Wednesday, 30 September 2015

नवजात शिशुओं के इलाज पर डॉक्टरों को प्रोत्साहन भत्ता


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-दिसंबर तक प्रदेश में खुल जाएंगी 50 नवजात शिशु रक्षा इकाइयां
-टीकाकरण बढ़ा, अब बच्चों की मौत रोकने को किए जा रहे प्रयास
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश में टीकाकरण की स्थितियां सुधरी हैं और अब बच्चों की मौत रोकने के प्रयास किए जा रहे हैं। बुधवार को राजधानी में स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं की राज्यस्तरीय समीक्षा बैठक में नवजात शिशुओं का इलाज करने वाले डॉक्टरों को प्रोत्साहन भत्ता देने का एलान किया गया। साथ ही दिसंबर तक प्रदेश में 50 नवजात शिशु रक्षा इकाइयां खोलने की बात भी कही गयी।
मातृ-शिशु कल्याण कार्यक्रमों की समीक्षा के दौरान बताया गया कि प्रदेश के 67 प्रतिशत बच्चे टीकाकरण के दायरे में आ गए हैं, जो पिछले वर्ष के 61 प्रतिशत से अधिक है। अब नवजात शिशुओं की जान बचाने पर अधिक जोर दिया जा रहा है। इसके लिए इस वर्ष दिसंबर तक हर हाल में राज्य में 50 सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट (नवजात शिशु रक्षा इकाइयां) स्थापित हो जाएंगी। वर्ष 2013 में इनकी संख्या सात थी, जो अब बढ़कर 27 हो चुकी हैं। इनसे चिकित्सकों को जोडऩे के लिए प्रोत्साहन भत्ता भी दिया जाएगा। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक अमित घोष ने बताया कि प्रदेश में इस समय मरीजों के उत्कृष्ट इलाज के लिए 192 फस्र्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) हैं, जिनकी संख्या बढ़ाकर 300 की जानी है। राज्य सरकार के बजट से 102 डॉयल सेवा की 500 अतिरिक्त एंबुलेंस चलाने की भी योजना है। भारत सरकार के संयुक्त सचिव राकेश कुमार ने कहा कि प्रदेश में नवजात शिशु व मातृ मृत्युदर, सकल प्रजनन दर एवं टीकाकरण से छूटे बच्चों का प्रतिशत अत्याधिकहै। साथ ही डायरिया एवं निमोनिया के कारण बच्चों में हो रहे मृत्युदर भी अत्याधिक है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की मृत्यु दर कम करने के लिए गंभीर (हाई रिस्क) गर्भावस्था की पहचान, उनका समय पर अस्पताल पहुंचाना व समय पर इलाज सुनिश्चित करना जरूरी है। प्रमुख सचिव अरविंद कुमार ने कहा कि प्रदेश सरकार जच्चा-बच्चा की सुरक्षा को लेकर संकल्पबद्ध है और इसके लिए सकारात्मक कोशिशें हो रही हैं।
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मिलेंगे 25 हजार तक ज्यादा
नवजात शिशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहन भत्ते का भी निर्धारण कर दिया गया है। इसके अंतर्गत नवजात शिशु रक्षा इकाइयों में तैनात होने वाले सरकारी सेवारत बाल रोग विशेषज्ञों को 25 हजार व एमबीबीएस चिकित्सकों को 15 हजार रुपये अतिरिक्त दिए जाएंगे। इसी तरह संविदा पर नियुक्त होने वाले बाल रोग विशेषज्ञों को 25 हजार व एमबीबीएस चिकित्सकों को 20 हजार रुपये अतिरिक्त दिये जाएंगे।

Tuesday, 29 September 2015

घर में ही जमे डॉक्टर साहब


-जिद्दी डॉक्टर, लाचार प्रशासन-
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-नियमों की धज्जियां उड़ाकर करा लेते हैं तैनाती
-दस से पंद्रह वर्ष से गृह जिले में डटे हैं डॉक्टर
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डॉ.संजीव, लखनऊ : डॉ.ज्योत्सना कुमारी कानपुर के डफरिन अस्पताल में एक मार्च 2001 को तैनात हुई थीं। कानपुर उनका गृह जिला भी है और जहां पे तैनाती तो हो ही नहीं सकती। इसके बावजूद 14 साल होने को आए, उनके तबादले की तरफ किसी का ध्यान तक नहीं गया।
यह स्थिति महज डॉ.ज्योत्सना कुमारी की नहीं। भारी संख्या में डॉक्टर अपने गृह जिले में ही जमे हैं। लखनऊ की मूल निवासी डॉ.पूनम सिंह की पहली नियुक्ति 17 मार्च 2005 को महाराजगंज में हुई थी। वहां लगभग चार माह काटने के बाद उनका तबादला लखनऊ हो गया। उन्होंने 28 जुलाई 2005 को लखनऊ के पीएसी अस्पताल में ज्वाइन किया और पहले मेडिकल अफसर, फिर कंसल्टेंट के रूप में काम करने के बाद चार नवंबर 2011 को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इटौंजा और फिर 26 जून 2013 को टीबी हास्पिटल ठाकुरगंज में तैनात हुईं। फिर उनका तबादला लोकनायक राजनारायण अस्पताल में हो गया। लखनऊ के मूल निवासी डॉ.नरेंद्र कुमार त्रिपाठी 11 वर्षों से लखनऊ में ही तैनात हैं। यूं, उन्होंने पूरी नौकरी राजधानी के आसपास ही की है। 27 फरवरी 1999 को सीतापुर से कॅरियर शुरू करने वाले डॉ.त्रिपाठी चार माह बाद एक जुलाई 2001 को बाराबंकी आ गए और फिर चार जुलाई 2004 से लखनऊ में ही हैं। बलरामपुर अस्पताल, इटौंजा व चिनहट स्वास्थ्य केंद्रों में काम करते हुए वे इस समय लोकबंधु राजनारायण अस्पताल में तैनात हैं। इसी तरह लखनऊ गृह जिला होने के बावजूद डॉ.अनामिका गुप्ता छह वर्ष, डॉ.रितेश द्विवेदी पांच वर्ष, डॉ.मनीष शुक्ला, डॉ.अखिलेश कुमार व डॉ.रामचंद्र गुप्ता तीन वर्ष से लखनऊ में तैनात हैं। सीतापुर गृह जिला होने के बावजूद डॉ.अमित वाजपेयी तीन वर्ष व डॉ.आफताब इकबाल बेग दो वर्ष से तैनात हैं।
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पड़ोसी जिला ही सही
कानपुर के 37वीं वाहिनी पीएसी अस्पताल में में 31 जनवरी 2003 से तैनात डॉ.अरविंद अवस्थी मूल रूप से उन्नाव के रहने वाले हैं। वह बीते साढ़े बारह वर्ष से पड़ोस के कानपुर में तैनात हैं। इससे पहले के दो साल भी उन्होंने पड़ोस के जिले रायबरेली में काटे थे।
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डिग्री दूसरी, काम तीसरा
बड़े शहरों में रहने के लिए चिकित्सकीय अराजकता भी सिर चढ़कर बोल रही है। स्वास्थ्य विभाग के अभिलेखों में डॉ.कुमकुम शर्मा की डिग्री के रूप में एमडी (मेडिसिन) दर्ज है। इस तरह उनकी नियुक्ति फिजीशियन के रूप में होनी चाहिए। इसके विपरीत वह छह अगस्त 1991 से 24 अगस्त 2001 तक दस साल लखनऊ में रेडियोलॉजिस्ट रहीं और फिर 25 अगस्त 2001 को कानपुर के डफरिन अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में तैनात हो गयीं। पिछले 15 वर्षों से वह कानपुर में ही जमी हैं।
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गृह जिले में नियुक्ति गलत
गृह जिले में नियुक्ति किसी भी हालत में नहीं होनी चाहिए। हाल ही में 15 लोगों की ऐसी सूची आई थी, जिनकी नियुक्ति भूलवश हो गयी थी। उन सबको गृह जिले से हटा दिया गया था। एक बार फिर सबकी समीक्षा कराकर गलत नियुक्त चिकित्सकों को हटाया जाएगा।
-डॉ.विजयलक्ष्मी, स्वास्थ्य महानिदेशक, उत्तर प्रदेश

शुल्क प्रतिपूर्ति : एक दिन पहले तक जोड़े गए पाठ्यक्रम व बैंक


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-दशमोत्तर छात्रवृत्ति आवेदन की अंतिम तिथि आज
-विकलांग व पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों को मंजूरी
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए अभ्यर्थी बुधवार यानी तीस सितंबर तक आवेदन कर सकेंगे। समाज कल्याण निदेशालय ने अंतिम तारीख से एक दिन पहले तक आवेदन के लिए मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम व खातों में राशि पहुंचाने के लिए बैंक जोडऩे को मंजूरी दी।
प्रदेश में दो लाख रुपये से कम वार्षिक आय वाले अभिभावकों के बच्चों की पढ़ाई न रुकने देने के लिए शासन स्तर पर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति योजना का संचालन किया जाता है। समाज कल्याण विभाग इसके लिए नोडल विभाग के रूप में काम करता है। साथ में पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की भी सक्रियता रहती है। बारहवीं के बाद विभिन्न प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए मान्यता दिए जाने के चलते आवेदकों की भीड़ काफी बढ़ गयी है। समाज कल्याण विभाग द्वारा जारी शुरुआती कैलेंडर में 15 जुलाई तक आवेदन की अंतिम तारीख घोषित की गयी थी, फिर कई संस्थानों में परीक्षाफल न घोषित होने जैसी समस्याएं आने पर तारीख बढ़ाकर 30 सितंबर करनी पड़ी। अनेक संस्थान भी नामांकन के लिए समाज कल्याण विभाग की मान्यता सूची में नहीं जुड़े थे, उन्हें 20 सितंबर तक का अतिरिक्त समय भी दिया गया।
बुधवार को अंतिम दिन होने के कारण ऑनलाइन आवेदन में तेजी आयी। इस बीच मंगलवार को समाज कल्याण विभाग ने विकलांगों के लिए शकुन्तला मिश्रा विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे कुछ पाठ्यक्रमों को मान्यता प्रदान की है। इसके अलावा कुछ पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों को भी इस सूची में जोड़ा गया है। अब इनके छात्र-छात्राएं भी बुधवार तक आवेदन कर सकेंगे। अधिकारियों के मुताबिक अब अंतिम तारीख बढऩे की उम्मीद नहीं है। सभी आवेदन आ जाने के बाद जिला स्तरीय जांच समिति उनकी जांच कर उन्हें लॉक करेगी। उसके बाद समयबद्ध ढंग से सभी छात्र-छात्राओं के खातों में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति स्थानांतरित की जाएगी। इसके लिए अब तक शामिल बैंकों के साथ सीबीएस सुविधा वाले कुछ ग्र्रामीण बैंकों को भी जोड़ा गया है।

Monday, 28 September 2015

डाक्टरों का तबादला करने में हारी सरकार


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जिद्दी डॉक्टर, लाचार प्रशासन
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-एक ही जिले में बीस वर्ष से ज्यादा समय से डटे
-कई ने तो पूरी नौकरी ही बिना जिला छोड़े पार की
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डॉ.संजीव, लखनऊ :
केस एक : डॉ.हेमलता यादव लखनऊ में 26 वर्षों से हैं। 30 दिसंबर 1989 को उनकी तैनाती सआदतगंज हेल्थ पोस्ट में हुई। छह जनवरी 2005 तक वहां रहने के बाद पांच महीने के लिए राजधानी में ही सहायक निदेशक बनीं और चार जून 2005 से अब वह नाका नगरीय परिवार कल्याण केंद्र में मेडिकल अफसर हैं।
केस दो : डॉ.अजय कुमार साहनी कॅरियर के शुरुआती चार साल तो प्रतापगढ़ व रायबरेली में रहे किन्तु 23 अगस्त 1995 को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सरोजनी नगर में ज्वाइन करने के बाद फिर यहां से नहीं गए। संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, राज्य ब्लड बैंक, लोकबंधु राजनारायण अस्पताल में तैनाती के बाद इस समय अलीगंज स्वास्थ्य केंद्र में तैनात हैं।  
सरकार चाहे जिस दल की हो, दूर-दराज के इलाकों में डॉक्टर नहीं भेज पा रही। सचिवालय में बैठे अफसर डाक्टरों पर सख्ती कर नहीं पाते और डाक्टर हैं कि छोटे शहरों या गांवों में जाने को तैयार नहीं। कुछ और उदाहरण देखें-डॉ. किरन गर्ग सात मार्च 1991 को लखनऊ के राजा बाजार हेल्थ पोस्ट में मेडिकल अफसर बनकर आयीं। वहां पांच माह रहीं और तब से पहले ऐशबाग और फिर 1999 से पुलिस अस्पताल में तैनात हैं। डॉ.निशा सचान ने कॅरियर के शुरुआती छह साल तो अमेठी के मुसाफिरखाना में काटे किन्तु सात अगस्त 1991 को राजधानी आयीं तो फिर यहीं की होकर रह गयीं। इसी तरह डॉ.नीना उपाध्याय ने 30 अक्टूबर 1993 को लखनऊ के वीरांगना अवंतीबाई अस्पताल में ज्वाइन किया और उसके बाद से महानगर, केजीएमयू होते हुए अब अलीगंज में तैनात हैं।
लखनऊ में ज्यादा मारामारी होने के कारण कुछ लोग आसपास के जिलों में तैनाती करा लेते हैं। डॉ.राजेश गुप्ता व डॉ.कमलेश चंद्र 17 वर्षों से, डॉ.वासुदेव सिंह, डॉ.भुवन चंद्र पंत व डॉ.अजय तिवारी 16 वर्षों से, डॉ.जितेंद्र कुमार, डॉ.अरुण कुमार व डॉ.एके मिश्रा 15 वर्षों से सीतापुर में तैनात हैं। यही स्थिति अन्य महानगरों की भी है। डॉ.गीता यादव सात जुलाई 2004 से कानपुर के डफरिन अस्पताल में तैनात हैं। इससे पहले वे 25 जुलाई 1997 से छह जुलाई 2004 तक पड़ोस के उन्नाव में तैनात रही थीं। इसी तरह 20 फरवरी 1999 को शामली से कॅरियर शुरू करने वाले डॉ.विनय कुमार वहां महज डेढ़ साल रहे और फिर चार अगस्त 2000 को मेरठ में ज्वाइन किया। तब से अब तक 15 साल से वे मेरठ में ही तैनात हैं। 21 जून 2003 से इलाहाबाद के जिला अस्पताल में तैनात डॉ.अभय राज सिंह का पूरी चिकित्सकीय करियर वहीं बीत गया है। जिला अस्पताल से पहले एक अक्टूबर 2002 से 21 जून 2003 तक वे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रामनगर में तैनात रहे थे।
नियम छह साल में तबादले का
तबादला नियमों के अनुसार कोई डॉक्टर एक शहर में छह साल से अधिक व एक मंडल में नौ साल से अधिक नहीं रह सकता जबकि आंकड़े बताते हैं कि कई  डॉक्टर पूरी नौकरी एक ही शहर में बिता देते हैं। अधिक दबाव पड़ा तो आसपास के जिले में तबादला कराकर एक गैप क्रियेट कराया और फिर वापस उसी जिले में आ गए।
बड़े शहरों की सिफारिशें बड़ी
अधिकारियों के मुताबिक सर्वाधिक मारामारी राजधानी लखनऊ में रहने के लिए है। कानपुर, इलाहाबाद, मेरठ, वाराणसी, आगरा जैसे जिलों में एक बार पैठ बना चुके डॉक्टर बड़े नेताओं व अफसरों के फैमिली डॉक्टर बन जाते हैं। इसके बाद तो इन्हें हटाना मुश्किल। यही अफसर प्रमोशन के बाद राजधानी में बड़ी भूमिका में होते हैं, जबकि नेता भी समय के साथ मजबूत होकर पैरवी करने लगते हैं।
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दस फीसद तबादले की मजबूरी
एक वर्ष में दस प्रतिशत डॉक्टरों के तबादले ही किये जा सकते हैं। वर्षों से एक ही जिले में रुके चिकित्सकों के तबादले किये गए हैं, फिर भी अभी पूरी तरह से मानकों के अनुरूप नहीं हो सके हैं।
-अरविन्द कुमार, प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य)

