Thursday, 31 December 2015

खरी नहीं उतरीं 38 फीसद दवाएं

-4723 नमूनों का परीक्षण, मानक स्तर पर मिले महज 2902
-बाजार में झोंकी गयीं दस फीसद से अधिक नकली दवाएं
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : दवा बाजार में नकली दवाओं का बोलबाला थमने का नाम नहीं ले रहा है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक बाजार में दस फीसद से अधिक नकली दवाएं झोंक दी गयी हैं। 38 फीसद दवाएं मानकों के अनुरूप न होने के कारण पर्याप्त असर नहीं करती हैं।
खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने वर्ष समाप्त होते-होते अपने कामकाज का जो ब्योरा जारी किया है, उसके मुताबिक आठ महीने में विभाग की ओर से छापेमारी कर जांच के लिए प्रदेश भर से दवाओं के 5150 और कास्मेटिक्स उत्पादों के 301 नमूने प्रयोगशालाओं को भेजे गए। इनमें से 4723 नमूनों की जांच रिपोर्ट ही चौंकाने वाली है। इनमें से 506 दवाएं नकली निकली हैं। इस तरह बाजार में दस फीसद से अधिक नकली दवाएं मौजूद होने की पुष्टि हुई है। इनके अलावा महज 2902 नमूने ही मानक स्तर के अनुकूल पाए गए हैं। शेष 1821 नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे। इस तरह आंकड़े ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि 38 फीसद से अधिक दवाएं घटिया हैं और संभवत: यही कारण है कि तमाम बार दवाएं असर नहीं करतीं और लोगों को परेशान होना पड़ता है।
दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग भी इन दवाओं पर नियंत्रण के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं कर रहा है। अधिकारी इसके लिए कर्मचारियों की कम संख्या को जिम्मेदार ठहराते हैं। विभाग में संयुक्त आयुक्त व उपायुक्त के एक-एक पद स्वीकृत हैं किन्तु इन पद पर किसी की नियुक्ति नहीं है। सहायक आयुक्त के दो पद खाली हैं, वहीं औषधि निरीक्षकों के भी 25 पद खाली हैं। औषधि निरीक्षकों के 104 पदों में से 58 पद अस्थायी और 46 स्थायी हैं। इन 46 स्थायी पदों के विपरीत महज 11 औषधि निरीक्षक स्थायी हैं। औषधि निरीक्षकों की कमी के कारण अपेक्षा के अनुरूप जांच पड़ताल नहीं हो पाती और तमाम प्रकरण औषधि निरीक्षकों के स्तर पर ही विवेचना की प्रतीक्षा किया करते हैं। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन आयुक्त एके सिंह ने विवेचना के साथ अदालती कार्रवाई में भी तेजी लाने को कहा है। विभागीय मंत्री इकबाल महमूद ने भी छापों की संख्या बढ़ाने के साथ समयबद्ध ढंग से कर्मचारियों की नियुक्ति करने के निर्देश दिये हैं।

सुबह बनीं परिवार कल्याण महानिदेशक, शाम को रिटायर

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- डॉ.योगेंद्र कुमार बनाए गए स्वास्थ्य महानिदेशक
- डॉ.एमआर मलिक को परिवार कल्याण का प्रभार
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : स्वास्थ्य महकमे के लिए वर्ष का आखिरी दिन गहमा-गहमी भरा रहा। एक माह से कार्यवाहक रहीं डॉ.मीनू सागर ने सुबह स्थायी परिवार कल्याण महानिदेशक का काम संभाला और शाम को रिटायर हो गयीं। उनकी जगह डॉ.एमआर मलिक को परिवार कल्याण महानिदेशक का प्रभार सौंपा गया है, वहीं डॉ.योगेंद्र कुमार स्वास्थ्य महानिदेशक बने हैं।
30 नवंबर को परिवार कल्याण व स्वास्थ्य महानिदेशकों के सेवानिवृत्त होने के बाद डॉ.मीनू सागर व डॉ.योगेंद्र कुमार को कार्यवाहक के रूप में प्रभार सौंपा गया था। इसके बाद मुख्यमंत्री के पास इन दोनों चिकित्सकों की स्थायी नियुक्ति के लिए प्रस्ताव भेजा गया था। एक माह तक प्रतीक्षा के बाद बुधवार को इन दोनों चिकित्सकों की स्थायी नियुक्ति हुई। उसके बाद गुरुवार सुबह डॉ.योगेंद्र कुमार ने स्वास्थ्य महानिदेशक व डॉ.मीनू सागर ने परिवार कल्याण महानिदेशक का काम संभाल लिया।
डॉ.मीनू सागर एक ही दिन के लिए स्थायी परिवार कल्याण महानिदेशक रह सकीं। दरअसल 31 दिसंबर को ही उन्हें सेवानिवृत्त होना था, इसलिए सुबह काम संभालने के बाद शाम को वह रिटायर हो गयीं। उन्होंने अभी तक निदेशक (चिकित्सा उपचार) का काम संभाल रहे डॉ.एमआर मलिक को कार्यवाहक के रूप में प्रभार सौंपा है। अब डॉ.मलिक को स्थायी परिवार कल्याण महानिदेशक बनाने की फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय भेजी गयी है। उधर प्रदेश के नए स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ.योगेंद्र कुमार ने कहा कि शासन की मंशा के अनुरूप समाज के आखिरी व्यक्ति तक सेहत के संसाधन पहुंचाना उनका लक्ष्य है। डॉक्टर समय पर अस्पताल पहुंचें और मरीजों को कोई परेशानी न हो, यह भी सुनिश्चित किया जाएगा।
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Tuesday, 29 December 2015

मुफ्त ट्रिपल सी से पिछड़ों को रोजगार की राह


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-कंप्यूटर का ककहरा
-तीन माह के कोर्स ऑन कम्प्यूटर कॉन्सेप्ट्स का खर्च उठाएगी सरकार
-एक लाख रुपये आय सीमा, पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन करने की तैयारी
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डॉ.संजीव, लखनऊ : प्रदेश के पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों को रोजगार दिलाने के लिए सरकार कंप्यूटर का ककहरा सहेजे तीन माह के कोर्स ऑन कंप्यूटर कॉन्सेप्ट्स यानी ट्रिपल सी की पढ़ाई कराएगी। इसके लिए एक लाख रुपये की आय सीमा निर्धारित कर पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन करने की तैयारी है।
कुछ वर्षों से सरकारी नौकरियों में ट्रिपल सी पाठ्यक्रम की अनिवार्यता के बाद पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों को इस पाठ्यक्रम का प्रशिक्षण दिये जाने का प्रस्ताव किया गया है। निदेशक पुष्पा सिंह के मुताबिक प्रस्ताव को शासन ने हरी झंडी दे दी है। अभी तक विभाग कंप्यूटर के ओ लेवल पाठ्यक्रम के लिए अनुदान देता था, किंतु उससे बहुत अधिक संख्या में छात्र-छात्राएं लाभान्वित नहीं होते थे। अब ट्रिपल सी पाठ्यक्रम की उपयोगिता देखते हुए इससे अधिकाधिक छात्र-छात्राओं को रोजगार के अवसर मुहैया कराए जा सकेंगे। तीन माह के ट्रिपल सी पाठ्यक्रम का संचालन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रानिक्स एंड इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी से संबद्ध संस्थानों में होगा। इसमें पंजीकरण कराने वाले विद्यार्थियों को तीन माह पढ़ाने के बदले पिछड़ा वर्ग विभाग संबंधित संस्थान को 3500 रुपये का भुगतान करेगा। अभी तक विभाग की योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आय सीमा गरीबी रेखा के नीचे की थी। ट्रिपल सी पाठ्यक्रम की पढ़ाई के लिए इसे एक लाख रुपये कर दिया गया है। विभाग के उपनिदेशक शैलेश के मुताबिक आवेदन ऑनलाइन करने होंगे और मानकों पर खरे उतरने के बाद काउंसिलिंग के माध्यम से संस्थान का आवंटन किया जाएगा। जिन जिलों में मान्यता प्राप्त संस्थान नहीं होंगे, वहां के विद्यार्थियों को पड़ोसी जिले में प्रवेश दिलाया जाएगा। लाभार्थी विद्यार्थियों की संख्या बजट के अधीन मिलने वाली धनराशि पर निर्भर करेगी।
बढ़ेगा ओ लेवल का अनुदान
पिछड़ा वर्ग विभाग ने ओ लेवल कंप्यूटर पाठ्यक्रम की पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं के लिए अनुदान की राशि बढ़ाने का प्रस्ताव भी किया है। अभी प्रति विद्यार्थी 10 हजार रुपये मिलते हैं, जिसे बढ़ाकर 15 हजार रुपये करने का प्रस्ताव किया गया है। इस वर्ष इस योजना के लिए 11 करोड़ रुपये का प्रावधान था, अगले वित्तीय वर्ष में इसे बढ़ाने की मांग भी की जा रही है।
75 फीसद उपस्थिति जरूरी
पिछड़ा वर्ग निदेशक के अनुसार विद्यार्थियों की गंभीरता बरकरार रखने और संस्थानों द्वारा कोई मनमानी करने से रोकने के लिए प्रवेश लेने वाला विद्यार्थियों की कम से कम 75 फीसद उपस्थिति जरूरी होगी। इस उपस्थिति का प्रमाण देने पर ही अनुदान राशि का भुगतान किया जाएगा। परीक्षाफल का प्रतिशत भी निर्धारित किया जाएगा। ओ लेवल मामले में राष्ट्रीय सफलता प्रतिशत को आधार बनाकर फैसला किया जाएगा।

Monday, 28 December 2015

अगले साल 123 पीएमएस डॉक्टर बनेंगे विशेषज्ञ


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-मेडिकल परास्नातक में प्रवेश के लिए 15 जनवरी तक मांगे आवेदन
-पांच साल नौकरी छोड़ी तो पूरे वेतन संग देने पड़ेंगे दस लाख रुपये
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश सरकार अगले शैक्षिक सत्र 2016-17 में प्रांतीय चिकित्सा सेवा (पीएमएस) के 123 डॉक्टरों को विशेषज्ञ बनाएगी। प्रदेश के सरकारी मेडिकल कालेजों के परास्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए पीएमएस संवर्ग में कार्यरत एमबीबीएस चिकित्सकों से 15 जनवरी तक आवेदन मांगे गए हैं। पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद पांच साल तक सरकारी नौकरी छोडऩे पर इस दौरान दिये गए वेतन के साथ दस लाख रुपये अतिरिक्त वसूले जाएंगे।
सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी दूर करने के लिए हर साल राजकीय चिकित्सा महाविद्यालयों में सरकारी चिकित्सकों के लिए परास्नातक सीटें आरक्षित की जाती हैं। अगले शैक्षिक सत्र 2016-17 के लिए राजधानी लखनऊ के किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के अलावा कानपुर, आगरा, मेरठ, गोरखपुर, झांसी व इलाहाबाद मेडिकल कालेजों में कुल 123 परास्नातक डिप्लोमा सीटें पीएमएस डॉक्टरों के लिए आरक्षित की गयी हैं। इन सीटों पर भर्ती के लिए परास्नातक मेडिकल प्रवेश परीक्षा (पीजीएमईई) नहीं देनी होती है और स्वास्थ्य विभाग की मेरिट सूची व काउंसिलिंग के आधार पर सीधे आवंटन हो जाता है।
स्वास्थ्य विभाग ने वर्ष 2016-17 के लिए प्रांतीय चिकित्सा सेवा संवर्ग के चिकित्सकों से 15 जनवरी, 2016 तक आवेदन को कहा है। आवेदन के लिए अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष रखी गयी है। प्रांतीय चिकित्सा सेवा में कम से कम पांच वर्ष के अनुभव के साथ ग्र्रामीण क्षेत्र के प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात रहे चिकित्सकों को वरीयता देने का भी फैसला हुआ है। मेरिट सूची बनाते समय ग्र्रामीण क्षेत्र में एक साल की सेवा को दो साल जोड़ा जाएगा। दो वर्ष का डिप्लोमा करते समय पढ़ाई का खर्चा उठाने के साथ अभ्यर्थी को ड्यूटी पर मानकर पूरा वेतन दिया जाएगा। पढ़ाई पूरी करने के बाद कम से कम पांच साल सरकारी नौकरी में विशेषज्ञ के रूप में काम करना जरूरी होगा। ऐसा न करने पर पढ़ाई के दौरान दिये गए वेतन के साथ दस लाख रुपये की वसूली संबंधित डॉक्टर से की जाएगी। इसके लिए प्रवेश के लिए आवेदन करते समय ऐसे दो विभागीय चिकित्सकों की गारंटी भी लगानी होगी, जिनकी कम से कम दस साल की नौकरी बची हो।
सर्वाधिक सीटें एनेस्थीसिया की
परास्नातक पढ़ाई के लिए सर्वाधिक 32 सीटें एनेस्थीसिया में डिप्लोमा (डीए) की हैं। 17 चिकित्सक डिप्लोमा इन चाइल्ड हेल्थ (डीसीएच) करके बाल रोग विशेषज्ञ तो 17 ही डिप्लोमा इन ऑप्थेल्मिक मेडिसिन एंड सर्जरी (डीओएमएस) में प्रवेश लेकर नेत्र रोग विशेष बनेंगे। स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञता वाले पाठ्यक्रम (डीजीओ) के लिए 14 और जन स्वास्थ्य की चिंता करने के लिए डिप्लोमा इन पब्लिक हेल्थ (डीपीएच) पाठ्यक्रम के लिए 13 सीटें आरक्षित हैं। इनके अलावा सात सीटें डिप्लोमा इन क्लीनिकल पैथोलॉजी (डीसीपी) और पांच सीटें डिप्लोमा इन ट््यूबरक्लोसिस एंड चेस्ट डिसीज (डीटीसीडी) की हैं। अस्थि रोग विशेषज्ञता (डीआर्थ) की चार और त्वचा व गुप्त रोग विशेषज्ञता (डीवीडी) की तीन सीटों पर प्रवेश होंगे।

सरकारी भवनों में लगेंगी कांच के दरवाजे वाली लिफ्ट

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- लिफ्ट में मुख्यमंत्री के फंसने के बाद लिया गया फैसला
- विधान भवन में लिफ्ट लगाने वाली कंपनी काली सूची में
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सरकारी भवनों में अब कांच के दरवाजे वाली लिफ्ट लगाई जाएंगी। पिछले दिनों विधान भवन में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिफ्ट में फंसने की घटना के बाद यह फैसला लिया गया है। साथ ही विधान भवन की इस लिफ्ट को लगाने वाली कंपनी को काली सूची में डाल दिया गया है।
बीते दिनों मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विधान भवन में पत्नी व सांसद डिंपल यादव के साथ फंस गए थे। इसके बाद पूरी लिफ्ट संचालन व्यवस्था की नये सिरे से समीक्षा की गयी है। उक्त लिफ्ट लगाने वाली कंपनी थीसन कुरुप को प्रदेश सरकार ने काली सूची में डाल दिया है। साथ ही अन्य लिफ्ट की नियमित जांच में अतिरिक्त सख्ती बरतने के निर्देश दिये गए हैं। तय हुआ है कि अब सरकारी भवनों में लगने वाली लिफ्ट के दरवाजे लोहे के नहीं होंगे। अब सिर्फ कांच के पारदर्शी दरवाजे वाली लिफ्ट ही लगाई जाएंगी। इस बदलाव से प्रति लिफ्ट औसतन तीन लाख रुपये खर्च आएगा, किन्तु लिफ्ट में फंसने की स्थिति में मनोवैज्ञानिक प्रभाव सकारात्मक रहेगा। नयी तकनीक वाली लिफ्ट बीच में नहीं बंद होती हैं। कोई खराबी आने पर वे निकटतम फ्लोर पर ही रुकती हैं। ऐसे में दरवाजा न खुलने की स्थिति में लिफ्ट के भीतर मौजूद लोगों को शीशे से बाहर दिखाई पड़ता रहता है और उनका मनोबल नहीं गिरता है। वे घबराहट से भी बचते हैं।
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नहीं लगेंगे टिंटेड ग्लास
लिफ्ट के अलावा भवनों की सुरक्षा में भी अब अधिक चौकसी बरती जाएगी। सरकारी क्षेत्र की सबसे बड़ी निर्माण एजेंसी उत्तर प्रदेश निर्माण निगम ने तय किया है कि अब किसी भी सरकारी भवन में अपारदर्शी शीशे नहीं लगाए जाएंगे। ऐसे टिंटेड ग्लास लगाए जाने के कारण कई बार उड़ते पक्षियों को अपनी परछायी दिखती है और वे शीशे पर चोंच मारते हैं। तय हुआ है कि अब सरकारी भवनों में सिर्फ पारदर्शी शीशे ही लगाये जाएंगे।

