नियोजन को स्वीकारने के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। महिलाएं तैयार ही नहीं होती थीं। कई बार उनके पति ही उन्हें भड़का देते थे। पांच साल पहले जब दूसरे बच्चे की मां बनी, तो गांव वालों ने कहना शुरू किया दूसरों को तो कहती हो, खुद क्यों नहीं ऑपरेशन कराती। प्रेम कुमारी ने ऑपरेशन कराया। खुद ऑपरेशन के बाद उन्होंने ज्यादा बच्चे न होने का संदेश दिया और लोग बदलने लगे। अब महिलाएं उनके साथ खड़ी रहती हैं और असर भी दिख रहा है। बच्चे स्वस्थ हैं और उनके टीकाकरण से लेकर इलाज तक की पूरी चिंता होती है।
महिपुरवा ब्लॉक की ही एएनएम सुमित्रा राय का काम भी चुनौती भरा रहा है। उनके जिम्मे अम्बावर्दिया व चहलवां गांव हैं। वहां तक पहुंचने में इन्हें आठ किलोमीटर तक पैदल जाना पड़ता था। वे गांवों जातीं तो विरोध शुरू हो जाता। जंगल से भरे इलाके में बमुश्किल पहुंचने के बाद भी विरोध का सामना करने के लिए उन्हें चूल्हे तक संपर्क की रणनीति अपनाई। वे घर-घर संवाद करने लगीं। वे बीमारियों के बारे में बतातीं और लोग दरवाजे बंद करते तो कई बार बाहर से ही चिल्लाते हुए जानकारी देने लगतीं। धीरे-धीरे अस्वीकार्यता का कोहरा छंटा और लोग उनसे जुडऩे लगे। टीकाकरण के साथ अस्पताल में प्रसव के फायदे बताए तो लोग उसका हिस्सा बनने लगे। अब तो वे खुद पूरी तरह अपडेट रहती ही हैं, दोनों गांवों के लोगों को भी अपडेट रखती हैं। कभी बेगानेपन से शुरू हुआ गांव वासियों से उनका रिश्ता अब अपनेपन के साथ पारिवारिक रूप ले चुका है। पिछले दिनों प्रमोशन कर जब उन्हें हेल्थ विजिटर बना दिया गया, फिर भी वे एएनएम का काम कर रही हैं। आठ किलोमीटर पैदल जाने से बचने का रास्ता भी हाल ही में दुपहिया वाहन खरीदने के कारण बंद हुआ किंतु वे आज भी गांव के एक कोने में गाड़ी खड़ी कर दोनों गांवों के लोगों से सीधे जुड़ी रहती हैं।
हम गरीब हैं, बच्चा तो न गरीब हो
प्रेमकुमारी कहती हैं कि बच्चों को लेकर जिम्मेदारी का भाव हर मां में होता है। नियोजन के अपने अभियान में उन्होंने इसी को आधार बनाया। हर मां से कहा, हम गरीब हैं तो क्या हुआ, कम से कम कुछ ऐसा करें कि बच्चा हमसे गरीब न हो। असर भी हो रहा है और लोग कदम दर कदम साथ दे रहे हैं। कई बार पति और परिवार के अन्य सदस्य विरोध भी करते हैं तो महिलाएं आगे आ जाती हैं। वे बच्चों के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती हैं।
पुरुषों को समझाकर महिलाओं तक पैठ
26 साल से एएनएम के रूप में काम कर रही सुमित्रा राय का कहना है कि लोगों को तैयार करने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। अब तो फिर भी लोग बात सुनते हैं, पहले तो लोग देखकर भागते थे। महिलाएं दरवाजे बंद कर लेती थीं और पुरुष मिलने नहीं देते थे। घर के पुरुष सदस्यों को समझाकर शुरुआत की गयी और धीरे-धीरे लोग समझने लगे। अब तो कई बार लोग इंतजार करते हैं और घरों के उन आयोजनों का भी न्योता आता है, जिनमें सिर्फ परिवार के लोग ही बुलाए जाते हैं।

