Monday, 31 August 2015

पेंशनर की मृत्यु, रकम फिर भी खाते में


कोषागार निदेशालय का आकलन, पांच हजार करोड़ डूबे
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-मृत्यु के बाद परिजन नहीं देते सूचना, लेते रहते धन
-भूमि राजस्व की तरह ब्याज सहित वसूली के आदेश
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डॉ.संजीव, लखनऊ:
है तो यह भी वित्तीय जालसाजी लेकिन फर्क तरह की। कोषागार निदेशालय ने पेंशनर की मौत के बाद परिजनों द्वारा उनके खाते से पेंशन लेते रहने का मामला पकड़ा है। ये वे लोग हैं जो फैमिली पेंशन नहीं लेते। आकलन के मुताबिक दस सालों में पांच हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम डूब चुकी है। अब ब्याज सहित वसूली के आदेश दिये गए और दो सौ करोड़ रुपये वसूले भी जा चुके हैं।
प्रदेश में इस समय लगभग दस लाख पेंशनर हैं। इन सभी को पेंशन बैंक खातों के माध्यम से भेजी जाती है। जिन पेंशनरों की मृत्यु की सूचना मिलती है, उनकी पेंशन रोक दी जाती है। वर्ष में एक बार पेंशनर द्वारा अपना जीवित प्रमाण पत्र खुद कोषागार जाकर देने का नियम है। एक बार जीवन प्रमाण पत्र मिलने के बाद अगले वर्ष तक पेंशन खाते में जाती रहती है। इस बीच यदि पेंशनर की मृत्यु हो जाती है तो उसके परिजनों की जिम्मेदारी है कि वे तत्काल इसकी सूचना बैंक व कोषागार को दें, ताकि उनकी पेंशन बंद की जा सके पर ऐसा नहीं हो रहा। बहुत से परिजनों ने पेंशनर की मृत्यु की जानकारी नहीं दी जबकि इसके विपरीत वे संयुक्त खाते, चेक या एटीएम आदि का लाभ उठाकर पेंशन निकालते रहे।
कोषागार निदेशक के मुताबिक औसतन पचास हजार पेंशनरों की मृत्यु हर वर्ष होती है। इन्हें आठ हजार से अस्सी हजार रुपये तक पेंशन दी जाती है। 15 हजार रुपये औसत पेंशन मानकर बिना सूचना के छह माह पेंशन जारी करने को आधार बनाकर जोड़ा गया तो हर वर्ष औसतन 900 करोड़ रुपये कोषागार के खाते से मृत पेंशनरों के नाम जा रहे हैं। खातों में पेंशन जाने की योजना वर्ष 2005 में शुरू की गयी थी, इस तरह बीते दस वर्षों में कम से कम 5000 करोड़ रुपये के पेंशन घपले का आकलन किया गया है और यह राशि अधिक भी हो सकती है।
अब क्या होगा 
कोषागार निदेशक लोरिक यादव ने कोषाधिकारियों को पत्र लिखकर जीवन प्रमाण पत्र न जमा करने वाले पेंशनरों की सूची तैयार कर तहसीलदारों के माध्यम से उनके सत्यापन को कहा है। इसके बाद बैंकों से उनके आहरण की जानकारी लेकर रकम ब्याज सहित वारिसानों से वसूली जाएगी। यह वसूली भूमि राजस्व वसूली की तरह होगी। इसके लिए रिकवरी सर्टिफिकेट (आरसी) भी जारी की जाएगी। अभी एक साल बाद जीवन प्रमाण पत्र न जमा करने पर पेंशन तो रोक ही दी जाती है, अब उसके तीन माह बाद संबंधित खाते से धन निकासी रोकने के निर्देश भी दिये गए हैं।
54 प्रतिशत संतानें देतीं धोखा
प्रमुख सचिव (वित्त) राहुल भटनागर द्वारा मंडलायुक्तों व जिलाधिकारियों को भेजे गए पत्र में साफ कहा गया है कि 54 प्रतिशत पेंशनरों की मृत्यु की सूचना उनके वारिसानों द्वारा नहीं दी जाती है। इस कारण उनकी मृत्यु के बाद भी कई महीनों तक पेंशन उनके खाते में जाती रहती है। पेंशनर के उत्तराधिकारी एटीएम कार्ड या चेक के माध्यम से अवैध रूप से इस धनराशि का आहरण कर लेते हैं।
200 करोड़ वसूले गए
प्रथमदृष्ट्या लगभग पांच हजार करोड़ रुपये के घपले की उम्मीद है। यह राशि बढ़ भी सकती है। फिलहाल कोषाधिकारियोंको सतर्क कर अपने मृत माता-पिता की पेंशन हड़पने वालों से वसूली के आदेश दिये गए हैं। अब तक 200 करोड़ रुपये वसूले भी जा चुके हैं।
-लोरिक यादव, निदेशक कोषागार

शुल्क प्रतिपूर्ति घोटाले के दोषी कालेजों की छिनेगी मान्यता

-निशाने पर कानपुर के पांच व मेरठ का एक कालेज
-घोटाले की रकम के आंकलन को समिति, होगी वसूली
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
समाज कल्याण विभाग की शुल्क प्रतिपूर्ति योजना में घोटाला करने वाले संस्थानों की मान्यता छीनी जाएगी। इसके अलावा घोटाले की रकम का आंकलन कर वसूली की भी तैयारी है। इस बाबत जारी पहली सूची में कानपुर के पांच व मेरठ का एक कालेज शामिल है।
लंबी जांच प्रक्रिया के बाद समाज कल्याण विभाग ने गुरुवार को कानपुर के पांच व मेरठ के एक कालेज को काली सूची में डालने के आदेश जारी कर दिये थे। काली सूची में शामिल कानपुर के बंशी समूह के बंशी कालेज ऑफ मैनेजमेंट व बंशी कालेज ऑफ एजूकेशन के प्रबंधन ने दोनों संस्थानों में छात्रों की अदला बदली कर फीस का गबन किया। एक साल छात्रों का समूह पहले कालेज में पढ़ता था, तो दूसरे साल उसे दूसरे कालेज में भर्ती दिखाकर प्रतिपूर्ति में घोटाला किया जाता था। कानपुर के विद्या भवन कालेज ऑफ इंजीनियङ्क्षरग एंड टेक्नोलॉजी, सेठ श्रीनिवास अग्र्रवाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और इसी समूह के कालेज सेठ श्रीनिवास अग्र्रवाल इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट को भी काली सूची में डाला गया है। इन सभी में अनुसूचित जाति वर्ग के छात्र-छात्राओं को प्रवेश तो मिला, किन्तु कोई छात्र काउंसिलिंग से नहीं आया। केवल शुल्क प्रतिपूर्ति धनराशि हड़पने के लिए सभी का प्रवेश प्रबंधकीय कोटे से किया गया। इसी तरह मेरठ के एक्सीलेंस कालेज ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज ने तो दूरस्थ शिक्षा पाठ्यक्रम के नाम पर किराये के भवन में संस्थान चलाते हुए शुल्क प्रतिपूर्ति ले ली।
अब इन सभी संस्थानों से शुल्क प्रतिपूर्ति के मद में ली गयी रकम वसूलने की तैयारी है। समाज कल्याण निदेशक जी राम के मुताबिक ज्यादातर संस्थान उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय (यूपीटीयू) से संबद्ध हैं और उन्हें अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) से संबद्ध हैं। इनकी मान्यता समाप्त करने के लिए यूपीटीयू व एआइसीटीई को पत्र लिखे जा रहे हैं। इनकी मान्यता छिनवाने की कार्रवाई के साथ इन सभी से शुल्क प्रतिपूर्ति घोटाले की रकम भी वसूली जाएगी। घोटाले की रकम का आंकलन करने के लिए समिति बना दी गयी है। उसे समयबद्ध ढंग से रिपोर्ट देने को कहा गया है। साथ ही इस पूरे घोटाले के लिए दोषी अधिकारी भी चिह्नित किये जा रहे हैं। पहले चरण में कानपुर व मेरठ के जिलाधिकारियों को पत्र लिखकर काली सूची में डाले गए छह संस्थानों के  प्रबंधकों के खिलाफ मुकदमा कायम करने को कहा गया है। जल्द ही दोषी अधिकारियों को चिह्नित कर उनके खिलाफ भी मुकदमा कायम क