अरबों खर्च फिर भी 26 फीसद सिटी बसें सड़क से गायब

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-सात शहरों में प्रभावी नहीं साबित हो सकी नगर बस सेवा
-एक साल से नहीं हुई समीक्षा, अब रोडवेज ने मांगी रिपोर्ट
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सूबे के सात शहरों में नगर बस सेवा प्रभावी साबित नहीं हो पा रही है। चार सौ करोड़ रुपये से अधिक खर्च किये जाने के बाद भी 26 फीसद बसें सड़कों से गायब हैं। अब इस सेवा के संचालन से जुड़े रोडवेज ने सभी शहरों से इसकी समग्र्र रिपोर्ट मांगी है।
शहरों में आवाजाही को सुगम बनाने के लिए वर्ष 2009 में 70 लाख रुपये तक कीमत वाली बसें खरीदी थीं। कुल मिलाकर 1140 बसों की खरीद और  उनके संचालन पर 400 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर राजधानी लखनऊ के साथ कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, मेरठ, आगरा व मथुरा में ये बसें चलाई गयी थीं। वर्ष 2010 में इन बसों का संचालन तो शुरू हो गया किन्तु किसी भी शहर में सभी बसें ठीक से नहीं चल पा रही हैं। हालात ये हैं कि 1140 बसों में से महज 837 बसें ही सड़क पर हैं, शेष 26 फीसद से अधिक बसें खराब खड़ी हैं।
इस स्थिति के लिए संचालन की पूरी प्रक्रिया को दोषी माना जा रहा है।  संचालन के लिए हर जिले में अलग-अलग कंपनियां बनीं, जिनकी अध्यक्षता की कमान मंडलायुक्तों को सौंपी गयी। इन कंपनियों के प्रबंध निदेशक रोडवेज के ही अधिकारी बनाए गए। दरअसल इन बसों के हानि-लाभ की समयबद्ध समीक्षा तक नहीं हो रही है। इन कंपनियों में परिवहन निगम की हिस्सेदारी महज 25 फीसद होने और शेष नगर विकास विभाग के जिम्मे होने के कारण परिवहन विभाग भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। हाल ही में परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक के. रविन्द्र नायक ने नगर बस सेवा की खराब स्थिति पर चिंता जताते हुए संचालन कंपनियों के प्रबंध निदेशकों से बसों की समग्र्र रिपोर्ट मांगी है। इसके बाद नगर विकास विभाग के अधिकारियों के साथ चर्चा कर बस सेवा सुधारने की रणनीति बनायी जाएगी।
कानपुर की हालत सबसे खराब
नगर बस सेवा में सर्वाधिक 270 बसें पाने वाले कानपुर की हालत सबसे खराब है। वहां महज 70 बसें सड़क पर हैं। उन्हें भी आर्थिक लाभ के लिए कानपुर देहात सीमा तक चलाया जा रहा है। कानपुर के अलावा लखनऊ में 260, आगरा में 170, इलाहाबाद व वाराणसी में 130, मेरठ में 120 और मथुरा में 60 बसें चलाई गयी थीं।
लखनऊ ने मांगीं 40 और बसें
राजधानी लखनऊ के लिए नगर बस सेवा के संचालन को और पुख्ता करने के लिए 40 नयी बसें खरीदने का प्रस्ताव किया गया है। यहां खरीदी गयीं 260 बसों में से 225 बसें सड़क पर हैं। लखनऊ नगर बस सेवा के प्रबंध निदेशक ए. रहमान के मुताबिक आठ करोड़ रुपये खर्च कर ये बसें खरीदी जाएंगी। इसके लिए प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है। 

Sunday, 27 December 2015

16 जिलों में आयुष केंद्र सुधारेंगे सेहत


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-आयुर्वेद, होम्योपैथी व यूनानी पद्धतियों से इलाज
-योग व प्राकृतिक चिकित्सा को भी मिलेगी वरीयता
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्राकृतिक व पुरातन पद्धतियों से सेहत सुधार के लिए राज्य के 16 जिलों में आयुष केंद्र खोलने का फैसला हुआ है। इन केंद्रों में आयुर्वेद, होम्योपैथी व यूनानी पद्धतियों से इलाज के साथ योग व प्राकृतिक चिकित्सा को भी वरीयता प्रदान की जाएगी।
प्रदेश में एलोपैथी के अलावा अन्य चिकित्सा पद्धतियों से इलाज को बढ़ावा देने के लिए आयुष स्वास्थ्य केंद्र खोलने का फैसला हुआ है। इन स्वास्थ्य केंद्रों में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के साथ योगा व प्राकृतिक चिकित्सा पर विशेष जोर दिया जाएगा। इसके लिए यहां विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के चिकित्सकों की तैनाती के साथ योग शिक्षक व प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ भी तैनात किये जाएंगे। प्रदेश आयुष मिशन की निदेशक कुमुदलता श्रीवास्तव के मुताबिक कुल 17 केंद्रों में से दस आयुर्वेद, चार होम्योपैथी व तीन यूनानी चिकित्सकों की अगुवाई में संचालित होंगे। इस कार्यक्रम के संचालन के लिए जिला स्तर पर किसी समाजसेवी संस्था को भी नामित किये जाने पर विचार चल रहा है। संचालन व नियंत्रण के लिए हर जिले में क्षेत्रीय आयुर्वेदिक व यूनानी अधिकारी और जिला होम्योपैथिक चिकित्सा अधिकारी की संयुक्त टीम बनाई जाएगी और धनराशि का आहरण-वितरण भी इनके संयुक्त हस्ताक्षरों से राष्ट्रीयकृत बैंक में खुले खातों से होगा।
राजधानी लखनऊ में ऐसे दो केंद्रों की स्थापना का फैसला हुआ है। गोसाइगंज व इंदिरानगर में आयुष स्वास्थ्य केंद्र खुलेंगे। इसके अलावा मैनपुरी, कन्नौज, चित्रकूट, आजमगढ़, सीतापुर, बस्ती, झांसी व इटावा में आयुर्वेद चिकित्सकों की अगुवाई में आयुष स्वास्थ्य केंद्र खुलेंगे। फतेहपुर के हथगांव, चंदौली, मऊ व सिद्धार्थनगर में आयुष स्वास्थ्य केंद्र खोलने का जिम्मा होम्योपैथी विभाग को सौंपा गया है। इसी तरह रामपुर, बदायूं व श्रावस्ती में यूनानी चिकित्सक आयुष केंद्रों का संचालन संभालेंगे।
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वाराणसी में एकीकृत अस्पताल
आयुष की तीन विधाओं आयुर्वेद, होम्योपैथी व यूनानी की चिकित्सा सुविधाएं एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराने की भी योजना है। प्रदेश के प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूपचंद्र पाण्डेय ने बताया कि इस योजना के अंतर्गत 50 बेड का एकीकृत अस्पताल खोला जाएगा। इसकी शुरुआत वाराणसी से होगी। वहां के राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय प्रांगण में पहला एकीकृत आयुष अस्पताल शुरू किया जाएगा। वहां आयुर्वेद चिकित्सक व अन्य स्टाफ पहले से मौजूद हैं, यूनानी व होम्योपैथी चिकित्सकों व अन्य स्टाफ की नियुक्ति कर अस्पताल संचालन सुनिश्चित किया जाएगा।

सीजी सिटी कैंसर संस्थान के लिए बस एक आवेदन


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-चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 30 नवंबर तक मांगे थे आवेदन
-लखनऊ के सीएमओ के अलावा कोई भी इच्छुक नहीं
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की महत्वाकांक्षी सीजी सिटी कैंसर संस्थान योजना का नेतृत्व करने के लिए वरिष्ठ कैंसर रोग विशेषज्ञ ढूंढ़े नहीं मिल रहे हैं। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने देश भर में विज्ञापन जारी कर 30 नवंबर तक निदेशक पद के लिए आवेदन मांगे थे, किन्तु लखनऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) के अलावा किसी ने आवेदन तक नहीं किया।
राजधानी के चकगंजरिया सिटी (सीजी सिटी) क्षेत्र में कैंसर के अतिविशिष्ट उपचार सुविधाओं वाले अंतरराष्ट्रीय स्तर के संस्थान को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी महत्वाकांक्षी योजना करार देते हैं। स्वयं मुख्य सचिव इस पूरी परियोजना की नियमित समीक्षा कर रहे हैं। अक्टूबर माह में संस्थान का निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया गया है। इसके साथ ही चिकित्सा शिक्षा विभाग ने संस्थान के निदेशक पद के लिए 30 नवंबर तक आवेदन मांगे थे। इसके लिए देश भर में विज्ञापन भी किया गया था। इसके बावजूद 30 नवंबर तक सिर्फ एक आवेदन ही आया है। बताया गया कि उक्त कैंसर संस्थान का निदेशक बनने के लिए सिर्फ लखनऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ.एसएनएस यादव ने ही इच्छा जाहिर की है। मानकों के अनुसार वे भी संस्थान के निदेशक बनने की पात्रता पूरी नहीं करते हैं। ऐसे में एक भी उपयुक्त आवेदन न आने से चिकित्सा शिक्षा महकमा परेशान है। यह हालत तब है जबकि मुख्य सचिव स्वयं अगले वर्ष अक्टूबर तक हर हाल में संस्थान के वाह्यïरोगी विभाग का संचालन शुरू करने के निर्देश दे चुके हैं। निदेशक के बाद तीन प्रमुख विभागों के विभागाध्यक्षों के चयन की प्रक्रिया भी पूरी करनी है, किन्तु अभी उसकी शुरुआत तक नहीं हो सकी है।
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सर्च कमेटी ढूंढ़ेगी निदेशक
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक ने स्वीकार किया कि बस एक ही आवेदन आया था, वह भी मानकों के अनुरूप नहीं था। अब मुख्य समिति की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की सर्च कमेटी बनाकर निदेशक का चयन किया जाएगा। इसके माध्यम से हमें राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ मिलेंगे ताकि  संस्थान का संचालन ठीक प्रकार से हो सके। 

Wednesday, 23 December 2015

अगले माह खातों में पहुंचेगी छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति

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-17 लाख छात्र-छात्राएं होंगे लाभान्वित
-22 लाख के आवेदन हो गए हैं निरस्त
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : लंबी प्रतीक्षा और खासी जांच-पड़ताल के बाद अगले माह छात्र-छात्राओं के खातों में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति पहुंच जाएगी। समाज कल्याण विभाग ने इसके लिए अंतिम समय सारिणी घोषित कर दी है।
धनाभाव के कारण पढ़ाई न रुकने देने के लिए दो लाख से कम आय वर्ग वाले परिवारों के छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है। समाज कल्याण विभाग अनुसूचित जाति, जनजाति व सामान्य वर्ग, पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग अन्य पिछड़ा वर्ग व अल्पसंख्यक कल्याण विभाग अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का नियोजन करता है। कुछ वर्षों में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में हुए गडबड़घोटाले के बाद इस बार आवेदन से लेकर अंतिम दौर तक खासी स्क्रीनिंग की गयी। इस स्क्रीनिंग का ही परिणाम था वर्ष 2015-16 में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए कुल 39 लाख छात्र-छात्राओं ने आवेदन किया था, जिसमें से 22 लाख आवेदन विभिन्न कारणों से निरस्त हो गये हैं। इसमें से ज्यादातर ऐसे छात्र-छात्राएं हैं, जिन्होंने फर्जी प्रमाणपत्रों का सहारा लिया और उसका खुलासा होने पर उन्हें छात्रवृत्ति न देने का फैसला हुआ है। साथ ही संबंधित संस्थानों व छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी भी चल रही है।
जिन 17 लाख छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान होना है, उनके लिए पूरी समय सारिणी की घोषणा कर दी गयी है। इसके अनुसार जिला छात्रवृत्ति स्वीकृति समिति संदिग्ध पाए गए आवेदनों के संबंध में 10 जनवरी 2016 तक फैसला ले लेगी। साथ ही जिन छात्र-छात्राओं के आवेदन सही पाए गए हैं, उनके ब्योरे को जिला स्तरीय विभागीय अधिकारी के डिजिटल सिग्नेचर से हर हाल में 10 जनवरी तक लॉक कर दिया जाएगा। इस ब्योरे के आधार पर एनआइसी की राज्य इकाई 15 जनवरी तक मांग सृजित कर लेगी। इसके बाद 31 जनवरी तक छात्र-छात्राओं के बचत खातों में कोषागार से ई-पेमेंट के तहत सीधे धनराशि भेज दी जाएगी। 

मार्च से सभी जिलों में पेंशन ऑनलाइन

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-नहीं लगाने पड़ेंगे महालेखाकार कार्यालय व कोषागार के चक्कर
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश में एक मार्च से सभी जिलों में पूरी पेंशन प्रणाली को ऑनलाइन कर दिया जाएगा। सभी कोषागारों को सेंट्रल सर्वर से जोडऩे के बाद इस व्यवस्था पर अमल के लिए वित्त विभाग ने ये आदेश जारी किये हैं।
राज्य कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन निर्धारण तक कई बार कोषागार व महालेखाकार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। महालेखाकार कार्यालय से भविष्य निधि सहित कर्मचारियों की पूरी नौकरी की बचत का आंकड़ा कोषागार भेजा जाता है, जहां से भुगतान होता है। इसी तरह कर्मचारी के कार्यालय से अंतिम वेतन सहित अन्य जानकारियों के साथ पेंशन स्वीकृति के कागजात कोषागार भेजे जात हैं। अभी सेवानिवृत्ति और पेंशन स्वीकृति की इस पूरी प्रक्रिया में कई बार एक से तीन महीने तक का समय लग जाता है। इस दौरान महालेखाकार कार्यालय और कोषागारों के कर्मचारियों द्वारा सेवानिवृत्त कर्मचारियों के आर्थिक दोहन की शिकायतें भी मिलती हैं। इससे निपटने के लिए पूरी प्रक्रिया को ही ऑनलाइन करने का फैसला हुआ था। इससे कर्मचारियों को कोषागार या महालेखाकार कार्यालय जाने के चक्कर से मुक्ति मिलेगी। उनके कागजात ऑनलाइन होंगे और सभी आपत्तियों का निस्तारण भी ऑनलाइन सुनिश्चित किया जाएगा।
पिछले वर्ष पहले-पहल उन्नाव व बाराबंकी में ऑनलाइन पेंशन स्वीकृत करने की व्यवस्था होने के बाद अब प्रदेशभर में इसे लागू करने के संबंध में जारी शासनादेश में कहा गया है कि एक मार्च 2016 या उसके बाद सेवानिवृत्त होने वाले सभी सरकारी कर्मचारियों के पेंशन प्रकरणों का निस्तारण ऑनलाइन ही होगा। इसके लिए सभी आहरण-वितरण अधिकारियों, मंडलीय अपर निदेशकों व संयुक्त निदेशकों के डिजिटल सिग्नेचर जुटाने सहित आधारभूत प्रक्रिया हर हाल में 29 फरवरी तक पूरी कर ली जाए। इसके बाद सेवानिवृत्त कर्मचारियों के कागजात एक बार उनके दफ्तर से कोषागार पहुंचेंगे, उसके बाद पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी।
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दो कोषागारों को एक माह का समय
लखनऊ स्थित जवाहर भवन कोषागार व इलाहाबाद के सिविल लाइन्स कोषागार को ऑनलाइन प्रणाली से जुडऩे के लिए एक माह का अतिरिक्त समय दिया गया है। इन कोषागारों से जुड़े विभागों के कर्मचारियों के मार्च माह में सेवानिवृत्त होने पर तो पुरानी पद्धति से ही पेंशन स्वीकृत होगी, किन्तु वित्तीय वर्ष 2016-17 की पहली तिमाही में ये दोनों कोषागार भी ऑनलाइन स्वीकृति प्लेटफार्म से जुड़ जाएंगे।