Monday, 4 January 2016

कार्ड से बीमारी खोज डॉक्टर की बात सुनाएंगी आशा


-मोबाइल कुंजी व अकादमी का इस्तेमाल बढ़ाने के निर्देश
-31 जनवरी तक प्रशिक्षण पूरा हो सभी जिलों में प्रशिक्षण
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सात साल की रमा को उल्टी-दस्त हो रहे हैं। अस्पताल दूर है और रमा की मां परेशान। वह भाग कर गांव की आशा कार्यकर्ता के पास पहुंची। आशा कार्यकर्ता ने एक छल्ला निकाला, उसमें फंसे तमाम सारे काड्र्स में से एक कार्ड निकाला। उसमें लिखा नंबर अपने मोबाइल से मिलाया और रमा की मां के कान में लगा दिया। रमा की मां को फोन पर डॉक्टर ने कुछ टिप्स दिये और उनके अनुपालन से रमा की हालत सुधरनी भी शुरू हो गयी।
यह कहानी रमा, उसकी मां और आशा के बीच की है, पर अब इसे पूरे प्रदेश में दोहराने की तैयारी है। आशा कार्यकर्ताओं को मोबाइल कुंजी व अकादमी से जोडऩे के बावजूद प्रशिक्षण के अभाव में वे उसका इस्तेमाल नहीं कर रही हैं। अब स्वास्थ्य विभाग ने हर हाल में 31 जनवरी तक सभी आशा कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण पूरा करने के निर्देश दिये हैं। दरअसल स्वास्थ्य विभाग ने मोबाइल कुंजी के तहत पचास से अधिक काड्र्स का सेट और सिम कार्ड के साथ मोबाइल फोन हर आशा कार्यकर्ता को दिया है। हर कार्ड पर गर्भावस्था, प्रसव, नवजात शिशु की देखभाल, साफ-सफाई और बच्चों की बीमारी से जुड़े समस्याओं व जरूरी सलाह अलग-अलग लिखी हैं। उस समस्या व बीमारी के लिए अलग-अलग नंबर आवंटित किये गए हैं। आशा कार्यकर्ता को वही बीमारी देखकर अपने मोबाइल से नंबर मिलाना होगा, जिसके बाद उधर से पहले से रिकार्ड डॉक्टर की आवाज आती है। डॉक्टर से मिली जानकारी का पालन करने पर लाभ मिलता है। हर कार्ड के पीछे संबंधित बीमारी व समस्या से जुड़ा एक दोहा भी लिखा है, जिसका मतलब भी आशा कार्यकर्ता को पढ़कर समझाना होगा। इस प्रक्रिया को ठीक प्रकार से लागू करने के लिए प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने आदेश जारी कर 31 जनवरी तक हर हाल में सभी आशा कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण पूरा करने के निर्देश दिये हैं। उन्होंने बताया कि 25 उच्च प्राथमिकता वाले जिलों में तो प्रशिक्षण कार्यक्रम का एक दौर पूरा ही हो चुका है, वहां समयबद्ध ढंग से प्रशिक्षण पूरा करने के निर्देश दिये गए हैं। इसके अलावा अन्य जिलों में भी तत्काल प्रशिक्षण शुरू करने के निर्देश दिये हैं। अगले माह से हर हाल में सभी आशा कार्यकर्ता मोबाइल कुंजी व मोबाइल एकेडमी का प्रयोग शुरू कर दें।
संवाद का रिश्ता होगा मजबूत
प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार के अनुसार मोबाइल कुंजी व मोबाइल एकेडमी के प्रचुर प्रयोग से आशा व ग्र्रामीणों के बीच संवाद का रिश्ता और मजबूत होगा। जिन्हें डॉक्टर की सलाह सीधे सुनाई जाती है, उनका इलाज व सलाह के प्रति भरोसा बढ़ता है, वहीं आशा कार्यकर्ता का आत्मविश्वास बढ़ता है। उपचार के अलावा परिवार कल्याण व स्वास्थ्य रक्षा में भी यह प्रक्रिया खासी उपयोगी साबित होगी। 