पिछड़ों में बंटवारे से पिछड़ा वर्ग आयोग की मनाही

-उत्तर प्रदेश का सुझाव पहले सभी राज्यों की बैठक बुलायी जाए
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग ने पिछड़ों के भीतर बंटवारा कर अतिपिछड़ों को चिन्हित करने से साफ इनकार कर दिया है। साथ ही राष्ट्रीय आयोग को पत्र लिखकर राज्य आयोगों की बैठक बुलाकर इस बाबत व्यापक चर्चा की मांग की है।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने बीते दिनों उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग सहित प्रदेश के सभी राज्य पिछड़ा वर्ग आयोगों को भेजे अपने पत्र में पिछड़ा वर्ग के भीतर भी अतिपिछड़ों को अलग करने पर जोर दिया था। प्रस्ताव के मुताबिक आरक्षण के कई वर्षों के बाद भी पिछड़े वर्ग की सभी जातियों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है, इसलिए पिछड़ों में भी अतिपिछड़े अलग से चिह्नित किये जाने चाहिए। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष राम आसरे विश्वकर्मा ने बताया कि आयोग ने इस प्रयास को पिछड़े वर्ग के लोगों को बांटने की कोशिश माना है। इसीलिए उन्होंने स्पष्ट रूप से इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना कर दिया।
राष्ट्रीय आयोग को लिखे पत्र में विश्वकर्मा ने कहा है कि अभी तक पिछड़े वर्गों का जातिवार आकलन नहीं हुआ है। पता किया जाना चाहिए कि किस जाति के लोग सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक रूप से कहां तक पहुंचे। 27 प्रतिशत आरक्षण के बाद अनेक जातियां पिछड़ों की सूची में बढ़ाई गयी हैं तो अब आरक्षण प्रतिशत पर भी पुनर्विचार होना चाहिए। पिछड़ों के लिए क्रीमीलेयर व्यवस्था पहले ही लागू है, जिसके दायरे में आते ही आरक्षण का लाभ मिलना बंद हो जाता है। उनकी राय है कि बैठक के माध्यम से देश भर के पिछड़े वर्ग के लोगों की समस्याओं पर चर्चा भी की जा सकेगी।

Sunday, 27 September 2015

सरकारी डॉक्टर बनना है तो सीखो नसबंदी


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-राज्य में खुलेंगे 18 प्रशिक्षण केंद्र, एमसीआइ से मिलेगी अनुमति
-पुरुषों ने महिलाओं को सौंप रखा है नसबंदी कराने का जिम्मा
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डॉ.संजीव, लखनऊ
पुरुष प्रधान समाज में नसबंदी कराने का जिम्मा भी पुरुषों ने महिलाओं को ही सौंपा हुआ है। तमाम कोशिशों के बाद भी पुरुष नसबंदी तुलनात्मक रूप से नहीं बढ़ पायी तो अब इसे बढ़ाने के लिए सरकारी सेवा से जुडऩे वाले एमबीबीएस उत्तीर्ण चिकित्सकों को पुरुष नसबंदी का अनिवार्य प्रशिक्षण देने की तैयारी है।
प्रदेश में पुरुष नसबंदी बढ़ाने के लिए राज्य सरकार अधिक चिकित्सकों को हुनरमंद बनाने की तैयारी में है। अभी तक पुरुष नसबंदी के लिए सर्जन होना जरूरी था। प्रदेश के सिर्फ चार सरकारी मेडिकल कालेजों में ही नसबंदी का प्रशिक्षण दिया जाता है। अब इसे विस्तार देने की तैयारी है। बीते दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की मंजूरी के बाद अब हर सरकारी डॉक्टर के लिए नसबंदी करने का प्रशिक्षण अनिवार्य किया जा रहा है। नियमित ही नहीं, संविदा पर सरकारी नौकरी का हिस्सा बनने वाले एमबीबीएस डॉक्टरों के लिए नसबंदी करना सीखना अनिवार्य होगा। सर्जरी की प्रक्रिया होने के कारण एमबीबीएस उत्तीर्ण को यह पाठ्यक्रम कराने के लिए एमसीआइ की अनुमति भी ली जाएगी। इसके लिए प्रदेश के सभी 18 मंडल मुख्यालयों पर पुरुष नसबंदी प्रशिक्षण केंद्र भी खोले जाएंगे। इनमें से आठ का संचालन स्वास्थ्य विभाग की तकनीकी सहयोग इकाई (टीएसयू) और दस का संचालन सिफ्सा के हाथ में होगा। प्रदेश सरकार की किसी भी योजना का हिस्सा बनने के साथ संबंधित एमबीबीएस डॉक्टर को इन प्रशिक्षण केंद्रों में जाकर पुरुष नसबंदी करना सीखना होगा, उसके बाद ही वे सरकारी नौकरी ज्वाइन कर सकेंगे। ये प्रशिक्षण केंद्र इस वर्ष के अंत तक खोलने का लक्ष्य है। मंडल मुख्यालयों पर ये केंद्र खुलने के बाद जिला स्तर पर भी विस्तार किया जा सकेगा।
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पुरुष पांच फीसद भी नहीं
प्रदेश में नसबंदी के बीते पांच वर्षों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इनसे पता चलता है कि नसबंदी कराने वालों में पुरुषों की संख्या पांच फीसद भी नहीं है। इस दौरान वर्ष 2010-11 में सर्वाधिक 4,04,104 महिलाओं ने नसबंदी कराई थी, जबकि इस वर्ष पुरुषों की संख्या ढाई फीसद के आसपास महज 9,046 थी। वर्ष 2011-12 में सर्वाधिक 11,801 पुरुषों ने नसबंदी कराई, किन्तु 3,22,002 महिलाओं की तुलना में यह संख्या भी चार फीसद से कम रही। वर्ष 2012-13 में तो 3,03,996 महिलाओं की तुलना में सिर्फ 6,539 पुरुषों ने ही नसबंदी कराई। अब तक यही सिलसिला कायम है और इस मौजूदा वित्तीय वर्ष के शुरुआती पांच महीनों, अप्रैल से अगस्त के बीच में जहां 21,693 महिलाएं नसबंदी करा चुकी हैं, वहीं इसके लिए आगे आने वाले पुरुषों की संख्या महज 1,497 ही है।

Friday, 25 September 2015

10 वेंटिलेटर, 12 डॉक्टर, तीन करोड़ की दवाएं


-सेहत का सच-
-प्रमुख सचिव ने गोरखपुर मेडिकल कालेज से मांगी दैनिक रिपोर्ट
-असहयोग करने वाले डॉक्टर हटेंगे, तुरंत भरे जाएं सभी खाली पद
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डॉ.संजीव, लखनऊ
जानलेवा इंसेफ्लाइटिस के जोरदार प्रकोप के बावजूद इलाज में लापरवाही पर शासन ने सख्त रुख अख्तियार किया है। दैनिक जागरण में प्रकाशित 'सेहत का सचÓ अभियान के बाद प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने गोरखपुर मेडिकल कालेज से दैनिक रिपोर्ट मांगने के साथ वहां 10 नए वेंटिलेटर लगाने, 12 डॉक्टरों की तैनाती करने और तत्काल दवाओं के लिए तीन करोड़ रुपये की दवाएं खरीदने के आदेश जारी किये हैं। असहयोग करने वाले डॉक्टरों को हटाने व सभी खाली पद तुरंत भरने के निर्देश भी दिये गए हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार के कई जिले इस समय इंसेफ्लाइटिस से कराह रहे हैं। अधिसंख्य गंभीर मरीज गोरखपुर मेडिकल कालेज भेजे जाते हैं। दैनिक जागरण ने हाल ही में चिकित्सकीय अराजकता की खबरें विस्तार से प्रकाशित कीं, तो चिकित्सा शिक्षा महकमा सक्रिय हुआ। प्रमुख सचिव ने गोरखपुर मेडिकल कालेज के प्राचार्य से इंसेफ्लाइटिस व दिमागी बुखार की स्थितियों पर दैनिक रिपोर्ट भेजने को कहा है। रोज सुबह नौ बजे आने वाली यह रिपोर्ट मुख्य सचिव तक भेजी जाएगी। मेडिकल कालेज के कुछ शिक्षकों द्वारा प्रशासनिक असहयोग की शिकायत सामने आने पर उन्हें तुरंत हटाने के लिए प्राचार्य से रिपोर्ट मांगी गयी है, वहीं कालेज के सभी रिक्त पद तुरंत अभियान चलाकर भरने के निर्देश दिये गए हैं। वहां 10 और वेंटिलेटर लगाने के आदेश दिये गए हैं। 56 वेंटिलेटरों के साथ अब वहां इनकी कुल संख्या 66 हो जाएगी।
इसके अलावा हर मरीज को भर्ती करने के लिए एक और वार्ड इंसेफ्लाइटिस व दिमागी बुखार के मरीजों के लिए आरक्षित करने को कहा गया है। डॉक्टरों की कमी से निपटने के लिए कानपुर, मेरठ, आगरा, झांसी व इलाहाबाद से बाल रोग व मेडिसिन विभाग के 12 जूनियर डॉक्टरों को तीन माह के लिए गोरखपुर मेडिकल कालेज से संबद्ध कर दिया गया है। मरीजों को अस्पताल से दवाएं न मिलने का मामला सामने आने पर प्रमुख सचिव ने तीन करोड़ रुपये दवाओं के लिए जारी करने के आदेश दिये हैं। इनमें से असाध्य रोगों के बजट से 50 लाख रुपये बुधवार को जारी भी कर दिये गए, शेष ढाई करोड़ रुपये के लिए वित्त विभाग में फाइल भेजी गई है।
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हर जीएनएम का प्रशिक्षण मेडिकल कालेज में
मेडिकल कालेज में नर्सों की कमी से निपटने के लिए गोरखपुर के सभी पैरामेडिकल शिक्षण संस्थानों में जीएनएम पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले हर विद्यार्थी का प्रशिक्षण मेडिकल कालेज में ही कराया जाएगा। विशेष सचिव अङ्क्षरदम भïट्टाचार्य द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि इस वर्ष प्रवेश लेने वाले विद्यार्थी न्यूनतम 45 दिन और द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी न्यूनतम 60 दिन गोरखपुर मेडिकल कालेज से संबद्ध रहेंगे।
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स्वास्थ्य विभाग से गंभीर मरीज ही भेजे जाएं मेडिकल कालेज
सेहत का सच अभियान के दौरान स्वास्थ्य विभाग के प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की निष्क्रियता व जिला अस्पतालों द्वारा भी सभी मरीज मेडिकल कालेज भेज दिये जाने की बात प्रकाश में आयी थी। इस पर चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने स्वास्थ्य महानिदेशक को पत्र लिखकर सिर्फ गंभीर मरीजों को ही मेडिकल कालेज भेजने की बात कही है।
इंसेफ्लाइटिस का उदाहरण देते हुए डॉ.त्रिपाठी ने लिखा है कि जिला अस्पतालों व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सक तैनात होने के बाद भी मरीजों को सीधे मेडिकल कालेज भेज दिया जाता है। कई बार तो सामान्य रोगियों की संख्या अधिक हो जाने के कारण गंभीर रोगियों पर पूरा फोकस नहीं हो पाता पूर्वांचल के सभी जिला अस्पतालों में इंसेफ्लाइटिस व दिमागी बुखार के मरीजों के लिए विशेष वार्ड बनाकर वहां उनका समुचितउपचार सुनिश्चित कराने की बात भी कही गयी है।
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मजबूत होंगे इंसेफ्लाइटिस प्रभावित जिला अस्पताल
दैनिक जागरण में प्रकाशित सेहत का सच अभियान में उजागर समस्याओं का समाधान करने की दिशा में पहल करते हुए इंसेफ्लाइटिस प्रभावित सात जिलों के जिला अस्पतालों को और मजबूत करने का फैसला लिया गया है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने बताया कि इन अस्पतालों में डाक्टरों के साथ नर्सों व पैरामेडिकल स्टाफ भी बढ़ाया जाएगा।
प्रमुख सचिव ने बताया कि सभी जिला अस्पतालों से नियमित रिपोर्ट मांगी जा रही है। गोरखपुर, देवरिया, महाराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, सिद्धार्थ नगर व संतकबीर नगर के जिला अस्पतालों में स्थापित बाल रोग सघन चिकित्सा कक्ष अभी डॉक्टरों व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की कमी के कारण ठीक प्रकार से नहीं चल पा रहे थे। इस पर हर जिला अस्पताल में पांच डॉक्टरों, बीस नर्सों व चार पैरामेडिकल स्टाफ की नियुक्ति तुरंत करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके लिए जिला स्तर पर ही चिकित्सकों की चिह्नित कर उन्हें संविदा पर रखने का फैसला लिया गया है। 

सभी मेडिकल कालेजों में होगी नर्सिंग की पढ़ाई

-बढ़ेंगी 620 सीटें, स्टेट मेडिकल फैकल्टी का फैसला
-सभी कालेजों में पैरामेडिकल पाठ्यक्रम भी बढ़ेंगे
राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश के सभी मेडिकल कालेजों में नर्सिंग की पढ़ाई कराई जाएगी। बुधवार को हुई स्टेट मेडिकल फैकल्टी की बैठक में अगले शैक्षिक सत्र से इन कालेजों के माध्यम से सरकारी क्षेत्र में नर्सिंग की 620 सीटें बढ़ाने का फैसला हुआ। साथ ही सभी मेडिकल कालेजों में पैरामेडिकल पाठ्यक्रम भी बढ़ाए जाएंगे।
स्टेट मेडिकल फैकल्टी के अध्यक्ष डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि पुराने मेडिकल कालेजों में सिर्फ गोरखपुर व झांसी में नर्सिंग पाठ्यक्रम नहीं चल रहे थे। अब इन दोनों कालेजों में सौ-सौ सीट के नर्सिंग स्कूल खोलने का फैसला लिया गया है। साथ ही पिछले कुछ वर्षों में नए खुले कन्नौज, जालौन, आजमगढ़, अम्बेडकर नगर व सहारनपुर मेडिकल कालेजों में 60-60 सीटों के साथ नर्सिंग स्कूल खोलने का फैसला हुआ है। अगले सत्र से प्रस्तावित बांदा व बदायूं मेडिकल कालेजों में भी 60-60 सीटों वाले नर्सिंग स्कूल खुलेंगे। सभी प्राचार्यों से इस बाबत तैयारी कर नर्सिंग काउंसिल में आवेदन करने को कहा जाएगा। इससे राज्य के सरकारी क्षेत्र में नर्सिंग की 620 सीटें बढ़ जाएंगी। इसके बाद नर्सों की उपलब्धता भी और आसान होगी। बैठक में सभी मेडिकल कालेजों में पैरामेडिकल पाठ्यक्रम बढ़ाने का भी फैसला लिया गया। कन्नौज, जालौन, आजमगढ़, अम्बेडकर नगर व सहारनपुर मेडिकल कालेजों में फिजियोथिरैपी, ऑप्टोमिट्री, ओटी व लैब टेक्नीशियन, इमरजेंसी व ट्रामा टेक्नीशियन, ब्लड ट्रांसफ्यूशन टेक्नीशियन सहित 24 पाठ्यक्रमों का संचालन अगले शैक्षिक सत्र से करने का फैसला भी हुआ है।

Tuesday, 22 September 2015

इंसेफ्लाइटिस पर सीएम का फरमान ठेंगे पर


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-सेहत का सच
-इंसेफ्लाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर्स की स्थापना का प्रयोग हुआ विफल
-अस्पतालों में न डॉक्टर पहुंचते, न फार्मासिस्ट व अन्य कर्मचारी
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डॉ.संजीव, गोरखपुर : यह तीस बेड वाला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है। गोरखपुर के खोराबार ब्लाक के शिवपुर सीएचसी को लोग बड़े अस्पताल के रूप में जानते हैं। पास के गांव गहिरा की शोभा को रोज रात में बुखार आता है और बदन में दर्द भी रहता है। तीन दिन से इस बड़े अस्पताल में आ रही हैं किन्तु डॉक्टर ही नहीं मिलते। यह स्थिति तब है, जबकि गोरखपुर व आसपास के इलाकों में तेजी से फैले इंसेफ्लाइटिस को लेकर मुख्यमंत्री तक चिंता जाहिर कर चुके हैं। मुख्यमंत्री का हर फरमान स्वास्थ्य विभाग के ठेंगे पर है।
गोरखपुर व आसपास के जिलों में इंसेफ्लाइटिस नई समस्या नहीं है। बीते दिनों इंसेफ्लाइटिस से एक साथ कई मौतें होने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस मसले पर हाई अलर्ट के साथ हर मरीज का इलाज सुनिश्चित करने को कहा था। गोरखपुर मेडिकल कालेज के साथ ही जिला अस्पतालों व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को इंसेफ्लाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर्स के रूप में विकसित करने की बात कही गयी थी। इंसेफ्लाइटिस से हो रही मौतों का सिलसिला तो अब भी नहीं थमा है किन्तु स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता कहीं नहीं दिखती है। जमीनी हकीकत की पड़ताल करते हुए लखनऊ-गोरखपुर हाईवे पर गोरखपुर से पहले ही सहजनवां अस्पताल पहुंचिये तो सच से सामना हो जाएगा। सुबह 11 बजे तक कई कमरों में डॉक्टर ही नहीं आए थे। सुरदई निवासी जयकार कुमार अपनी बहन राधिका को दिखाने के लिए काफी देर से भटक रहे थे किन्तु कोई देखने वाला नहीं था। अधीक्षक डॉ.जेके सिन्हा से इंसेफ्लाइटिस सेंटर व मरीजों के बारे में पूछा तो वे बोले, हमें नहीं पता, सिस्टर बता पाएंगी। इंसेफ्लाइटिस वार्ड में पहुंचे तो वहां साफ कह दिया गया कि बच्चों को यह बीमारी अधिक होती है और यहां बाल रोग विशेषज्ञ ही नहीं है तो मरीज मेडिकल कालेज भेजने ही पड़ते हैं।
गोरखपुर के ही शिवपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने पर तो चिकित्सकीय अराजकता की विद्रूप तस्वीर दिखाई देती है। वहां सुबह सवा दस बजे वार्ड ब्वाय राजेश सिंह अस्पताल के पोर्च में तख्त पर बैठकर लिखापढ़ी कर रहे थे। पूरे अस्पताल के अधिकांश कमरों में ताला पड़ा था। मरीज निराश होकर लौट रहे थे। यहां पांच एलोपैथिक डॉक्टरों की ड्यूटी है किन्तु कोई नहीं आता। फार्मासिस्ट, नर्स, वार्ड ब्वाय व अन्य कर्मचारी भी नहीं आए थे। अस्पताल में दंत चिकित्सक की भी तैनाती होनी है और इसके लिए डेंटल चेयर तक खरीद कर आ गयी है, किन्तु ऐसे तमाम चिकित्सकीय उपकरण ताले में बंद हैं। इंसेफ्लाइटिस पीडि़त मरीजों के अलग इलाज के पुख्ता बंदोबस्त का दावा करते हुए सूचनाएं भी लिखी हैं किन्तु इंसेफ्लाइटिस कक्ष में ही ताला पड़ा था। पैथोलॉजी जांच की मशीनें तो हैं किन्तु जांच नहीं होती। इंसेफ्लाइटिस को लेकर कमोवेश यही स्थिति अधिकांश स्वास्थ्य केंद्रों की है और इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता।
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मेडिकल कालेज पर छोड़ा पूरा जिम्मा
इसे चिकित्सकीय अराजकता ही कहेंगे कि जिला अस्पताल से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक इंसेफ्लाइटिस के इलाज का पूरा जिम्मा गोरखपुर मेडिकल कालेज पर छोड़ दिया गया है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के स्तर पर तो ज्यादातर डॉक्टर ही नहीं मिलते और जिला अस्पताल से भी इंसेफ्लाइटिस के लक्षणों के मरीज आते ही कई बार तो बिना देखे ही मेडिकल कालेज के लिए रेफर कर दिये जाते हैं। बताया गया कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को भी मरीजों को जिला अस्पताल के बजाय मेडिकल कालेज भेजने के ही मौखिक निर्देश दिये गए हैं। इस कारण मेडिकल कालेज में भी भीड़ इतनी ज्यादा हो जाती है कि डॉक्टर उसे संभाल नहीं पाते।
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गोद में बच्चा, फिर भी आतीं डॉक्टर
चिकित्सकों के न पहुंचने से निराश मरीजों के बीच एक चिकित्सक का पहुंच जाना उत्साहित कर देता है। शिवपुर स्वास्थ्य केंद्र में जहां मरीजों ने चिकित्सकों सहित अन्य कर्मचारियों के न आने की शिकायत की, वहीं आयुर्वेद चिकित्सक डॉ.चित्रा त्रिपाठी के नियमित आने की बात कही। बताया कि वे छोटा सा बच्चा होने के बावजूद नियमित रूप से अस्पताल आती हैं। वे मरीज भी नियमित देखती हैं। 