Tuesday, 22 December 2015

ढाई लाख और ओबीसी विद्यार्थियों को शुल्क प्रतिपूर्ति की राह खुली

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-धनाभाव में नहीं मिल सकी थी इन छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति
-वर्ष 2015-16 के लिए आवंटित धन से मिले 118 करोड़ रुपये
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के उन छात्र-छात्राओं के लिए खुशखबरी है, जिन्होंने वर्ष 2014-15 में छात्रवृत्ति या शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया और अकारण ही उनके आवेदन निरस्त सूची में शामिल हो गए। ऐसे ढाई लाख और ओबीसी विद्यार्थियों को शुल्क प्रतिपूर्ति व छात्रवृत्ति की राह खुल गयी है।
वर्ष 2014-15 में अन्य पिछड़े वर्ग के लगभग तीन लाख विद्यार्थियों के शुल्क प्रतिपूर्ति व छात्रवृत्ति के आवेदन निरस्त हो गए थे। उन्होंने आवेदन की प्रक्रिया पूरी कर पंजीकरण कराया था किन्तु ऑनलाइन सर्वर पर फेल्ड ट्रांजेक्शन या रिजेक्ट ट्रांजेक्शन लिखकर आ रहा था। परेशान छात्र-छात्राएं पिछड़ा वर्ग कल्याण निदेशालय के लगातार चक्कर लगा रहे थे। बताया गया कि धनाभाव के कारण इन विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति नहीं मिल सकी थी। इसके बाद से कई बार इन विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का प्रस्ताव किया गया किन्तु उस पर अमल नहीं हुआ।
बीते दिनों पिछड़ा वर्ग निदेशालय ने शासन वित्तीय वर्ष 2015-16 में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए स्वीकृत 442 करोड़ रुपये में से 118 करोड़ रुपये वर्ष 2014-15 की अवशेष छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के रूप में देने की अनुमति मांगी थी। इस पर शासन स्तर से मंजूरी मिल गयी है। पिछड़ा वर्ग कल्याण निदेशक पुष्पा सिंह ने बताया कि 118 करोड़ रुपये जारी हो जाने से पिछले वर्ष पूर्वदशम व दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन करने वाले ढाई लाख से अधिक छात्र-छात्राएं लाभान्वित होंगे। वे इस कारण खासे परेशान थे। अगले कुछ दिनों में राशि के अनुरूप मानकों का पालन करते हुए छात्र-छात्राओं के नाम सर्वर पर अपलोड कर दिये जाएंगे। साथ ही उन सभी के खातों में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति स्थानांतरण की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी।

48 जिलों में होगी औषधीय पौधों की खेती

-उद्यान व खाद्य प्रसंस्करण विभाग की मदद लेगा चिकित्सा शिक्षा विभाग
-आयुष सोसायटी बोर्ड ने दी हरी झंडी, सवा सात करोड़ रुपये होंगे खर्च
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : केंद्र सरकार की पहल पर गठित आयुष मिशन ने प्रदेश के 48 जिलों में औषधीय पौधों की खेती से आयुष को बढ़ावा देने का फैसला किया है। इसके लिए उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग की मदद ली जा रही है।
आयुर्वेद, होम्योपैथ, सिद्धा, यूनानी आदि चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए गठित आयुष मिशन ने उत्तर प्रदेश में आयुर्वेद से अधिकाधिक लोगों को जोडऩे के लिए औषधीय पौधों की खेती कराने की पहल की है। इसके अंतर्गत मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए सवा सात करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। राज्य आयुष मिशन की निदेशक कुमुदलता श्रीवास्तव ने बताया कि औषधीय पौधों की खेती सुनिश्चित करने के लिए उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग की मदद ली जाएगी। इसके अंतर्गत 3192 हेक्टेयर भूमि में औषधीय पौधों की खेती कराई जाएगी। प्रदेश में छह स्थानों पर पौधों की नर्सरी विकसित की जाएंगी। खेती के बाद प्रबंधन के लिए 24 इकाइयों का नियोजन होगा ताकि पौधों का अधिकाधिक लाभ उठाया जा सके। इस पूरी योजना को आयुष सोसायटी बोर्ड की हरी झंडी मिल गयी है। जिले चिह्नित कर लिये गए हैं और जल्द ही इस पर अमल शुरू हो जाएगा।
ये हैं 48 जिले
सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, बिजनौर, संभल, मेरठ, बुलंदशहर, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, लखनऊ, सीतापुर, हरदोई, फैजाबाद, बाराबंकी, अम्बेडकरनगर, सुलतानपुर, बस्ती, महाराजगंज, कुशीनगर, गोरखपुर, इलाहाबाद, कौशांबी, प्रतापगढ़, कन्नौज, कानपुर देहात, इटावा, फतेहपुर, आगरा, मथुरा, एटा, अलीगढ़, हाथरस, आजमगढ़, वाराणसी, गाजीपुर, जौनपुर, चंदौली, मीरजापुर, सोनभद्र, बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा, झांसी, जालौन, ललितपुर, बहराइच
पौधे दूर करते बीमारी
राजधानी लखनऊ स्थित आयुर्वेद मेडिकल कालेज के डॉ.एके दीक्षित के अनुसार जो पौधे लगाए जाएंगे, वे तमाम बीमारियों में लाभप्रद साबित होते हैं। अश्वगंधा का प्रयोग ताकत के लिए होता है तो कालमेघ लिवर के मरीजों में मददगार साबित होता है। आर्टीमीशिया से मलेरिया, सर्पगंधा से रक्तचाप, ब्राह्मïी से अवसाद और हरितिकी से पेट रोगों से जूझने में मदद मिलती है। मनोरोगियों के इलाज में एक्यूरेस कैल्मस नामक पौधे का प्रयोग होता है। तुलसी और गुग्गल तो मल्टीटास्किंग पौधे माने जाते हैं। तुलसी एंटीवायरल है, वहीं गुग्गल कोलेस्ट्राल बढऩे से रोकने के साथ हृदय रोगों सहित तमाम गंभीर समस्याओं का समाधान करता है।
हर्बल गार्डेन व प्रशिक्षण पर जोर
प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय के अनुसार इस योजना में हर्बल गार्डेन की स्थापना के साथ प्रशिक्षण पर भी जोर दिया जाएगा। इसके अंतर्गत पांच हेक्टेयर क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण पौधों की नर्सरी लगाई जाएगी, वहीं दो हर्बल गार्डेन स्थापित किये जाएंगे। इसके अलावा औषधीय पौधों की खेती के लिए चिह्नित किसानों को 50-50 के बैच में बुलाकर प्रशिक्षित किया जाएगा।

Monday, 21 December 2015

आधी रात जगाकर आपदा में भेजा, अब काट रहे वेतन

-नेपाल में लोगों को बचाने गए रोडवेज परिचालकों पर गिरी गाज
-परिवहन निगम प्रबंध निदेशक ने दिये जांच व कार्रवाई के निर्देश
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
नेपाल में आई आपदा के दौरान मदद के लिए भेजे गए परिचालक अब परेशान हैं। पहले तो उन्हें आधी रात में जगाकर नेपाल भेज दिया गया, अब उनका वेतन काटा जा रहा है। इससे परेशान परिचालक परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक की शरण में गए तो उन्होंने मामले की जांच के साथ अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिये हैं।
इसी वर्ष 25 अप्रैल को नेपाल में आए भीषण भूकंप के राज्य परिवहन निगम की बसें उसी रात में ही नेपाल के लिए रवाना हो गयी थीं। गोरखपुर व आसपास जो बसें सड़क पर थीं, उनके अलावा डिपो में खड़ी बसों को भी नेपाल भेजने के आदेश हुए थे, ताकि वहां से लोगों को राहत सामग्र्री भेजी जा सके और आपदा से बचाकर लाया भी जा सके। तमाम चालकों-परिचालकों को आधी रात में घरों से जगाकर ड्यूटी पर भेजा गया था। उस समय सभी लोग चाहे-अनचाहे ड्यूटी पर गए। उन्हें भोजन आदि के लिए 2500 रुपये भी दिये गए थे।
त्रासदी के दौरान कई दिनों तक ये लोग नेपाल तक आते-जाते रहे। आपदा के लगभग छह माह बाद अक्टूबर में अचानक परिचालकों के वेतन से पैसे काटने शुरू कर दिये गए। परिचालकों को कम वेतन मिला तो उन्हें बताया गया कि नेपाल में आपदा राहत ड्यूटी के दौरान भोजन आदि के लिए जो 2500 रुपये दिये गए थे, वह काटे जा रहे हैं। परिचालकों ने गोरखपुर क्षेत्र के अधिकारियों से संपर्क किया तो कहा गया कि उस आपदा के दौरान सिर्फ चालकों की जरूरत थी, क्योंकि टिकट बनने नहीं थे और सिर्फ आपदा राहत सामग्र्री लेकर जाना था और वहां से पीडि़तों को लेकर शिविरों तक पहुंचाना था। ऐसे में परिचालकों की जरूरत नहीं थी, फिर भी वे गए इसलिए वेतन काटा गया है। परिचालकों का कहना था कि वे अपने मन से नहीं गए उन्हें तो भेजा गया था। कोई सुनवाई न होने पर परिचालकों ने प्रबंध निदेशक के. रविन्द्र नायक से गुहार लगाई। उन्होंने परिचालकों के तर्क को सही माना। उनका कहना था कि परिचालकों को भेजने वाले अधिकारियों की गल्ती है। उन्होंने मामले की जांच के आदेश देने के साथ क्षेत्रीय प्रबंधक सहित उन अधिकारियों को चिह्नित करने को कहा है, जिन्होंने इन परिचालकों को भेजा है। उक्त धनराशि की कटौती इन अधिकारियों के वेतन से होगी। 

भाजपाई दिखाएंगे वाजपेयी से मोदी तक की सुशासन यात्रा

-अटलबिहारी के जन्मदिन 25 से 31 दिसंबर तक सुशासन सप्ताह
-केंद्र से आए पिछली व मौजूदा राजग सरकारों की उपलब्धियों के वीडियो
राज्य ब्यूरो, लखनऊ: भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन 25 से 31 दिसंबर तक सुशासन सप्ताह के रूप में मनाने का फैसला लिया है। इस दौरान हर जिले में विशेष आयोजन कर वाजपेयी से मोदी तक की सुशासन यात्रा दिखाई जाएगी। इसके लिए केंद्र से पिछली व वर्तमान राजग सरकार की उपलब्धियों के वीडियो भेजे गए हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन वैसे भी भारतीय जनता पार्टी हर वर्ष मनाती रही है। इस बार 25 दिसंबर को तो सभी जिलों में भाजपा कार्यकता सुशासन दिवस के रूप में मनाएंगे, ही उसके बाद पूरे एक सप्ताह तक विशेष आयोजन होंगे। वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी होने हैं, ऐसे में प्रदेश में इन आयोजनों को लेकर पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व भी गंभीर है। यही कारण है कि रविवार को दिल्ली में हुई बैठक में पार्टी के प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल को जिलावार आयोजनों पर सीधी नजर रखने को कहा गया है। बंसल ने बताया कि 25 दिसंबर से 31 दिसंबर तक पूरे प्रदेश में सुशासन सप्ताह मनाया जाएगा। इस दौरान हर जिले में अलग-अलग कार्यक्रम होंगे, जिनमें कार्यकर्ताओं के साथ आम जनता का जुड़ाव भी सुनिश्चित किया जाएगा। क्षेत्रवार पार्टी के बड़े नेताओं के कार्यक्रम अलग-अलग जिलों में लगाए जाएंगे। इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के सुशासन और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को मिलाकर जनता को सीधे जोड़ा जाएगा। उन्हें दस-दस मिनट के दो वीडियो दिखाए जाएंगे, जिनमें अटल सरकार की उपलब्धियों के साथ मोदी सरकार की अब तक की तमाम योजनाओं का ब्योरा होगा। कार्यकर्ताओं को श्रेष्ठ भारत की ओर, सुशासन के रास्ते बेहतर जिंदगी के वास्ते जैसे नारों के साथ केंद्र सरकार की उपलब्धियां बताई जाएंगी। इनमें देश में डेढ़ करोड़ एलईडी बल्बों का वितरण, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा, सुकन्या, मुद्रा बैंक जैसी योजनाओं के साथ स्वच्छता अभियान पर जोर दिया जाएगा। रोज 18 किलोमीटर सड़क निर्माण को अगले साल तक बढ़ा तीस किलोमीटर रोज करने सहित भविष्य की योजनाओं की जानकारी भी दी जाएगी।