चार साल बीटेक प्रथम वर्ष में भर्ती दिखा हड़पी फीस

-कानपुर के पांच व मेरठ का एक कालेज काली सूची में
-कालेजों के साथ कर्मचारियों पर भी मुकदमे के आदेश
-अमरोहा के पांच कालेजों जारी हुआ कारण बताओ नोटिस
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
दसवीं के बाद पढ़ाई न रुकने देने के लिए समाज कल्याण विभाग की शुल्क प्रतिपूर्ति योजना में घोटाले के नए-नए आयाम सामने आ रहे हैं। कानपुर के सेठ श्रीनिवास अग्र्रवाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने एक ही छात्र को चार साल तक बीटेक प्रथम वर्ष में भर्ती दिखाकर फीस हड़प ली। कानपुर के ऐसे पांच व मेरठ के एक कालेज को काली सूची में डालने के आदेश हुए हैं। इन कालेजों के साथ समाज कल्याण विभाग के दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ भी मुकदमा कायम कराया जाएगा।
लंबी सुनवाई के बाद काली सूची में डाले गए कानपुर के सेठ श्रीनिवास अग्र्रवाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में श्रीचंद भारती के पुत्र रजत सिंह भारती ने वर्ष 2010-11 में बीटेक प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था। कालेज ने उस वर्ष तो रजत के नाम पर शुल्क प्रतिपूर्ति ली ही, वर्ष 2012-13, 2013-14 ओर 2014-15 में भी रजत को बीटेक प्रथम वर्ष में ही दिखाकर शुल्क प्रतिपूर्ति वसूल ली गयी। समाज कल्याण विभाग के नोडल छात्रवृत्ति अधिकारी सिद्धार्थ मिश्र के मुताबिक रजत का मामला तो बानगी भर है। इस कालेज ने वर्ष 2011-12 में बीटेक में 750 छात्रों का प्रवेश दिखाया, जबकि परीक्षा में सिर्फ 234 बैठे। इसी तरह वर्ष 2012-13 में 526 के सापेक्ष 244, 2013-14 में 477 के सापेक्ष 166 छात्र बीटेक परीक्षा में सम्मिलित हुए। इसी समूह के एक और कालेज सेठ श्रीनिवास अग्र्रवाल इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट को भी काली सूची में डाला गया है। इन दोनों संस्थानों में अनुसूचित जाति के छात्र-छात्राओं का प्रवेश तो दिखाया गया किन्तु काउंसिलिंग से एक भी नहीं आया। सभी का प्रवेश प्रबंधकीय कोटे से हुआ।
होती रही छात्रो की अदला-बदली
काली सूची में कानपुर के बंशी समूह के बंशी कालेज ऑफ मैनेजमेंट व बंशी कालेज ऑफ एजूकेशन को भी शामिल किया गया है। इन कालेजों के प्रबंधन ने दोनों संस्थानों में छात्रों की अदला बदली कर फीस का गबन किया। एक साल छात्रों का समूह पहले कालेज में पढ़ता था, तो दूसरे साल उसे दूसरे कालेज में भर्ती दिखाकर प्रतिपूर्ति में घोटाला किया जाता था। इनमें पीजीडीएम पाठ्यक्रम में वर्ष 2012-13 में शत प्रतिशत व वर्ष 2013-14 में 97 प्रतिशत विद्यार्थी अनुसूचित जाति के थे। एमबीए में वर्ष 2011-12 में 60 में 43, वर्ष 2012-13 में 91 में 51, वर्ष 2013-14 में 130 में 82 विद्यार्थी ही परीक्षा में बैठे। कालेज प्रबंधन इन स्थितियों के पीछे कोई औचित्यपूर्ण आधार नहीं बता सका। कानपुर के ही विद्या भवन कालेज ऑफ इंजीनियङ्क्षरग एंड टेक्नोलॉजी को भी काली सूची में डाला गया है। यहां वर्ष 2011-12 में प्रवेशित छात्र संख्या के सापेक्ष 75 प्रतिशत, 2012-13 में 74 प्रतिशत, 2013-14 में 91 प्रतिशत केवल अनुसूचित जाति छात्रों को प्रवेश दिलाया गया। कोई छात्र काउंसिलिंग से नहीं आया। केवल शुल्क प्रतिपूर्ति धनराशि हड़पने के लिए सभी का प्रवेश प्रबंधकीय कोटे से किया गया।
बिना मान्यता भी ले लिया धन
म रठ के एक्सीलेंस कालेज ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज को भी समाज कल्याण विभाग ने काली सूची में डालने के निर्देश दिये हैं। यह संस्थान किराये के भवन में चल रहा था और मौजूदा समय में तो बंद भी चल रहा था। इसे शासन स्तर से मान्यता भी नहीं प्राप्त थी, फिर भी 29 लाख 15 हजार 270 रुपये की शुल्क प्रतिपूर्ति ले ली। इस संस्थान के खिलाफ पहले ही मुकदमा कराया जा चुका है। कानपुर की काली सूची में डाली गयी संस्थाओं के खिलाफ मुकदमे के लिए जिलाधिकारी को पत्र लिखा गया है। इनके अलावा अमरोहा के पांच कालेजों आइएमएस पॉलीटेक्निक, इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड साइंस, महाराजा अग्र्रसेन कालेज ऑफ टेक्नोलॉजी, इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी व एएसके इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलाजी को भी गड़बडिय़ों के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।
संस्थानों से वसूलेंगे धन
काली सूची में शामिल संस्थानों ने शासन का करोड़ों रुपये का नुकसान किया है। अब इन सभी से उक्त धनराशि की वसूली की जाएगी। संस्थाएं छात्र-छात्राओं को लालच देकर उनका भविष्य बर्बाद कर रही हैं। वे झांसे में आकर प्रवेश न ले। -सिद्धार्थ मिश्र, नोडल छात्रवृत्ति अधिकारी, समाज कल्याण निदेशालय

स्वास्थ्य मिशन में लापरवाह 168 अफसरों का वेतन रोका

-जननी सुरक्षा योजना को लेकर गंभीर नहीं
-न सुधरे तो और कड़ी कार्रवाई को चेताया
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में लापरवाही बरतने वाले 168 अफसरों का वेतन रोक दिया गया है। इन पर जननी सुरक्षा योजना को लेकर गंभीर न होने का आरोप है। इसके साथ ही इन्हें न सुधरने पर और कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गयी है।
जानकारी के मुताबिक सूबे भर में चल रहे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के कार्यक्रमों में जननी सुरक्षा योजना व जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम मुख्य हैं। इन्हें तीन 'एÓ यानी आशा, एएनएम व आंगनवाड़ी के संयोजन से चलाया जाता है। इस समय स्वास्थ्य महकमे का पूरा जोर जननी सुरक्षा योजना पर है। बुधवार को प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने इन योजनाओं की समीक्षा की तो पता चला कि सूबे के 168 अफसर कामकाज में लापरवाही बरत रहे हैं। इनमें जिला कार्यक्रम प्रबंधक (डीपीएम), डिस्ट्रिक्ट कम्युनिटी प्रोसेस मैनेजर (डीसीपीएम) व जिला लेखा प्रबंधक (डीएएम) शामिल हैं।
इन अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे आशा, एएनएम व आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनें और समयबद्ध ढंग से उनका समाधान करें। बीते दिनों कई आशा कार्यकर्ताओं ने तमाम सार्वजनिक कार्यक्रमों में खुल कर इन अफसरों द्वारा उपेक्षा किये जाने व उनके आर्थिक भुगतान तक समय पर न कराने की शिकायत की थी। स्वयं स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन द्वारा पिछले सप्ताह हुई समीक्षा में भी यह मुद्दा उठा था। बुधवार को हुई समीक्षा में भी यह तथ्य प्रकाश में आया कि इनमें से तमाम अफसर आशा कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में भी नहीं हैं। उनकी सुनते नहीं हैं और स्वास्थ्य मिशन के कार्यक्रमों का अनुपालन आधा भी नहीं हुआ है। इस पर सभी 168 अफसरों के वेतन रोकने के निर्देश दे दिये गए हैं। साथ ही उन्हें तत्काल आशा कार्यकर्ताओं की वित्तीय समस्याओं को दूर करना सुनिश्चित करने के निर्देश दिये गए हैं। ऐसा न करने पर उन्हें निलंबन सहित और कड़ी कार्रवाई के लिए तैयार रहने को कहा गया है। अगले माह पुन: इन सभी के कामकाज की समीक्षा की जाएगी।