अब 50 लाख लोगों को समाजवादी पेंशन देने की तैयारी


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-मुख्यमंत्री ने की पहल, तैयार किया जा रहा प्रस्ताव
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : समाजवादी पेंशन से अधिकाधिक लोगों को जोडऩे के लिए अब सरकार 50 लाख लोगों को इस योजना से जोडऩे की तैयारी कर रही है। मुख्यमंत्री के स्तर पर पहल के बाद इस आशय का प्रस्ताव बनाया जा रहा है।
सरकार ऐसे गरीब परिवारों को समाजवादी पेंशन देती है, जिनके पास आय के उपयुक्त साधन नहीं हैं। इसके अंतर्गत पहले वर्ष 500 रुपए प्रति माह की दर से पेंशन मिलती है और फिर पांच साल तक हर वर्ष 50 रुपए महीने बढ़ाकर इसे 750 रुपए प्रति माह करने की योजना है। समाज के सभी वर्गों को इस योजना से लाभान्वित करने के लिए 30 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 25 प्रतिशत अल्पसंख्यक व 45 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग व सामान्य वर्ग के लोगों को लाभान्वित किया जाता है। इसके अंतर्गत वर्ष 2014-15 में 40 लाख लोगों को समाजवादी पेंशन देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। समाजवादी पेंशन को लेकर जबर्दस्त उत्साह देखे जाने के बाद राज्य सरकार ने वर्ष 2015-16 के लिए लाभार्थियों की संख्या 45 लाख करने का फैसला लिया था। मौजूदा वित्तीय वर्ष में धन का आवंटन भी इसी के अनुरूप कर दिया गया था। जानकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री के स्तर पर समाजवादी पेंशन योजना के संबंध में फीडबैक लिये जाने पर पता चला कि लोग इसे अत्यधिक पसंद कर रहे हैं। इस बाबत फार्म भरने को लेकर उत्साह भी दिखा। ऐसे में समाजवादी पेंशन के लाभार्थियों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी है। अब 50 लाख लोगों को समाजवादी पेंशन देने की तैयारी है। सूचना विभाग द्वारा इस आशय की होर्डिंग भी मुख्यमंत्री आवास के पास लोहिया पथ पर लगा दी गयी है। उसमें स्पष्ट कहा गया है कि सरकार अब समाजवादी पेंशन के लाभार्थियों की संख्या बढ़ाकर 50 लाख करने की तैयारी कर रही है।

Monday, 21 September 2015

दवा न खून, बस मौत आसानी से


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सेहत का सच
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-खोखले साबित हो रहे दवा और खून मुफ्त देने के दावे
-इस साल अब तक 207 मौतों के बावजूद व्यवस्था नहीं सुधरी
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डॉ.संजीव, गोरखपुर
शाम के सात बजे हैं। एक बुजुर्ग आइसीयू से कपड़े में लिपटी एक बच्ची को लेकर बाहर निकलते हैं। बाहर खड़ी महिलाएं जैसे ही यह दृश्य देखती हैं, चीखें गूंज उठती हैं। इस क्रंदन के पीछे दोहरा दर्द है हालांकि गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कालेज के वार्ड 12 के लिए यह सामान्य घटना है...रोज की है पर क्या करें वे बेचारे परिवार वाले जिनकी इस बच्ची को यह अस्पताल दवाएं और खून तक मुहैया न करा सका।
गोरखपुर व आसपास के जिलों में इंसेफ्लाइटिस पुरानी समस्या है। हर साल सैकड़ों लोग इस बीमारी की चपेट में आकर जान गंवा देते हैं। हर बार की तरह इस बार भी शासन से प्रशासन तक बड़े-बड़े दावे किये गए किन्तु जमीनी हकीकत उल्टी है। मुख्यमंत्री इंसेफ्लाइटिस के इलाज में लापरवाही न होने देने की बात करते हैं, सरकार दवा और खून मुफ्त देने का दावा करती है, प्रमुख सचिव मेडिकल कालेज का निरीक्षण करते हैं, किन्तु व्यवस्था है कि सुधरने का नाम नहीं लेती।
कुशीनगर के हाटा बाजार क्षेत्र के महरथा निवासी दुलारे की नातिन को पिछले हफ्ते तेज बुखार आया। उसे लेकर वह कुशीनगर जिला अस्पताल पहुंचे तो उन्हें गोरखपुर मेडिकल कालेज भेज दिया गया। यहां इंसेफ्लाइटिस के विशेष वार्ड में बच्ची को भर्ती करा दिया गया। चार दिन इलाज के बाद बच्ची की मौत हो गयी किन्तु इस बीच दुलारे व उनके परिवारीजन ने सारे दुख देख लिये। अस्पताल पहुंचने के बाद उन्हें बाजार से दवाएं लाने के लिए नियमित पर्चे पकड़ा दिये जाते। मृत्यु से एक दिन पहले खून चाहिए था पर वह भी मेडिकल कालेज ब्लड बैंक में नहीं मिला। इसके लिए उन्हें बाबा गोरक्षनाथ ब्लड बैंक जाना पड़ा।
सिर्फ दुलारे को ही इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ रहा। देवरिया के सर्वेश गुप्ता पर्चा लेकर गेट के बाहर भागते हुए मिले। गोरखपुर के ही लक्ष्मीगंज निवासी अरविंद का पुत्र कृष्णा भी भर्ती है। अरविंद के मुताबिक पहले दिन तो कुछ दवाएं मिलीं, किन्तु अब ज्यादातर दवाओं के लिए उन्हें बाहर भेज दिया जाता है। उधर, मेडिकल कालेज प्रशासन के दावे बिल्कुल विपरीत हैं।
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समस्या का समाधान जरूर होगा
यदि कोई गड़बड़ कर रहा है तो उन तक पहुंचें, समस्या का समाधान जरूर होगा। प्रयासों का ही नतीजा है कि इंसेफ्लाइटिस से मौतों में कमी आई है। पिछले वर्ष अब तक 397 लोगों की जान गयी थी, इस वर्ष 207 लोगों की ही मौत हुई है। दवा व खून न मिलने की जांच होगी और दोषी को दंडित किया जाएगा।
-डॉ.आरपी शर्मा, प्राचार्य, मेडिकल कालेज
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रिपोर्ट का इंतजार
हर मरीज को तुरंत भर्ती करने के सरकारी दावे का भी गोरखपुर मेडिकल कालेज में मजाक उड़ाया जा रहा है। बिहार के गोपालगंज से राजेश यादव अपनी बेटी अंजनी को लेकर यहां पहुंचे। वहां की रिपोर्टों के आधार पर इंसेफ्लाइटिस होने के कारण उन्हें सीधे इंसेफ्लाइटिस वार्ड रेफर किया गया। वह पूरे दिन परेशान रहे किन्तु बेटी को भर्ती नहीं किया गया। डॉक्टरों का कहना था कि पहले इंसेफ्लाइटिस की एक और जांच होगी।
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अधिकारियों के आने पर सफाई
इंसेफ्लाइटिस वार्ड के आसपास सफाई कई दफा अफसरों के दौरों के मद्देनजर ही होती है। सघन चिकित्सा कक्ष के बाहर कोने पर काफी मेडिकल कचरा जमा रहता है। खुले में कचरा फेंकना तो आम बात है। तीमारदारों ने बताया कि जिस दिन किसी अधिकारी को आना होता है, उस दिन तो ताबड़तोड़ सफाई शुरू हो जाती है। उसके अलावा स्थिति जस की तस।
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Sunday, 20 September 2015

टूटी बिल्डिंग, पानी तक का संकट, कैसे हो इलाज


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-सेहत का सच
-नए अस्पतालों के निर्माण के बीच पुराने भवनों को गए भूल
-प्रारंभिक जरूरतों की परवाह तक नहीं करने से डॉक्टर निराश
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डॉ.संजीव, फैजाबाद : प्रदेश में लगातार नए अस्पताल खोलने की घोषणाएं हो रही हैैं किन्तु पुराने अस्पतालों की चिंता किसी को नहीं है। भवन टूटे हुए हैं, चिकित्सकों तक को पानी का संकट है, ऐसे में इलाज कैसे हो यह भी बड़ा सवाल है। जो डॉक्टर नियमित रूप से अस्पताल पहुंच रहे हैैं, वे प्रारंभिक जरूरतों की परवाह न किये जाने से निराश हैं।
भरतकुंड ऐतिहासिक स्थल है। वहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था। कुछ माह पूर्व उसे बंद कर मसौधा ब्लाक के कैल में शिफ्ट कर दिया गया। अब वहां डॉक्टर तो नियमित जाते हैं किन्तु उनकी परेशानियां बढ़ गयी हैं। अस्पताल में चार बेड भी हैं किन्तु रात में मरीज देखने की कोई सुविधाएं नहीं है। दो पुरुषों व दो महिलाओं को भर्ती कर इलाज करने की सुविधा होने के बावजूद यहां ड्रिप लगाने के अलावा भर्ती कर कोई इलाज नहीं होता। अस्पताल में हैंडपंप तक नहीं है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर के लिए आवास की व्यवस्था होती है किन्तु यहां नहीं है। ऐसे में डॉक्टर फैजाबाद से रोज लगभग तीस किलोमीटर मोटरसाइकिल चलाकर आते हैं। कैल के ही सबसेंटर में कुछ वर्ष पहले तक महिलाओं के प्रसव की व्यवस्था थी। अब वह इस कदर जर्जर हो चुका है कि एएनएम को बगल में पंचायत भवन के बरामदे में बैठकर  काम करना पड़ता है। आशा कार्यकर्ता यदि किसी मरीज को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रेफर करें तो वहां महिला चिकित्सक न होने से निराशा ही होती है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में आधारभूत सुविधाएं न होने से दिक्कत है। बाराबंकी के बड़ागांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर एलोपैथिक डॉक्टर ही नहीं, आयुष विधा के चिकित्सक भी इलाज के लिए मौजूद रहते हैं। यहां डिलीवरी रूम से लेकर ऑपरेशन थियेटर तक है किन्तु स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ न होने से दिक्कत होती है। ऐसे में आशा कार्यकर्ता यदि किसी गर्भवती महिला को गंभीर अवस्था में लेकर आए तो उस महिला को जिला अस्पताल भेजने के अलावा कोई चारा नहीं होता है। यहां के महिला चिकित्सालय का भवन पूरी तरह जर्जर है, इसलिए वहां भी गंभीर महिलाओं का इलाज नहीं होता है। फैजाबाद के मसौधा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भी स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ न होने से दिक्कत होती है और वहां गंभीर प्रसव नहीं हो पाते हैं। यह स्थिति बाराबंकी और फैजाबाद के अधिकांश स्वास्थ्य केंद्रों की है, किन्तु इस ओर कोई सकारात्मक कार्य हो ही नहीं रहा है। सच ये है कि सभी प्रसव एएनएम के सहारे ही होते हैं।
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बायोमीट्रिक से हुआ सुधार
ऐसा नहीं है कि सरकार चाहे तो स्थितियां नहीं सुधर सकती हैं। बाराबंकी के बड़ागांव स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इसका बड़ा उदाहरण है। वहां अंगूठा लगाकर हर डॉक्टर व कर्मचारी की बायोमीट्रिक उपस्थिति दर्ज की जाती है। ऐसा होते ही वहां सुधार हो गया। अब वहां नियमित रूप से डॉक्टर, कम्पाउंडर व अन्य कर्मचारी आते हैं और किसी तरह की दिक्कत नहीं होती। इससे मरीज भी खुश हैं और पहले कर्मचारियों व डॉक्टरों की अनुपस्थिति से परेशान रहने वाले अधीक्षक भी प्रफुल्लित हैं।
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डॉक्टर भी, कम्पाउंडर भी
सरकारी अस्पतालों में समस्याओं से जूझते हुए भी तमाम डॉक्टर काम कर रहे हैैं। लखनऊ-गोरखपुर हाईवे से सटे 22 किलोमीटर भीतर मसौधा ब्लाक के कैल में बने स्वास्थ्य केंद्र में बैठे डॉ.अमरनाथ गुप्ता खुद ही मरीज देख रहे थे, खुद ही दवा भी बांट रहे थे। उन्होंने बताया कि रोज तीस से चालीस मरीज आते हैं। वे बड़ी उम्मीद लेकर आते हैं, इसलिए उन्हें निराश नहीं किया जा सकता। डॉ.गुप्ता ने सामने एक ट्रे में सभी प्रमुख दवाएं सजा रखी थीं और एक-एक कर दवा देने के साथ उन्हें खाने का तरीका भी मरीजों को समझाते जा रहे थे।