यूपी में नहीं रुकेगी डीजल वाहनों की बिक्री


साक्षात्कार परिवहन आयुक्त
प्रदूषण के मामले में दिल्ली की लगातार खराब होती हालत पर चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने वहां तीन महीने के लिए हाई एंड डीजल वाहनों की बिक्री पर रोक लगा दी है। उत्तर प्रदेश के भी कई शहरों में प्रदूषण जानलेवा स्तर तक पहुंच चुका है। परिवहन विभाग इस दिशा में विशेष अभियान चलाकर प्रदूषण रोकने की पहल तो कर रहा है किन्तु दिल्ली जैसा कठोर कदम उठाने के पक्ष में नहीं है। परिवहन आयुक्त के रविन्द्र नायक ने दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता डॉ.संजीव से बातचीत में साफ कहा कि उत्तर प्रदेश में डीजल वाहनों की बिक्री रोकने का कोई इरादा नहीं है।
-उत्तर प्रदेश में प्रदूषण की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है, परिवहन विभाग इस दिशा में कठोर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है?
--पूरे प्रदेश में एक हजार प्रदूषण जांच केंद्र खोले जा रहे हैं। इन्हें परिवहन कार्यालयों से इतर निजी क्षेत्र को सौंपा गया है और उन्हें अत्याधुनिक फोटोयुक्त पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल प्रमाण पत्र देना होगा। एक जनवरी से प्रदेश भर में एक साथ प्रदूषण चेकिंग के लिए अभियान चलेगा और इसमें बिना प्रमाण पत्र चलते पाए गए वाहनों पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
-सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में भारी डीजल वाहनों का पंजीकरण प्रतिबंधित कर दिया है, प्रदेश में इस तरह की पहल क्यों नहीं करते?
--वह अदालत का फैसला है। प्रदेश से कोई अदालत में याचिका कर ऐसा फैसला ले आएगा, तो हम भी अमल में लाएंगे। हम अपने स्तर से ऐसा कोई फैसला नहीं करेंगे। हां कानपुर, लखनऊ, आगरा जैसे शहरों में हम पहले ही डीजल चालित वाणिज्यिक वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित कर चुके हैं। इस पर सख्ती से अमल कराया जा रहा है। हाल ही में अकेले लखनऊ में 600 ऐसी गाडिय़ों का परमिट निरस्त किया गया है, जो शहर के भीतर अवैध ढंग से चलती मिली थीं।
-केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि संभागीय परिवहन अधिकारी (आरटीओ) अत्यधिक भ्रष्ट व चंबल के डकैतों की तरह हैं?
--यह उनकी राय है। मैं विभाग के मुखिया के रूप में अपने साथियों के मामले में ऐसी राय नहीं बना सकता। विभाग के स्तर पर पारदर्शिता बनाए रखने की कोशिश हो रही है, ताकि भ्रष्टाचार न हो। सभी आरटीओ का संपत्ति का नियमित ब्योरा लिया जाता है। जो नहीं जमा करते उनके खिलाफ कार्रवाई होती है। शिकायत होने पर विजिलेंस व अन्य जांचें भी कराई जाती हैं।
-फिर भी परिवहन विभाग की भ्रष्ट विभाग के रूप में बनी छवि तो चिंताजनक है ही?
--इसे सुधारने के लिए दफ्तरों से जनता का सीधा संवाद कम करने की कोशिश हो रही है। ऑनलाइन लर्निंग लाइसेंस के साथ अब टैक्स भी ऑनलाइन जमा हो जाएगा। उसके लिए आरटीओ दफ्तर जाने की जरूरत नहीं है। जब जनता के दफ्तर जाने की जरूरत ही नहीं रहेगी, तो भ्रष्टाचार स्वयमेव कम होगा। इसके अलावा 28 आरटीओ दफ्तरों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं, जो इंटरनेट के माध्यम से सीधे परिवहन आयुक्त कार्यालय, लखनऊ से जुड़े रहेंगे। इसकी शुरुआत हो गयी है। यहां बैठकर हम आकस्मिक पूछताछ भी करते हैं। इससे दलालों का आरटीओ दफ्तरों में प्रवेश कम हुआ है।
-परिवहन विभाग के अफसर पर्चियां देकर ओवरलोडिंग करा रहे हैं। ऐसी समानांतर व्यवस्था क्यों नहीं रुक पा रही?
--हम जनता से भी सबूत मांगते हैं और खुफिया विभाग की सक्रियता की अपेक्षा भी करते हैं। अपने स्तर पर इसे रोकने के लिए प्रदेश में राजमार्गों पर 40 स्थानों पर कम्प्यूटरीकृत धर्मकांटे लग रहे हैं। ये 'वे इन मोशनÓ धर्मकाटे सड़कों पर लगेंगे और चलते हुए वाहन का वजन तौल लेंगे। इससे हमें ऑनलाइन डेटा मिल जाएगा। इसके लिए एनएचएआइ से बात हो रही है और इस योजना की सफलता के बाद ओवरलोडिंग बंद हो जाएगी। ओवरलोडिंग करने वाले ड्राइवर का लाइसेंस निरस्त करने की कार्रवाई होती है और हर साल औसतन दो सौ करोड़ रुपये जुर्माना भी किया जा रहा है।
-जो नियम बने हैं, उनका पालन भी नहीं हो रहा है। उसमें क्या बाधा है?
--मोटर वेहिकिल एक्ट का उल्लंघन रोकने के लिए आरटीओ के साथ यातायात पुलिस का सहयोग भी जरूरी है। इसके बिना समस्या होती है। इसके अलावा लोकतांत्रिक प्रणाली में तमाम दबाव समूह भी काम करते हैं, जिनसे निपटना पड़ता है। यदि पुलिस-प्रशासन सहयोग करे तो काम बहुत आसान हो जाए, किन्तु ऐसा नहीं होता है।
-आप परिवहन निगम के भी प्रबंध निदेशक हैं। राज्य में बस अड्डों के बगल से डंके की चोट पर डग्गामारी हो रही है?
--यह सच है कि पूरे प्रदेश में कई स्थानों पर बस अड्डों के पास से निजी संचालक बसें चला रहे हैं। इन बसों का संचालन निहित स्वार्थों और कई विभागों द्वारा संरक्षण दिये जाने के कारण संभव होता है। इस पर अंकुश के लिए पुलिस व प्रशासन को मदद करनी होगी। हमारे अधिकारी थाने जाकर शिकायत करते हैं तो पुलिस मुकदमा तक नहीं करती। कहीं-कहीं तो उल्टा हमारे अफसरों पर मुकदमा हो जाता है। नगर निगम के लोगों को इन अवैध अड्डों पर अंकुश लगाना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं होता।
-रोडवेज बसों की हालत खराब है, समयबद्ध संचालन भी नहीं होता?
--रोडवेज बसों की हालत ठीक करने के लिए हम पूरे प्रदेश में औचक निरीक्षण करवा रहे हैं। बसों की फोटो तक खिंचवाकर मंगवा रहे हैं, ताकि उन्हें ठीक करवाया जा सके। अब सिर्फ चाक-चौबंद बसें ही सड़क पर उतरेंगी। एक जनवरी से पूरे प्रदेश में समय सारिणी लागू हो जाएगी। उसके बाद सामान्य बसों की भी ऑनलाइन बुकिंग होगी और यात्रा निश्चित रूप से सुगम होगी। 

Sunday, 20 December 2015

इंटर्नशिप में ज्यादा पैसा चाहते भावी डॉक्टर


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-प्रदेश के सभी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में हस्ताक्षर अभियान
-केंद्रीय मेडिकल कालेजों के बराबर भत्ता देने की हो रही मांग
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई कर रहे भावी डॉक्टर इंटर्नशिप में ज्यादा धन चाहते हैं। इसके लिए प्रदेश भर के छात्र-छात्राओं ने सभी मेडिकल, होम्योपैथी, आयुर्वेदिक व यूनानी कालेजों में हस्ताक्षर अभियान से आंदोलन की शुरुआत की है। मांग है कि इन्हें कम से कम केंद्रीय चिकित्सा शिक्षा संस्थानों के बराबर इंटर्नशिप भत्ता तो दिया ही जाए।
चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में एमबीबीएस, बीएचएमएस, बीएएमएस व बीयूएमएस करने वाले विद्यार्थियों को साढ़े चार साल तक कक्षाओं में अध्ययन के बाद संस्थान से संबद्ध अस्पताल में एक साल की इंटर्नशिप करनी होती है। इस दौरान उन्हें 7500 रुपये प्रति माह भत्ता मिलता है। अब ये विद्यार्थी हस्ताक्षर अभियान चलाकर इंटर्नशिप भत्ता बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि महंगाई के इस दौर में यह राशि बहुत कम है और उन्हें मिलने वाला 250 रुपये रोज तो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के दैनिक भत्ते से भी कम है। बीएचयू व एएमयू के मेडिकल कालेजों में 13,500 रुपये प्रतिमाह इंटर्नशिप भत्ता मिलता है। उन्हें कम से कम इन केंद्रीय संस्थानों के बराबर ही भत्ता दिया जाए। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी का कहना है कि इंटर्नशिप भत्ता कम नहीं है। फिर भी यदि उन्हें कोई प्रतिवेदन मिलता है तो प्रधानाचार्यों से बात कर शासन को संस्तुति करेंगे।
प्रदेश स्तरीय संघर्ष समिति बनी
भविष्य के डॉक्टर इस मसले पर आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। इसके लिए दुर्गेश चतुर्वेदी के नेतृत्व में राज्य स्तरीय संघर्ष समिति बनाई गयी है। इसमें केजीएमयू लखनऊ से अजीत यादव, मेडिकल कालेज, कानपुर से राज गुप्ता, इलाहाबाद से श्याम कुमार व जय राम, आगरा से राहुल सिंह, झांसी से आनंद यादव, सैफई से आलोक व व्युत्पन्न मिश्र, अंबेडकर नगर से अमित व धीरज, कन्नौज से सुरेंद्र को शामिल किया गया है। होम्योपैथी कालेजों से रान अभय सिंह, शिवप्रताप सिंह व संकल्प चावला, यूनानी कालेजों से फय्याज व आसिम को इस समिति से जोड़ा गया है।
निजी कालेज नहीं देते धेला
निजी कालेजों में लाखों रुपये खर्च कर एमबीबीएस करने वाले छात्र-छात्राओं को वहां के संबद्ध अस्पतालों में इंटर्नशिप करने पर धेला नहीं मिलता है। नियमानुसार इन कालेजों को भी इंटर्नशिप भत्ता देना चाहिए किन्तु ये छात्र-छात्राओं की ड्यूटी अस्पतालों में लगाते हैं, हस्ताक्षर भी कराते हैं किन्तु भत्ता नहीं देते।
पीजी की तैयारी को छोड़ते भत्ता
हर साल बड़ी संख्या में विद्यार्थी पीजी की तैयारी के लिए भत्ता त्याग भी देते हैं। दरअसल यदि कोई विद्यार्थी अपने कालेज से संबद्ध अस्पताल छोड़कर कहीं और इंटर्नशिप करता है, तो उसे भत्ता नहीं मिलता है। परास्नातक की तैयारी के लिए तमाम सरकारी जिला अस्पतालों में इंटर्नशिप करने की पहल करते हैं, क्योंकि सेटिंग हो जाती है और उन्हें बहुत कम जाना पड़ता है। इस दौरान वे पढ़ाई करते हैं, ताकि एमडी या एमएस जैसी कक्षाओं में प्रवेश मिल सके।

आधुनिकीकरण व सख्ती के साथ बढ़ेंगे मानव संसाधन


यातायात सुरक्षा अभियान
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-फिटनेस पिट्स व ड्राइविंग ट्रैक्स बनाने की तैयारी
-75 आरआइ भर्ती कर फिटनेस प्रक्रिया होगी सुगम
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सुरक्षित यातायात के लिए परिवहन विभाग मानव संसाधन की अराजकता रोकने पर काम कर रहा है। अब आधुनिकीकरण व सख्ती के साथ मानव संसाधन वृद्धि पर जोर देने की तैयारी है।
परिवहन विभाग में कर्मचारी तो कम हैं ही और जो हैं, वे ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए परिवहन विभाग का जोर अब उचित मानव संसाधन प्रबंधन पर है। आरटीओ दफ्तरों से जुड़े अफसरों को लक्ष्य आधारित कामकाज सौंपने के साथ हर स्तर पर सख्ती की जा रही है। अपर परिवहन आयुक्त (प्रशासन) डॉ.राजेंद्र प्रसाद मानते हैं कि कर्मचारियों की कमी के कारण फिटनेस जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। सड़क तमाम वाहन फिटनेस के पर्याप्त परीक्षणों के बिना फिटनेस प्रमाण पत्र लेकर आ जाते हैं। इसके लिए सीधी जिम्मेदारी रीजन इंस्पेक्टर यानी आरआइ की होती है। आरआइ वास्तव में लाइसेंसिंग अथॉरिटी व पंजीयन अधिकारी, दोनों रूप में काम करते हैं। आरआइ की संख्या बेहद कम होने के कारण समस्या आ रही है। अब प्रदेश में 75 नए आरआइ भर्ती करने की पहल हुई है, ताकि हर जिले में कम से कम एक आरआइ तो हो ही। जिन जिलों में वाहनों का लोड अधिक है, वहां दो या अधिक आरआइ भी नियुक्त किये जा सकेंगे। इसके लिए लोक सेवा आयोग में भर्ती की प्रक्रिया भी शुरू हो गयी है।
संभागीय परिवहन कार्यालयों के आधुनिकीकरण पर भी जोर दिया जा रहा है। अभी फिटनेस जांचने के लिए आरटीओ दफ्तरों में फिटनेस पिट्स नहीं थे। इन्हें हर दफ्तर में बनवाना सुनिश्चित करने के निर्देश दिये गए हैं। ड्राइविंग के परीक्षण के लिए आरटीओ दफ्तरों में स्वचालित कम्प्यूटरीकृत ड्राइविंग ट्रैक्स बनाने का फैसला हुआ है। इन ट्रैक्स पर स्पीड ब्रेकर, मोड़, लाल-हरी बत्ती आदि बिल्कुल मुख्य मार्गों की तरह होंगे। गाड़ी ड्राइव करते समय चालक द्वारा की गल्तियां खुद रिकार्ड हो जाएंगी और फिर उसी हिसाब से पास-फेल का रिजल्ट आएगा। जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में गठित सड़क सुरक्षा समितियों को भी सक्रिय करने के लिए उन्हें पत्र लिखे जा रहे हैं।

Thursday, 17 December 2015

52 संस्थानों को मंजूरी, बढ़ेंगी नर्सिंग की 2500 सीटें

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-नर्सिंग काउंसिल में आवेदन का आज आखिरी दिन
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के 52 संस्थानों में नर्सिंग पाठ्यक्रमों को मंजूरी मिल गयी है। अगले वर्ष से बीएस-सी नर्सिंग की एक हजार व जीएनएम व एएनएम की 1500 नयी सीटों पर प्रवेश लेकर पढ़ाई शुरू कराने की तैयारी है। शासन से अनुमति के बाद शुक्रवार को नर्सिंग काउंसिल में आवेदन किया जाएगा। शुक्रवार 18 दिसंबर ही काउंसिल में आवेदन की अंतिम तारीख है।
लगातार खुल रहे मेडिकल कालेजों के बीच नर्सों की कमी समस्या बनकर सामने आ रही थी। इसी का सामना करने के लिए नर्सिंग काउंसिल ने मान्यता की शर्तों में कुछ ढिलाई की थी। अब जीएनएम व एएनएम की पढ़ाई के लिए भवन, छात्रावास व अस्पताल यदि संस्था का न हो, तो भी पाठ्यक्रम शुरू किया जा सकेगा। इसके बाद निजी क्षेत्र से आवेदनों की बाढ़ सी आ गयी थी। उधर चिकित्सा शिक्षा विभाग ने भी अपने सभी मेडिकल कालेजों में नर्सिंग पाठ्यक्रम संचालन का फैसला किया था। प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय के मुताबिक कानपुर मेडिकल कालेज में 1992 से बंद चल रहा बीएस-सी नर्सिंग पाठ्यक्रम दोबारा शुरू किया जाएगा। इलाहाबाद के जीएनएम पाठ्यक्रम को अपग्रेड कर बीएस-सी नर्सिंग में बदला जाएगा और आगरा में बीएस-सी नर्सिंग पाठ्यक्रम शुरू किया जाएगा।
वैसे नर्सिंग पाठ्यक्रमों के लिए आवेदन करने वाले संस्थानों के निरीक्षण में भी विलंब हुआ। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय व स्टेट मेडिकल फैकल्टी, दोनों के बीच कुछ खींचतान की स्थिति भी बनी, बाद में स्टेट मेडिकल फैकल्टी ने निरीक्षण किया और 52 संस्थानों को मंजूरी दी। इनमें से 27 में बीएस-सी नर्सिंग और 25 में एएनएम व जीएनएम कोर्स का सत्यापन होगा। अब शुक्रवार को आवेदन के अंतिम दिन नर्सिंग काउंसिल में इन सभी 52 संस्थानों के आवेदन अग्रसारित कर भेजने की तैयारी है। फैकल्टी के सचिव डॉ.राजेश जैन का कहना है कि एक साथ 2500 नर्सिंग सीटें बढऩे से निश्चित रूप से क्रांतिकारी बदलाव आएगा।
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Wednesday, 16 December 2015

