Tuesday, 22 September 2015

इंसेफ्लाइटिस पर सीएम का फरमान ठेंगे पर


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-सेहत का सच
-इंसेफ्लाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर्स की स्थापना का प्रयोग हुआ विफल
-अस्पतालों में न डॉक्टर पहुंचते, न फार्मासिस्ट व अन्य कर्मचारी
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डॉ.संजीव, गोरखपुर : यह तीस बेड वाला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है। गोरखपुर के खोराबार ब्लाक के शिवपुर सीएचसी को लोग बड़े अस्पताल के रूप में जानते हैं। पास के गांव गहिरा की शोभा को रोज रात में बुखार आता है और बदन में दर्द भी रहता है। तीन दिन से इस बड़े अस्पताल में आ रही हैं किन्तु डॉक्टर ही नहीं मिलते। यह स्थिति तब है, जबकि गोरखपुर व आसपास के इलाकों में तेजी से फैले इंसेफ्लाइटिस को लेकर मुख्यमंत्री तक चिंता जाहिर कर चुके हैं। मुख्यमंत्री का हर फरमान स्वास्थ्य विभाग के ठेंगे पर है।
गोरखपुर व आसपास के जिलों में इंसेफ्लाइटिस नई समस्या नहीं है। बीते दिनों इंसेफ्लाइटिस से एक साथ कई मौतें होने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस मसले पर हाई अलर्ट के साथ हर मरीज का इलाज सुनिश्चित करने को कहा था। गोरखपुर मेडिकल कालेज के साथ ही जिला अस्पतालों व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को इंसेफ्लाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर्स के रूप में विकसित करने की बात कही गयी थी। इंसेफ्लाइटिस से हो रही मौतों का सिलसिला तो अब भी नहीं थमा है किन्तु स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता कहीं नहीं दिखती है। जमीनी हकीकत की पड़ताल करते हुए लखनऊ-गोरखपुर हाईवे पर गोरखपुर से पहले ही सहजनवां अस्पताल पहुंचिये तो सच से सामना हो जाएगा। सुबह 11 बजे तक कई कमरों में डॉक्टर ही नहीं आए थे। सुरदई निवासी जयकार कुमार अपनी बहन राधिका को दिखाने के लिए काफी देर से भटक रहे थे किन्तु कोई देखने वाला नहीं था। अधीक्षक डॉ.जेके सिन्हा से इंसेफ्लाइटिस सेंटर व मरीजों के बारे में पूछा तो वे बोले, हमें नहीं पता, सिस्टर बता पाएंगी। इंसेफ्लाइटिस वार्ड में पहुंचे तो वहां साफ कह दिया गया कि बच्चों को यह बीमारी अधिक होती है और यहां बाल रोग विशेषज्ञ ही नहीं है तो मरीज मेडिकल कालेज भेजने ही पड़ते हैं।
गोरखपुर के ही शिवपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने पर तो चिकित्सकीय अराजकता की विद्रूप तस्वीर दिखाई देती है। वहां सुबह सवा दस बजे वार्ड ब्वाय राजेश सिंह अस्पताल के पोर्च में तख्त पर बैठकर लिखापढ़ी कर रहे थे। पूरे अस्पताल के अधिकांश कमरों में ताला पड़ा था। मरीज निराश होकर लौट रहे थे। यहां पांच एलोपैथिक डॉक्टरों की ड्यूटी है किन्तु कोई नहीं आता। फार्मासिस्ट, नर्स, वार्ड ब्वाय व अन्य कर्मचारी भी नहीं आए थे। अस्पताल में दंत चिकित्सक की भी तैनाती होनी है और इसके लिए डेंटल चेयर तक खरीद कर आ गयी है, किन्तु ऐसे तमाम चिकित्सकीय उपकरण ताले में बंद हैं। इंसेफ्लाइटिस पीडि़त मरीजों के अलग इलाज के पुख्ता बंदोबस्त का दावा करते हुए सूचनाएं भी लिखी हैं किन्तु इंसेफ्लाइटिस कक्ष में ही ताला पड़ा था। पैथोलॉजी जांच की मशीनें तो हैं किन्तु जांच नहीं होती। इंसेफ्लाइटिस को लेकर कमोवेश यही स्थिति अधिकांश स्वास्थ्य केंद्रों की है और इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता।
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मेडिकल कालेज पर छोड़ा पूरा जिम्मा
इसे चिकित्सकीय अराजकता ही कहेंगे कि जिला अस्पताल से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक इंसेफ्लाइटिस के इलाज का पूरा जिम्मा गोरखपुर मेडिकल कालेज पर छोड़ दिया गया है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के स्तर पर तो ज्यादातर डॉक्टर ही नहीं मिलते और जिला अस्पताल से भी इंसेफ्लाइटिस के लक्षणों के मरीज आते ही कई बार तो बिना देखे ही मेडिकल कालेज के लिए रेफर कर दिये जाते हैं। बताया गया कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को भी मरीजों को जिला अस्पताल के बजाय मेडिकल कालेज भेजने के ही मौखिक निर्देश दिये गए हैं। इस कारण मेडिकल कालेज में भी भीड़ इतनी ज्यादा हो जाती है कि डॉक्टर उसे संभाल नहीं पाते।
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गोद में बच्चा, फिर भी आतीं डॉक्टर
चिकित्सकों के न पहुंचने से निराश मरीजों के बीच एक चिकित्सक का पहुंच जाना उत्साहित कर देता है। शिवपुर स्वास्थ्य केंद्र में जहां मरीजों ने चिकित्सकों सहित अन्य कर्मचारियों के न आने की शिकायत की, वहीं आयुर्वेद चिकित्सक डॉ.चित्रा त्रिपाठी के नियमित आने की बात कही। बताया कि वे छोटा सा बच्चा होने के बावजूद नियमित रूप से अस्पताल आती हैं। वे मरीज भी नियमित देखती हैं। 

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