न डॉक्टर न कम्पाउंडर, आया चलावें अस्पताल


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सेहत का सच
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-सड़क से दूर अस्पताल पूरी तरह चल रहे भगवान भरोसे
-कुछ जगह एडजस्टमेंट कर एक डॉक्टर के सहारे संचालन
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डॉ.संजीव, बाराबंकी
यदि आप सड़क किनारे के किसी गांव में रहते हैं तो इलाज की उम्मीद कर सकते हैं। सड़क से थोड़ा दूर जाते ही इलाज की संभावनाएं दूरी बढऩे के साथ कम होने लगती हैं। अधिकांश अस्पतालों में न तो डॉक्टर पहुंचते हैं, न ही कम्पाउंडर। कई जगह तो आया ही पूरा अस्पताल चलाती मिलीं।
प्रदेश सरकार प्राथमिक व नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने के तमाम दावे करती है लेकिन वास्तविकता के धरातल पर ये दावे खरे नहीं उतर रहे। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पहल पर मौजूदा वर्ष को मातृ-शिशु रक्षा को समर्पित किया गया है मगर सच्चाई इससे बहुत दूर है। कुछ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को छोड़ दिया जाए तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक डॉक्टर पहुंच ही नहीं रहे हैैं। बाराबंकी के मसौली में महिला चिकित्सालय खुला तो लोग खुश हुए थे, किन्तु अब वे निराश ही रहते हैं। शुक्रवार सुबह आठ बजे से वहां गांव की एक महिला अपने दो बच्चों को लेकर आई थी। नाम पूछने पर उन्होंने साफ मना कर दिया कि वह नाम व फोटो नहीं छापने देंगी। खैर, तीन घंटे से अधिक समय हो गया किन्तु अस्पताल में आने वाली महिला डॉक्टर नहीं पहुंचीं। एक एएनएम आई तो वह भी क्षेत्र में निकल गई। आखिर में 12 बजे तक इंतजार करने के बाद उक्त महिला को लौट जाना पड़ा। तब तक अस्पताल को आया खेमावती ही संभाल रही थी। गांव वालों के मुताबिक पहले कम्पाउंडर आ जाता था, किन्तु अब डॉक्टर के न आने के कारण वह भी नहीं आता है। इसकी शिकायत भी कई बार मुख्य चिकित्सा अधिकारी तक की गयी किन्तु कोई असर नहीं होता है। क्षेत्र के अन्य प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी यही स्थिति मिली।
बाराबंकी व फैजाबाद के ग्र्रामीण अंचलों में एक और बात देखने को मिली। महिला चिकित्सालयों या उन प्राथमिक चिकित्सालयों में जहां सिर्फ महिलाएं ही तैनात हैं, वहां डॉक्टरों की कमी ज्यादा है। पुरुष चिकित्सकों ने एडजस्टमेंट का फार्मूला निकाला है। वे सप्ताह में तीन-तीन दिन आते हैं और बाकी तीन दिन लखनऊ में प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। यह स्थिति सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी है। फैजाबाद के मसौधा का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सभी सुविधाएं हैं। वार्ड से लेकर ऑपरेशन थियेटर तक सब बने हैं किन्तु डॉक्टर नहीं आते। हम दोपहर एक बजे के आसपास वहां पहुंचे तो डॉ.बीएन यादव व डॉ.दिनेश वर्मा की ड्यूटी थी, किन्तु मौजूद मिले सिर्फ डॉ.दिनेश वर्मा। वहां संविदा पर कुछ डॉक्टर नियुक्त किये गए हैं किन्तु वे आते ही नहीं। इस कारण एक गर्भवती महिला सहित दो दर्जन मरीज डॉक्टर के इंतजार में बैठे थे। कम्पाउंडर न होने के कारण दवा वितरण कक्ष में भी सन्नाटा था।
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दवा कंपनी के खर्चे पर आतीं डॉक्टर
बाराबंकी के कुछ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की आवाजाही दवा कंपनियों के भरोसे है। ये डॉक्टर लखनऊ में प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। दवा कंपनियां उनसे अपनी दवा लिखवाने के बदले उन्हें टैक्सी से सप्ताह में एक-दो दिन अस्पताल भिजवाने का इंतजाम करती हैं। इनमें महिला चिकित्सक ज्यादा हैं। एक महिला चिकित्सक के पति तो स्वास्थ्य विभाग में अधिकारी हैं और वह अपनी इच्छानुसार सप्ताह में एक दिन जाकर पूरे हस्ताक्षर कर आती हैं।
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जब गांव वालों ने कर लिया कैद
बाराबंकी के मसौली महिला चिकित्सालय में डॉक्टर सप्ताह में एक या अधिकतम दो दिन आती थीं। गांव वाले अस्पताल जाते तो उन्हें निराश ही लौटना पड़ता था। अस्पताल के बाहर मिली ग्र्रामीण रंजना के मुताबिक रोज-रोज की इन स्थितियों से परेशान होकर कुछ माह पूर्व गांव वाले इकट्ठे हुए और उन्होंने गेट बंद कर डॉक्टर को कैद कर लिया। बाद में पुलिस आयी तो वह छूटीं। फिर कुछ दिन स्थितियां ठीक रहीं किन्तु फिर वही हाल है।
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Saturday, 19 September 2015

पैथोलॉजी में साइकिल, बरामदे में गर्भवती


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-सेहत का सच-
-सरकारी अस्पतालों में पहुंच ही नहीं रहे डॉक्टर
-जांचें तो दूर, मरीजों की चिंता भी भगवान भरोसे
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डॉ. संजीव, फैजाबाद
हर मरीज को तुरंत इलाज व मुफ्त दवा का सरकारी दावा आज भी ग्र्रामीण अंचल में महज सपना ही है। वहां सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर ही नहीं पहुंच रहे हैैं। जांचें व दवाएं मिलना तो दूर, मरीजों की चिंता भी भगवान भरोसे ही है।
बाराबंकी व फैजाबाद प्रदेश सरकार के उच्च प्राथमिकता वाले जिलों की सूची में शामिल हैं। सरकार आए दिन यहां जच्चा-बच्चा की सुरक्षा से लेकर उनके भरपूर इलाज तक का दावा करती है, किन्तु जमीनी हकीकत कुछ और ही है। लखनऊ से गोरखपुर के बीच चमचमाते हाइवे के किनारे बन रही ऊंची इमारतों से नीचे उतरकर कुछ किलोमीटर भीतर जाइए तो सेहत के साथ हो रहा मजाक साफ दिख जाएगा।
शुरुआत बाराबंकी के बड़ागांव स्थित जच्चा-बच्चा अस्पताल यानी सब सेंटर से करते हैं। अस्पतालों में शत प्रतिशत प्रसव की तैयारियों का दावा यहां खोखला नजर आता है। यहां अस्पताल में ताला पड़ा है। पास के जकारिया गांव की अशरफुन्निशां गर्भवती हैं। आशा कार्यकर्ता उन्हें अस्पताल लेकर आयीं तो उन्हें बरामदे में पड़े बेड पर लिटा दिया गया। अब उनकी परवाह करने वाला वहां कोई नहीं है। पूछने पर बताया गया कि डॉक्टर तो यहां आती ही नहीं हैैं। दो एएनएम सावित्री व आमिनी हैं, जो हफ्ते में तीन-तीन दिन आकर ड्यूटी कर लेती हैं। सबसेंटर के बाहर मिली प्रीति का कहना था कि यहां तो आने वाले हर मरीज भगवान भरोसे ही रहते हैैं। गंभीर अवस्था में आएं तो इलाज मिलना असंभव ही होता है।
बाराबंकी से आगे बढ़कर फैजाबाद पहुंचे तो वहां का हाल भी ऐसा ही है। हर मरीज की मुफ्त जांच का दावा यहां दम तोड़ रहा है। रानी बाजार के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पैथोलॉजी में साइकिल खड़ी थी। पैथोलॉजी में कोई जांच नहीं होती। जांच की आवश्यकता पडऩे पर मरीजों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा जाता है। फैजाबाद के मसौधा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर भी कमोवेश यही स्थिति दिखी। सरकार सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर एक्सरे सहित अन्य जांचें मुफ्त करने का दावा करती है किन्तु यहां एक्सरे कक्ष में ताला पड़ा था। अस्पताल के चिकित्सक डॉ. दिनेश यादव बताते हैं कि अभी एक्सरे जैसी सुविधाएं नहीं शुरू हो सकी हैं, शुरुआती जांचें जरूर होती हैं। वहां आए मरीज मो.इमरान का कहना था पहले तो डॉक्टर ही नहीं मिलते, यदि मिल भी जाएं तो जांच के नाम पर जिला अस्पताल या नए खुले दर्शन नगर अस्पताल में भेज दिया जाता है।
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हम तो पिराइवेट हन
बाराबंकी के बड़ागांव सबसेंटर पर मिली आया की फोटो खींचने की कोशिश हुई तो उन्होंने साफ मना कर दिया। बोलीं, हम तो पिराइवेट हन, मरीज अउर उनके घर वाले जौन दई देत हैं, वहै लइ लेती हन। यानी वे सरकारी अस्पताल में नौकरी नहीं करतीं। बिना सरकारी अनुमति के एएनएम ने उनकी आउटसोर्सिंग की है और वे वहां मरीजों से मिलने वाले कुछ रुपयों के लिए उनका प्रसव कराने आ जाती हैं।
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पूरा समय अस्पताल को
इस पड़ताल में कुछ उम्मीद की किरणें भी नजर आयीं। फैजाबाद के रानी बाजार स्वास्थ्य केंद्र में डॉ.प्रशांत शुक्ला मरीज देख रहे थे। वे बोले, इलाहाबाद मेडिकल कालेज से एमबीबीएस करने के बाद यहां आ गया हूं। अब अस्पताल परिसर में ही रहता हूं। अभी शादी नहीं हुई तो पूरा समय मरीजों के लिए ही समर्पित है। यहां अस्पताल में प्रसव भी होते हैं और रात में कोई मरीज आ जाए तो निराश नहीं लौटना पड़ता।

Wednesday, 16 September 2015

कुपोषण के खिलाफ जंग में 11,77,933 चुनौतियां


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-75 जिलों में अभियान चलाकर ढूंढ़े गए अतिकुपोषित बच्चे
-फिर भी नहीं ढूंढ़े जा सके 11 लाख से अधिक प्रभावित बच्चे
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डॉ.संजीव, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में कुपोषण के खिलाफ जंग छेडऩे की तमाम कोशिशों के बीच चुनौतियां चिह्नित की गयी हैं। सभी 75 जिलों में अभियान चलाकर 11,77,933 अतिकुपोषित बच्चे ढूंढे गए हैं। शासन स्तर पर हर बच्चे को चुनौती मानकर उसे अतिकुपोषण के घेरे से बाहर निकालने का लक्ष्य रखा गया है। इन चुनौतियों को चिह्नित करने के लिए दो दिन चले अभियान के बाद भी अतिकुपोषण के शिकार अभी आधे बच्चे नहीं ढूंढे जा सके हैं।
प्रदेश में पांच वर्ष आयु वर्ग के कुल बच्चों की संख्या दो करोड़ 26 लाख 53 हजार 877 है। स्वास्थ्य विभाग के मानकों के हिसाब से इनमें 22 लाख 65 हजार 387 बच्चे अतिकुपोषित श्रेणी में हैं। इसके बावजूद अब तक ऐसे सिर्फ 1.4 लाख बच्चे चिह्नित थे। कुपोषण के मामले में सर्वाधिक खतरनाक रेड जोन होता है, जिसमें वे बच्चे रखे जाते हैं जो अपनी आयु की तुलना में बहुत कमजोर होते हैं। ऐसे बच्चों की अतिकुपोषित श्रेणी तलाशने के लिए बीते दिनों मुख्य सचिव के स्तर पर पहल हुई थी। सभी 75 जिलों के जिलाधिकारियों को सीधी जिम्मेदारी सौंप कर हर बच्चे का वजन लेना सुनिश्चित करने की बात कही गयी थी।
इसके बाद प्रदेश भर के एक करोड़ 97 लाख नौ हजार 707 बच्चों का वजन किया गया। इनमें से 11,77,933 बच्चे अतिकुपोषित निकले हैं, जिन्हें रेड जोन में शामिल कर लिया गया है। अब इन बच्चों को कुपोषण के दायरे से बाहर निकालने के साथ ही शेष बचे 10 लाख 87 हजार 454 बच्चों को तलाशने की मुहिम भी शुरू की जाएगी। रेड जोन में शामिल किए गए बच्चों को पहले येलो जोन तक पहुंचाया जाएगा। येलो जोन में वे बच्चे होते हैं, जो कुपोषित और स्वस्थ बचपन की सीमारेखा पर होते हैं। येलो जोन के बाद इन बच्चों को स्वस्थ बच्चों के ग्र्रीन जोन में पहुंचाने की मशक्कत होगी। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविन्द कुमार के अनुसार रेड जोन में शामिल सभी बच्चों की मासिक जांच होगी। इन्हें दोगुना पुष्टाहार तो दिया ही जाएगा, उनके माता-पिता की काउंसिलिंग भी की जाएगी। नवजात शिशु को शत प्रतिशत स्तनपान कराकर कुपोषण से बचाया जा सकता है, इसलिए आशा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व एएनएम के नेटवर्क को मजबूत कर हर स्तर पर प्रयास होंगे। हर माह होने वाले पोषण दिवस को और प्रभावी बनाया जाएगा। उन्हें विशेष रूप से विटामिन ए सप्लीमेंट भी दिये जाएंगे।  
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-यूपी का हाल-
कुल बच्चे : 2,26,53,877
वजन हुआ : 1,97,09,707
अतिकुपोषित : 22,65,387
पहचाने गए : 11,77,933
अभी बचे हैं : 10,87,454

आंकड़ों में खेल किया तो नपेंगे सीएमओ


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-गोंडा, सीतापुर व फर्रुखाबाद में तुरंत हो आशा की भर्ती
-हौसला साझेदारी में निजी अस्पतालों को सीधे भुगतान
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं को जमीनी स्तर तक सार्थक रूप में उतारने के लिए सही आंकड़े सामने आने जरूरी हैं। इसके बावजूद तमाम मुख्य चिकित्सा अधिकारी लापरवाही करते हुए आंकड़ों में गड़बड़ी कर रहे हैं या करवा रहे हैं। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने बुधवार को साफ कहा कि अब यदि आंकड़ों में खेल किया गया तो संबंधित सीएमओ के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
शीर्ष वरीयता वाले 25 जिलों में स्वास्थ्य विभाग के कामकाज की समीक्षा करते हुए प्रमुख सचिव ने कहा कि तमाम जिलों में समय से आंकड़े नहीं भर कर लॉक नहीं किए जा रहे हैं। इससे मनमाने ढंग से बदलाव भी होता है। वार्षिक आंकड़े भी नहीं ठीक से भेजे जा रहे हैं। अब यह स्थिति नहीं सामने आनी चाहिए। आंकड़ों की जांच के लिए समितियां बनाकर समय पर वे भेज दिए जाने चाहिए। गोंडा, सीतापुर व फर्रुखाबाद के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से आशा कार्यकर्ताओं के रिक्त पदों पर भर्ती तुरंत करने को कहा गया। हौसला साझीदारी योजना में निजी क्षेत्र को मान्यता देने में ढिलाई न करने के निर्देश दिए गए। तय हुआ कि अब निजी अस्पतालों को भुगतान सिफ्सा के माध्यम से सीधे ऑनलाइन प्रणाली से हो जाएगा। ऑक्सीटोसिन का दुरुपयोग रोकने के साथ इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए। कहा गया कि अन्य महत्वपूर्ण दवाएं भी हर हाल में उपलब्ध रहें। बैठक में राष्ट्र्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक अमित घोष, तकनीकी सहयोग इकाई के मुखिया विकास गोथलवाल, स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ.विजयलक्ष्मी आदि की उपस्थिति रही।
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शहरी स्वास्थ्य केंद्रों पर जोर
प्रमुख सचिव ने राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (एनयूएचएम) के कामकाज की समीक्षा में शहरी स्वास्थ्य केंद्रों को समयबद्ध ढंग से चालू करने पर जोर दिया। बीते माह जिन साठ शहरी स्वास्थ्य केंद्रों का उद्घाटन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किया था, उनके कामकाज की भी समीक्षा की गयी। उन्होंने कहा कि दवाओं की उपलब्धता हर हाल में सुनिश्चित की जाए। बीस शहरी स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों से लेकर अन्य कर्मचारियों की जरूरत शासन को भेजी जाए, ताकि पद सृजन कर उन्हें समयबद्ध ढंग से चालू कराया जा सके।
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ब्लड बैंक न करें ढिलाई
प्रमुख सचिव ने 39 सरकारी ब्लड बैंकों की समीक्षा करते हुए कहा कि किसी भी मरीज के इलाज में ब्लड बैंकों के स्तर पर कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए। डेंगू के मरीजों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर उन्हें प्लेटलेट्स की जरूरत होगी। ऐसे में ब्लड बैंक्स में ब्लड कम्पोनेंट सेपेरेशन यूनिट भी ठीक से काम करें, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। ब्लड बैंकों में पेशेवर रक्तदाताओं से कतई खून न लिया जाए और उसके स्थान पर रक्तदान को बढ़ावा दिया जाए। इसके लिए विशेष अभियान भी चलाया जाना चाहिए।

संक्रामक रोगों की जल्द पहचान में जुटेंगे मेडिकल कालेज


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-सामाजिक कार्यों व शोध गतिविधियों में वृद्धि की पहल
-इंसेफ्लाइटिस पर नियंत्रण को गोरखपुर में विशेष इंतजाम
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : संक्रामक रोगों की जल्दी पहचान में मेडिकल कालेजों की भूमिका सुनिश्चित करने की पहल शासन स्तर पर की जा रही है। इसके लिए सभी कालेजों के सोशल एंड प्रिवेंटिव मेडिसिन विभागों को सक्रिय किया जाएगा। इंसेफ्लाइटिस पर नियंत्रण को गोरखपुर मेडिकल कालेज में विशेष इंतजाम किए गए हैं।
चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रदेश के प्रमुख सचिव अनूप चंद्र पाण्डेय ने बताया कि हर मेडिकल कालेज में सामाजिक कार्यों से जुड़ाव के लिए सोशल एंड प्रिवेंटिव मेडिसिन विभागों की स्थापना की गयी थी। ग्र्रामीण अंचलों में इन विभागों के नोडल सेंटर भी हैं किन्तु अब प्रभावी नहीं हैं। इन सभी को प्रभावी रूप से सक्रिय किया जाएगा। सभी मेडिकल कालेजों में ग्र्रामीण स्तर तक जुड़ाव बढ़ाकर संक्रामक रोगों का अध्ययन हो, उन पर शोध बढ़ें तो निश्चित रूप से रोगों पर नियंत्रण अधिक प्रभावी होगा। इसके लिए सभी मेडिकल कालेज प्राचार्य स्वयं भी शोध गतिविधियों पर नजर रखेंगे। हर कालेज में नियमित रूप से कितने शोध हो रहे हैं, कितने विषयों पर काम चल रहा है, आदि ब्यौरा भी वार्षिक प्रतिवेदन का हिस्सा बनेगा।
मंगलवार को गोरखपुर मेडिकल कालेज का निरीक्षण कर लौटे प्रमुख सचिव ने बताया कि वहां इंसेफ्लाइटिस पर नियंत्रण के विशेष इंतजाम किए जाएंगे। किसी भी हालत में पुनर्संक्रमण की स्थिति न पैदा हो, यह सुनिश्चित करने को कहा गया है। जापानी इंसेफ्लाइटिस या दिमागी बुखार का मरीज आने पर उसका पूरा इलाज नि:शुल्क होगा। दवाओं के लिए अतिरिक्त तीन करोड़ रुपए जारी कर दिए गए हैं। डॉक्टरों, नर्सों से लेकर पैरामेडिकल स्टाफ तक सभी पद हर हाल में दो माह के भीतर भर लिये जाएंगे। वहां 56 वेंटीलेटर्स चल रहे हैं किन्तु बिजली जाने की स्थिति में उनके बंद होने का खतरा था। इससे निपटने के लिए 250 केवीए जेनरेटर खरीदने को 22.32 लाख रुपये स्वीकृत कर दिए गए हैं। वहां पहुंचने वाले मरीजों के तीमारदारों को रुकने के लिए एयरपोर्ट एथॉरिटी ऑफ इंडिया की मदद से रैन बसेरा बनेगा। इसके लिए शासन से अनापत्ति प्रमाणपत्र भी जारी कर दिया गया है।