मेडिकल कालेजों में बढ़ेंगे नर्सिंग व फार्मेसी पाठ्यक्रम

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-मेडिकल फैकल्टी का फैसला-
-कानपुर, आगरा व इलाहाबाद में बीएससी नर्सिंग व बीफार्मा की पढ़ाई
-मेरठ में एमएससी नर्सिंग के साथ केंद्र से बीफार्मा पर एमओयू
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : मेडिकल कालेजों में नर्सिंग व फार्मेसी पाठ्यक्रम बढ़ाने का फैसला हुआ है। बुधवार को हुई राज्य मेडिकल फैकल्टी के शासी निकाय की बैठक में तय हुआ कि कानपुर, आगरा व इलाहाबाद में बीएससी नर्सिंग व बीफार्मा की पढ़ाई होगी। मेरठ में एमएससी नर्सिंग के साथ बीफार्मा पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से एमओयू पर जल्द हस्ताक्षर होंगे।
मेडिकल फैकल्टी की बैठक में जानकारी दी गयी कि कानपुर मेडिकल कालेज से संबद्ध बीएससी नर्सिंग पाठ्यक्रम 1992 से बंद चल रहा है। इसे अगले शैक्षिक सत्र से पुन: चालू करने का फैसला हुआ। आगरा में बीएससी नर्सिंग पाठ्यक्रम को केंद्र की मंजूरी मिल गयी है। इसके लिए धन भी आ गया है। वहां पद सृजन कर हर हाल में जुलाई 2016 से पढ़ाई शुरू करा दी जाए। इलाहाबाद में चल रहे जीएनएम के पाठ्यक्रम को अपडेट कर वहां बीएससी नर्सिंग पाठ्यक्रम शुरू किया जाएगा। मेरठ मेडिकल कालेज में एमएससी नर्सिंग पाठ्यक्रम शुरू करने का फैसला हुआ।
नर्सिंग के अलावा बीफार्मा पाठ्यक्रमों को भी मेडिकल फैकल्टी की ओर से मजबूती प्रदान करने का फैसला किया गया। मेरठ में बीफार्मा पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए केंद्र सरकार से मंजूरी मिल चुकी है किंतु अब तक उसके लिए आवश्यक एमओयू पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। तय हुआ कि औपचारिकताएं पूरी कर जल्द से जल्द उक्त एमओयू पर हस्ताक्षर सुनिश्चित कराए जाएं। कानपुर, इलाहाबाद व आगरा में बीफार्मा पाठ्यक्रम शुरू करने पर सहमति बनी। इसके लिए भारत सरकार को तत्काल प्रस्ताव भेजने के निर्देश इन कालेजों के प्राचार्यों को दिये गए। प्रदेश के मेडिकल कालेजों में चल रहे फार्मेसी के पाठ्यक्रमों को लेकर फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआइ) का निरीक्षण हो चुका है। पीसीआइ ने जो कमियां इंगित की हैं, उन्हें एक सप्ताह के भीतर दूर किया जाए।
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चारो कालेजों को एक-एक करोड़
प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूपचंद्र पाण्डेय ने बताया कि आगरा, मेरठ, इलाहाबाद व कानपुर मेडिकल कालेजों में नर्सिंग व फार्मेसी का आधारभूत ढांचा ठीक करने की जरूरत है। इन चारो कालेजों को एक-एक करोड़ रुपये की राशि जीर्णोद्धार के लिए देने का फैसला हुआ है। बैठक में मेडिकल फैकल्टी के अध्यक्ष डॉ.वीएन त्रिपाठी व सचिव डॉ.राजेश जैन सहित मेडिकल कालेजों के प्राचार्य मौजूद थे। 

बढ़े पेंशनर तो कोषागार ने मांगे 150 अफसर

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-परिवहन सहित अन्य निगम कर रहे कोषागार से पेंशन की मांग
-शासन से मांगे 861 लेखाकार, खाली पड़े हैं आधे से अधिक पद
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : बिजली कर्मचारियों को कोषागार से पेंशन दिलाने के प्रस्ताव के बाद परिवहन निगम सहित कई अन्य निगम व विभाग भी कोषागार से पेंशन की मांग कर रहे हैं। ऐसे में पेंशनर बढऩे के साथ ही कोषागार ने शासन से 150 अफसर मांगे हैं। लेखाकार के खाली पड़े आधे से अधिक पदों को भरने के लिए भी शासन से 861 लेखाकार मांगे गए हैं।
राज्य मंत्रिमंडल की शुक्रवार को प्रस्तावित बैठक में पावर कॉरपोरेशन सहित सभी बिजली कंपनियों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों को कोषागार के माध्यम से पेंशन दिलाने का प्रस्ताव आने वाला है। सरकार इस बारे में सैद्धांतिक सहमति बना चुकी है। परिवहन निगम सहित कई अन्य निगमों के कर्मचारी भी कोषागार से ही पेंशन दिलाने की मांग कर रहे हैं। पावर कॉरपोरेशन कर्मियों को कोषागार से पेंशन मिलने के बाद इन निगमों का दबाव भी बढ़ेगा। दरअसल कोषागार से पेंशन हर हाल में महीने की आखिरी तारीख या अगले महीने की पहली तारीख तक पेंशनर के खाते में पहुंच जाती है। इसके विपरीत कई निगमों में तो वेतन तक के लाले पड़े हैं। ऐसे में निगमों के कर्मचारी कोषागार से पेंशन चाहते हैं, ताकि वेतन में भले ही विलंब हो, वृद्धावस्था तो समय पर पेंशन के साथ ठीक से कटे।
कोषागार निदेशक लोरिक यादव के अनुसार पावर कॉरपोरेशन के बाद परिवहन निगम के स्तर पर भी जल्द ही कोषागार से पेंशन का प्रस्ताव चल रहा है। दो साल पहले बेसिक शिक्षा महकमा भी पेंशन के लिए कोषागार से जुड़ गया था। इसके बावजूद मानवशक्ति में वृद्धि के बजाय कमी ही हुई है। अब पेंशनर बढऩे की बात सामने आने पर शासन से डेढ़ सौ कोषागार अधिकारी और मांगे गए हैं। प्रदेश के 75 कोषागारों में अभी एक-एक कोषागार अधिकारी हैं, इन सभी में कम से कम दो-दो कोषागार अधिकारियों की और जरूरत है। 150 कोषागार अधिकारी मिलने पर कामकाज ठीक हो सकेगा। उन्होंने बताया इस समय लेखाकार के भी आधे से अधिक पद खाली हैं। प्रदेश भर में सहायक लेखाकार के 304 व लेखाकार के 557 पद रिक्त हैं। सहायक लेखाकार के 304 पदों के लिए तो लोक सेवा आयोग में अधियाचन गया है, किंतु शासन से कुल 861 पदों पर भर्ती का प्रस्ताव किया गया है। इसके बाद न सिर्फ कामकाज सुधरेगा, बल्कि पेंशनरों की सुख-सुविधा का भी अधिक ध्यान रखने में सफलता मिलेगी। 

Tuesday, 15 December 2015

जादुई आंखें जांच लेती हैं गाड़ी की फिटनेस


सड़क सुरक्षा अभियान
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-आरटीओ में नहीं होता जांच प्रक्रिया का पालन
-कई बार तो गाड़ी के पास जाए बिना ही आरआइ देते प्रमाणपत्र
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डॉ.संजीव, लखनऊ : क्या परिवहन कर्मचारियों के पास जादुई आंखें हैं जो वे गाड़ी के पास भी गए बिना उसे फिटनेस सर्टिफिकेट दे देते हैं। लगता तो ऐसा ही है क्योंकि बिना शीशे वाली बसों और जर्जर ट्रकों का सड़क पर उतरना तभी संभव है जब उन्हें परिवहन विभाग से पूरी छूट हासिल हो।
सात सीटों से कम क्षमता वाले निजी वाहनों को छोड़कर बाकी सभी को पंजीकरण के बाद पहली दफा दो वर्ष में और फिर हर वर्ष अपना फिटनेस परीक्षण कराना जरूरी होता है। इसके लिए हर संभागीय परिवहन कार्यालय में एक आरआइ जिम्मेदार होता है। परिवहन विभाग के अनुसार इस समय नियमित फिटनेस कराने वाले लगभग सात लाख वाहन सड़कों पर हैं। फिटनेस जांचने का दावा भी किया जाता है किंतु असलियत उलट है।नियमानुसार गाड़ी की फिटनेस जांचते समय उसके शीशे, सीटें, टायर आदि के साथ लाइट, ब्रेक व स्टियरिंग की पड़ताल ठीक से होनी चाहिए। हर गाड़ी में पीछे लाल, आगे सफेद और दोनों साइड में पीला फ्लोरोसेंट टेप चिपकाना जरूरी है। देखा जाना चाहिए कि घिसे टायर आगे न लगे हों और स्टियरिंग से छेड़छाड़ न की गई हो। इस प्रक्रिया से एक गाड़ी की फिटनेस जांचने में 40 मिनट से एक घंटा लग सकता है। गाड़ी चलाकर, ब्रेक लगाकर, लाइट जलाकर देखना तो दूर, कई बार तो आरआइ गाड़ी के पास तक नहीं जाते।
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11 लाख अनफिट गाडिय़ां
परिवहन आयुक्त के. रविन्द्र नायक मानते हैं कि प्रदेश में 11 लाख अनफिट गाडिय़ां हैं। इन वाहनों ने वर्षों से टैक्स नहीं जमा किया है और फिटनेस के लिए भी नहीं आ रहीं। ऐसी गाडिय़ों के मालिक इन्हें ग्र्रामीण क्षेत्रों या अन्य जिलों में भेज देते हैं। विभाग के पास ऑनलाइन वेरीफाइंग सिस्टम न होने के कारण इन्हें पकडऩा संभव नहीं होता।
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मुस्तैद नहीं आरटीओ दफ्तर
फिटनेस मापने के लिए जिम्मेदार आरआइ तो गंभीर हैं ही नहीं, व्यवस्थाओं के मामले में भी संभागीय परिवहन दफ्तर भी मुस्तैद नहीं। दफ्तरों में गाड़ी चलाकर देखने की व्यवस्था तो है ही नहीं, फिटनेस जांचने के लिए सर्वाधिक जरूरी फिटनेस पिट्स तक नहीं हैं। फिटनेस पिट्स पर गाडिय़ां खड़ी करके उनके नीचे घुस कर फिटनेस जांची जाती है। इनके बिना जांच महज औपचारिकता है।
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दौड़ रहीं सैकड़ों खटारा बसें
परिवहन विभाग की मिलीभगत से फर्जी फिटनेस के आधार पर निजी खटारा बसें तो दौड़ ही रही हैं, रोडवेज की भी 500 खटारा सड़कों पर हैं। प्रदेश में रोडवेज बसों का काफिला नौ हजार का है। इनमें से 500 बसों की स्थिति बहुत खराब है। अनेक बसों में शीशे बंद नहीं होते और सीटें फटी हुई हैं। अधिकारियों ने माना कि कभी-कभी ऑब्जेक्शन लगाए जाते हैं लेकिन गाडिय़ां फिर भी फिटनेस पाकर चलती रहती हैं।

छह दिन में आठ करोड़ को फाइलेरिया की दवा


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-33 जिलों में आज से दवा खिलाने का विशेष अभियान
-घर-घर जाएंगे स्वास्थ्य कर्मी, बनीं रैपिड रिस्पांस टीमें
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश से फाइलेरिया को जड़ से समाप्त करने के लिए मंगलवार से अभियान चलाकर आठ करोड़ लोगों को फाइलेरिया की दवा खिलाई जाएगी। इस दौरान 33 जिलों में स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाएंगे। प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर पर रैपिड रिस्पांस टीमें भी बनी हैं।
वर्ष 2014-15 में प्रदेश में अब तक 1427 फाइलेरिया के मरीज चिह्नित हो चुके हैं। वेक्टर जनित रोगों के उपचार व अनुरक्षण के प्रभारी अपर निदेशक डॉ. राकेश सक्सेना के मुताबिक फाइलेरिया के दुनिया भर के रोगियों में से 40 फीसद भारत में हैं। भारत के जिन 255 जिलों में यह रोग फैला है, उनमें 51 उत्तर प्रदेश में हैं। इन 51 में से सर्वाधिक प्रभावित 33 जिलों में छह दिन का विशेष अभियान चलाकर हर घर तक पहुंचकर कुल आठ करोड़ लोगों को फाइलेरिया की दवा दी जाएगी। इस दौरान दो साल से छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं व गंभीर रूप से बीमार लोगों को यह दवा नहीं दी जाएगी। कोई समस्या आने पर समाधान के लिए हर प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर एक रैपिड रिस्पांस टीम मौजूद रहेगी। टीम के साथ एक एंबुलेंस भी तैयार रखने के निर्देश दिये गए हैं। फाइलेरिया मुख्य रूप से गंदे पानी में पैदा होने वाले यूलेक्स मच्छर से फैलता है। इस अभियान के दौरान लोगों को सफाई के प्रति जागरूक भी किया जाएगा। 15 से 17 दिसंबर तक तीन दिन फाइलेरिया दिवस के रूप में मनाकर दवा बांटने का लक्ष्य है। फिर भी बचे रह गए लोगों को अगले तीन दिन 18 से 20 दिसंबर तक दवा दी जाएगी। दवा वितरण वाले 33 जिलों के अलावा 18 जिलों में ट्रांसमिशन एसेसमेंट सर्वे होगा, जिससे इन जिलों में रोग की मौजूदा स्थिति का आकलन किया जा सके।
इन जिलों में अभियान
अमेठी, आजमगढ़, बलरामपुर, बांदा, बाराबंकी, देवरिया, फैजाबाद, फर्रुखाबाद, फतेहपुर, गोंडा, गोरखपुर, हमीरपुर. हरदोई, जौनपुर, कन्नौज, कानपुर देहात, कानपुर नगर, खीरी, लखनऊ, मऊ, मीरजापुर, पीलीभीत, प्रतापगढ़, रायबरेली, संत कबीर नगर, संत रविदास नगर, शाहजहांपुर, श्रावस्ती, सीतापुर, सोनभद्र, सुलतानपुर, उन्नाव व वाराणसी

Saturday, 12 December 2015

बदले नियम हुई सख्ती, फिर भी 11 लाख से ज्यादा संदिग्ध


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-दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में साबित हुईं गड़बडिय़ां
-संस्थानों से माह भीतर मांगे गए जवाब, नहीं होगा कोई भुगतान
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डॉ.संजीव, लखनऊ
शुल्क प्रतिपूर्ति व छात्रवृत्ति मामले में नियम बदलने, खूब सख्ती के बावजूद प्रदेश में हुए आवेदनों में 11 लाख से ज्यादा संदिग्ध पाए गए हैं। तीस बिंदुओं पर पड़ताल कर संदिग्ध आवेदन चिह्नित किये गए हैं। इन सबको वापस भेजकर संबंधित संस्थानों से एक माह भीतर जवाब मांगा गया है। संदेहों का समाधान न होने पर इन संस्थानों का कोई भुगतान नहीं होगा।
दसवीं के बाद धनाभाव में पढ़ाई न रुकने देने के लिए दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति योजना में तमाम गड़बडिय़ां व करोड़ों को घोटाला सामने आने के बाद न सिर्फ कई संस्थान काली सूची में डाले गए, बल्कि पूरी प्रक्रिया में खासी सख्ती कर दी गयी थी। नियम बदलने के बावजूद फर्जीवाड़ा करने वाले बाज नहीं आए और समाज कल्याण विभाग ने 30 बिंदुओं पर मामलों की जांच कराई तो कुल 33,37,461 आवेदनों में से 11,42,066 आवेदन संदिग्ध पाए गए। इनमें सर्वाधिक 2,42,772 आवेदन तो ऐसे हैं, जिन्होंने विभिन्न प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों में दूसरे, तीसरे, चौथे या पांचवें वर्ष में प्रवेश लिया है। अब इन आवेदनों को वापस कर जिला समाज कल्याण अधिकारियों, पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारियों व अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों से कहा गया है कि वे संस्थानों से जवाब मांगें। 10 जनवरी तक ऑनलाइन जवाब दर्ज किये जाएं। इसके बाद गड़बड़ पाए गए विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति तो नहीं ही मिलेगी, दोषी संस्थानों पर भी कड़ी कार्रवाई होगी।
आय प्रमाणपत्रों का फर्जीवाड़ा
तमाम बंदिशों के बावजूद फर्जी आय प्रमाणपत्रों का बोलबाला रहा है। 94,987 आवेदकों के आय प्रमाणपत्र राजस्व आंकड़ों से मेल नहीं खाते तो 1,06,672 आवेदकों की आय राजस्व आंकड़ों से अलग निकली। 1,19,747 छात्र-छात्राओं ने एक ही आय प्रमाणपत्र क्रमांक का प्रयोग पिता का नाम बदल-बदल कर किया था। 757 मामलों में एक से अधिक आवेदनों में आय प्रमाणपत्र का क्रमांक समान होने के साथ पिता का नाम भी वही था, वहीं 1244 मामले ऐसे मिले, जिनमें एक ही आय प्रमाणपत्र क्रमांक के साथ पिता का नाम तीन बार से अधिक इस्तेमाल किया गया था।
फर्जी जाति व निवास प्रमाणपत्र
जांच में तीन लाख के आसपास फर्जी जाति व निवास प्रमाणपत्र भी मिले हैं। 1,00,868 जाति प्रमाणपत्र राजस्व अभिलेखों से नहीं मिले, वहीं 255 जाति प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल एक से अधिक बार और 1244 का इस्तेमाल तीन से अधिक बार हुआ, जबकि इनमें पिता का नाम एक ही दर्ज था। 1,61,894 मूल निवास प्रमाणपत्र राजस्व अभिलेखों से नहीं मिल सके। 15,172 ऐसे एक ही क्रमांक वाले जाति प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल बार-बार हुआ, जिनमें पिता का नाम एक ही दर्ज था।
रोल नंबर से पकड़ी गड़बड़ी
छानबीन के दौरान 95,848 विद्यार्थियों के हाईस्कूल के रोल नंबर यूपी बोर्ड के आंकड़ों से मेल नहीं खा रहे थे तो 38,036 के इंटरमीडिएट के रोल नंबर अलग थे। 886 ऐसे विद्यार्थी भी पकड़े गए जिन्होंने हाईस्कूल बोर्ड का रोल नंबर ही फर्जी भर दिया था।  6106 के शुल्क क्रमांक में गड़बड़ी मिली। 42,079 के रेकार्ड ही गायब थे, जबकि वे वर्ष 2014-15 में समान कोर्स में पढ़ाई का दावा कर रहे थे।