आयुर्वेद के टेलीमेडिसिन केंद्र से सबका इलाज

-लखनऊ के आयुर्वेदिक कालेज से होगी शुरुआत
-तीन सीमावर्ती केंद्रों से जोड़कर मिलेगी उपचार की सुविधा
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : आयुर्वेदिक चिकित्सा को आधुनिक स्वरूप में सर्वसुलभ बनाने के लिए टेलीमेडिसिन केंद्रों की स्थापना का फैसला हुआ है। आयुष मिशन की पहल पर इसकी शुरुआत राजधानी लखनऊ से हो रही है। यहां से तीन सीमावर्ती केंद्रों को जोड़कर उपचार की सुविधा दिलाई जाएगी।
आयुर्वेद को जनता से सीधे जोडऩे के लिए केंद्रीय आयुष मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश में टेलीमेडिसिन केंद्रों की स्थापना को मंजूरी दी है। प्रदेश आयुष मिशन को इस पूरी योजना की मॉनीटङ्क्षरग का जिम्मा सौंपा गया है। इस योजना के तहत आयुर्वेदिक कालेजों को आधार बनाकर आसपास के जिलों को जोड़ते हुए टेलीमेडिसिन उपचार का नेटवर्क बनाया जाएगा। एक केंद्र पर कुल मिलाकर पचास लाख रुपये खर्च होंगे, जिसमें से 35 लाख रुपये में मुख्य संचार केंद्र विकसित किया जाएगा, वहीं 15 लाख रुपये में आसपास के तीन जिलों में सीमावर्ती केंद्र विकसित किये जाएंगे। इन सीमावर्ती केंद्रों में पहुंचने वाले लोगों की समस्याएं सुनकर ऑनलाइन उन्हें आयुर्वेदिक कालेज स्थित मुख्य केंद्र तक भेजा जाएगा। जरूरत पर वीडियो कांफ्रेंसिंग जैसी सुविधाएं भी मुहैया होंगी, साथ ही मरीजों की जांच रिपोर्ट ऑनलाइन मुख्य केंद्र तक पहुंचेगी। इसके बाद आयुर्वेदिक कालेज के चिकित्सक जो उपचार बताएंगे, उसके अनुरूप इन केंद्रों पर मौजूद विभागीय समन्वयक मरीजों को जानकारी देंगे और उनका पूरा इलाज होगा।
प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय के अनुसार इस योजना की शुरुआत लखनऊ के राजकीय आयुर्वेदिक कालेज को नोडल सेंटर के रूप में विकसित करके की जाएगी। उत्तर प्रदेश राज्य आयुष सोसायटी की कार्यकारी परिषद ने इस योजना को मंजूरी दे दी है। लखनऊ के आयुर्वेदिक कालेज के प्राचार्य से टेलीमेडिसिन केंद्र की स्थापना के लिए आयुष मंत्रालय के दिशा निर्देशों के अनुरूप विस्तृत कार्ययोजना मांगी गयी है। कार्ययोजना का परीक्षण कर काम शुरू कराने के लिए कालेज को पचास फीसद राशि तुरंत जारी कर दी जाएगी। इस टेलीमेडिसिन केंद्र की सफलता के बाद राज्य के अन्य हिस्सों में भी ऐसे ही केंद्र खोलने का प्रस्ताव है, ताकि अधिक से अधिक लोग इस योजना से लाभान्वित हो सकें।