Tuesday, 15 September 2015

मेडिकल मैनेजर दिखाएंगे मरीजों को राह



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-आजमगढ़, गोंडा, रायबरेली, सीतापुर एवं हरदोई में बाल सघन चिकित्सा कक्ष
-नर्सों की भर्ती के लिए बदलेंगे नियम, हर मंडलीय अस्पताल में डायलिसिस विंग
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : आप सरकारी अस्पताल में पहुंचकर इलाज के लिए भटक रहे हैं तो चिंता न करें। आप अस्पताल में तैनात मेडिकल मैनेजर के पास जाएं, वह राह दिखाएंगे। जल्द ही सरकारी अस्पतालों में ऐसी स्थितियां सुलभ कराने के निर्देश मुख्य सचिव आलोक रंजन ने दिए हैं।
मंगलवार को स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के साथ हुई बैठक में मुख्य सचिव ने कहा कि ये मेडिकल मैनेजर न सिर्फ सौम्य तरीके से मरीजों व तीमारदारों की समस्याओं का समाधान करेंगे बल्कि चिकित्सकीय परीक्षण से लेकर जांच आदि तक की चिंता करेंगे। उन्होंने अधिकारियों व जिलाधिकारियों को अस्पतालों के नियमित निरीक्षण करने और इसके लिए बाकायदा सूची बनाने के निर्देश दिए हैं। प्रमुख सचिव से गोरखपुर से निरीक्षण की शुरुआत करने को कहा गया है। 17 जनपदों में निर्माणाधीन रोगी आश्रय स्थलों का निर्माण समय पर पूरा कराने को कहा।
मुख्य सचिव ने कहा कि नर्सों के रिक्त पद भरने के लिए आवश्यकता के अनुरूप सेवा नियमावली में परिवर्तन भी किया जा सकता है। अस्पतालों में सभी परीक्षण व जांचें 24 घंटे होनी चाहिए। 84 अस्पतालों में आयुष विंग स्वीकृत हुई थीं, उनमें से 57 पूरी हो चुकी हैं। शेष भी समयबद्ध ढंग से पूरी कराई जाएं। उन्होंने कहा कि मंडलीय अस्पतालों में एक माह के भीतर डायलिसिस केंद्र शुरू कराए जाएं। आजमगढ़, गोंडा, रायबरेली, सीतापुर एवं हरदोई के जिला अस्पतालों में बाल सघन चिकित्सा कक्ष का निर्माण गुणवत्ता के साथ कराया जाए।
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इंसेफ्लाइटिस पर सतर्कता
बैठक में प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने बताया कि इंसेफ्लाइटिस व दिमागी बुखार के लिए संवेदनशील 17 जिलों के जिला चिकित्सालयों में प्रयोगशालाएं चालू हो चुकी हैं। अप्रैल से जुलाई तक 37 जिलों में सात लाख से अधिक बच्चों को इंसेफ्लाइटिस का टीका लगाया जा चुका है। प्रदेश में साढ़े आठ लाख से अधिक वैक्सीन उपलब्ध हैं। गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया, बस्ती, सिद्धार्थनगर एवं संतकबीरनगर के 36 ब्लाकों में 15 से 65 वर्ष तक की आयु वर्ग के लोगों को इंसेफ्लाइटिस का टीका लगाने के लिए 47 लाख वैक्सीन उपलब्ध कराई जा रही है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष दिमागी बुखार के रोगियों की संख्या घटी है। मृत्युदर भी पिछले वर्ष के 19.80 प्रतिशत से घटकर 13.32 प्रतिशत रह गयी है।

फीस तय न होने से निजी चिकित्सा संस्थानों में मनमानी


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-रुक गयी शासन स्तर पर शुरू हुई फीस निर्धारण प्रक्रिया
-निजी मेडिकल व डेंटल कालेजों ने नहीं भेजा पूरा ब्योरा
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : शासन की मंशा के बावजूद निजी मेडिकल, डेंटल व आयुर्वेदिक कालेजों का फीस निर्धारण अब तक नहीं हो सका है। इस कारण निजी चिकित्सा संस्थान मनमानी फीस लेकर प्रवेश कर रहे हैं।
प्रदेश में निजी क्षेत्र के 14 मेडिकल कालेज, 25 डेंटल कालेज व 14 आयुर्वेदिक कालेज संचालित हो रहे हैं। इनमें मनमानी फीस वसूली की शिकायतें लंबे समय से मिलती रही हैं। इस पर अंकुश की तमाम कोशिशें विफल होने पर इस वर्ष प्रदेश सरकार ने निजी चिकित्सा संस्थानों की फीस तय करने का फैसला किया था। इसके लिए प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) ने पहल कर मेडिकल व डेंटल कालेजों के लिए चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक व आयुर्वेदिक कालेजों के लिए आयुर्वेद निदेशक के माध्यम से फीस निर्धारण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी। सभी कालेजों से चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा प्रमाणित उनके आय-व्यय का लेखा-जोखा भी मांगा गया था, ताकि उसके हिसाब से फीस निर्धारित की जा सके। इस बाबत कई बार बैठकों के बाद भी सभी निजी कालेजों ने अपना ब्यौरा नहीं सौंपा। बमुश्किल एक दर्जन कालेजों ने अपना लेखा-जोखा सौंपा, जिसमें से आधा दर्जन के लिए एमबीबीएस व बीडीएस की फीस ढाई से साढ़े सात लाख के बीच निर्धारित की गई। अन्य संस्थानों की फीस अब तक लंबित है। आयुर्वेदिक कालेजों की फीस निर्धारण के लिए तो शुरुआती बैठकों के बाद बैठक तक नहीं हो सकी है। इस बीच सभी कालेजों में प्रवेश प्रक्रिया भी शुरू हो गयी है। कालेज मनमानी वसूली कर प्रवेश ले रहे हैं और चिकित्सा शिक्षा विभाग उन्हें रोक नहीं पा रहा है। इस संबंध में चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने कहा कि जल्द ही फीस निर्धारित की जाएगी। इस बीच यदि किसी कालेज द्वारा वसूली या अराजकता की शिकायत मिली, तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी की जरूर की जाएगी।
53 कालेज, 250 करोड़ फीस
प्रदेश के 53 निजी कालेजों में एमबीबीएस की 1500, बीडीएस की 2500 व बीएएमएस की 1000 सीटें हैं। इन पांच हजार सीटों पर कालेज संचालक मनमानी वसूली करते हैं। मौजूदा समय में बीएएमएस के लिए औसतन तीन लाख रुपये प्रति वर्ष, बीडीएस के लिए औसतन पांच लाख रुपये प्रतिवर्ष और एमबीबीएस के लिए औसतन दस लाख रुपये प्रतिवर्ष तक निजी कालेजों द्वारा वसूले जा रहे हैं। इस तरह 53 कालेजों में औसतन 250 करोड़ रुपये फीस हर साल वसूली जाती है।
11 साल बाद शुरू हुई प्रक्रिया
निजी कालेजों में फीस निर्धारण की यह प्रक्रिया बमुश्किल 11साल बाद शुरू हो सकी है। इससे पहले वर्ष 2004 में फीस निर्धारण किया गया था। तब तय हुआ था कि हर तीन साल में निजी कालेजों की फीस पुन: निर्धारित की जाएगी। शासन स्तर पर निजी कालेजों की पकड़ ही थी कि फीस का पुनर्निधारण नहीं हुआ और कालेज मनमाने ढंग से वसूली करते रहे। इस बार भी यह सिलसिला शुरू होने के बाद बार-बार रुकने के कारण तमाम सवाल उठ रहे हैं।  

Monday, 14 September 2015

इंसेफ्लाइटिस व संक्रामक बुखार पर हाई अलर्ट


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-विशेष सचिवों की रिपोर्ट के बाद विभाग सक्रिय
-प्रमुख सचिव रखेंगे सीधी नजर, गोरखपुर से शुरुआत
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : इंसेफ्लाइटिस  व संक्रामक बुखार को लेकर प्रदेश के मेडिकल कालेजों में हाई अलर्ट जारी किया गया है। विशेष सचिवों की रिपोर्ट के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग सक्रिय हुआ है। अब विशेष सचिव सीधी नजर रखेंगे और गोरखपुर से इसकी शुरुआत होगी।
इंसेफ्लाइटिस से हो रही मौतों पर मुख्यमंत्री ने सख्त रुख अख्तियार किया है। डेंगू के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। इस पर चिकित्सा शिक्षा विभाग ने इंसेफ्लाइटिस व डेंगू सहित सभी तरह के संक्रामक बुखार पर सभी मेडिकल कालेजों को हाई अलर्ट रहने को कहा है। उनसे बुखार का कोई भी मरीज आने पर किसी भी तरह की लापरवाही न करने की बात भी कही गयी है। संक्रामक बुखार के संबंध में दैनिक रिपोर्ट भेजने के साथ मेडिकल कालेज प्राचार्यों से स्वयं सीधे नजर रखने को कहा गया है। अपेक्षा की गयी है कि वे रात में भी वार्डों का राउंड लेकर इलाज में कोई लापरवाही न होने दें।
प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) अनूप चंद्र पाण्डेय ने बीते दिनों सभी विशेष सचिवों को अलग-अलग मेडिकल कालेजों में भेज कर औचक निरीक्षण कराए थे। इन निरीक्षणों की रिपोर्ट आने के बाद विभाग की सक्रियता और बढ़ गयी है। स्वयं प्रमुख सचिव अब मेडिकल कालेजों का निरीक्षण करेंगे और इसकी शुरुआत गोरखपुर से हो रही है। गोरखपुर व आसपास के इलाकों में इंसेफ्लाइटिस  के मरीज भारी संख्या में आते हैं और गंभीर मरीजों को गोरखपुर मेडिकल कालेज ही भेजा जाता है। इसलिए प्रमुख सचिव स्वयं गोरखपुर मेडिकल कालेज जा कर वहां स्थितियों की समीक्षा करेंगे। इसके बाद वे अन्य मेडिकल कालेजों में भी जाएंगे। इसके अलावा चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक से भी अलग-अलग मेडिकल कालेज जाकर वहां की तैयारियां परखने को कहा गया है।
इन लक्षणों पर बरतें सावधानी
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि इस समय जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई), एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) और डेंगू को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। यदि किसी को तेज बुखार के साथ उल्टी, सिर दर्द, झटके आने और बेहोशी जैसी समस्या हो तो उसे तुरंत अस्पताल भेजा जाए। मेडिकल कालेजों से संबद्ध अस्पतालों को निर्देश दिए गए हैं कि इन लक्षणों वाले मरीजों की जेई व डेंगू की अनिवार्य जांच कराई जाए।

अब न हो सकेगी मेडिकल कालेजों में ढिलाई


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-सुदृढ़ीकरण, मानकीकरण व समय निर्धारण पर जोर
-तीन प्राचार्यों की समिति को सौंपा नियमन का जिम्मा
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : मेडिकल कालेजों में ढिलाई करने वाले डॉक्टरों पर शिकंजा कसने की रणनीति बनाई गई है। मरीज की भर्ती से लेकर इलाज के विभिन्न पड़ावों तक हर काम के लिए समय निर्धारित करने की तैयारी है। इसके लिए एक पूर्व चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक सहित तीन प्राचार्यों की समिति गठित की गई है।
मेडिकल कालेजों से जुड़े अस्पतालों में अति विशेषज्ञता से लेकर सामान्य इलाज तक के लिए पहुंचने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। तमाम नए अस्पताल खुलने के साथ ही नए मेडिकल कालेज भी खुल रहे हैं। देखा गया है कि जिन-जिन जिलों में मेडिकल कालेज हैं, वहां के लोग जिला अस्पतालों से ज्यादा भरोसा मेडिकल कालेज से संबद्ध अस्पताल पर करते हैं। चिकित्सा शिक्षा विभाग के सामने इस भरोसे पर खरा उतरने की चुनौती है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने इस बाबत सभी प्राचार्यों व अन्य अधिकारियों से पढ़ाई के साथ ही इलाज की गुणवत्ता व समयबद्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। साफ कहा है कि मरीज अस्पताल पहुंचे तो समयबद्ध ढंग से उसका इलाज हो और उसमें किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो। इसके लिए सम्पूर्ण व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण, समय निर्धारण व मानकीकरण किया जाना चाहिए।
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि सभी मेडिकल कालेजों से संबद्ध अस्पतालों में पूरी व्यवस्था के मानकीकरण के लिए पूर्व चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक व मेरठ मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ.केके गुप्ता, कानपुर मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ.नवनीत कुमार व इलाहाबाद मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ.एसपी सिंह की तीन सदस्यीय समिति गठित की गई है। यह समिति हर स्तर पर समयबद्धता सुनिश्चित करने के लिए अपनी संस्तुतियां देगी। इसके अंतर्गत मरीज के अस्पताल में प्रवेश करने से लेकर उसे इमरजेंसी से वार्ड में स्थानांतरित करने व आवश्यकतानुरूप चिकित्सक को बुलाए जाने तक की सारी स्थितियों के लिए समय-सीमा निर्धारित की जाएगी। चिकित्सा सेवाओं की मौजूदा स्थिति के सुदृढ़ीकरण के लिए जरूरी अवयवों का विश्लेषण भी यह समिति करेगी। समिति चिकित्सा सुविधाओं को उच्च मानकों के अनुरूप करने के लिए भी सुझाव देगी। इसके बाद कुछ कालेजों के अस्पतालों के राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण पर भी विचार किया जाएगा।
24 घंटे होंगी सभी जांचें
चिकित्सा सुविधाओं का उच्चीकरण सुनिश्चित करने के लिए मेडिकल कालेजों से संबंधित सभी अस्पतालों में पैथोलॉजी, एक्सरे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एमआरआइ आदि सभी जांचें 24 घंटे कराई जाएंगी। इसके लिए सभी प्राचार्यों को निर्देश देकर उनसे जेनरेटर का बैकअप भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। लिफ्ट व जेनरेटर में ऑपरेटर आदि की व्यवस्था ठीक करने को कहा गया है। 

Sunday, 13 September 2015

हर मरीज का बनेगा हेल्थ रिपोर्ट कार्ड


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-प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक ऑनलाइन होगा पूरा ब्योरा
-बना मासिक कैलेंडर, सीएमओ होंगे सीधे जवाबदेह
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सरकारी अस्पताल पहुंचने वाले हर मरीज का हेल्थ रिपोर्ट कार्ड बनाया जाएगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के स्तर तक इस पूरे ब्योरे को ऑनलाइन करने के निर्देश दिये गए हैं। इस बाबत सीएमओ को सीधे जवाबदेह बनाकर मासिक कैलेंडर भी घोषित कर दिया गया है।
सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाले मरीजों का ब्योरा फिलहाल पूरी तरह कंप्यूटरीकृत नहीं होता है। इस कारण फॉलोअप की स्थिति में दिक्कत आती है। अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल तक पहुंचने वाले हर मरीज का एक हेल्थ रिपोर्ट कार्ड बनाने और उसे पूरी तरह ऑनलाइन करने के निर्देश दिये गए हैं। इसके लिए बनाए गए साफ्टवेयर में हर माह की 21 तारीख से अगले माह की 20 तारीख तक के आंकड़े भरे जाएंगे। हर ब्लाक स्तर के प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक ये आंकड़े 23 तारीख तक पहुंच जाएंगे। इसके बाद प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अपने क्षेत्र के सभी प्राथमिक व नवीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के रिपोर्ट कार्ड को 25 तारीख तक मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय तक पहुंचाना सुनिश्चित करेंगे। सीएमओ के स्तर पर सभी अधीनस्थ चिकित्सा इकाइयों के हेल्थ रिपोर्ट कार्ड की ऑनलाइन फीडिंग सुनिश्चित की जाएगी। इसके साथ ही मूल प्रति का सत्यापन भी होगा। इस पूरी प्रक्रिया पर अमल के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी को जवाबदेह बनाया गया है। किसी भी स्तर की समीक्षा बैठक में इन्हीं आंकड़ों पर बात की जाएगी।
14 ट्रामा सेंटरों के लिए 700 पद स्वीकृत
राब्यू, लखनऊ : सरकार ने 14 ट्रामा सेंटरों के लिए 700 पद स्वीकृत किये हैं। इनमें से 126 पदों पर आउटसोर्सिंग से नियुक्तियां की जाएंगी। कानपुर नगर, फैजाबाद, बस्ती, जालौन, इटावा, फतेहपुर, ललितपुर, बाराबंकी, हरदोई, आजमगढ़, बुलंदशहर, फीरोजाबाद, उन्नाव व सुलतानपुर में ट्रामा सेंटर बनकर तैयार हो चुके हैं। अब इनको शुरू करने के लिए पद सृजन की प्रक्रिया पूरी की गयी है। हर ट्रामा सेंटर के लिए 50 पद सृजित हुए हैं। इनमें दो एनेस्थेटिस्ट, दो अस्थि रोग विशेषज्ञ, दो जनरल सर्जन, तीन आकस्मिक चिकित्सा अधिकारी, 15 स्टाफ नर्स, तीन ऑपरेशन थियेटर टेक्नीशियन, तीन एक्सरे टेक्नीशियन, दो लैब टेक्नीशियन, नौ नर्सिंग अटेंडेंट व नौ मल्टी टास्क वर्कर शामिल हैं। मल्टी टास्क वर्कर की नियुक्ति आउट सोर्सिंग से बाह्यï सेवा प्रदाता एजेंसी के माध्यम से की जाएगी।