पांच नए मेडिकल कालेजों में भर्ती होंगी 433 स्टाफ नर्स


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-मुख्यमंत्री की सीधी नजर-
-नए खोलने के साथ कुछ वर्षों में खुले कालेजों की मजबूती पर भी जोर
-अभियान चलाकर भरे जाएंगे खाली पड़े पैरामेडिकल स्टाफ के पद
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
प्रदेश में नए मेडिकल कालेज खोलने की मशक्कत के बीच बीते कुछ वर्षों में खुले कालेजों की मजबूती पर भी जोर दिया जा रहा है। स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन कालेजों की सीधी नजर रख रहे हैं। अब ऐसे पांच कालेजों में 433 स्टाफ नर्स भर्ती करने का फैसला हुआ है। पैरामेडिकल स्टाफ के अन्य पद भी अभियान चलाकर भरे जाएंगे।
प्रदेश में बीते कुछ वर्षों में लगातार मेडिकल कालेज खुले हैं किन्तु चिकित्सकों से लेकर कर्मचारियों तक की कमी से जूझ रहे हैं। वर्ष 2011 में अंबेडकर नगर, 2012 में कन्नौज, 2013 में जालौन व आजमगढ़ और इसी वर्ष 2015 में सहारनपुर मेडिकल कालेज में पढ़ाई शुरू हुई थी। इनमें पढ़ाई व इलाज के स्तर को मजबूत करने के लिए यहां नर्सिंग व पैरामेडिकल स्टाफ की मजबूती पर जोर दिया जा रहा है। प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय के अनुसार इन पांचों कालेजों में 433 स्टाफ नर्सों की भर्ती को मंजूरी दी गयी है। अगले तीन माह में इनकी भर्ती प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। इसके अलावा फार्मासिस्ट, टेक्नीशियन आदि के खाली पदों का ब्योरा सभी कालेजों के प्राचार्यों से मांगा गया है। इन पदों पर भी इसी वित्तीय वर्ष में यानी मार्च 2016 तक अभियान चलाकर भर्तियां कर ली जाएंगी।
हर जगह सीटी-एमआरआइ
प्रमुख सचिव ने बताया कि प्रदेश के हर मेडिकल कालेज में सीटी स्कैन व एमआरआइ की सुविधा मुहैया कराना सुनिश्चित करने के निर्देश दिये गए हैं। इसके लिए खरीद आदेश दे दिये गए हैं और 31 मार्च से पहले सभी कालेजों में सीटी स्कैन व एमआरआइ की उच्च गुणवत्ता वाली मशीनें लग जाएंगी। इस बीच इनके ऑपरेटर्स व अन्य विशेषज्ञों की भर्ती का काम भी पूरा कर लिया जाएगा।
पोंछामुक्त होंगे सभी संस्थान
प्रदेश के सभी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों को पोंछामुक्त बनाने के निर्देश दिये गए हैं। सभी जगह मैकेनाइज्ड मशीन से पोंछा लगेगा। साथ ही सफाईकर्मियों का रोस्टर बनेगा और दिन में कितनी बार सफाई हुई, उसका ब्योरा आम जनमानस के लिए भी बोर्ड में चस्पा होगा। अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक और कालेज के प्राचार्य का फोन नंबर भी लिखा जाएगा, ताकि यदि समय पर सफाई न हो तो मरीज व तीमारदार शिकायत कर सकें।
बचे 285 करोड़ से उच्चीकरण
प्रमुख सचिव डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय के मुताबिक बीते तीन वर्षों के बचे हुए 285 करोड़ रुपये का पूरा इस्तेमाल कर मेडिकल कालेजों का उच्चीकरण होगा। वर्ष 2013-14 के 141 करोड़ और वर्ष 2014-15 के 94 करोड़ रुपये का इस्तेमाल नहीं हो सका था और इस वर्ष भी 50 करोड़ रुपये बचा था। इस राशि से सीटी स्कैन, एमआरआइ आदि मशीनों के साथ वेंटिलेटर, मॉनीटर, कोबाल्ट मशीनें, कैथलैब्स आदि के साथ सभी कालेजों में मजबूत सघन चिकित्सा कक्ष स्थापित किये जा रहे हैं। यह काम 31 मार्च 2016 तक पूरे कर लिये जाएंगे। 

रात को थर्मस में चाय लेकर चलेंगे रोडवेज बस ड्राइवर


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-दुर्घटनाओं की समीक्षा में पता चली नींद के झोंके की बात
-रात के लिए अलग सुपरवाइजर, होगी फैसले लेने की छूट
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सर्दी में होने वाली रोडवेज बस दुर्घटनाओं की समीक्षा में उन्हें नींद का झोंका आने को बड़ा कारण माना गया है। अब तय हुआ है कि रात में गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर साथ में थर्मस में चाय लेकर चलेंगे। साथ ही रात-दिन सक्रिय रहने वाले बस अड्डों पर रात के लिए अलग से सुपरवाइजर नियुक्त किये जाएंगे, जिन्हें फैसले लेने की पूरी छूट होगी।
परिवहन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) यासर शाह ने अधिकारियों के साथ बैठक कर सर्दी में होने वाली दुर्घटनाओं की पड़ताल की। पता चला कि रात में बसों के चालक नींद के झोंके में आ जाते हैं, जिस कारण दुर्घटनाएं होती हैं। इस पर तय हुआ कि रात में चलने वाले सभी बस चालकों को रोडवेज की ओर से थर्मस दिये जाएंगे। वे उनमें चाय भरके चलेंगे। रास्ते में जहां भी नींद आएगी, वे बस किनारे खड़ी करेंगे, चाय पियेंगे, फिर गाड़ी आगे बढ़ाएंगे। इसी तरह अनुबंधित बसों के मालिकों से भी अपने चालकों को तत्काल थर्मस उपलब्ध कराने के निर्देश दिये गए हैं।
परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक के रवींद्र नायक ने सभी बसों व उनके बाहरी भाग पर सफेद, गोल्डेन, पीले व लाल रिफ्लेक्टिव टेप लगाने के निर्देश दिये हैं। सभी बसों में टेल लाइट, इंडीकेटर लाइट, फॉग लाइट या ऑल वेदर बल्ब अनिवार्य किया गया है। बसों के चालकों को गंतव्य तक निर्धारित समय पर ही पहुंचने के लिए बिल्कुल परेशान न किया जाए। जिन बस अड्डों पर पूरी रात बसों का आवागमन होता है, वहां रात की पाली के लिए अलग से सुपरवाइजर तैनात किये जाएं, जिन्हें कोहरे को देखते हुए बसों का संचालन रोकने या विलंबित करने की पूरी छूट हो। ऐसी स्थिति में यात्रियों के लिए भी ठहरने की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा है कि इन निर्देशों के अनुपालन में कमी या लापरवाही पाए जाने पर क्षेत्रीय व सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक के साथ डिपो के सेवा प्रबंधक को जिम्मेदार मानकर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

Thursday, 10 December 2015

हर कोने में मेडिकल कालेज, पांच हजार बनेंगे डॉक्टर


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-इसी माह मुख्यमंत्री चंदौली में करेंगे 17वें कालेज का शिलान्यास
-दो साल में छह और चिकित्सा संस्थान शुरू करने का लक्ष्य
-प्रदेश में बढ़ेंगी एमबीबीएस की 1700 से अधिक सीटें
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
पुराने मेडिकल कालेजों को चलाने के लिए जूझ रहे चिकित्सा शिक्षा महकमे को अगले दो साल में छह और मेडिकल कालेज शुरू करने हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इसी माह चंदौली में राज्य के 17वें सरकारी मेडिकल कालेज का शिलान्यास करेंगे। केंद्र के पास लंबित पांच मेडिकल कालेजों को मंजूरी मिलते ही प्रदेश के हर कोने में मेडिकल कालेज होगा और हर साल औसतन पांच हजार डॉक्टर बनेंगे।
प्रदेश में इस समय सरकारी क्षेत्र में 13 व निजी क्षेत्र में 14 मेडिकल कालेज संचालित हो रहे हैं। वर्ष 1911 में खुला लखनऊ का किंग जार्ज  मेडिकल विश्वविद्यालय सरकारी क्षेत्र का पहला मेडिकल कालेज था तो 1947 में आगरा, 1956 में कानपुर, 1961 में इलाहाबाद, 1966 में मेरठ, 1968 में झांसी और 1972 में गोरखपुर के बाद 2006 में सैफई के ग्र्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान के रूप में मेडिकल कालेज की शुरुआत हुई थी। इसके बाद 2011 में अंबेडकर नगर, 2012 में कन्नौज, 2013 में जालौन व आजमगढ़ और इसी वर्ष 2015 में सहारनपुर मेडिकल कालेज की शुरुआत हुई। बांदा में 14वां व बदायूं में 15वां कालेज खोलने की तैयारी चल रही है। जौनपुर में 16वें कालेज का निर्माण चल रहा है और इसी माह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव चंदौली में 17वें मेडिकल कालेज का शिलान्यास करेंगे। 600 करोड़ रुपये खर्च कर बनने वाले इस कालेज के लिए 22 एकड़ जमीन चिकित्सा शिक्षा विभाग को मिल चुकी है।
सरकार ने अगले दो वर्षों में बांदा, बदायूं, जौनपुर व चंदौली के साथ नोएडा के बाल चिकित्सालय को मेडिकल कालेज में बदलने व राजधानी लखनऊ के राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान को पूर्ण मेडिकल कालेज के रूप में शुरू करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इनके अलावा फैजाबाद, बस्ती, शाहजहांपुर, फीरोजाबाद व बहराइच में मेडिकल कालेज शुरू करने का प्रस्ताव केंद्र में लंबित है। उनके लिए डीपीआर भेजी जा चुकी है और जल्द ही फैसले की उम्मीद है। निजी क्षेत्र में भी अगले दो वर्षों में करीब आधा दर्जन मेडिकल कालेज शुरू होंगे। इस समय सरकारी क्षेत्र में एमबीबीएस की 1722 व निजी क्षेत्र में 1550 एमबीबीएस सीटें हैं। नए कालेजों में 1700 से अधिक सीटें बढऩे से प्रदेश में एमबीबीएस सीटों की संख्या पांच हजार हो जाएगी।
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बनी रहेगी मान्यता की चुनौती
प्रदेश में नए मेडिकल कालेजों का शिलान्यास तो हो रहा है किन्तु शिक्षकों की कमी से पुरानों की मान्यता ही संकट में है। ऐसे में नए कालेजों के लिए मान्यता भी चुनौती बनी रहेगी। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी का मानना है कि नए कालेज खुलने से प्रदेश के हर कोने में न सिर्फ चिकित्सा शिक्षा बल्कि श्रेष्ठ इलाज की सुविधा मुहैया होगी। जहां तक शिक्षकों की कमी का सवाल है तो इस बाबत चिकित्सा शिक्षकों को उत्तराखंड की तर्ज पर अधिक वेतन व सुविधाएं देने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। इसके अलावा जैसे-जैसे कालेज पुराने होते जाएंगे, उनकी स्थायी संबद्धता के साथ वहां एमडी-एमएस के कोर्स शुरू होंगे। इससे शिक्षकों की कमी भी पूरी होगी।

इंजीनियरिंग कालेजों में गेस्ट फैकल्टी को मिलेंगे 30 हजार

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-अभी तक 18 से 22 हजार तक प्रति माह देने का था प्रावधान
-एआइसीटीई के मानकों के अनुरूप ही हो सकेंगी नियुक्तियां
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
प्रदेश के सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों में गेस्ट फैकल्टी (अतिथि व्याख्याताओं) को अब तीस हजार रुपये प्रति माह मिलेंगे। प्राविधिक शिक्षा विभाग ने इस आशय का शासनादेश जारी किया है।
इंजीनियरिंग कालेजों व प्राविधिक विश्वविद्यालयों के लिए अब तक बने नियम के अनुसार बीटेक उत्तीर्ण गेस्ट फैकल्टी को 18 हजार, एमटेक को 20 हजार व पीएचडी को 22 हजार रुपये प्रति माह मिलते थे। यह राशि अपेक्षाकृत कम मानी जा रही थी और इस कारण अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) के मानकों के अनुरूप शिक्षक भी नहीं मिल पा रहे थे। 26 अगस्त 2010 को जारी आदेश में उक्त राशि निर्धारित की गयी थी। अब इसे और बढ़ाकर 30 हजार रुपये प्रति माह कर दिया गया है। शिक्षकों के व्याख्यानों पर भी ध्यान रखा जाएगा कि उन्हें कितनी कक्षाओं में कितना पढ़ाया। अब प्रति व्याख्यान 450 रुपये के हिसाब से जोडऩे और माह में अधिकतम 30 हजार रुपये भुगतान की बात कही गयी है।
प्रदेश के दोनों प्राविधिक विश्वविद्यालयों व सभी इंजीनियरिंग कालेजों को भेजे शासनादेश में प्रमुख सचिव (प्राविधिक शिक्षा) मोनिका एस गर्ग ने कहा है कि शासन से अनुदान ले रहे सभी प्राविधिक शिक्षा संस्थानों व घटक संस्थानों में गेस्ट फैकल्टी की नियुक्ति के लिए पुराने नियमों में बदलाव कर नयी नीति निर्धारित की गयी है। अब गेस्ट फैकल्टी की नियुक्ति में एआइसीटीई के मानकों का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित किया जाएगा। गेस्ट फैकल्टी या सेवानिवृत्त शिक्षकों को संविदा के आधार पर नियुक्त करने के लिए संस्थान के निदेशक या विश्वविद्यालय के वरिष्ठतम प्रोफेसर की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जाएगी। समिति में प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर स्तर के किसी अन्य संस्थान के दो शिक्षक भी रहेंगे। अनुसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग व अल्पसंख्यक वर्ग के प्रतिनिधित्व हेतु संस्थान के निदेशक द्वारा नामित तीन सदस्यों के साथ संबंधित विभागाध्यक्ष सदस्य सचिव के रूप में समिति का हिस्सा बनेंगे। 