स्तनपान कराने से घटता वजन, भागती बीमारियां

-विश्व स्तनपान सप्ताह-
-महिलाओं को जागरूक करने के लिए चलेगा विशेष अभियान
-दो साल तक पिलाएं दूध, छह माह तक पानी से भी रखें दूर
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
बच्चे को जन्म के एक घंटे के भीतर मां का दूध मिले तो उसे नवजीवन मिलता है। एक से आठ अगस्त तक चलने वाले विश्व स्तनपान सप्ताह में इस बाबत जागरूकता के साथ जानकारी दी जाएगी कि स्तनपान से महिलाओं को भी लाभ होता है। इससे उनका वजन घटता है और तमाम बीमारियां दूर भागती हैं।
महिलाओं को स्तनपान के प्रति जागरूक करने के लिए स्वास्थ्य महकमा पूरे प्रदेश में विशेष अभियान चलाएगा। स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन स्वयं प्रमुख सचिव अरविंद कुमार व महानिदेशक डॉ.विजयलक्ष्मी के साथ सि पूरे अभियान पर नजर रख रहे हैं। इसके लिए स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात चिकित्सकों से लेकर एएनएम, आशा व आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तक, सभी को सक्रिय करने की बात कही गयी है। माताओं को बच्चे के जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान की शुरुआत कराने के लाभ बताए जाएंगे। उन्हें प्रेरित किया जाएगा कि छह माह तक घुट्टी, शहद आदि तो दूर, पानी भी न पिलाएं। बच्चे के छह माह का होने के बाद ऊपरी पूरक आहार की शुरुआत तो कर दें किन्तु कम से कम दो वर्ष तक स्तनपान कराएं। कामकाजी माताएं भी अपने बच्चे को स्तनपान कराने के प्रति विशेष ध्यान रखें। शहरी मलिन बस्तियों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को स्तनपान कराये जाने के लाभ के साथ ही माताओं को स्वयं की साफ-सफाई पर भी ध्यान देने के लिए जागरूक किया जाएगा।
नहीं पनपने देता रोग
नवजात शिशु में रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति नहीं होती। मां के दूध में मौजूद लेक्टोफोर्मिन बच्चे की आंत में लौह तत्वों को समाप्त कर देता है, जिससे शिशु की आंत में रोगाणु पनप नहीं पाते। मां के दूध से आए साधारण जीवाणु बच्चे की आंत में पनपते हैं और रोगाणुओं से प्रतिस्पर्धा कर उन्हें पनपने नहीं देते। इस तरह बच्चा मां का दूध पीकर सदा स्वस्थ रहता है।
मां को भी होता है लाभ
स्तनपान मां के लिए गर्भावस्था के दौरान बढ़े वजऩ को घटाने में सहायक होता है। ब्रेस्ट कैंसर या ओवेरियन कैंसर से बचाने और डिप्रेशन से राहत दिलाने में भी स्तनपान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे तनाव कम होता है और प्रसव के बाद होने वाले रक्तस्राव से मुक्ति मिलती है। स्तनपान एक प्राकृतिक गर्भनिरोधक भी है।
बच्चे की बौद्धिक क्षमता में वृद्धि
-स्तनपान से मजबूत हुए भावनात्मक रिश्ते के परिणामस्वरूप ऐसे शिशु की बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है।
-मां का दूध सुपाच्य होता है। स्तनपान करने वाले बच्चों में पेट की गड़बडिय़ों की आशंका नहीं होती।
-मां का दूध नाक और गले में प्रतिरोधी त्वचा बना देता है, जिससे दमा व नाक की बीमारियां नहीं होतीं।
-बच्चे बाद में मोटे नहीं होते, क्योंकि उन्हें शुरू से जरूरत से ज्यादा खाने की आदत नहीं पड़तीं।
-स्तनपान से जीवन के बाद के चरणों में रक्त कैंसर, मधुमेह और उच्च रक्तचाप का खतरा कम हो जाता है।

मेडिकल कालेज शिक्षकों को देखने ही होंगे मरीज

--कसा शिकंजा--
-मांगा भर्ती व रोज देखे गए मरीजों का पूरा ब्योरा
-देनी होगी सर्जरी व प्रसूति की नियमित जानकारी
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
प्रदेश के मेडिकल कालेजों के शिक्षकों को अब अस्पताल की जगह घर पर मरीज देखने की आदत छोडऩी होगी। उन्हें हर हाल में संबद्ध अस्पतालों में मरीज देखने होंगे। ऐसा न करने वाले शिक्षकों को दूरदराज के मेडिकल कालेज में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
प्रदेश के सरकारी मेडिकल कालेजों के शिक्षकों को बाह्यï रोगी विभाग (ओपीडी) में नियमित मरीज देखने चाहिए। इसके अलावा उनके अधीन ही मरीज भर्ती भी होते हैं। लंबे समय से शिकायत मिल रही थी कि तमाम डॉक्टर खुद मरीज न देखकर किसी जूनियर डॉक्टर को अपनी ओपीडी सौंप देते हैं। इसी तरह भर्ती मरीजों को देखने के लिए भी नहीं जाते और उनका पूरा इलाज उनके जूनियर डॉक्टरों की यूनिट के सहारे होता है। अब ये डॉक्टर ऐसा नहीं कर सकेंगे। प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय ने सभी मेडिकल कालेजों से अस्पताल में बाह्यï रोगी विभाग में रोज देखे जाने वाले औसत मरीजों की संख्या के साथ डॉक्टरों व उनके द्वारा अलग-अलग देखे गए मरीजों की जानकारी मांगी है। इसके अलावा अस्पतालों में उपलब्ध शैय्याओं की तुलना में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या भी पूछी गयी है। सर्जन व प्रसूति रोग विशेषज्ञों द्वारा की गयी सर्जरी व अस्पताल में पैदा हुए बच्चों की जानकारी भी भेजने को कहा गया है। कैंसर रोगियों की जानकारी के साथ रेडियोथिरैपी की जानकारी मांगी गयी है तो हृदय व लीवर रोगियों के अस्पताल पहुंचने व इलाज होने संबंधी जानकारी भेजने को भी कहा गया है।
अस्पताल में ही हों जांचें
मेडिकल कालेजों से संबंधित अस्पतालों में हर जांच सुनिश्चित कराने के निर्देश दिये गए हैं। इसके लिए पैथोलॉजी तथा नॉन इमेजिंग टेस्टों का औसत भेजने के साथ अल्ट्रासाउंड, एक्सरे, सीटी स्कैन, एमआरआइ का ब्योरा मांगा गया है। इनके अलावा अस्पतालों में कुल कार्यरत वेंटीलेटर के सापेक्ष हर माह मरीजों की संख्या की जानकारी भी मांगी गयी है।
दवाओं की कमी नहीं होगी
सभी अस्पतालों में दवाओं की कमी न पडऩे देने के लिए भी प्रधानाचार्यों को निर्देश दिये गए हैं। उनसे औषधि बजट के साथ व्यय व आवश्यकता की जानकारी मांगी गयी है। हर माह की एक तारीख को औषधिवार स्टॉक की स्थिति उपलब्ध कराने को भी कहा गया है। मरीजों के भोजन की व्यवस्था के साथ सफाई का ब्योरा भी मांगा गया है।
नहीं रहने देंगे स्टाफ की कमी
प्रदेश के मेडिकल कालेजों से संबद्ध अस्पतालों में मरीजों को हर हाल में इलाज उपलब्ध कराने के साथ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित कराई जाएगी। इसके लिए फैकल्टी व पैरामेडिकल स्टाफ सहित किसी भी स्तर के स्टाफ की कमी नहीं होने दी जाएगी। साथ ही प्रधानाचार्यों से मुख्यमंत्री की घोषणाओं का अनुपालन सुनिश्चित करने को भी कहा गया है। -डॉ.वीएन त्रिपाठी, चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक

एक सर्वर के साथ महालेखाकार से जुड़ेंगे सूबे के 78 कोषागार

-52 कोषागारों को जोडऩे का काम पूरा
-आसान होगी आर्थिक आवाजाही पर नजर
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
राज्य के कोषागारों को अब एक सर्वर के साथ महालेखाकार कार्यालय से जोड़ा जाएगा। इस व्यवस्था के तहत अब तक 52 कोषागार जोड़े जा चुके हैं। इसके बाद आर्थिक आवाजाही पर नजर रखना आसान हो जाएगा।
राज्य के 75 जिलों के अलावा इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ के जवाहर भवन व दिल्ली के यूपी भवन में कोषागार संचालित हैं। इन कोषागारों के माध्यम से राज्य की समूची आर्थिक आवाजाही होती है। इन कोषागारों का कम्प्यूटरीकरण तो हो चुका है किन्तु अभी आपस में पूरी तरह से ये कोषागार नहीं जुड़ सके हैं। इसलिए इन कोषागारों की सतत मॉनीटरिंग नहीं हो पाती है। दिन में होने वाली आर्थिक आवाजाही राज्य के कोषागार मुख्यालय तक आती तो है, किन्तु कई बार छोटी चूक भी निस्तारित होने में खासा समय लग जाता है। कोषागारों में भुगतान के लिए आने वाले बिलों के बारे में महालेखाकार कार्यालय से भी तमाम जानकारियां तलब की जाती हैं। ऐसे में वहां भी विवरण भेजना पड़ता है।
प्रदेश के कोषागार निदेशक लोरिक यादव के मुताबिक अब राज्य के सभी 78 कोषागारों को आपस में जोडऩे की पहल की गयी है। इसके लिए लखनऊ में कोषागार निदेशालय ने एनआइसी परिसर में एक बड़ा सर्वर लगाया गया है। इस सर्वर पर एक-एक कर जिला कोषागारों का लोड डालकर उन्हें आपस में जोड़ा जा रहा है। अब तक 52 जिलों के कोषागार इस सर्वर से जुड़ चुके हैं। शुरू में जिस क्षमता का सर्वर लगाया गया था, जैसे-जैसे जिले जुड़ते गए, लोड का आंकलन होता गया। अब पुन: आंकलन कर सर्वर की क्षमता बढ़ाई गयी है। जल्द ही सभी जिलों के कोषागारों को इस सर्वर के माध्यम से आपस में जोड़ दिया जाएगा। सभी कोषागार जोडऩे के बाद राज्य के महालेखाकार कार्यालय को भी इसी सर्वर से जोड़ दिया जाएगा। इससे सभी 78 कोषागार महालेखाकार कार्यालय से भी जुड़ जाएंगे। इसके बाद दिन में किसी भी समय सूबे के किसी भी जिले में होने वाली आर्थिक आवाजाही न सिर्फ सीधे लखनऊ स्थित कोषागार निदेशालय की जानकारी में होगी, महालेखाकार कार्यालय भी उसे जान सकेगा।
आएगी पारदर्शिता, सुधरेगा कामकाज
राज्य के सभी 78 कोषागारों को महालेखाकार कार्यालय के साथ सर्वर से जोडऩे की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। इससे राज्य के कोष संचालन की समूची प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी। साथ ही कामकाज में भी व्यापक रूप से सुधार आएगा। सबकुछ ऑनलाइन हो जाने के बाद काम की रफ्तार भी निश्चित बढ़ेगी। -लोरिक यादव, निदेशक कोषागार

सीएम के लौटने से पहले आई वीआरएस पर एसपी की सफाई

--फेसबुक पर सफाई पोस्ट!--
-फोन पर गालीगलौज व घर पर गुंडे भेजने का आरोप
-कहा, कर्मठ व पढ़े-लिखे लोग क्यों न लड़ें चुनाव?
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले वरिष्ठ आइएएस अफसर सूर्यप्रताप सिंह ने अब फेसबुक पर अपनी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) पोस्ट की है। खास बात यह है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के विदेश जाते ही उन्होंने अपने वीआरएस प्रार्थनापत्र का एलान किया था और उनके लौटने से ठीक पहले एसपी की सफाई आई है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बीते मंगलवार को विदेश यात्रा पर गए थे। उसके बाद गुरुवार को सूर्यप्रताप सिंह ने मुख्यसचिव को बड़ा सा पत्र लिखकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगी थी। उस पत्र में उन्होंने तमाम सवाल उठाए थे। यह पत्र उन्होंने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर पोस्ट भी किया है। अब मुख्यमंत्री के विदेश से लौटने से ठीक पहले उन्होंने अपने वीआरएस पर सफाई भी फेसबुक पर पोस्ट की है। अपनी सफाई में उन्होंने यथाशक्ति मनोयोग से काम करने का दावा किया है। हालांकि उन्होंने माना है कि वे अवसर का लाभ उठाकर नौ साल के लिए विदेश में पढऩे भी चले गए। उन्होंने लिखा है कि अमेरिका से वापिस आने के बाद से पिछले दो वर्ष में प्रमुख सचिव के रूप में सात विभागों का मुंह देखा, जिस दौरान स्पष्ट आभास हुआ कि प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था भी जाति व पार्टी लाइन पर विभाजित हो चुकी है। उन्होंने अपने वर्तमान विभाग, सार्वजनिक उद्यम को कम महत्व वाला करार देकर कहा कि काम न होने के कारण उन्होंने सार्वजनिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने शुरू किये। दावा किया कि पिछले छह माह में निजी खर्चे पर, अवकाश लेकर 48 जनपदों का भ्रमण कर जनसमस्याओं को महसूस किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि झूठ की पोल खुलने से नाराज नेताओं ने न सिर्फ उन्हें इस्तीफा देकर राजनीति में आने की चुनौती दी, बल्कि फोन पर गालीगलौज भी कराया और घर पर गुंडे भेजे। ऐसे वातावरण में उन्होंने पद से चिपकने की बजाय शांति से जनसमस्याओं को उठाने का फैसला किया। उन्होंने सवाल उठाया कि पढ़े लिखे, साफ छवि के कर्मठ व निष्ठावान लोग चुनाव क्यों न लड़ें? इससे गंदगी का भी सफाया होगा, जैसा विकसित देशों में होता है।

यूपी में भी भाजपा से हिस्सा मांगेगी लोजपा

-भाजपा की तर्ज पर कामकाज के लिए प्रदेश को बांटा
-77 सीटों पर दावेदारी, मजबूत सीटें हो रहीं चिह्नित
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
केंद्र की सत्ता में साझीदार लोक जनशक्ति पार्टी उत्तर प्रदेश में भी भाजपा से हिस्सेदारी मांगेगी। पार्टी 77 सीटों पर अपनी दावेदारी को आधार बनाकर मजबूत सीटों को चिह्नित कर रही है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल भले ही दो साल बाकी है, किन्तु वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए गतिविधियां तेज हो गयी हैं। केंद्र सरकार में भाजपा के साथ शामिल लोकजनशक्ति पार्टी बिहार ही नहीं, उत्तर प्रदेश में भी अपनी हिस्सेदारी मांगने की तैयारी कर रही है। पार्टी ने अपने राष्ट्रीय पदाधिकारियों की टीम में उत्तर प्रदेश के कई नाम शामिल करने के साथ ही प्रदेश में संगठन मजबूती के लिए काली प्रसाद पाण्डेय को प्रदेश प्रभारी बनाया है। इसके अलावा प्रदेश में कामकाज का विकेन्द्रीकरण भी भाजपा की तर्ज पर किया गया है। भाजपा प्रदेश को आठ हिस्सों में बांटकर कामकाज का संचालन करती है, वहीं लोजपा ने प्रदेश को चार हिस्सों में बांटा है। इन चारो हिस्सों का मुख्यालय मेरठ, लखनऊ, गोरखपुर व झांसी को बनाया गया है।
प्रदेश प्रभारी काली प्रसाद पाण्डेय के मुताबिक पार्टी बनारस व फैजाबाद में दलित सम्मेलन कर चुकी है। वहां दलितों की भागीदारी ने पार्टी को उत्साहित किया है। अब पूर्वांचल पर फोकस करते हुए गोरखपुर में कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन भी हुआ है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में पार्टी के अस्तित्व व प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। पार्टी के मुखिया राम विलास पासवान की अपनी लोकप्रियता भी उत्तर प्रदेश में जबर्दस्त है। ऐसे में यहां पार्टी अपनी पूरी हिस्सेदारी भाजपा से मांगेगी। लोजपा यहां जनता दल के दौर में 77 सीटों पर चुनाव लड़ चुकी है। ऐसे में प्राथमिक रूप से 77 सीटों पर तो दावेदारी बनती ही है, फिर भी पार्टी अपनी मजबूती वाली सीटें चिह्नित कर रही है। समय रहते राष्ट्रीय नेतृत्व के माध्यम से भाजपा को उन सीटों के बारे में जानकारी दे दी जाएगी, ताकि पार्टी वहां उम्मीदवार घोषित कर सके।