Sunday, 3 January 2016

योजना से बीमारी खत्म, शादी पर जोर

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-पुनर्जीवित होगी पिछड़ा वर्ग विभाग की शादी बीमारी योजना
-विवाह पर सहायता राशि दोगुनी करने का प्रस्ताव
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : पिछड़ा वर्ग विभाग की शादी बीमारी योजना को पुनर्जीवित करने के लिए उससे बीमारी खत्म कर शादी पर जोर देने का प्रस्ताव किया गया है। विभाग गरीब पिछड़ों के विवाह पर सहायता राशि दस हजार से बढ़ाकर 20 हजार करने जा रहा है।
वर्ष 2007-08 से प्रदेश सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे के अन्य पिछड़े वर्ग के परिवारों की पुत्रियों की शादी के लिए दस हजार व गंभीर बीमारी से पीडित लोगों को पांच हजार रुपये अनुदान देने का प्रावधान किया था। वर्ष 2013-14 तक योजना संचालित भी हुई, किन्तु बंद कर दी गयी। इस योजना में वर्ष 2009-10 व 2010-11 में 40-40 करोड़, 2011-12 में 50 करोड़ और 2012-13 में 90.18 करोड़ रुपये खर्च किए गए। वर्ष 2013-14 में 150 करोड़ रुपये मिले, जिसमें 112.49 करोड़ रुपये खर्च कर 1,11,649 लोगों को शादी व 1877 लोगों को बीमारी में अनुदान दिया गया। योजना के अंतिम पांच वर्षों में कुल उपलब्ध 370.33 करोड़ राशि में से 332.66 करोड़ रुपये खर्च कर 3,37,325 लोगों को लाभ पहुंचाया गया। पिछड़ा वर्ग विभाग के सचिव डा.हरिओम के मुताबिक समीक्षा में पाया गया कि यह योजना खासी लोकप्रिय थी, इसलिए इसे नए सिरे से शुरू करने का फैसला हुआ है। दरअसल यह योजना लंबित थी और हर वर्ष इसके लिए टोकेन बजट का भी इंतजाम होता था। अब इसे अगले वर्ष से नए प्रारूप में शुरू किया जाएगा। इस बाबत विस्तृत प्रस्ताव शासन को भेजा जा रहा है।
पिछड़ा वर्ग विभाग की निदेशक पुष्पा सिंह के मुताबिक इस योजना के लिए अगले वित्तीय वर्ष में 150 करोड़ रुपये का प्रारंभिक प्रावधान करते हुए नए सिरे से प्रस्ताव बनाया गया है। इसके परिवर्तित रूप में इसे शादी अनुदान योजना के रूप में जाना जाएगा और बीमारी अनुदान की व्यवस्था को खत्म कर दिया जाएगा। दरअसल जब यह इस योजना में बीमारी को शामिल किया गया था, तब सरकारी अस्पतालों में इलाज पूरी तरह मुफ्त नहीं था। अब हर तरह का इलाज मुफ्त है और गरीबों के लिए तो कैंसर जैसे रोगों का इलाज भी मुफ्त मुहैया कराने की सुविधा है। इसलिए नये प्रस्ताव में शादी अनुदान पर जोर दिया गया है। यह अनुदान भी दस हजार रुपये से बढ़ाकर बीस हजार रुपये करने का प्रस्ताव है।
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Friday, 1 January 2016