Wednesday, 9 December 2015

पीएमएस डॉक्टर बचाएंगे आयुर्वेद की लाज


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-सीसीआइएम ने दिया है दिसंबर तक सुधार का अल्टीमेटम
-सभी प्राचार्यों को जिम्मेदारी, प्रमुख सचिव करेंगे समीक्षा
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डॉ.संजीव, लखनऊ
प्रदेश के आठ में से छह आयुर्वेदिक मेडिकल कालेजों को मान्यता न मिलने से प्रदेश में आयुर्वेद शिक्षा का भविष्य खतरे में पड़ गया है। अब इसे बचाने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाने के साथ पीएमएस डॉक्टरों की मदद लेने का फैसला हुआ है। सीसीआइएम ने इन कालेजों को ढांचागत समस्याएं दूर करने के लिए दिसंबर तक का अल्टीमेटम दिया है। इसके लिए चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव ने सभी प्राचार्यों की सीधी जिम्मेदारी सौंपते हुए स्वयं नियमित समीक्षा की बात कही है।
सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन (सीसीआइएम) ने प्रदेश के आठ में से छह आयुर्वेद कालेजों की मान्यता समाप्त कर दी है। साथ ही अगले सत्र में मान्यता पाने के लिए हर हाल में दिसंबर तक ढांचागत कमियां दूर करने के निर्देश दिये हैं। इस पर प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पांडेय ने सभी प्राचार्यों को कालेजवार सीसीआइएम की आपत्तियों के अनुरूप ध्यान देने को कहा है। सभी कालेजों की मान्यता में आधुनिक (एलोपैथी) के विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी भी बड़े कारण के रूप में सामने आयी थी। बताया गया कि कई बार विज्ञापन देने के बावजूद एलोपैथी के विशेषज्ञ नहीं मिल रहे हैं। इस पर तय हुआ कि इस कमी को प्रांतीय चिकित्सा सेवा संवर्ग के चिकित्सकों की नियुक्ति अतिथि प्रवक्ता के रूप में करके पूरी की जाए। इसके लिए प्रधानाचार्यों से कालेजों के आसपास की सीएचसी व पीएचसी का ब्योरा मांगा गया है, जिसके बाद स्वास्थ्य विभाग से बात कर चिकित्सकों की नियुक्ति कराई जाएगी।
नहीं मिल रहे संस्कृत प्रवक्ता
लखनऊ व वाराणसी के कालेजों को सशर्त मान्यता मिली है, इसलिए इन दोनों कालेजों से अतिरिक्त सतर्कता बरतने को कहा गया है। दोनों कालेजों में संस्कृत प्रवक्ता नहीं है। इनकी नियुक्ति तत्काल की जाएगी। इसी तरह पंचकर्म, फिजियोथिरैपिस्ट व पैरामेडिकल की कमी भी अलग-अलग इकाइयों का सृजन कर पूरी की जाएंगी।
कंप्यूटरीकरण पर भी जोर
बरेली में अतिथि प्रवक्ता और बांदा में उच्च संकाय की कमी पाई गयी थी। पीलीभीत, झांसी, मुजफ्फर नगर में कम्प्यूटरीकृत वाह्यï व अंत: रोगी विभाग न होने को बड़ा कारण माना गया है। इलाहाबाद में यंत्र व उपकरण की कमी को मान्यता न देने का कारण बताया गया था। इस पर प्रमुख सचिव ने कंप्यूटरीकरण पर जोर देने के साथ प्राचार्यों को बिन्दुवार समस्याओं का समाधान करने को कहा है और वे भी नियमित समीक्षा करेंगे।

मुख्यमंत्री आ रहे हैं, इलाज के लिए तैयार रहो

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-अखिलेश का प्रदेश दौरा-
-चिकित्सा शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग कर रहे विशेष तैयारी
-समाज व महिला कल्याण, बाल विकास पर भी रहेगा जोर
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ
अधीक्षक जी, मुख्यमंत्री जल्दी ही प्रदेश दौरे पर निकल रहे हैं, वे आपके अस्पताल भी आ सकते हैं, इसलिए जनता का इलाज ठीक से करो, वरना अपने इलाज के लिए तैयार रहो। स्वास्थ्य व चिकित्सा शिक्षा विभाग में इस तरह की फोन कॉल्स इन दिनों आम सी हो गयी हैं। अस्पतालों के चिकित्सा अधीक्षकों, मुख्य चिकित्सा अधिकारियों व मेडिकल कालेज प्राचार्यों को सावधान किया जा रहा है। इसी तरह की सक्रियता महिला कल्याण व बाल विकास विभाग में भी देखी जा रही है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इसी माह प्रस्तावित प्रदेश दौरे को लेकर विभिन्न महकमों में सक्रियता बढ़ गयी है। इनमें भी चिकित्सा शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग विशेष तैयारी करते नजर आ रहे हैं। दरअसल जनता से सीधे जुड़े इन विभागों के कैबिनेट मंत्री का दायित्व भी मुख्यमंत्री ने स्वयं संभाल रखा है। सेहत उनकी प्राथमिकता सूची में भी ऊपर है। ऐसे में यह तय माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री निकलेंगे तो अस्पतालों व मेडिकल कालेजों में जरूर जाएंगे। स्वास्थ्य विभाग ने सभी अस्पतालों में चिकित्सकों की मौजूदगी सुनिश्चित करने, दवाओं की कमी न होने देने और हर हाल में सफाई का पूरा ध्यान रखने के निर्देश मुख्य चिकित्सा अधिकारियों व जिला अस्पतालों के मुख्य चिकित्सा अधीक्षकों को दिये हैं। कहा गया है कि सभी प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर समय पर पहुंचें और मरीज किसी भी हाल में निराश न लौटें। इसी तरह चिकित्सा शिक्षा विभाग ने सभी प्राचार्यों से अस्पतालों में मशीन के माध्यम से सफाई शुरू कराने, दवाओं की कमी न पडऩे देने को कहा है।
स्वास्थ्य के अलावा अन्य विभागों में भी मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर सक्रियता बढ़ गयी है। मुख्यमंत्री अपने दौरे में लोगों से सीधे संवाद कर सकते हैं। इस दौरान समाज कल्याण विभाग से जुड़ी शुल्क प्रतिपूर्ति, छात्रवृत्ति और समाजवादी पेंशन जैसी योजनाओं को लेकर कोई सवाल न उठे, इसके लिए समाज कल्याण विभाग के अफसर तैयारी कर रहे हैं। समाजवादी पेंशन को वैसे भी मुख्यमंत्री अपनी सफल योजनाओं में शामिल करते रहे हैं। इसके अलावा महिला कल्याण व बाल विकास विभागों में भी मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर अतिरिक्त सक्रियता देखी जा रही है। एक अधिकारी के मुताबिक बाल विकास विभाग की योजनाओं को लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी व कन्नौज की सांसद डिंपल यादव स्वयं भी सीधी रुचि लेती रही हैं। इसलिए मुख्यमंत्री इन विभागों की योजनाओं के अमल पर भी पूछताछ कर सकते हैं। 

Tuesday, 8 December 2015

सौर ऊर्जा से चमकेंगे इंजीनियरिंग कालेज


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-आ रहा डेढ़ से दो लाख रुपये महीने बिजली बिल
-नेडा से लेंगे मदद, सवा से डेढ़ करोड़ आएगा खर्च
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों को ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप आत्मनिर्भर करने की तैयारी है। सभी इंजीनियरिंग कालेजों को सौर ऊर्जा से चमकाने के सरकार ने निर्देश दिये हैं।
उत्तर प्रदेश में इस समय 14 राजकीय प्राविधिक शिक्षण संस्थान हैं। इन संस्थानों में बिजली का औसत बिल डेढ़ से दो लाख रुपये महीने आता है। इनमें एचबीटीआइ कानपुर, यूपीटीटीआइ कानपुर, आइईटी लखनऊ, आर्किटेक्चर कालेज लखनऊ, केएनआइटी सुलतानपुर व बीआइईटी झांसी पुराने इंजीनियरिंग कालेज हैं। गोरखपुर के राजकीय इंजीनियरिंग कालेज को विश्वविद्यालय का रूप मिल चुका है। वैसे पुराने कालेजों को अपनी पढ़ाई के अलावा आजमगढ़, बांदा, बिजनौर, अंबेडकरनगर, मैनपुरी, कन्नौज व सोनभद्र की चिंता भी करनी पड़ती है। इन कालेजों का बिजली का बिल लगातार अधिक आने और कई बार भुगतान तक लंबित हो जाने से हो रही दिक्कतें शासन के समक्ष आयीं तो इन्हें सौर ऊर्जा से चमकाने का प्रस्ताव किया गया है। तय हुआ है कि सभी पुराने इंजीनियरिंग कालेजों का आकलन कर वहां सौर ऊर्जा संयंत्र लगाए जाएं। इसके लिए नेडा के साथ मिलकर आने वाले खर्च का आकलन कर लिया जाए। सभी संस्थानों के निदेशकों को इस काम में तत्परता बरतने को कहा गया है।
नए खुले आजमगढ़, मैनपुरी, कन्नौैज व सोनभद्र के कालेज तो अब भी अपने परिसर में नहीं पहुंचे हैं। आजमगढ़ का संचालन गोरखपुर, मैनपुरी व कन्नौज का कानपुर और सोनभद्र का संचालन सुलतानपुर में हो रहा है। इन्हें अगले शैक्षिक सत्र तक अपने परिसर में पहुंचाने का निर्देश देने के साथ ही नए परिसरों में शुरुआत के साथ ही सौर ऊर्जा के बंदोबस्त करने को कहा गया है। प्राविधिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) फरीद महफूज किदवई ने बताया कि कई इंजीनियरिंग कालेजों का बिजली का बिल काफी अधिक आ रहा है। इससे निपटने के लिए इंजीनियरिंग कालेजों में सौर ऊर्जा उपकरण लगाने को कहा गया है। एक सामान्य इंजीनियरिंग कालेज में जरूरत भर के सौर ऊर्जा उपकरण लगाने में सवा से डेढ़ करोड़ रुपये के आसपास खर्च आएगा। इसे अगले वित्तीय वर्ष 2015-16 के आधारभूत ढांचागत विकास के खर्च में शामिल कर लिया जाएगा।

Monday, 7 December 2015

लापरवाह व भ्रष्ट तीन आयुर्वेद कर्मी निलंबित

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-निदेशक के निरीक्षण में गैरहाजिर मिले अफसर
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : लापरवाह व भ्रष्ट आयुर्वेद कर्मियों पर अनुशासन का डंडा चलाया गया है। ऐसे तीन कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है। आयुर्वेद निदेशक के निरीक्षण में गैरहाजिर मिले अधिकारियों-कर्मचारियों से जवाब तलब भी किया गया है।
आयुर्वेद विभाग में अराजकता चरम पर है। बीते दिनों शासन स्तर से लापरवाह व भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई के सख्त संदेश दिये गए थे। इस पर हरदोई के फार्मासिस्ट सतीश चंद्र को निलंबित कर दिया गया है। सतीश पर अनुशासनहीनता व शासन के आदेशों का पालन न करने का आरोप था। बनारस में भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए प्रिंस कुमार पाण्डेय व स्वामीनाथ राम को भी निलंबित कर दिया गया है। इन दोनों पर घूस लेने के आरोप थे और पुष्टि भी हुई थी। आयुर्वेद निदेशक प्रो. सुरेश चंद्र ने रायबरेली व फतेहपुर के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी कार्यालयों का निरीक्षण किया तो पता चला कि अधिकारी व कर्मचारी मनमाने ढंग से गैरहाजिर हो जाते हैं। रायबरेली के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डा.शशिधर त्रिवेदी भी अनुपस्थित मिले। स्टाफ नर्स ममता हस्ताक्षर कर गायब थी। कर्मचारियों रमेश चंद्र तिवारी, लल्ले सिंह व मो. तौफीक के हस्ताक्षर तो थे, किन्तु कार्यालय में नहीं मिले। इस पर रजिस्टर जब्त कर जांच कराई जा रही है। इनसे जवाब भी मांगा गया है। स्पष्टीकरण आने के बाद इनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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Friday, 4 December 2015

देहरी तक जाकर इलाज व जांच करेंगे डॉक्टर


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-36 जिलों में चलेंगी 170 मोबाइल मेडिकल यूनिट
-हर यूनिट माह में 24 जगह देखेगी 60-60 मरीज
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश का स्वास्थ्य महकमा बीमारों के घर की देहरी तक जाकर जांच और इलाज सुनिश्चित करेगा। 36 जिलों में 170 मोबाइल मेडिकल यूनिट सक्रिय की जाएंगी। हर यूनिट महीने में कम से कम 24 जगह जाकर कम से कम 60-60 मरीज देखेगी।
शहरी व ग्र्रामीण क्षेत्रों में अस्पतालों के नेटवर्क के बावजूद तमाम इलाके ऐसे हैं, जहां तक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच पाती हैं। अब ऐसे इलाकों तक स्वयं स्वास्थ्य विभाग की टीम जाकर मरीजों का इलाज करेगी। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने बताया कि कुल 170 मोबाइल यूनिटों में से तीस जिलों में पांच-पांच यूनिट का फोकस ग्र्रामीण इलाकों पर होगा, वहीं छह महानगरों की 20 यूनिटों का फोकस मलिन बस्तियों पर होगा। हर यूनिट में दो वाहन होंगे, जिनमें से एक में क्लीनिकल लैब व दूसरे में डॉक्टर आदि चलेंगे। यूनिट में लैब टेक्नीशियन, फार्मासिस्ट, ईसीजी, ऑटो एनालाइजर आदि के साथ मेडिकल ऑफीसर भी होंगे। मरीजों की प्राथमिक जांच कर उनका इलाज तुरंत कर दवाएं भी दी जाएंगी। गंभीर मरीजों को एंबुलेंस बुलाकर बड़े अस्पताल भेज दिया जाएगा। हर यूनिट को महीने में कम से कम 24 कैंप करने होंगे और हर कैंप में कम से कम 60 मरीज देखने होंगे।
इन जिलों में पांच-पांच यूनिट
सहारनपुर, रामपुर, बरेली, बदायूं, एटा, कासगंज, कन्नौज, कानपुर देहात, फर्रुखाबाद, हरदोई, पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, बस्ती, आजमगढ़, सीतापुर, बहराइच, बाराबंकी, रायबरेली, कौशांबी, इलाहाबाद, श्रावस्ती, गोंडा, फैजाबाद, बलरामपुर, सिद्धार्थ नगर, संत कबीर नगर, गोरखपुर, महाराजगंज, अंबेडकर नगर
यहां मलिन बस्तियों पर जोर
शहरी क्षेत्रों में बीस मोबाइल मेडिकल यूनिट सक्रिय होंगी, जिनका जोर मलिन बस्तियों में इलाज की सुविधाएं पहुंचाने पर होगा। तय हुआ है कि गौतमबुद्ध नगर व वाराणसी में दो-दो, आगरा व गाजियाबाद में तीन-तीन, कानपुर नगर व लखनऊ में पांच-पांच मोबाइल मेडिकल यूनिट शुरू होंगी।
जच्चा-बच्चा अस्पतालों की शुरुआत पर काम बढ़ा
राब्यू, लखनऊ: प्रदेश में प्रस्तावित 49 जच्चा-बच्चा अस्पतालों की शुरुआत को लेकर काम तेज हुआ है। इन अस्पतालों को निजी क्षेत्र से संचालित कराया जाना है। एक हजार करोड़ रुपये के ऊपर की परियोजना होने के कारण मुख्य सचिव स्तर से इस पर टेंडर प्रक्रिया होनी है। शुक्रवार को मुख्य सचिव आलोक रंजन की अध्यक्षता में हुई बैठक में इन अस्पतालों के संचालन पर विचार विमर्श हुआ। नियोजन, वित्त, औद्योगिक विकास आदि विभागों से एक सप्ताह के भीतर उनकी राय मांगी गयी है। इन विभागों की राय व अनापत्ति आने के बाद टेंडर प्रक्रिया तेज की जाएगी। 