प्राइवेट प्रैक्टिस रोकने को हर नर्सिंग होम का सर्वे

-मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को सौंपी जांच की जिम्मेदारी
-मरीजों से बात कर जांचेंगे सरकारी डॉक्टरों की आवाजाही
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर अंकुश लगाने की कोशिशों को बढ़ाते हुए स्वास्थ्य विभाग ने राज्य के हर नर्सिंग होम का सर्वे कराने का फैसला लिया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को इस जांच की जिम्मेदारी सौंपते हुए उनसे मरीजों से बात कर सरकारी डॉक्टरों की आवाजाही की पड़ताल को कहा गया है।
शासन की तमाम कोशिशों के बाद भी राज्य के सरकारी अस्पतालों में तैनात चिकित्सकों की प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं रुक रही है। वे सरकारी अस्पतालों में मरीजों को भर्ती न कर निजी अस्पतालों में ले जाते हैं। बीते दिनों राजधानी के लोहिया अस्पताल से एक मरीज को निजी अस्पताल ले जाकर ऑपरेशन करने और बाद में उसकी मौत हो जाने के मामले से यह बात पूरी तरह से साबित हो गयी है। इसके बाद बीते दिनों स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन ने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के सामने प्रमुख सचिव व महानिदेशक सहित महकमे के आला अफसरों से साफ कहा था कि हर हाल में प्राइवेट प्रैक्टिस रुकनी चाहिए।
स्वास्थ्य मंत्री की सख्ती के बाद प्रदेश की स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ.विजयलक्ष्मी ने राज्य के सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को पत्र लिखकर हर नर्सिंग होम का सर्वे करने का निर्देश दिया है। उनसे कहा गया है कि हर नर्सिंग होम में चिकित्सकों की उपलब्धता की जांच होनी चाहिए। वहां आने वाले मरीजों से पूछा भी जाए कि उनका इलाज कौन डॉक्टर कर रहे हैं। हर नर्सिंग होम की व्यापक रिपोर्ट बनाकर शासन को भेजने के लिए कहा गया है। इसमें मरीजों की संख्या, उनका इलाज करने वाले डॉक्टरों के नाम और उनके पते आदि का भी ब्योरा मांगा गया है। अधिकारियों का मानना है कि नर्सिंग होम्स के सर्वे में मरीजों से पूछताछ के बाद उन डॉक्टरों का नाम सामने आएगा, जो सरकारी अस्पताल के स्थान पर नर्सिंग होम में मरीज देखते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना आसान हो जाएगा और उसके लिए प्रशासनिक आधार भी होगा। अभी सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर मजबूत प्रशासनिक आधार के अभाव में कड़ी कार्रवाई से बच जाते हैं।

सरकारी अस्पतालों की दवाओं का ब्योरा होगा ऑनलाइन

-स्वास्थ्य मंत्रालय तक रहेगी उपलब्धता की पूरी जानकारी
-दवा न देने वाले अफसरों पर चलेगा सरकार का 'डंडा
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में दवाओं का गंभीर संकट तात्कालिक रूप से भले ही परेशान करने वाला हो, किन्तु यह दूरगामी समाधान की राह भी लाया है। अब सरकार ने सभी अस्पतालों में उपलब्ध दवाओं का ब्योरा ऑनलाइन करने का फैसला लिया है। इससे नियमित रूप से दवाओं की उपलब्धता की पूरी जानकारी शासन तक रहेगी और दवा न देने वाले अफसरों पर 'डंडा चल सकेगा।
बीते कुछ दिनों से प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में दवाएं न मिलने की शिकायतें शासन तक लगातार आ रही थीं। स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन के मुताबिक यह स्थिति तब थी, जबकि इस बार किसी भी तरह दवाएं कम न पडऩे देने के लिए शासन ने न सिर्फ समय पर दवा आपूर्तिकर्ताओं की सूची को अंतिम रूप दे दिया था, बल्कि उनके साथ दरों को अंतिम रूप देकर 'रेट कान्ट्रैक्ट भी तय कर दिया था। इसके बावजूद दवाएं न मिलने की बात चौंकाने वाली है। इससे निपटने के लिए अब सभी दवाओं का ब्योरा ऑनलाइन करने का फैसला हुआ है। इसके अंतर्गत सभी अस्पतालों में एक प्रभावी 'इन्वेन्टरी मैनेजमेंट सिस्टम लागू किया जाएगा। इससे हर हाल में दवाओं की पूरी जानकारी कम्प्यूटरीकृत हो जाएगी।
स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि इस ऑनलाइन प्रक्रिया में जैसे ही दवा अस्पताल में पहुंचेगी, उसका पूरा ब्योरा कम्प्यूटर पर दर्ज किया जाएगा। उसके बाद जैसे-जैसे प्रतिदिन जितनी दवाएं मरीजों को बांटी जाएंगी, उनका ब्योरा भी नियमित रूप से कम्प्यूटरीकृत होता जाएगा। जिस नेटवर्क के माध्यम से यह ब्योरा दर्ज होगा, उस नेटवर्क से जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से लेकर स्वास्थ्य महानिदेशक, सचिवालय में प्रमुख सचिव तक तो जुड़े ही होंगे, स्वास्थ्य मंत्री स्वयं भी उस पर नजर रखेंगे। ऐसे में कोई भी दवा उपलब्ध होते हुए उसे देने से इनकार नहीं कर पाएगा। साथ ही कोई दवा कितनी बची है, इसकी जानकारी भी रोज संबंधित प्रभारी अधिकारियों के पास आ जाएगी। इससे वे समय पर दवा मंगा सकेंगे। इससे अस्पतालों में दवा न मिलने की समस्या का समाधान भी हो जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे अधिक लाभ यह होगा कि जिस स्तर पर भी लापरवाही होगा, वह तुरंत पता चल जाएगी। इसके बाद सरकार तुरंत संबंधित अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। यही नहीं, यदि दवा आपूर्तिकर्ता के द्वारा समय पर आपूर्ति नहीं की जाएगी, तो उसके खिलाफ भी काली सूची में डालने जैसी कार्रवाई की जाएगी।

प्राइवेट प्रैक्टिस पर लगाम के लिए हटेंगे बड़े डॉक्टर

-काम न करने वाले 14 नेत्र शल्य चिकित्सकों पर होगी कार्रवाई
-कई मेडिकल शिक्षकों के स्टिंग वीडियो भी शासन तक पहुंचे
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
सूबे में चिकित्सकीय अराजकता को समाप्त करने के लिए शासन स्तर पर सख्त रुख अख्तियार किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग ने अपनी तरफ से पहल कर अस्पतालों में काम न करने वाले चिकित्सकों को चिह्नित करना शुरू कर दिया है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के पास भी कई मेडिकल कालेज शिक्षकों के स्टिंग वीडियो पहुंचे हैं। अब कई बड़े डॉक्टरों के तबादले की तैयारी है।
लोहिया अस्पताल में प्राइवेट प्रैक्टिस के कारण हुई मौत और कानपुर मेडिकल कालेज में एक महिला को डॉक्टरों द्वारा गंगा बैराज में फेंके जाने से सूबे का सेहत महकमा हिल गया है। स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन ने प्राइवेट प्रैक्टिस रोकने के लिए हर संभव सख्त कदम उठाने के निर्देश दिये हैं। चिकित्सकों के लिए अस्पतालों में मरीज देखने व सर्जरी करने तक के लक्ष्य निर्धारित किये जा रहे हैं। प्रमुख सचिव स्वास्थ्य ने प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में तैनात नेत्र शल्य चिकित्सकों का ब्योरा तलब किया तो पता चला कि तमाम डाक्टरों ने तो इस साल अब तक एक भी सर्जरी नहीं की थी। ऐसे में वर्ष में पचास से कम सर्जरी करने वाले डॉक्टर चिह्नित किये गए हैं। ऐसे 12 नेत्र शल्य चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिये गए हैं। माना जा रहा है कि ये लोग सरकारी अस्पतालों में तो सर्जरी नहीं करते, किन्तु प्राइवेट प्रैक्टिस में संलिप्त रहते हैं।
इसी तरह राज्य के मेडिकल कालेजों के तमाम वरिष्ठ चिकित्सकों द्वारा प्राइवेट प्रैक्टिस किये जाने की शिकायतें भी आ रही हैं। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार पुराने सरकारी मेडिकल कालेजों आगरा, कानपुर, मेरठ, इलाहाबाद, झांसी व गोरखपुर मेडिकल कालेजों के शिक्षक ही नहीं, वरिष्ठ पदों पर बैठे कुछ लोग भी नियमित रूप से प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं। इनमें से कुछ लोगों के स्टिंग वीडियो भी शासन तक पहुंचे हैं। प्रांतीय चिकित्सा सेवा के कई डॉक्टरों के खिलाफ भी इसी तरह की शिकायतें सबूत सहित आई हैं। अब रणनीति बनाई गयी है कि इन सब चिकित्सकों को उन शहरों से हटाकर दूर भेजा जाए। इससे वे यह तय कर लेंगे कि उन्हें सरकारी सेवा में रहा है या प्राइवेट प्रैक्टिस करनी है। चिकित्सा शिक्षा सेवा संवर्ग में भी अब बांदा से लेकर सूबे के दूर-दराज तक मेडिकल कालेज खुल जाने से प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों को दूर भेजने के अवसर बढ़ गए हैं।