कदम उठे तो काफिला बना


डॉ.संजीव, लखनऊ
महाराजगंज के एसपी सिंह और सोनभद्र की डा. विभा। दोनों ने स्वास्थ्य की दृष्टि से पिछड़े जिलों में काम शुरू किया, दोनों को विपरीत हालात मिले पर दोनों ने ही अपने जज्बे से सफलता पायी और सैकड़ों को सेहत का वरदान बख्शा। उन्होंने सिद्ध किया कि कोशिशें महत्वपूर्ण होती हैं, संसाधन उनके बाद आते हैं।
महाराजगंज जिले के सदर ब्लाक में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के अलावा 24 सबसेंटर हैं। यहां प्राथमिक इलाज के साथ टीकाकरण और पोषण तक की चिंता की जानी चाहिए थी। दो बरस पहले इस ब्लाक के लिए परियोजना प्रबंधक के रूप में एसपी सिंह पहुंचे तो पाया कि वहां 24 में से अधिकांश सबसेंटर चल ही नहीं रहे थे जबकि हर सबसेंटर के लिए अलग एएनएम व अन्य स्वास्थ्य कर्मी तैनात थे। एसपी सिंह सभी जगह गए तो पाया कि गांव के लोग इनका फायदा तो उठाना चाहते हैं किन्तु पहल नहीं हो रही है। तब शुरुआत हुई सिसवनिया के स्वास्थ्य उपकेंद्र से। वहां के ग्र्राम प्रधान सुदामा प्रसाद से मिले तो राह दिखने लगी। गांव के लोग मिले और सिसवनिया सबसेंटर का चोला बदलने लगा। उसकी मरम्मत कराई गयी, वहां फर्नीचर का इंतजाम कराया गया और फिर सौर ऊर्जा से बिजली चमकने लगी। अब हाल यह है कि 24 में से 11 सबसेंटर सुसज्जित हो चुके हैं और आठ पर काम चल रहा है। वहां प्रसव के साथ प्राथमिक उपचार के बंदोबस्त हो चुके हैं। चिकित्सक भी नियमित पहुंचते हैं और गांव वाले भी सक्रिय हैं। संस्थागत प्रसव बढ़ गया है।
अब चलते हैं सोनभद्र के जंगलों में जहां चिकित्सा क्षेत्र में गांधी का ग्र्राम स्वराज अंगड़ाई लेता दिख रहा है। वहां के म्योरपुर ब्लाक के 400 गांवों में काम कर रही डॉ.विभा व उनकी टीम को सेहत से सेवा का यह संदेश उनके माता-पिता से मिला था। 1967 में इन गांवों में पहुंचे गांधीवादी डॉ.प्रेम भाई और उनकी चिकित्सक पत्नी डॉ.रागिनी पर्शिकर ने 1969 में एक झोपड़ी में क्लीनिक की शुरुआत की थी। बेटी विभा एमबीबीएस करने के बाद स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ बनी तो विवाह के बाद कानपुर के एक मिशनरी अस्पताल में चिकित्सा करने लगी। माता-पिता के संस्कार उन्हें बहुत दिन कानपुर में भी न रोक सके और कुछ बरस पहले वह भी सोनभद्र पहुंच गयीं। अब 400 गांवों में लोगों को जागरूक करने के साथ सेहत की चिंता कर रही हैं। नियमित अभियान चलाकर खानपान के प्रति सतर्क रहने और सफाई से जोड़ा जाता है। अशिक्षा व भूतप्रेत जैसी मान्यताओं के कारण लोग इलाज नहीं कराते, तो उन्हें इसके लिए तैयार किया जाता है। अब मरीजों की जबरदस्त भीड़ लगती है।
स्कूलों से कराई प्रतियोगिता
महाराजगंज के सदर ब्लाक में सक्रिय एसपी सिंह कहते हैं कि जब उपकेंद्रों को सही करने का कोई रास्ता नहीं दिखा तो हर गांव में खुले स्कूलों से प्रतियोगिता का भाव जगाया। जब स्कूल चमक सकते हैं, बच्चे वहां पढऩे के लिए जाते हैं तो सेहत में वही प्रयास क्यों नहीं हो सकते? यह प्रयोग सफल हुआ और लोग स्कूलों की तर्ज पर स्वास्थ्य उपकेंद्रों को संवारने के लिए आगे आए। अब हर गांव में ग्र्राम स्वास्थ्य पोषण समितियां सक्रिय हैं। नियमित टीकाकरण के साथ ग्र्राम स्वास्थ्य पोषण दिवस जैसे आयोजन होते हैं।
स्वास्थ्य मित्रों से मिली मदद
सोनभद्र के म्योरपुर ब्लाक में विपरीत परिस्थितियों में इलाज की राह आसान करने में लगी डॉ.विभा बताती हैं कि उन्हें इस स्वास्थ्य मित्रों से अत्यधिक मदद मिली है। दरअसल त्रिस्तरीय प्रणाली विकसित कर इलाज की पहल की गयी है। पहले स्तर में हर गांव में स्वास्थ्य मित्र बनाकर उन्हें प्रशिक्षित किया गया। दूसरे स्तर पर उनके माध्यम से जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं और तीसरे स्तर पर बीमारियों को चिह्नित कर इलाज किया जाता है। स्वास्थ्य मित्रों के लिए नियमित रिफ्रेशर कोर्स चलते हैं, ताकि लोग बीमार ही न हों। 