गायब विद्यार्थियों का कारण न बताया तो संस्था काली सूची में

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-ऐसे संस्थानों को नहीं मिलेगी दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति
-कारण बताने व परीक्षाफल घोषणा के लिए दस दिसंबर तक का समय
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति योजना में एक साल धन लेने के बाद गायब हुए विद्यार्थियों के मामले में शासन स्तर पर सख्ती और बढ़ा दी गयी है। विद्यार्थियों के गायब होने का कारण बताने के लिए दस दिसंबर तक का समय देने के साथ ऐसा न कर पाने पर संबंधित संस्था को काली सूची में डालने का फैसला हुआ है। परीक्षाफल घोषणा के लिए भी दस दिसंबर तक का समय दिया गया है।
समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव सुनील कुमार द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति योजना में एक साल प्रवेश लेकर अगले साल गायब हो जाने वाले 18,87,666 विद्यार्थियों में से महज 3,99,810 विद्यार्थियों के गायब होने का कारण स्कॉलरशिप पोर्टल पर ऑनलाइन इंगित किया गया है। यह स्थिति तब है जबकि 30 नवंबर तक हर हाल में ऐसे मिसिंग विद्यार्थियों के आवेदन पत्र अग्र्रसारित न करने का कारण संबंधित संस्थानों को बताना था। अब इन सभी को अंतिम अवसर देते हुए दस दिसंबर तक हर हाल में कारण स्कॉलरशिप पोर्टल पर इंगित करना है। ऐसा न करने वाले संस्थानों के किसी भी विद्यार्थी को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान नहीं किया जाएगा।
सभी विश्वविद्यालयों द्वारा इस वर्ष घोषित परीक्षाफल को स्कॉलरशिप पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश भी दिए गए थे। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी व बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी सहित कई विश्वविद्यालयों ने अब तक परीक्षाफल स्कॉलरशिप पोर्टल पर अपलोड नहीं किया है। इन सभी विश्वविद्यालयों को भी दस दिसंबर तक का समय परीक्षाफल अपलोड करने के लिए दिया गया है। आदेश में स्पष्ट है कि जिन विश्वविद्यालयों द्वारा इस वर्ष घोषित परीक्षाफल दस दिसंबर तक अपलोड नहीं किये जाएंगे, उनके नवीनीकरण श्रेणी के छात्र-छात्राओं का छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति भुगतान बाधित हो जाएगा।

Thursday, 3 December 2015

छह आयुर्वेदिक कालेजों की मान्यता समाप्त


-लखनऊ व वाराणसी के कालेजों को ही सीसीआइएम की मान्यता
-सरकारी कालेजों से बीएएमएस की 230 सीटें छिनीं, 90 बचीं
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डॉ.संजीव, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में वर्षों से सरकारी उपेक्षा झेल रही आयुर्वेदिक शिक्षा का भविष्य खतरे में है। सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन (सीसीआइएम) ने आठ सरकारी आयुर्वेदिक कालेजों में छह की मान्यता समाप्त कर दी है। यहां बीएएमएस की 230 सीटें छिनने के बाद लखनऊ व वाराणसी की 90 सीटें ही बची हैं।
राज्य में लखनऊ, पीलीभीत, बांदा, झांसी, बरेली, मुजफ्फरनगर, इलाहाबाद व वाराणसी के आयुर्वेद कालेजों में बीएएमएस की 320 सीटें हैं। इन कालेजों को बीएएमएस के लिए सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन (सीसीआइएम) से मान्यता मिलती है। सीसीआइएम की टीम हर वर्ष इन कालेजों का दौरा कर वहां शिक्षकों व अन्य संसाधनों का विश्लेषण कर उस वर्ष के लिए बीएएमएस की मान्यता देती है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद हर हाल में एक अक्टूबर से शैक्षिक सत्र शुरू हो जाना चाहिए। इस वर्ष भी सीसीआइएम की टीम ने निरीक्षण किया किन्तु पहले चरण में एक भी आयुर्वेदिक कालेज को मान्यता योग्य नहीं माना। इसके लिए आयुर्वेद निदेशक को सीसीआइएम ने तलब भी किया। अनेक कोशिशों के बाद अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में सिर्फ वाराणसी की 40 व लखनऊ की 50 सीटों पर मान्यता मिली।
दो कालेजों को सशर्त मान्यता
सीसीआइएम टीम संतुष्ट तो लखनऊ व वाराणसी आयुर्वेदिक कालेजों के ढांचे से भी नहीं थी। वहां की मान्यता भी सशर्त मिली है। सीसीआइएम के आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि इन दोनों कालेजों में संस्कृत प्रवक्ता की कमी से लेकर आधारभूत ढांचे में कमी पर भी सवाल उठाए गए हैं। इस पर सीसीआइएम ने 31 दिसंबर 2015 तक इन सभी कमियों को दूर करने का निर्देश दिया है, अन्यथा इन कालेजों की मान्यता भी समाप्त कर दी जाएगी।
शिक्षकों की कमी बड़ी समस्या
शिक्षकों की कमी के कारण कालेजों की मान्यता समाप्त हुई। मॉडर्न मेडिसिन के शिक्षक न मिलने से अधिक दिक्कत है। इस वर्ष तो इन सभी कालेजों में सत्र शून्य हो गया है। अब नए सिरे से मान्यता की कोशिश होगी।
-डॉ.सुरेश चंद्रा, आयुर्वेद निदेशक

कुपोषण से जंग को कनाडा ने मिलाए हाथ


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-एक सही शुरुआत-
-1.7 करोड़ महिलाओं, बच्चों और किशोरियों की होगी चिंता
-उप उच्चायुक्त के सामने साझेदारी को दिया गया अंतिम रूप
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : कुपोषण से जंग के लिए उत्तर प्रदेश के सेहत महकमे ने कनाडा से हाथ मिलाए हैं। पांच साल तक चलने वाले इस विशेष कार्यक्रम 'एक सही शुरुआतÓ में 1.7 करोड़ महिलाओं, बच्चों व किशोरियों की चिंता की जाएगी। गुरुवार को कनाडा के उप उच्चायुक्त के सामने इस साझेदारी को अंतिम रूप दिया गया।
उत्तर प्रदेश में विशेष अभियान चलाकर 14 लाख अतिकुपोषित बच्चे चिह्नित किये गए हैं। इसके अलावा प्रदेश में 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 50 फीसद महिलाएं एनीमिया से ग्र्रस्त हैं, 15 से 18 वर्ष आयु वर्ग की 37 प्रतिशत किशोरियां कम वजन की हैं। इन स्थितियों से मुकाबले के लिए मंगलवार को 'एक सही शुरुआतÓ के रूप में कनाडा के साथ साझेदारी की घोषणा हुई। इस बाबत एक पांच सितारा होटल में आयोजित कार्यक्रम में कनाडा के उप उच्चायुक्त जेस डटन ने कहा कि उत्तर प्रदेश की यह पहल दुनिया के कई देशों के लिए प्रेरक बनेगी। पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में चुनौतियां बढ़ीं हैं, जिन्हें मिल कर दूर किया जाना है। वर्ष 2020 तक चलने वाले इस कार्यक्रम में प्रदेश के 18 जिलों में 14 लाख नवजात शिशुओं व उनकी माताओं के बीच मातृत्व संबंधी सेवाएं प्रदान की जाएंगी। इसके अलावा दस जिलों में 1.5 करोड़ किशोरियों को कुपोषण से निजात दिलाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। चार जिलों में 6.5 लाख बच्चों को कुपोषण से निजात दिलाना भी इस अभियान का हिस्सा होगा।
भारत में इस कार्यक्रम की कमान संभाला कनाडा के माइक्रोन्यूट्रियेंट इनीशियेटिव के अध्यक्ष जॉयल स्पाइसर ने कहा कि भारत में हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। इससे निपटने के लिए इनीशियेटिव ने यहां डेढ़ सौ करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला किया है। अब इस विशेष अभियान के माध्यम से उत्तर प्रदेश को मॉडल बनाकर कुपोषण से मुक्ति का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने कहा कि कुपोषण उत्तर प्रदेश के लिए एक चुनौती है, जिसका सामना मिलकर करेंगे। अब जिलों का प्रशासन भी इस काम से जुड़ रहा है और अधिकारियों तक ने गांव गोद लिये हैं। कार्यक्रम में सिफ्सा के अतिरिक्त अधिशासी निदेशक रिग्जियान सैंफिल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अतिरिक्त मिशन निदेशक अभिषेक प्रकाश, तकनीकी सहयोग इकाई के अधिशासी निदेशक विकास गोथलवाल व माइक्रोन्यूट्रियेंट इनीशियेटिव एशिया के निदेशक जॉन मैककुलॉग उपस्थित थे।
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डिंपल आज करेंगी कई योजनाओं की शुरुआत
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी व सांसद डिंपल यादव शुक्रवार को किशोरी स्वास्थ्य से जुड़ी कई योजनाओं की शुरुआत करेंगी। वे गोमती नगर के विकास खंड स्थित भारतेंदु नाट्य अकादमी के थ्रस्ट थियेटर में बालिका सुरक्षा योजना के अंतर्गत संपूर्णा क्लीनिक और बाल स्वास्थ्य पोषण माह की शुरुआत करेंगी। इसके अलावा वे कनाडा की साझेदारी से होने वाले 'एक सही शुरुआतÓ कार्यक्रम का आगाज भी करेंगी। किशोरियों को सेनेटरी नैपकिन वितरण की योजना की भी विधिवत शुरुआत इसी समारोह में होगी। 

Wednesday, 2 December 2015

यूनिसेफ संभालेगी नवजात शिशु देखभाल की कमान


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-राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की पहल, 12 मेडिकल कालेज करेंगे मदद
-आशा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण, डेढ़ माह में सात जांचों पर जोर
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डॉ.संजीव, लखनऊ : प्रदेश में नवजात शिशुओं की देखभाल की कमान अब यूनिसेफ संभालेगी। इस काम में 12 मेडिकल कालेजों की मदद भी ली जाएगी। इसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की कार्यकारी समिति से हरी झंडी मिल गयी है। इसके अंतर्गत आशा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने के साथ बच्चे के जन्म से डेढ़ माह के भीतर सात जांचों पर जोर दिया जाएगा।
नवजात शिशुओं की मौत उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे के लिए चुनौती बनी है। हालांकि वर्ष 2001 में नवजात मृत्यु दर 8.3 फीसद थी, जो 2011 में घटकर 5.3 फीसद हुई है, फिर भी इसे अत्यधिक मानकर काम किया जा रहा है। अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की पहल पर यूनिसेफ ने नवजात शिशु देखभाल का जिम्मा संभाला है। इसमें प्रदेश के 12 मेडिकल कालेजों का सहयोग भी लिया जाएगा। सरकार अभी अस्पतालों व घरों, दोनों स्तर पर नवजात शिशु की रक्षा के लिए कार्यक्रम चला रही है किन्तु यूनिसेफ घरों पर आधारित नवजात शिशु रक्षा कार्यक्रमों को मजबूत करेगी। इसमें बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती डेढ़ माह तक उनका विशेष ध्यान रखने की रणनीति बनाई गयी है। बच्चे के जन्म के साथ ही तीन, सात, 14, 21, 28 व 42 दिन का होने पर आशा कार्यकर्ता बच्चे की जांच करेंगी और स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या होने पर उसका समाधान सुनिश्चित कराएंगी।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की राज्य कार्यकारी समिति ने यूनिसेफ के साथ नवजात शिशु देखभाल कार्यक्रम के सुदृढ़ीकरण के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। मिशन निदेशक अमित घोष के मुताबिक इस कार्यक्रम के अंतर्गत मंडल स्तर पर मॉनीटङ्क्षरग के लिए यूनिसेफ द्वारा विशेष रूप में पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की जाएगी। उनके साथ मेडिकल कालेजों के कम्युनिटी मेडिसिन विभागों के शिक्षक व जूनियर डॉक्टर भी सक्रिय रहेंगे। ये लोग मिलकर आशा कार्यकर्ताओं को विशेष प्रशिक्षण देने के साथ हर माड्यूल की गुणवत्ता सुनिश्चित करेंगे। आशा कार्यकर्ताओं के गृह भ्रम के दौरान सहयोगात्मक पर्यवेक्षण के साथ रिकार्डिंग व रिपोर्टिंग के स्तर को मजबूत किया जाएगा, ताकि कमियों का विश्लेषण कर उनका निदान सुनिश्चित किया जा सके।
पांच फीसद से अधिक नवजात की होती मृत्यु
प्रदेश में पांच फीसद से अधिक नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार कुल जन्म लेने वाले बच्चों में से 5.3 फीसद बच्चों की मृत्यु एक साल के भीतर हो जाती है। पांच साल का होते-होते 6.8 फीसद की जान चली जाती है। इनमें से जन्म के 28 दिन के भीतर 54 प्रतिशत व सात दिन के भीतर 41 प्रतिशत मौतें होती हैं। यही कारण है कि यूनिसेफ व स्वास्थ्य विभाग का पूरा जोर जन्म के तुरंत बाद बच्चों की देखरेख व उनकी जान बचाने पर है।

केजीएमयू चलाएगी एसजीपीजीआइ के लिए बना ट्रामा सेंटर


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-मंत्रिपरिषद की मंजूरी
-एम्स के एपेक्स ट्रामा सेंटर की तर्ज पर पदों का सृजन
-83.31 करोड़ हुए खर्च, पहले 24 घंटे होगा मुफ्त इलाज
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : संजय गांधी परास्नातक आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआइ) के लिए बने ट्रामा सेंटर का संचालन किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) करेगी। मंगलवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में यह फैसला किया गया। तय हुआ कि भर्ती होने के बाद पहले 24 घंटे यहां पूरी तरह मुफ्त इलाज होगा।
वृंदावन आवासीय योजना संख्या 4 में एसजीपीजीआइ के लिए ट्रामा सेंटर बनाया गया है। इस पर कुल 87.69 करोड़ रुपए खर्च होने थे, जिसमें से 83.31 करोड़ रुपये खर्च भी किये जा चुके हैं। इसके संचालन के लिए नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एपेक्स ट्रामा सेंटर की भांति पदों के सृजन की प्रक्रिया चल रही है। सितंबर में केजीएमयू के कुलपति ने इस ट्रामा सेंटर को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव किया था। एसजीपीजीआइ के निदेशक ने भी कहा कि संस्थान में हड्डी, स्त्री एवं प्रसूति व बाल रोग जैसे ट्रामा से संबंधित महत्वपूर्ण विभाग अभी विकसित नहीं हैं। ऐसे में दोनों पक्षों की सहमति पर इस ट्रामा सेंटर का संचालन केजीएमयू से कराए जाने का प्रस्ताव किया गया था। बैठक में तय हुआ कि ट्रामा सेंटर के संचालन में जरूरी मानव संसाधन, उपकरण आदि का प्रावधान व इस पर होने वाले खर्च का वहन केजीएमयू को शासन द्वारा उपलब्ध अनुदान से किया जाएगा। यहां भर्ती होने वाले मरीजों की पहले 24 घंटे मुफ्त चिकित्सा सुविधा केजीएमयू द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए विशेष रूप से वित्तीय प्रावधान भी किये जाएंगे। इसके लिए परिसंपत्तियों का हस्तांतरण समयबद्ध ढंग से एसजीपीजीआइ द्वारा केजीएमयू को कर दिया जाएगा।
नए वर्ष में शुरुआत
मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद अब ट्रामा सेंटर प्रदेश के लिए नए वर्ष 2016 का तोहफा होगा। केजीएमयू की ओर से चिकित्सकों की तैनाती आदि की प्रक्रिया जल्द शुरू कर दी जाएगी। प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने बताया कि ट्रामा सेंटर के संचालन के लिए केजीएमयू को 15 करोड़ रुपये तुरंत जारी किये जा रहे हैं। इससे एक माह में तीस बेड पर उपचार शुरू हो जाएगा। इसके बाद धीरे-धीरे मरीजों की संख्या बढ़ाई जाएगी।