प्रदेश में गंभीर दवा संकट


-मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की शिकायत पर शासन चिंतित
-दवा आपूर्तिकर्ताओं की बुलाई बैठक, होंगी 'ब्लैक लिस्टेड
डॉ.संजीव, लखनऊ
सूबे के सरकारी अस्पतालों में गंभीर दवा संकट की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से इस बाबत मिली शिकायत ने शासन को चिंतित कर दिया है। इस पर शनिवार को दवा आपूर्तिकर्ताओं की बैठक बुलाई गयी है। समय पर आपूर्ति न कर पाने वालों को 'ब्लैक लिस्टेड करने की भी तैयारी है।
मुख्यमंत्री से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक पूरी सरकार की ओर से राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क इलाज की बात कही जाती है। बाह्यï रोगी विभाग में आने वाले मरीजों को कम से कम पांच दिन की दवाएं नि:शुल्क देने के साथ ही भर्ती होने वालों का पूरा इलाज मुफ्त करने का निर्देश भी है। इसके बावजूद बीते कुछ दिनों से मरीजों को पांच दिन तो दूर तीन दिन की भी दवाएं नहीं मिल रही हैं। मरीजों से तो शासन को इस आशय की शिकायतें मिल ही रही थीं, हाल ही में दो दर्जन से अधिक मुख्य चिकित्सा अधिकारियों ने भी दवाएं न उपलब्ध हो पाने की शिकायत की है। कहा गया है कि बमुश्किल तीस दवाएं ही मिल पा रही हैं। आपूर्तिकर्ताओं द्वारा समय पर दवाओं की आपूर्ति न हो पाने के कारण तमाम जरूरी दवाएं मरीजों को नहीं मिल पा रही हैं।
इस पर स्वास्थ्य मंत्री ने अफसरों से पूछा तो उन्हें बताया गया कि जिन 284 दवाओं की सूची निर्धारित की गयी है, उनमें महंगी एंटीबायोटिक्स सहित जीवनरक्षक इंजेक्शन आदि भी शामिल हैं। इसके बावजूद तमाम अस्पतालों के चिकित्सा अधीक्षकों द्वारा लोकल परचेज की शिकायत भी सामने आयी। इस पर स्वास्थ्य मंत्री ने लोकल परचेज न करने के स्पष्ट निर्देश दिये। स्वास्थ्य मंत्री की सख्ती के बाद पूरा स्वास्थ्य महकमा सक्रिय हो गया है। प्रदेश की स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ.विजय लक्ष्मी ने शनिवार को सभी दवा आपूर्तिकर्ताओं की बैठक बुलाई है। इस बैठक में उनसे तत्काल दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने को कहा गया है। ऐसा न कर पाने पर उन्हें काली सूची में डाल दिया जाएगा।
अफसर भी नहीं बख्शे जाएंगे
अस्पतालों में दवाएं न मिलने का मामला सामने आया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से साफ कह दिया गया है कि जब शासन की ओर से धन भी दे दिया गया है और 284 दवाओं की खरीद को मंजूरी भी दे दी गयी है, फिर दिक्कत नहीं आनी चाहिए। इसके बावजूद समस्याएं पैदा की जा रही हैं, तो दवा आपूर्ति कर्ताओं के खिलाफ तो कार्रवाई होगी ही, दोषी अधिकारी भी नहीं बख्शे जाएंगे। मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को तो समझा दिया गया है, जल्द ही अस्पतालों के मुख्य चिकित्सा अधीक्षकों व निदेशकों को भी बुलाकर इस बाबत निर्देश दिये जाएंगे। -अहमद हसन, स्वास्थ्य मंत्री

22 जिलों में डेंगू व चिकनगुनिया का खतरा

-स्वास्थ्य विभाग चौकन्ना, बुलाई अफसरों की बैठक
-प्रमुख सचिव की अगुवाई में होगी तैयारियों की समीक्षा
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
मौसम बदलने के साथ ही राज्य के 22 जिलों में डेंगू व चिकनगुनिया का खतरा है। इसे लेकर स्वास्थ्य विभाग चौकन्ना है और इन सभी जिलों के अफसरों की बैठक आगामी 28 जुलाई को बुलाई गयी है।
बीच-बीच में हो रही बारिश व मौसम के संक्रमण काल के साथ ही सेहत महकमा खासा चिंतित हो उठा है। इस दौरान मच्छर जनित बीमारियां डेंगू व चिकनगुनिया फैलने का डर अत्यधिक होता है। बीते कुछ वर्षों में राज्य में डेंगू व चिकनगुनिया के कारण तमाम लोगों की मौतें भी हो चुकी हैं। यही कारण है कि इस बार स्वास्थ्य विभाग पूरी तैयारी कर लेना चाहता है। विभाग ने राज्य के 22 जिलों को डेंगू व चिकनगुनिया के लिए गंभीर रूप से चिंताजनक माना है। इन जिलों में बीते कुछ वर्षों में भारी संख्या में लोग डेंगू व चिकनगुनिया के शिकार हुए थे। इस बार विभाग इन जिलों के लिए अभी से पुख्ता तैयारियां कर रहा है। इन सभी जिलों में डेंगू व चिकनगुनिया के लिए खून के नमूने की तुरंत जांच के साथ ही दवाओं आदि की पूर्ण उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। यही कारण है कि शासन स्तर पर आगामी मंगलवार 28 जुलाई को इन जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों व प्रमुख चिकित्सालयों के मुख्य चिकित्सा अधीक्षकों की बैठक लखनऊ में बुलाई गयी है। इस बैठक में प्रदेश के प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार स्वयं उपस्थित रहेंगे। स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ.विजय लक्ष्मी ने सूबे में डेंगू व चिकनगुनिया से निपटने के लिए पुख्ता बंदोबस्त की कमान संचारी रोग निदेशक डॉ.सत्य प्रकाश व अपर निदेशक डॉ.राकेश सक्सेना को सौंपी है। इस बाबत परीक्षण किट व दवाओं आदि के बंदोबस्त की नियमित समीक्षा भी की जाएगी।
ये हैं 22 जिले
लखनऊ, सीतापुर, खीरी, हरदोई, प्रतापगढ़, बहराइच, सहारनपुर, आगरा, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, अम्बेडकर नगर, गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया, कुशीनगर, बस्ती, इलाहाबाद, रायबरेली, फतेहपुर, कानपुर नगर, कानपुर देहात, कन्नौज