उप्र में हर घंटे निमोनिया से मर रहे 11 बच्चे

-अस्पतालों में विशेष चौकसी, आशा के स्तर तक एलर्ट
-पेंटावैलेंट टीकाकरण के साथ राज्य भर में अभियान
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश में हर घंटे निमोनिया से 11 बच्चे मर रहे हैं। इन स्थितियों से निपटने के लिए स्वास्थ्य महकमे ने आशा के स्तर तक एलर्ट करने के साथ अस्पतालों में विशेष चौकसी के निर्देश दिये हैं। इसके अलावा पेंटावैलेंट टीकाकरण के साथ निमोनिया से निपटने के लिए राज्य भर में विशेष अभियान शुरू किया गया है।
प्रदेश में तापमान गिरने व सर्दी बढऩे के साथ ही निमोनिया का खतरा बढ़ रहा है। प्रदेश में वैसे ही निमोनिया खासा खतरनाक स्थिति में है। यहां हर वर्ष पैदा होने वाले 50 लाख बच्चों में से पांच लाख की मृत्यु उनके पांच साल का होने से पहले हो जाती है। इनमें भी 17 प्रतिशत की मौत निमोनिया के कारण होती है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में हर साल कुल मिलाकर 53 लाख बच्चों को निमोनिया होता है, जिनमें से सही देखभाल के अभाव में लगभग छह लाख बच्चे गंभीर स्थिति में पहुंच जाते हैं। इनमें भी 89,196 की सांसें निमोनिया के कारण थम जाती है। इस तरह हर दिन 248 और हर घंटे 11 बच्चे निमोनिया से मर जाते हैं।
जाड़ा बढऩे के साथ ही निमोनिया के मामले तेजी से बढ़ते हैं, इसलिए स्वास्थ्य विभाग ने अपने पूरे महकमे को अलर्ट कर दिया है। इसके लिए राज्य स्तर पर निमोनिया व डायरिया की रोकथाम के लिए संयुक्त कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसके अंतर्गत जिला अस्पतालों व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को अतिरिक्त सतर्कता के निर्देश दिये गए हैं। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने बताया कि निमोनिया को लेकर पूरा विभाग चिंतित है। हाल ही में शुरू हुए पेंटावैलेंट टीके में निमोनिया से निपटने की क्षमता है। इसके प्रयोग से सुधार होने की उम्मीद है। इसके अलावा जरूरी दवाएं आशाओं तक पहुंचा दी गयी हैं, ताकि प्राथमिक इलाज में कोई कोताही न हो। स्वास्थ्य महानिदेशक योगेंद्र कुमार का कहना है कि निमोनिया में शुरुआती स्तर पर पहचान जरूरी है। इसके लिए प्रशिक्षण देकर आशा व एएनएम स्तर तक निमोनिया के मरीज को हर हाल में समय पर इलाज सुनिश्चित करने को कहा गया है। निमोनिया के लक्षण पता चलते ही तुरंत प्राथमिक या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा जाए। गंभीर होने पर अविलंब मरीजों को जिला अस्पताल भेजा जाए।
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ये सावधानियां जरूरी
-एक ही कमरे में बहुत अधिक लोग लंबे समय तक न रहें
-कमरे में रूम हीटर व कॉयल आदि ज्यादा देर तक न जलाएं, इससे कमरे की हवा घुटन भरी व शुष्क हो जाती है
-टीकाकरण अवश्य कराएं व छह माह तक स्तनपान न बंद करें