काली सूची से संस्थाओं को मिलने लगी राहत


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-हाथरस की बारह शैक्षिक संस्थाओं से हुई शुरुआत
-कई अन्य संस्थानों के संचालक भी हो हए सक्रिय
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति घोटाले में काली सूची में डाली गयी शैक्षिक संस्थाओं को राहत मिलने लगी है। हाथरस की बारह संस्थाओं से इसकी शुरुआत होने पर कई अन्य संस्थानों के संचालक भी सक्रिय हो गए हैं।
दसवीं के बाद धनाभाव में पढ़ाई न रुकने देने के लिए दो लाख रुपये या उससे कम वार्षिक आय वाले अभिभावकों के बच्चों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति योजना है। कुछ वर्षों से इसमें जबर्दस्त घोटाले की बात सामने आयी, तो तमाम शैक्षिक संस्थाओं को काली सूची में डाल दिया गया। ये संस्थाएं अदालत की शरण में गयीं तो अदालत ने दोबारा जांच के निर्देश दिये। अब इसी दोबारा जांच के बाद संस्थाओं को काली सूची से राहत मिलने लगी है। इसकी शुरुआत भी हाथरस की बारह संस्थाओं से हुई है।
समाज कल्याण विभाग की ओर से जारी शासनादेश के मुताबिक हाथरस के सुसायतकला के मास इंजीनियङ्क्षरग एंड टेक्निकल कालेज और जगन्नाथ प्रसाद महाविद्यालय को काली सूची से मुक्त कर दिया गया है। इसी तरह हाथरस के ही विजेन्द्र जनता पीजी कालेज विसावर, आरपी कन्या महाविद्यालय बुढ़ाईच जलेसर रोड, श्रीमती राजारानी महाविद्यालय जुलाहपुर, श्री कृष्ण योगी राज डिग्र्री कालेज रतिभानपुर, श्रीमती लौंगश्री महाविद्यालय नगला आल, श्रीकृष्ण योगीराज टेक्निकल इंस्टीट्यूट, केजीएन डिग्र्री कालेज सिकन्दरा मऊ, भूदेवी खुशालीराम महाविद्यालय हसायन, एसडी एजूकेशनल जलेसर रोड व आरपीआइटीसी बुढ़ाइच जलेसर रोड को काली सूची में डालने के आदेश को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। इन संस्थाओं के बारे में अंतिम निर्णय एक माह के भीतर समाज कल्याण निदेशक की अध्यक्षता में गठित समिति करेगी। इन फैसलों के बाद काली सूची में डाले गए अन्य संस्थान भी सक्रिय हो गए हैं। अधिकांश ने न्यायालय की शरण ली है, किन्तु फिलहाल किसी को राहत नहीं मिली है।
कालेज जोडऩे को 20 तक का समय
समाज कल्याण विभाग ने दशमोत्तर छात्रवृत्ति के लिए सभी वर्गों के लिए अंतिम तारीख पहले ही 30 सितंबर कर दी थी। अब कालेजों के लिए भी ऑनलाइन इंट्री मॉड्यूल में अपना नाम जुड़वाने के लिए अंतिम तारीख 20 अगस्त कर दी गयी है। इस बाबत शासन स्तर पर सहमति के बाद फैसला लिया गया।

मरीजों की सुरक्षा को फार्मासिस्टों की मुहिम

-कश्मीर से कन्याकुमारी तक यात्रा निकालकर जगाई अलख
-अब गांधी जयंती पर वाराणसी से पांच साल का अभियान
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश में फार्मासिस्टों की कमी के बीच उनकी उपयोगिता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में फार्मासिस्टों के संगठन भी आगे आए हैं। अब उन्होंने अपनी उपयोगिता बताने के साथ मरीजों की सुरक्षा के लिए विशेष मुहिम शुरू करने का फैसला लिया है। हाल ही में कश्मीर से कन्याकुमारी तक यात्रा निकालने के बाद अब गांधी जयंती पर वाराणसी से पांच साल का अभियान शुरू किया जाएगा।
देश में 11 लाख फार्मासिस्ट पंजीकृत हैं। यह संख्या इनकी आवश्यकता के अनुपात में काफी कम है। इस बीच इनकी उपयोगिता पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं। ऐसी स्थितियों को भांप कर ही फार्मासिस्टों ने मरीजों की सुरक्षा को लेकर मुहिम शुरू की है। पहले चरण में कश्मीर से कन्याकुमारी तक फार्मासिस्ट क्रांति यात्रा निकाली गयी है। इसमें अलग अलग राज्यों में फार्मासिस्टों की समस्याओं का आकलन किया गया है। अब दूसरे चरण में दो अक्टूबर को वाराणसी में राष्ट्रीय स्तर का अधिवेशन होगा। इस अधिवेशन की थीम 'मरीजों की सुरक्षा के लिए फार्मासिस्टों की मजबूती रखी गयी है। अभियान के संयोजक अमिताव जयप्रकाश चौधरी के मुताबिक फार्मासिस्टों का सही उपयोग न होने से दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता घटने सहित तमाम समस्याएं सामने आ रही हैं। वाराणसी अधिवेशन में ऐसी समस्याओं पर विचार करने के साथ पांच वर्ष के लिए मरीज सुरक्षा अभियान की शुरुआत भी होगी। अधिवेशन में पूरे देश से फार्मासिस्ट जुटेंगे।
फर्जीवाड़े से छवि खराब
सर्वाधिक फार्मासिस्टों का प्रयोग दवाओं की दुकानों में होता है, किन्तु वहां भी फार्मासिस्टों द्वारा किये जा रहे फर्जीवाड़े ने उनकी छवि खराब की है। फार्मासिस्ट डेढ़ से दो हजार रुपये महीने के लिए अपना प्रमाणपत्र किराए पर दे देते हैं, जिससे उनकी उपयोगिता न होने का तर्क दिया जाने लगा है। माना जा रहा है कि ऐसी स्थितियों के लिए जिम्मेदार फार्मासिस्ट स्वयं हैं।
फार्मा शिक्षा की जन्मदात्री काशी
अधिवेशन वाराणसी में रखने के पीछे तर्क दिया गया है कि यहीं औपचारिक फार्मा शिक्षा की शुरुआत हुई थी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने शुरुआती प्रशिक्षित फार्मासिस्ट दिये थे। इसके बाद अन्य संस्थानों की शुरुआत हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्षेत्र होने के कारण भी वाराणसी का चयन हुआ है। फार्मासिस्ट अपनी मांगों का ज्ञापन भी प्रधानमंत्री के वाराणसी स्थित कार्यालय 'मिनी पीएमओ में देंगे।

Friday, 11 September 2015

सेहत सुधार की सवा दो हजार योजनाओं को हरी झंडी

-6340 करोड़ रुपए के स्वास्थ्य मिशन से सुविधाओं को रफ्तार
-जच्चा-बच्चा की चिंता पर खर्च होंगे 1600 करोड़ रुपए
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : प्रदेश सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से 6340 करोड़ रुपए खर्च कर सेहत की सुविधाओं को रफ्तार देने जा रही है। राज्य स्वास्थ्य समिति ने सेहत सुधार की सवा दो हजार योजनाओं को हरी झंडी दी है। इसमें सर्वाधिक 1600 करोड़ रुपए जच्चा-बच्चा की चिंता पर खर्च होंगे।
प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए बनी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में 2250 योजनाओं का प्रस्ताव किया गया था। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने 17 अगस्त को इस बाबत प्रदेश की ओर से भेजी गयी 'रेकाड्र्स ऑफ प्रोसीडिंग्सÓ को मंजूरी दे दी है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार व राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक अमित घोष के संयोजन में हुई राज्य स्वास्थ्य समिति की बैठक में इन सभी 2250 योजनाओं के क्रियान्वयन को हरी झंडी दी गयी। इन सभी योजनाओं पर कुल मिलाकर 6,340 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। इनमें से 2200 करोड़ रुपए की पुरानी योजनाओं को आगे बढ़ाया जाएगा, वहीं 4140 करोड़ रुपए की नयी योजनाओं को मूर्त रूप दिया जाएगा।
सेहत में समग्र्र सुधार की तमाम योजनाओं के साथ इस वर्ष सर्वाधिक जोर जच्चा-बच्चा की चिंता पर रहेगा। मातृत्व स्वास्थ्य व परिवार कल्याण पर 1600 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। इसमें से परिवार कल्याण कार्यक्रमों पर 400 करोड़ रुपए खर्च करने को मंजूरी दी गयी है। जननी सुरक्षा योजना, जननी-शिशु सुरक्षा योजना आदि को और प्रभावी बनाने का फैसला हुआ है। टीकाकरण की अब तक की गति को सही बताते हुए उसे विस्तार दिया जाएगा। हर जिले में विशिष्ट जच्चा-बच्चा अस्पताल होना सुनिश्चित किया जाएगा, ताकि संस्थागत प्रसव में कोई दिक्कत न आए। पहले चरण में 100 शैय्याओं वाले 50 जच्चा-बच्चा अस्पताल बनेंगे।
...तो प्राइवेट डॉक्टर से कराएं इलाज
जच्चा-बच्चा की सेहत से कोई समझौता न करने की नीति के तहत सरकारी डॉक्टर न मिलने पर प्राइवेट डॉक्टर बुलाने का फैसला हुआ है। इसके अंतर्गत एक बार प्राइवेट डॉक्टर बुलाने पर एनेस्थीशिया विशेषज्ञ को 2500 और सर्जन या स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ को 4000 रुपए दिए जाएंगे। ग्र्रामीण क्षेत्र में जाने पर 1000 रुपए अतिरिक्त मिलेगा। इसी तरह प्राइवेट अस्पताल में सीजेरियन प्रसव होने की स्थिति में मिलने वाली राशि भी 1500 से बढ़ाकर 8000 रुपए कर दी गयी है। इसके अलावा पैनल बनाकर निजी अस्पतालों को जोड़ा जाएगा।

20 साल में भी न तैयार हो सकेंगे जरूरतभर फार्मासिस्ट


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-नियमों की लाचारी-
-हर साल 163 संस्थानों में प्रवेश लेते हैं 10,520 विद्यार्थी
-वर्ष 1988 में थे केवल दस संस्थान, 250 छात्र-छात्राएं
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डॉ.संजीव, लखनऊ : प्रदेश में फार्मासिस्ट की जरूरत के अनुपात में उनकी पढ़ाई का इंतजाम नहीं है। ढाई दशक में तेजी से नए कालेज खुलने के बावजूद स्थितियां ऐसी हैं कि बीस साल में भी जरूरी फार्मासिस्ट तैयार नहीं हो सकेंगे।
हर मेडिकल स्टोर में फार्मासिस्ट की अनिवार्यता के अलावा तेजी से खुलते अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों में भी फार्मासिस्ट की जरूरत बढ़ रही है। आकलन के अनुसार प्रदेश को तत्काल कम से कम ढाई लाख फार्मासिस्ट की आवश्यकता है। इसके विपरीत फार्मासिस्टों की उपलब्धता 30 हजार के आसपास ही हैं। उत्तर प्रदेश फार्मेसी काउंसिल में कुल मिलाकर पंजीकृत 64 हजार फार्मासिस्टों में से कुछ दूसरे प्रदेशों के हैं तो दस हजार के आसपास दूसरे प्रदेशों में हैं। पांच हजार के आसपास सेवानिवृत्त या मृत हो चुके हैं और 15 हजार के आसपास सरकारी नौकरी में हैं। ऐसे में कुल मिलाकर 30 हजार फार्मासिस्ट ही प्रदेश के लिए उपलब्ध हैं। इस कमी से निपटने के लिए हर वर्ष फार्मासिस्टों की पर्याप्त संख्या पढ़कर भी नहीं निकल रही है।
 प्रदेश में फार्मेसी की शिक्षा की स्थिति को देखें तो वर्ष 1988 में प्रदेश के छह पॉलीटेक्निक संस्थानों में 190 व इलाहाबाद, कानपुर, मेरठ व आगरा मेडिकल कालेजों में 60 सीटों को मिलाकर कुल 250 फार्मासिस्ट तैयार होते थे। फार्मासिस्टों की लगातार बढ़ती मांग को देखकर निजी क्षेत्र में भी फार्मेसी संस्थान खुलने शुरू हुए। फार्मेसी काउंसिल के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 111 संस्थानों में फार्मेसी में डिग्र्री व 52 में डिप्लोमा पाठ्यक्रम चलता है। डिग्र्री पाठ्यक्रम में हर वर्ष 7480 व डिप्लोमा में 3040 विद्यार्थियों को प्रवेश मिलता है। इस तरह हर वर्ष 10,520 विद्यार्थियों के प्रवेश लेने के बाद औसतन दस हजार फार्मासिस्ट तैयार होकर निकलते हैं। यह संख्या उत्तर प्रदेश में फार्मासिस्टों की जरूरत पूरी करने की दृष्टि से पर्याप्त नहीं है।
सायंकालीन कक्षाओं का प्रस्ताव
उत्तर प्रदेश फार्मेसी काउंसिल के अध्यक्ष सुनील यादव स्वीकार करते हैं कि जिस तेजी से मांग बढ़ी है, प्रदेश के संस्थान उस तेजी से फार्मासिस्ट नहीं तैयार कर रहे हैं। उन्होंने मौजूदा संस्थानों में ही सायंकालीन कक्षाएं चलाकर फार्मेसी की सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया से किया है। मौजूदा संस्थानों में सीटें बढ़ाने की कोशिश भी की जा रही है। वे शासन स्तर पर भी इस बाबत प्रस्ताव भेजेंगे कि प्रदेश के हर मेडिकल कालेज में फार्मेसी पाठ्यक्रम अनिवार्य रूप से शुरू कर दिया जाए। वहां की मौजूदा ढांचागत सुविधाओं से मान्यता मिलने में भी दिक्कत नहीं होगी और युवाओं के लिए रोजगार के अधिक अवसर सृजित होंगे।
मेडिकल कालेजों में होगी पहल
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी का कहना है कि सरकारी व निजी मेडिकल कालेजों में फार्मेसी पाठ्यक्रम शुरू करने की व्यापक संभावनाएं हैं। पुराने कालेजों में फार्मेसी पाठ्यक्रम चल ही रहे हैं। जल्द ही नए कालेजों में भी इन्हें शुरू किया जाएगा। निजी क्षेत्र के मेडिकल कालेजों को भी इस ओर प्रोत्साहित किया जाएगा।

Thursday, 10 September 2015

मेडिकल कालेजों में परास्नातक पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों पर जोर


-प्रमुख सचिव ने अधिकारियों के साथ बैठक कर बनाई रणनीति
-नर्सिंग, फार्मेसी, फिजियोथिरैपी में मास्टर्स से होगी शुरुआत
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मेडिकल कालेजों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के साथ विशेषज्ञ सहयोगियों का भी विकास करने के लिए अब परास्नातक पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों पर जोर दिया जा रहा है। गुरुवार को चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव ने इस बाबत रणनीति बनाई। नर्सिंग, फार्मेसी व फिजियोथिरैपी में मास्टर्स पाठ्यक्रमों से इस मुहिम की शुरुआत की जाएगी।
सभी मेडिकल कालेजों में एमडी, एमएस सहित चिकित्सा शिक्षा के परास्नातक पाठ्यक्रमों की सीटें बढ़ाने के फैसले के बाद अब पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों की शुरुआत पर जोर है। गुरुवार को प्रमुख सचिव डॉ.अनूप चंद्र पाण्डेय ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक में पैरामेडिकल शिक्षा के नियमन व सुदृढ़ीकरण की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों के मामले में प्रदेश के कालेजों को राष्ट्रीय स्तर पर महत्व मिलना चाहिए। इसके लिए शिक्षकों से लेकर अन्य व्यवस्थाएं तक चाक-चौबंद की जाएं। पैरामेडिकल क्षेत्र में विशिष्टताओं के साथ नए पाठ्यक्रम भी शुरू किए जाएं। फिलहाल कानपुर, आगरा, मेरठ, इलाहाबाद, झांसी व गोरखपुर मेडिकल कालेजों से इसकी शुरुआत करने को कहा गया है। सबसे पहले नर्सिंग, फार्मेसी व फिजियोथिरैपी विशेषज्ञता में परास्नातक पाठ्यक्रमों की शुरुआत होगी।
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नए मेडिकल कालेजों में डिप्लोमा पाठ्यक्रम
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि कन्नौज, आजमगढ़, सहारनपुर, जालौन व अम्बेडकर नगर में खुले नए मेडिकल कालेजों में लैब टेक्नीशियन व एक्सरे टेक्नीशियन विधाओं में डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। इन सभी कालेजों में दोनों डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में बीस-बीस सीटें हैं। अगले चरण में अन्य पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों की शुरुआत की जाएगी।