कार्रवाई से बचने को सूर्यप्रताप ने फेंका वीआरएस का दांव

-तमाम शर्तों व सवालों के साथ मुख्य सचिव को लिखा पत्र
-बाद में सोशल मीडिया में सार्वजनिक भी कर दी अपनी चिट्ठी
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले आइएएस अधिकारी सूर्यप्रताप सिंह ने कार्रवाई से बचने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का दांव खेला है। यही कारण है कि उन्होंने सीधे त्यागपत्र या वीआरएस के लिए आवेदन न कर तमाम शर्तों व सवालों के साथ मुख्य सचिव को पत्र लिखा है। यही नहीं, उन्होंने इस पत्र को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक भी कर दिया है।
बीते कुछ महीनों से सरकार के खिलाफ ऑन लाइन मोर्चा खोलने के साथ सड़क तक पर उतरने वाले आइएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह ने गुरुवार को अचानक मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) मांग ली। यह पत्र लिखते समय उन्होंने अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु सह रिटायरमेंट लाभ) नियमावली का तो हवाला दिया है, किन्तु सीधे वीआरएस न मांगकर तमाम शर्तें व शिकायतें भी जोड़ दी हैं। उनके इस कदम को हाल ही में अमिताभ ठाकुर के खिलाफ सरकार की कार्रवाई से जोड़ा जा रहा है। माना जा रहा है कि बीते दिनों सूर्यप्रताप की गतिविधियों को लेकर उन्हें एक नोटिस दिया गया था। इसके बावजूद वे सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी मुहिम चलाए हुए थे। नोटिस के बाद से ही उनके अगले कदम का इंतजार था, तो उन्होंने वीआरएस का दांव खेल दिया। उन्होंने मुख्य सचिव को बड़ा हृदय वाला बताकर उनसे अशिष्टता के लिए माफी भी मांगी है। सूर्यप्रताप इसी वर्ष 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। ऐसे में महज पांच माह पहले भेजे गए वीआरएस के आवेदन पर कई सवाल उठ रहे हैं। प्रक्रियागत रूप से प्रदेश सरकार यदि वीआरएस की संस्तुति कर भी देती है तो यहां से केंद्र सरकार के पास जाएगा। इस संबंध में मुख्य सचिव आलोक रंजन ने बताया कि उनका पत्र हमें मिल गया है। हमने इसे विधिक परीक्षण के लिए कार्मिक विभाग में भेज दिया है। जैसे ही उस पर रिपोर्ट आ जाएगी, उस पर कार्रवाई होगी। सामान्य रूप से वीआरएस देने में कोई तकनीकी अड़चन नहीं है।
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छुटभैया नेता भी बनते मुसीबत
अपने पत्र में सूर्यप्रताप ने लिखा है कि अगर कोई अधिकारी निष्ठा व कर्मठता का परिचय देना आरंभ करता है तो स्थानीय राजनीतिक लोग उसे सही रास्ते पर चलने नहीं देते। स्वार्थपर्तावश या कार्यकर्ताओं के बहाने राह में रोड़ा अटकाते हैं। जरा-जरा सी बात पर शिकायतों के माध्यम से उस अधिकारी के सिर पर निलंबन या स्थानांतरण की तलवार लटकना आम बात है। सत्तारूढ़ दल के छुटभैया नेता भी मुसीबत बन जाते हैं। यही कारण है कि अफसरों ने भी अपने आपको राजनेताओं की मंशा के अनुरूप ढालने में भलाई समझी है।
मैनेजर टाइप अफसरों की मौज
सूर्यप्रताप ने लिखा कि सत्तर के दशक तक की समाप्ति तक आइएएस अधिकारियों को बड़े ही सम्मान के साथ देखा जाता था। तब तक अधिकारियों को रिश्वत लेने या कदाचार पर समाज द्वारा हेय दृष्टि से देखे जाने का भय होता था। नौकरशाहों और राजनेताओं के गठजोड़ ने समूची व्यवस्था को ही पंगु बना डाला है। आज दागी और मैनेजर टाइप के अफसरों की मौज है।
मलाईदार पदों के लिए बोली
इस समय सार्वजनिक उद्यम विभाग में प्रमुख सचिव के रूप में कार्यरत सूर्यप्रताप ने लिखा है कि उत्तर प्रदेश जैसे आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक रूप से पिछड़े राच्य में नौकरशाही का बहुत बड़ा वर्ग जाति तथा राजनीतिक विचारधारा के आधार पर बंट गया है। मलाईदार उच्च पदों के लिए बोली लगायी जाती है। आज प्रति सप्ताह लगभग दो दर्जन अफसरों के तबादले हो रहे हैं। पिछले 15 सालों में देश में कुल 200 आइएएस, आइपीएस व आईएफएस अधिकारियों का निलंबन हुआ, जिसमे से 105 केवल उत्तर प्रदेश से हैं।
रोज आठ बलात्कार, 11 हत्याएं
प्रमुख सचिव ने कहा कि आज उत्तर प्रदेश में रोजाना लगभग आठ बलात्कार तथा 11 हत्याएं हो रही हैं। गत वर्ष 40,000 से अधिक हिंसक अपराध हुए। 2,000 से अधिक बलात्कार तथा 5,000 से अधिक हत्याएं हुईं। हत्याओं व बलात्कारों के कारण देश में सबसे असुरक्षित दस स्थानों में से 5 उत्तर प्रदेश में हैं। पुलिस थानों में एक वर्ग विशेष के दरोगाओं की तैनाती की बात से पुलिस में जनसामान्य का विश्वास डगमगाया है।

छात्राओं को स्कूल में मिलेंगी सेनेटरी नैपकिन्स

-कक्षा छह से बारह तक होगा वितरण
-साल भर की सौंपी जाएंगी एक साथ
-डिम्पल करेंगी औपचारिक शुरुआत
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
अगले माह से छात्राओं को अपने स्कूल में सेनेटरी नैपकिन्स मिलेंगी। कक्षा छह से बारह तक एक साथ वितरण कर छात्राओं को साल भर के प्रयोग की नैपकिन एक साथ सौंपी जाएंगी।
शासन स्तर पर किशोरी सुरक्षा पर जोर देने के साथ ही दस से 19 वर्ष आयु वर्ग की सभी छात्राओं को नि:शुल्क सेनेटरी नैपकिन्स बांटने का फैसला हुआ है। प्रदेश के सभी सरकारी विद्यालयों में कक्षा छह से बारह तक की छात्राओं को इस 'किशोरी सुरक्षा योजना से जोडऩे का फैसला हुआ है। राज्य में सरकारी जूनियर हाई स्कूलों, उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों व माध्यमिक विद्यालयों में कुल मिलाकर 16 लाख 77 हजार 819 छात्राएं अध्ययनरत हैं। इन सभी छात्राओं को पूरे वर्ष में उपयोग में आने वाली सेनेटरी नैपकिन्स एक साथ देने की तैयारी है। हर विद्यालय में हर छात्रा के लिए दस नैपकिन वाले तेरह पैकेट्स का एक कार्टन भिजवाया जाएगा। इस तरह हर छात्रा को वर्ष में तेरह बार प्रयोग के लिए 130 सेनेटरी नैपकिन मिल जाएंगी। यह योजना हर हाल में लागू करने की तैयारी है। इसका उद्घाटन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी व कन्नौज की सांसद डिम्पल यादव से कराने की बात कही जा रही है। यही कारण है कि नैपकिन के डिजाइन से लेकर उसकी पैकिंग तक के बारे में विशेषज्ञों से सलाह ली गयी है। नैपकिन खरीदने के लिए संस्था का चयन भी कर लिया गया है। अंतिम रूप से नागपुर व इंदौर की दो संस्थाओं के बीच नैपकिन आपूर्ति के लिए मुकाबला था। स्वास्थ्य विभाग की क्रय समिति ने इन्दौर की संस्था से नैपकिन खरीदने पर सहमति जताई, जिसके बाद यह फैसला हुआ। स्वास्थ्य विभाग के सचिव अरविन्द नारायण मिश्र द्वारा इस बाबत जारी आदेश में कहा गया है कि किशोरी सुरक्षा योजना, राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है। ऐसे में चयनित संस्था द्वारा समयबद्ध ढंग से उच्च गुणवत्ता के साथ आवश्यकता के अनुरूप सेनेटरी नैपकिन की आपूर्ति सुनिश्चित कराई जाएगी।
--किशोरी सुरक्षा योजना--
-16 लाख 77 हजार 819 छात्राओं को लाभ
-10 से 19 वर्ष आयु वर्ग को किया चिह्नित
-हर छात्रा को मिलेंगे 10 नैपकिन के 13 पैकेट
विशेष डिजाइन, आकर्षक पैकिंग
छात्राओं को सेनेटरी नैपकिन देने से पहले उनकी डिजाइन व पैकिंग का विशेष ध्यान रखा गया है। इसके लिए आपूर्तिकर्ता फर्म को विशेष निर्देश दिये गए हैं। अगले माह हर हाल में वितरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। -डॉ.विजय लक्ष्मी, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण महानिदेशक