ऐसे तो उप्र को चाहिए ढाई लाख फार्मासिस्ट


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-नियमों की लाचारी-
-न्यायमूर्ति केएल शर्मा आयोग की रिपोर्ट पर अमल नहीं
-बिजनेस फार्मासिस्ट के प्रशिक्षण से सुधर सकती स्थिति
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डॉ.संजीव, लखनऊ
दवा दुकानों में फार्मासिस्ट की अनिवार्यता का पालन करने के लिए उत्तर प्रदेश को कम से कम ढाई लाख फार्मासिस्ट चाहिए। इस समस्या के समाधान के लिए न्यायमूर्ति केएल शर्मा आयोग की रिपोर्ट बीते 11 साल से दबी पड़ी है। उस रिपोर्ट पर अमल कर बिजनेस फार्मासिस्ट का प्रशिक्षण शुरू किया जाता तो स्थिति सुधर सकती थी।
उत्तर प्रदेश में दवा की सवा लाख से अधिक दुकानें हैं। इनमें भी साठ प्रतिशत दवाएं ग्र्रामीण क्षेत्रों में हैं। दवा दुकानें औसतन सुबह सात बजे से रात 11 बजे तक खुलती हैं। दवा दुकानदार यदि श्रम विभाग के मानकों का पालन करें और आठ घंटे की शिफ्ट भी मान ली जाए, तो एक दुकान पर कम से कम दो फार्मासिस्ट की जरूरत होती है। इस तरह प्रदेश को ढाई लाख फार्मासिस्टों की जरूरत है इसके विपरीत उपलब्धता महज तीस हजार है। ऐसे में शेष फार्मासिस्टों का कोटा पूरा करने के लिए फर्जीवाड़ा होता है। यह पूरा मामला विभागीय अधिकारियों के संज्ञान में भी रहता है। ऐसी शिकायतें भी आती हैं कि जिलों में औषधि निरीक्षक फार्मासिस्ट की कमी की आड़ में दुकानदारों से वसूली तक करते हैं।
प्रदेश सरकार ने वर्ष 1999 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएल शर्मा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय आयोग गठित किया था। वर्ष 2004 में प्रदेश सरकार को सौंपी रिपोर्ट में आयोग ने फुटकर दुकानों के लिए बिजनेस फार्मासिस्ट या योग्य दवा फार्मासिस्ट नियम लागू करने का सुझाव दिया था। कहा गया था कि तीन माह का प्रशिक्षण देकर दवा दुकानदारों को ही फार्मासिस्ट का दर्जा दे दिया जाए। वे सरकारी नौकरी के लिए तो योग्य नहीं होंगे, किन्तु दुकान चला सकेंगे। तर्क ये था कि फार्मासिस्ट की अनिवार्यता उस समय थी, जब दुकानों पर कम्पाउंड मिलाकर दवा बनाई जाती थी। अब दवा की दुकानों पर बनी-बनाई दवाएं आती हैं और उन पर नाम छपे होते हैं। दुकानदार बस नाम देखकर दवाएं दे देते हैं। ग्यारह साल बीत जाने के बाद भी न्यायमूर्ति केएल शर्मा आयोग की रिपोर्ट पर अमल नहीं हुआ है। दवा विक्रेताओं का मानना है कि इस रिपोर्ट को लागू कर बिजनेस फार्मासिस्ट को मान्यता दी जानी चाहिए।
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चार साल लागू हो चुकी व्यवस्था
फार्मासिस्ट संकट से निपटने के लिए बिजनेस फार्मासिस्ट नियुक्त करने की व्यवस्था चार साल के लिए लागू भी की जा चुकी है। वर्ष 1960 से 1962 और 1976 से 1978 तक फार्मासिस्ट की कमी से निपटने के लिए चिकित्सकों के यहां कम्पाउंडर का काम कर दवा बनाने वालों को बिजनेस फार्मासिस्ट का दर्जा दिया गया था। तब तीन साल का अनुभव रखने वाले कम्पाउंडर को चिकित्सक के प्रमाण पत्र पर बिजनेस फार्मासिस्ट बना दिया गया था। इसके बाद इनका उपयोग दवा की दुकानों पर करने की भी छूट दे दी गयी थी।
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दवा बना सकते हैं, बेच नहीं सकते
यह विडम्बना ही है कि बिना फार्मेसी की पढ़ाई के दवा बनाने की अनुमति तो मिल जाती है, पर दवा बेचने की नहीं। ड्रग एंड कास्मेटिक्स रूल्स, 1945 के नियम-71 के अंतर्गत बीएससी उत्तीर्ण कोई व्यक्ति तीन वर्ष का अनुभव प्राप्त कर दवाओं के निर्माण के लिए अधिकृत कर दिया जाता है। इसके विपरीत कई वर्षों तक मेडिकल स्टोर चलाने वाले केमिस्टों को यह मौका नहीं मिलता। यही नहीं, थोक दवा विक्रेता के लिए फार्मासिस्ट की अनिवार्यता नहीं है जबकि उसी थोक दवा दुकान से दवा लाकर फुटकर बेचने के लिए फार्मासिस्ट होना जरूरी कर दिया गया है।

Wednesday, 9 September 2015

प्रदेश में एक लाख दवा दुकानें अवैध


--नियमों की लाचारी--
-सिर्फ तीस हजार फार्मेसिस्टों के सहारे सवा लाख फुटकर दुकानें
-सरकारी आंकड़ों में महज 71,400 दुकानें ही कराई गयीं पंजीकृत
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डॉ.संजीव, लखनऊ
नियमों की लाचारी से उत्तर प्रदेश में तकरीबन एक लाख दवा की दुकानें अवैध ढंग से चल रही हैं। मानकों का पालन करते हुए इनमें फार्मेसिस्ट तो हैं ही नहीं, लगभग आधी दुकानें बिना लाइसेंस ही चल रही हैं। हाल ही में दवा दुकानों के लाइसेंस का नवीनीकरण ऑनलाइन करने की पहल के बाद यह तथ्य सामने आया।
प्रदेश में दवा की दुकानों के लिए खाद्य एवं औषधि प्राधिकारी से लाइसेंस लेना तो अनिवार्य है ही, ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट के तहत हर फुटकर दवा की दुकान में फार्मेसिस्ट का होना भी जरूरी है। लाइसेंस लेने के साथ ही फार्मेसिस्ट का पूरा ब्योरा भी जमा करना होता है। हर पांच साल में नवीनीकरण कराते समय भी दवा दुकानों में कार्यरत फार्मेसिस्ट की जानकारी देनी होती है। इस फार्मेसिस्ट का उत्तर प्रदेश फार्मेसी काउंसिल में पंजीकृत होना भी जरूरी है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने 20 जून 2015 को आदेश जारी कर दवा दुकानों के नवीनीकरण के लिए ऑनलाइन आवेदन अनिवार्य कर दिया। इसके बाद से ही यह तथ्य सामने आने शुरू हुए हैं कि राज्य में अवैध दवा दुकानों की भरमार है और खाद्य एवं औषधि प्रशासन भी इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है।
आंकड़ों के अनुसार 75 जिलों में सवा लाख से अधिक दवा की दुकानें हैं। इसके विपरीत महज 71,400 दुकानों को लाइसेंस जारी हुए हैं। लगभग 60 हजार दुकानें तो बिना लाइसेंस ही चल रही हैं। इन सभी दुकानों में फार्मेसिस्ट होने चाहिए, किन्तु उत्तर प्रदेश में फार्मेसिस्ट ही इतने नहीं हैं। फार्मेसी काउंसिल में 60 हजार फार्मेसिस्ट पंजीकृत हैं। इनमें से 15 हजार सरकारी नौकरी में हैं। दस हजार फार्मेसिस्ट हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, हिमांचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, सिक्किम व मुंबई आदि दूसरे प्रदेशों के दवा कारखानों में नौकरी कर रहे हैं। लगभग पांच हजार फार्मेसिस्ट या तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं या उनकी मृत्यु हो चुकी है। इस तरह दवा दुकानों के लिए 30 हजार फार्मेसिस्ट ही बचते हैं। शेष तकरीबन एक लाख दवा दुकानें ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट का उल्लंघन कर बिना फार्मेसिस्ट के ही चल रही हैं। ऐसे में ये सभी दुकानें अवैध हैं।
एक फार्मेसिस्ट, कई दुकानें
दवा दुकानों के ऑनलाइन नवीनीकरण की शुरुआत से पता चला कि एक ही फार्मेसिस्ट का नाम कई दुकानों पर चढ़ा हुआ है। अब ऑनलाइन नवीनीकरण में फार्मेसिस्ट का पंजीकरण क्रमांक भरना होता है। जैसे ही दूसरी दुकान में पंजीकरण क्रमांक दिखेगा, ओवरलैपिंग होगी और पकड़ जाएगा। इसी कारण तमाम मामले पकड़े गए और अवैध दुकानों का पता चला।
बंद होंगी ऐसी दुकानें
औषधि नियंत्रक एके मल्होत्रा ने भी स्वीकार किया कि हर दुकान पर अलग फार्मेसिस्ट होना चाहिए किन्तु वह नहीं हैं। ऐसा न करना सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवमानना भी है। ऑनलाइन नवीनीकरण व लाइसेंस पंजीकरण से इस स्थिति का खुलासा हो रहा है। अब ऐसी सभी दवा दुकानें बंद होंगी और ऐसी दुकान चलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
दुकानदार भी हैं मजबूर
इसे नियमों की लाचारी ही कहेंगे कि दुकानदार भी फर्जीवाड़ा करने पर मजबूर हैं। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग फार्मेसिस्ट का प्रमाणपत्र लगाने पर मजबूर करता है और इतने फार्मेसिस्ट हैं नहीं कि अलग-अलग दुकानों पर वे उपलब्ध हो सकें। ऐसे में फार्मेसिस्ट भी दो हजार रुपये महीने तक अपना प्रमाणपत्र किराए पर देते हैं। हाल ही में सख्ती होने से फार्मेसिस्टों ने किराया बढ़ा दिया है।

बढ़ेंगी एमडी-एमएस की 171 सीटें

-प्रमुख सचिव के साथ मेडिकल कालेज प्राचार्यों की बैठक
-ढिलाई पर दो को चेतावनी, चौबीस घंटे होंगी सभी जाचें
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश में विशेषज्ञ चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने की मुहिम भी शुरू की जा रही है। इसके लिए परास्नातक चिकित्सा शिक्षा (एमडी-एमएस) की 171 सीटें बढ़ाई जाएंगी। मंगलवार को मेडिकल कालेजों के प्राचार्यों के साथ बैठक में प्रमुख सचिव ने सख्ती से इस बाबत सक्रियता के निर्देश दिए।
प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) अनूप चंद्र पाण्डेय ने कार्यभार संभालने के बाद सभी मेडिकल कालेजों के प्राचार्यों के साथ पहली बैठक बुलाई थी। पूरे दिन दो हिस्सों में चली इस बैठक में इलाज और पढ़ाई में समन्वय बनाने पर जोर दिया गया। कहा गया कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी से निपटने के लिए सरकारी क्षेत्र में विशेषज्ञ चिकित्सा शिक्षा को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसके लिए एमडी व एमएस सहित परास्नातक पाठ्यक्रमों की 171 सीटें बढ़ाने का फैसला हुआ। प्रमुख सचिव ने कहा कि आगरा में 49, मेरठ में 40, कानपुर में 38, इलाहाबाद में 24 और गोरखपुुर व झांसी मेडिकल कालेजों में 10-10 परास्नातक सीटें तुरंत बढ़ाई जा सकती हैं। इस दिशा में कोई लापरवाही नहीं होनी चाहिए और तुरंत भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) में आवेदन किया जाना चाहिए। दो मेडिकल कालेजों के प्राचार्यों को इस बाबत लापरवाही के लिए चेतावनी भी दी गयी। उन्होंने मेडिकल कालेजों से संबद्ध अस्पतालों में चौबीस घंटे इलाज के साथ सीटी स्कैन, एमआरआइ, एक्सरे, अल्ट्रासाउंड व सभी पैथोलॉजी परीक्षण भी सुनिश्चित किये जाने चाहिए। बैठक में चिकित्सा शिक्षा का वाट्सएप ग्र्रुप बनाकर सभी प्राचार्यों व अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को जोडऩे का फैसला किया गया, ताकि कोई समस्या होने पर सामूहिक चिंतन भी हो सके। इसकी कमान चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी को सौंपी गयी।
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बजट का रोना न रोएं
प्रमुख सचिव ने प्राचार्यों से साफ कहा कि वे किसी भी समस्या के लिए बजट का रोना न रोएं। वे समस्या का समाधान सुनिश्चित करें, धनाभाव कतई नहीं होने दिया जाएगा। लिफ्ट, जेनरेटर आदि का सुगम संचालन हो। उनके लिए ऑपरेटर तैनात किए जाएं। ऑपरेशन थियेटर से लेकर कक्षाओं तक एक भी उपकरण खराब नहीं होना चाहिए। उसे समयबद्ध ढंग से ठीक कराया जाए।
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मानक समय तय करें
प्रमुख सचिव ने कहा कि हर काम के लिए मानक समय निर्धारित किया जाना चाहिए। मरीज के अस्पताल पहुंचने के बाद इलाज शुरू होने से लेकर वार्ड में शिफ्ट होने आदि के लिए भी समय तय किया जाए। निर्माण कार्यों के लिए भी समयबद्ध कार्यक्रम तय किया जाए।
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बांदा-बदायूं पर रहा जोर
बैठक में बांदा व बदायूं मेडिकल कालेजों को हर हाल में शैक्षिक सत्र 2016-17 से शुरू करने पर जोर दिया गया। प्रमुख सचिव ने कहा कि बांदा में तो काफी काम हो चुका है, बदायूं में भी काम की रफ्तार बढ़ाई जाए। दोनों कालेजों के लिए पदों का सृजन कर भर्ती प्रक्रिया समय पर पूरी कर ली जाए, ताकि एमसीआइ की मान्यता में कोई संकट न आए।

तीसरी काउंसिलिंग को नहीं आयुष मान्यता का इंतजार


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-बीएएमएस व बीयूएमएस को अब तक नहीं मिली मान्यता
-बीएचएमएस के साथ भरी जाएंगी एमबीबीएस की बची सीटें
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सीपीएमटी की तीसरी काउंसिलिंग के लिए चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय आयुष पाठ्यक्रमों, बीएएमएस व बीयूएमएस की मान्यता का इंतजार नहीं करेगा। इसी माह बीएचएमएस के साथ एमबीबीएस की बची सीटों की काउंसिलिंग कराई जाएगी।
प्रदेश में सरकारी कालेजों की एमबीबीएस, बीडीएस, बीएचएमएस, बीएएमएस व बीयूएमएस सीटें संयुक्त मेडिकल प्रवेश परीक्षा (सीपीएमटी) के माध्यम से भरी जाती हैं। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय सीपीएमटी की दो दौर की काउंसिलिंग पूरी कर चुका है। इन दोनों दौर में सिर्फ एमबीबीएस व बीडीएस की सीटें ही भरी गयी हैं। होम्योपैथी कालेजों को मान्यता मिल जाने के बाद भी बीएचएमएस की काउंसिलिंग नहीं करायी गयी क्योंकि महानिदेशालय बीएचएमएस की काउंसिलिंग बीएएमएस व बीयूएमएस की काउंसिलिंग के साथ कराना चाहता था। दो दौर की सीपीएमटी काउंसिलिंग के इंतजार के बाद अब तक प्रदेश के आयुर्वेदिक व यूनानी कालेजों को केंद्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद यानी सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन (सीसीआइएम) से मान्यता नहीं मिली है। इस कारण आयुर्वेदिक व यूनानी कालेजों का शैक्षिक सत्र तो पिछड़ ही रहा है, होम्योपैथी कालेजों का सत्र भी बेपटरी होने का खतरा मंडरा रहा है।
अब चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय ने बीएचएमएस की काउंसिलिंग के लिए आयुर्वेदिक व यूनानी पाठ्यक्रमों की मान्यता का इंतजार न करने का फैसला किया है। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी के मुताबिक सीपीएमटी की तीसरी काउंसिलिंग सितंबर के दूसरे पखवाड़े में होगी। यदि तब तक बीएएमएस व बीयूएमएस पाठ्यक्रमों को सीसीआइएम की मान्यता मिल जाती है, तो उन्हें भी शामिल कर लिया जाए। मान्यता न मिलने की स्थिति में भी काउंसिलिंग नहीं टलेगी और बीएचएमएस के साथ एमबीबीएस व बीडीएस की बची सीटों को भरा जाएगा। तब तक अखिल भारतीय कोटे से उत्तर प्रदेश के मेडिकल कालेजों में भरी जाने वाली सीटों की स्थिति भी स्पष्ट हो जाती है। प्रदेश के हर सरकारी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की 15 प्रतिशत सीटें अखिल भारतीय कोटे से एआइपीएमटी के माध्यम से भरी जाती हैं। तमाम विद्यार्थी एआइपीएमटी से सीट आवंटित हो जाने के बाद भी प्रवेश नहीं लेते हैं। ऐसी सीटें वापस प्रदेश कोटे में आ जाती हैं, जिन्हें सीपीएमटी के माध्यम से भरा जाता है। आयुर्वेद निदेशक डॉ.सुरेश चन्द्रा का कहना है कि इस समय कालेजों की सुनवाई सीसीआइएम में चल रही है। सीपीएमटी की तीसरी काउंसिलिंग से पहले मान्यता की कोशिश हो रही है ताकि अच्छी रैंक के विद्यार्थी मिल सकें।

Monday, 7 September 2015

अब प्रोफेसर भी नहीं रह गए प्रिंसिपल साहब

-चिकित्सा शिक्षा विभाग में पदावनति का असर
-आजमगढ़ में प्राचार्य पद पर नियुक्ति खतरे में
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हो रही पदावनति का असर चिकित्सा शिक्षा विभाग पर भी पड़ रहा है। पदोन्नति में आरक्षण का लाभ पाकर प्राचार्य तक बन चुके तीन वरिष्ठ शिक्षक अब प्रोफेसर भी नहीं रह गए हैं।
सोमवार को चिकित्सा शिक्षा विभाग में पदावनति को अंतिम रूप दिया गया। इसमें आजमगढ़ मेडिकल कालेज के मौजूदा प्राचार्य तथा झांसी मेडिकल कालेज के प्राचार्य रहे डॉ.गणेश कुमार को एसोसिएट प्रोफेसर बनाया गया है। वे इससे पहले निलंबन का दंश भी झेल चुके हैं। अब एसोसिएट प्रोफेसर बन जाने के बाद आजमगढ़ मेडिकल कालेज के प्राचार्य का पद भी खतरे में पड़ गया है। भारतीय चिकित्सा परिषद के मानकों का पालन सुनिश्चित करने के लिए वहां शासन को नए प्राचार्य की नियुक्ति करनी पड़ सकती है। कानपुर व जालौन मेडिकल कालेजों के प्राचार्य रहे डॉ.आनंद स्वरूप को भी पदावनत कर एसोसिएट प्रोफेसर बना दिया गया है। तमाम अनियमितताओं के आरोप में डॉ.स्वरूप को जालौन से हटाकर चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय में संबद्ध कर दिया गया था। गोरखपुर में मौजूदा प्राचार्य की नियुक्ति से पहले कार्यवाहक प्राचार्य बनाए गए डॉ.सुनील आर्या को असिस्टेंट प्रोफेसर बना दिया गया है। वे दो प्रोन्नतियों के साथ प्रोफेसर बने थे। इसी दौर में एक आपराधिक मामले में नाम आने पर उन्हें निलंबित भी किया जा चुका है। इलाहाबाद मेडिकल कालेज के डॉ.एसएन चौधरी को भी पदावनत कर असिस्टेंट प्रोफेसर बना दिया गया है। महानिदेशालय के एक लिपिक व एक स्टेनो को भी पदावनत किया गया है।

आय नहीं, पिछली परीक्षा के नंबर बनेंगे छात्रवृत्ति का आधार


-शुल्क प्रतिपूर्ति-
-सैकड़ों फर्जी आय प्रमाणपत्र सामने आने पर हुआ फैसला
-मुख्य सचिव की सहमति, समाज कल्याण विभाग के आदेश
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डॉ.संजीव, लखनऊ
एक ही आय प्रमाणपत्र के आधार पर सैकड़ों छात्र-छात्राओं द्वारा छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति हड़पे जाने के मामले सामने आने पर शासन ने चयन का आधार बदलने का फैसला लिया है। अब विद्यार्थी के अभिभावक की आय के स्थान पर पिछली परीक्षा के नंबर छात्रवृत्ति वितरण का आधार बनेंगे।
दो लाख रुपये से कम वार्षिक आय वाले अभिभावकों के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति योजना का संचालन होता है। मुख्य सचिव ने महालेखाकार से पांच जिलों गाजियाबाद, कानपुर नगर, बाराबंकी, देवरिया व बांदा में बीते तीन वर्षों का ऑडिट कराया था। हापुड़ व मुरादाबाद कुछ निजी विश्वविद्यालयों की पड़ताल भी कराई गयी थी। इस जांच में अन्य तमाम गड़बडिय़ों के अलावा फर्जी आय प्रमाण पत्र लगाकर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति हासिल करने का मामला सामने आया था। सिर्फ इन पांच जिलों व कुछ विश्वविद्यालयों में ही सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने फर्जी आय प्रमाणपत्र लगाए थे। एक प्रमाण पत्र पर 236 से 640 तक अभ्यर्थियों द्वारा आवेदन की पुष्टि हुई।
इस पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में कहा गया कि दो लाख वार्षिक आय की सीमा तक समस्त छात्र-छात्राएं आवेदन करने के पात्र हैं, इसलिए वरीयता निर्धारण में वार्षिक आय को वेटेज (महत्व) देने का प्रावधान समाप्त कर दिया जाए। इसके स्थान पर केवल पिछले वर्ष की परीक्षा में प्राप्त अंकों के प्रतिशत को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का आधार बनाने का फैसला हुआ। साथ ही पाठ्यक्रम श्रेणी के अनुसार वेटेज अंक मिलेंगे। इस बाबत प्रमुख सचिव (समाज कल्याण) सुनील कुमार ने आदेश भी जारी कर दिए हैं।
ऐसे-ऐसे खुले मामले
-देवरिया में एक ही आय प्रमाण पत्र का प्रयोग 290 बार तक किया गया, ऐसे 994 अभ्यर्थियों ने लगाए 23 आय प्रमाण पत्र
-कानपुर नगर में 1242 विद्यार्थियों ने 36 आय प्रमाण पत्रों से काम चलाया, यहां एक ही आय प्रमाण पत्र का प्रयोग 236 बार किया गया
-गाजियाबाद में 14 आय प्रमाण पत्रों का प्रयोग 255 छात्र-छात्राओं ने 11 से 44 बार तक किया और इन सभी को छात्रवृत्ति भी मिली
-राजस्व परिषद की वेबसाइट पर उपलब्ध तथा विद्यार्थियों द्वारा जमा आय प्रमाण पत्रों में अंतर के 592 मामले सामने आए
-हापुड़ के एक निजी विश्वविद्यालय के 640 विद्यार्थियों ने एक ही क्रमांक के आय प्रमाण पत्र प्रयोग किये, इनमें पिता के नाम बदले हुए थे 

जनता परिवार की फूट से उम्मीदें गईं टूट

-समीकरण बदलने की उम्मीद से निराश छोटे दल
-राजद व जद (यू) ने कहा, भाजपा को होगा फायदा
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : समाजवादी पार्टी द्वारा बिहार में जनता परिवार की परिकल्पना को चकनाचूर करते हुए बिहार में अकेले चुनाव लडऩे का फैसला उत्तर प्रदेश में भी असर डालेगा। इस आशंका से छोटे दल परेशान हैं। राजद व जद (यू) तो मानते हैं कि सपा के इस फैसले का सर्वाधिक फायदा भारतीय जनता पार्टी को होगा।
जनता परिवार की एकता की शुरुआत से ही उत्तर प्रदेश के उन तमाम नेताओं की बांछें खिल गई थीं, जो जनता दल (यू) या राष्ट्रीय जनता दल का बैनर थामकर राजनीति कर रहे थे। इन्हें लगने लगा था कि 2017 के विधानसभा चुनाव में इन्हें भी हिस्सेदारी मिलेगी और समाजवादी पार्टी के कंधे पर सवार होकर ये कुछ सीटों पर अपनी नैया पार लगा लेंगे, पर अचानक सपा के धमाके से ये नेता खासे निराश हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव की बात करें, तो जद (यू) तो उन चुनावों से पहले ही भाजपा से दूर हो गया था। तब जद (यू) ने प्रदेश की 220 सीटों पर चुनाव लड़ा था। तब बलिया की बांसडीह सीट पर उसका प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहा था। इस बार जद (यू) को उम्मीद थी कि जनता परिवार का महत्वपूर्ण घटक होने के चलते पार्टी को सम्मानजनक सीटें मिलेंगी और पार्टी विधानसभा में अपनी हाजिरी दर्ज करा सकेगी।
राजद का तो उत्तर प्रदेश में अस्तित्व नगण्य है। 2012 के विधानसभा चुनाव में राजद सिर्फ उन्नाव की नवाबगंज सीट पर लड़ा था, जहां उसे तीस हजार वोट मिले थे। इस बार राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव की सपा मुखिया के साथ सीधी रिश्तेदारी और गठबंधन के चलते राजद के नेता भी मान रहे थे कि उन्हें कुछ सीटें मिल जाएंगी और वे सपा के सहारे चुनावी वैतरणी पार भी कर लेंगे।
समाजवादी पार्टी नेतृत्व द्वारा बिहार में महागठबंधन से अलग होने के फैसले से इन पार्टियों के नेता खासे निराश हैं। उनका मानना है कि यह करके सपा नेतृत्व ने प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर ही बदल दी है। जद (यू) के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश निरंजन भैयाजी का मानना है कि सपा के इस फैसले से भाजपा को ही फायदा होगा। राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष अशोक सिंह का मानना है कि सपा नेतृत्व का यह कदम दुर्भाग्यपूर्ण है।

Sunday, 6 September 2015

उप्र के 57 फीसद बच्चे बौने, 42 प्रतिशत का वजन कम


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-हर बीसवां बच्चा अत्यधिक कुपोषण का शिकार
-पड़ताल के लिए सात व दस सितंबर को वजन दिवस
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश में कुपोषित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हालात ये हैं कि राज्य का हर दसवां बच्चा कुपोषण व हर बीसवां बच्चा अत्यधिक कुपोषित है। अब ऐसे बच्चों की पड़ताल करने के लिए प्रदेश भर में सात और दस सितंबर को वजन दिवस का आयोजन किया जाएगा।
हाल ही में आए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि देश के हर आठ कम वजन वाले बच्चों में एक बच्चा उत्तर प्रदेश का होता है। इसी तरह बौनेपन के शिकार देश के सात बच्चों में से एक और सूखेपन के शिकार 11 में एक बच्चा उत्तर प्रदेश का होता है। उत्तर प्रदेश में 42.4 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं, वहीं 56.8 प्रतिशत बौने और 14.8 प्रतिशत सूखेपन के शिकार हैं। हर दसवां बच्चा कुपोषण का शिकार है। 5.1 प्रतिशत तो अत्यधिक कुपोषण के शिकार हैं। ऐसे में हर बीसवां बच्चा अत्यधिक कुपोषण का शिकार है, जो उत्तर प्रदेश के लिए चुनौती बना हुआ है। बच्चों का कुपोषण भी उनकी मौत का बड़ा कारण है, क्योंकि कुपोषण से प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और उपयुक्त विकास भी नहीं हो पाता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए कुपोषण के शिकार बच्चों की पड़ताल का फैसला हुआ है। मुख्य सचिव आलोक रंजन ने सभी जिलाधिकारियों को सीधे जिम्मेदार बनाकर सात व दस सितंबर को प्रदेश भर में वजन दिवस मनाने के निर्देश दिए हैं। यदि इन दो दिनों में कुछ बच्चे बच जाएं तो 14 सितंबर को अलग से आयोजन किया जाए। इसके बाद पांच वर्ष तक के सभी बच्चों के वजन के आधार पर कुपोषित व अतिकुपोषित बच्चों को अलग-अलग चिह्नित किया जाएगा, ताकि उनकी समस्या को दूर किया जा सके। मुख्य सचिव ने कहा है कि राज्य पोषण मिशन ने सिर्फ 1.58 लाख बच्चों के कुपोषित होने की बात कही है, जो सही नहीं है। इससे स्पष्ट है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के स्तर पर कुपोषित बच्चों की पड़ताल ठीक से नहीं की गयी है। इस बार वजन दिवस में कोई लापरवाही न हो, इसलिए पांच साल तक के सभी बच्चों की सूची बनाकर उनका वजन लेना सुनिश्चित करने को कहा गया है। इसके लिए ग्र्राम सभा व वार्ड स्तर पर प्रभारी भी नियुक्त किए जाएंगे।
बनेगा लाल रजिस्टर
वजन दिवस के बाद हर आंगनबाड़ी केंद्र पर आसपास के कुपोषित बच्चों की अलग से सूची बनाकर उनका नाम एक रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा। इसे लाल रजिस्टर कहा जाएगा। इन कुपोषित बच्चों का कुपोषण दूर करने के प्रयास होंगे और हर माह उनका वजन व पोषण के अन्य पैमानों पर आकलन करके उन्हें कुपोषित श्रेणी से अलग करने की कोशिश होगी। लक्ष्य होगा कि लाल रजिस्टर में एक भी नाम न बचे और सभी बच्चे कुपोषण की समस्या से मुक्त हो जाएं।

Thursday, 3 September 2015

पिछड़ों की चिंता में फायदे का आकलन


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-पिछड़ा वर्ग आयोग ने सभी जिलाधिकारियों से मांगा जवाब
-सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के बारे में भेजी प्रश्नावली
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग बीते कुछ वर्षों में पिछड़ों को मिली सुविधाओं का आकलन कर रहा है। इसके लिए सभी जिलाधिकारियों को विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के बारे में विस्तृत प्रश्नावली भेजकर जवाब मांगे गए हैं।
पिछड़ा वर्ग की राजनीति में सभी दल उनकी चिन्ता करने का दावा करते रहे हैं। बीते कुछ चुनावों से भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच पिछड़ों का हमदर्द साबित करने की होड़ सी लगी है। शासन स्तर पर यह सक्रियता एक बार फिर बढ़ सी गयी है। उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग ने पिछड़ों को अब तक हुए फायदे का आकलन करने की रणनीति बनाई है। आयोग अध्यक्ष राम आसरे विश्वकर्मा ने सभी जिलाधिकारियों को विस्तृत प्रश्नावली भेज कर पिछड़ों को मिली सुविधाओं और चलायी जा रही सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के अमल व पिछड़े वर्ग की वास्तविक हिस्सेदारी आदि का ब्यौरा मांगा है।
इस बाबत भेजी गयी प्रश्नावली में सभी विभागों में पिछड़े वर्ग के आरक्षण की स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है। इसमें स्वीकृत पदों के सापेक्ष संवर्गवार भरे गए पदों की संख्या के साथ उनका पूरा प्रतिशत भी पूछा गया है। लोहिया, कांशीराम और इंदिरा आवास योजनाओं में पिछड़े वर्ग को आवंटित आवासों के साथ समाजवादी व विधवा पेंशन योजनाओं में पिछड़े वर्ग के लाभार्थियों के प्रतिशत की जानकारी भी मांगी गयी है। हर जिले में खाद्य व रसद की कुल आवंटित दुकानों और मंडी परिषद द्वारा कुल आवंटित दुकानों की संख्या के सापेक्ष पिछड़े वर्ग को आवंटित दुकानों की संख्या तो मांगी ही गयी है, कृषि, तालाब, कुम्हारी कला, मत्स्य पालन व आवास के लिए आवंटित पट्टों में पिछड़ों की भागीदारी का ब्यौरा भी मांगा गया है।
युवाओं से जुड़े सवाल अलग
इस पूरी प्रश्नावली में युवाओं से जुड़े सवालों को बिल्कुल अलग कर दिया गया है। इसमें जनपद में बनाए गए छात्रावासों की संख्या, छात्रावासों में रहने वाले अन्य पिछड़े वर्ग के लाभार्थियों की संख्या के साथ ही शादी, बीमारी आदि में अन्य पिछड़े वर्ग के लाभार्थियों की पूरी जानकारी भी मांगी गयी है। आयोग की चिंता पिछड़े वर्ग के लिए संचालित कोचिंग संस्थानों व उनमें पढऩे वाले छात्रों के साथ ओ लेवल प्रशिक्षण में पिछड़ों की हिस्सेदारी को लेकर तो है ही, दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में पिछड़ों को मिल रहे फायदे का आकलन करने की बात भी कही गयी है।
बनेगी रणनीति, होंगे दावे
इस पूरी कवायद के बाद पिछड़ों के हित में मौजूदा सरकार व मौजूदा आयोग के कामकाज को रेखांकित किया जाएगा। इससे न सिर्फ भविष्य की रणनीति बनाई जा सकेगी बल्कि मौजूदा सरकार के सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग हितैषी होने के दावे भी किए जाएंगे। जहां चूक मिलेगी, उसे सुधारने की बात भी कही गयी है।