मेडिकल कालेजों में इलाज सुधारने को हरी झंडी

राज्य ब्यूरो, लखनऊ
राज्य में नए मेडिकल कालेज खुलने के साथ ही पुराने कालेजों व उनसे संबद्ध अस्पतालों में ढांचागत सुधार के लिए मुख्यमंत्री की पहल पर प्रयास शुरू हुए हैं। सभी कालेजों में सुधार के लिए चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय की तकनीकी समिति ने बैठक कर प्रारंभिक कार्ययोजना को हरी झंडी दे दी है। इस बैठक में कई मेडिकल कालेजों के प्राचार्य भी शामिल हुए।
हाल ही में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश के पुराने मेडिकल कालेजों की जर्जर स्थिति को सुधारने के मसले पर चिकित्सा शिक्षा विभाग को निर्देश दिये थे। उन्होंने सभी मेडिकल कालेजों से जरूरी प्रस्ताव मांगे थे, ताकि उन्हें आवश्यकतानुरूप पूरक बजट में शामिल किया जा सके। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय सक्रिय हुआ और सूबे के मेडिकल कालेजों के प्राचार्यों, वित्त नियंत्रकों व कार्यदायी संस्था के अधिकारियों के साथ हुई तकनीकी समिति की बैठक में इन प्रस्तावों को अंतिम रूप दिया गया। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि सभी कालेजों से जुड़े प्रस्तावित कार्यों को अंतिम रूप दे दिया गया है। अब मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप विस्तृत प्रस्ताव मंगवाए जा रहे हैं, ताकि अनुपूरक बजट में उन्हें जोड़ा जा सके।
झांसी में वातानुकूलित पुस्तकालय: महारानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कालेज, झांसी में केंद्रीय पुस्तकालय को वातानुकूलित करने व 250 सीटों के एक लेक्चर थियेटर के निर्माण का प्रस्ताव है। मेडिकल कालेज में गैस पाइप लाइन डलवाने व दो एलीवेटर की स्थापना कराने के साथ पैरामेडिकल कालेज में आवश्यक फर्नीचर खरीदने का प्रस्ताव है।
कानपुर में नया अस्पताल व ब्लड बैंक: गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय में उच्च स्तरीय ब्लड बैंक व एक सुपर स्पेशियलिटी चिकित्सालय के निर्माण, न्यूरोलॉजी सेंटर में ऑक्सीजन व वैक्यूम पाइप लाइन डलवाने तथा लाला लाजपत राय चिकित्सालय के मानसिक रोग विभाग का सुदृढ़ीकरण कराने का प्रस्ताव है। इसी तरह स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में वार्ड 7, 8 व 9, ऑपरेशन थियेटर तथा द्वितीय प्रसव कक्ष की मरम्मत और सेंट्रल आक्सीजन प्लांट संबंधी काम होने हैं और हृदय रोग संस्थान में ओपीडी, डायग्नोस्टिक व फिजियोथिरैपी विंग को आइडीएच भवन में संचालित करने हेतु पुनर्निमाण कार्य का प्रस्ताव है।
इलाहाबाद में कन्वेंशन सेंटर: मोती लाल नेहरू मेडिकल कालेज इलाहाबाद में नया कन्वेंशन सेंटर बनाने के साथ स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल परिसर में सरोजनी नायडू बाल चिकित्सालय का नया भवन भी बनेगा। चिकित्सालय परिसर में मेडिसिन, एनेस्थीशिया और टीबी चेस्ट विभागों के छह-छह बेड के सघन चिकित्सा कक्ष बनाए जाएंगे और एमडी नेत्र चिकित्सालय परिसर में आई ब्लॉक भवन का निर्माण होगा।
गोरखपुर में नया छात्रावास: बीआरडी मेडिकल कालेज गोरखपुर में 100 कमरों वाले स्नातकोत्तर पुरुष छात्रावास का निर्माण कराने के साथ 100 शैय्या वाले इंसेफेलाइटिस वार्ड के ऊपर 250 सीटों के लेक्चर थियेटर के निर्माण का प्रस्ताव है।
आगरा में पुनर्निर्माण: प्रदेश के सबसे पुराने एसएन मेडिकल कालेज, आगरा में बड़े पैमाने पर पुनर्निमाण की जरूरत महसूस की जा रही है। वहां सात मंजिले भवन के साथ पुराने भवन की मरम्मत
-मेडिकल कालेज कन्नौज की विभिन्न प्रयोगशालाओं में लैब फर्नीचर व फिक्चर्स का क्रय
-मेडिकल कालेज आगरा में सात मंजिले भवन की मरम्मत का कार्य

...तो रेलवे टिकट की तरह ऑन लाइन लीजिए स्टाम्प

-कोषागार या वेंडर के पास जाने की जरूरत होगी खत्म
-संपत्ति की रजिस्ट्री के दौरान जटिलताएं हो जाएंगी कम
डॉ.संजीव, लखनऊ
आपको अपने प्लाट की रजिस्ट्री करानी है और रजिस्ट्री से ठीक पहले स्टाम्प खरीदने की चिंता सता रही है तो निश्चिंत हो जाइये। जल्द ही राज्य का कोषागार महकमा आपको रेलवे टिकट की तरह ऑन लाइन स्टाम्प मुहैया कराने जा रहा है।
संपत्तियों की खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया में रजिस्ट्री के दौरान स्टाम्प की आपूर्ति कोषागार विभाग से होती है। स्टाम्प की खरीदारी के दौरान तमाम अनियमितताओं और कई बार तो फर्जी स्टाम्प तक की शिकायतें मिलती रहती हैं। ऐसे में अब राज्य के कोषागार निदेशालय ने लोगों को स्टाम्प खरीदने के झंझट से मुक्ति दिलाने की तैयारी की है। कोषागार निदेशालय इस समय एक सॉफ्टवेयर पर काम कर रहा है, जिसके बाद स्टाम्प खरीदने के लिए कोषागार या वेंडर के पास जाने की जरूरत नहीं रह जाएगी। उपभोक्ता ऑनलाइन उपलब्ध एक फार्म पर ही अपना पूरा ब्योरा भर कर आवश्यकतानुरूप स्टाम्प खरीद सकेंगे। इसके लिए जरूरी धन का भुगतान उन्हें इंटरनेट बैंकिंग के जरिये ऑनलाइन ही करना होगा। इस भुगतान के बाद उन्हें प्रिंटेड स्टाम्प पेपर नहीं मिलेगा। इसके स्थान पर एक विशेष कोड नंबर के साथ तुरंत ऑनलाइन प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाएगा। वे इस प्रमाण पत्र का प्रिंट निकालकर सबरजिस्ट्रार कार्यालय जाएंगे, जहां पहले ही इस खरीदारी का पूरा ब्योरा पहुंच चुका होगा। इसके लिए राज्य के सबरजिस्ट्रार कार्यालयों को कोषागार से इंटरनेट के माध्यम से जोड़ा जाएगा। सबरजिस्ट्रार उसी प्रमाण पत्र को आधार मानकर रजिस्ट्री कर देंगे। जैसे ही रजिस्ट्री होगी, उक्त स्टाम्प को प्रयुक्त मान लिया जाएगा।
क्या होगी प्रक्रिया
-कोषागार की वेबसाइट पर जाकर ऑन लाइन स्टाम्प खरीदने के लिए भरें फार्म
-अपनी संपत्ति का ब्योरा भर कर उसके लिए स्टाम्प की आवश्यकता करें दर्ज
-फार्म ठीक से भरने के बाद आएगा ऑन लाइन धन हस्तांतरण का विकल्प
-अपने खाते से स्टाम्प मूल्य के बराबर धन कोषागार खाते में करें हस्तांतरित
-धन जाते ही आपकी संपत्ति व आपने नाम जारी हो जाएगा हस्तांतरण प्रमाण पत्र
-इसका प्रिंट निकालकर सबरजिस्ट्रार कार्यालय में अन्य कागजों संग जमा करें
-सबरजिस्ट्रार उस प्रमाणपत्र को आधार बनाकर कर देंगे आपके संपत्ति की रजिस्ट्री
वापसी भी होगी आसान
यदि किसी कारणवश आप स्टाम्प खरीदने के बाद वापस करना चाहते हैं, तो वह भी बेहद आसान होगी। बस आपको एक फार्म भरकर सबरजिस्ट्रार कार्यालय में देना होगा कि आप उक्त स्टाम्प का प्रयोग नहीं करेंगे, उसे रद कर दिया जाए। सबरजिस्ट्रार कार्यालय से अनुमोदन होते ही स्टाम्प मूल्य का दस प्रतिशत शुल्क काटकर शेष राशि कोषागार के खाते से आपके खाते में हस्तांतरित हो जाएगी।
आसान हो जाएगी प्रक्रिया
हम जल्द ही ऑनलाइन स्टाम्प जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर देंगे। इस पर तेजी से काम चल रहा है। राज्य के कोषागारों व रजिस्ट्रार कार्यालयों को आपस में जोड़ कर इस काम को मूर्त रूप दिया जाएगा। इससे पूरी प्रक्रिया आसान हो जाएगी और तमाम गड़बडिय़ों से भी निजात मिलेगी। -लोरिक यादव, निदेशक कोषागार

सूबे के अस्पतालों में साल भीतर बढ़ेंगे 12 हजार बेड

-इनमें आठ हजार बेड जच्चा-बच्चा के लिए होंगे आरक्षित
-67 प्रतिशत बच्चों का टीकाकरण, हर माह बढ़ाने का लक्ष्य
-स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति बीस फीसद ज्यादा खर्च का फैसला
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
सूबे की सेहत ठीक करने के लिए सरकार ढांचागत सुधार पर जोर दे रही है। स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव अरविंद कुमार के मुताबिक एक साल के भीतर राज्य के अस्पतालों में 12 हजार बेड बढ़ाए जाएंगे।
मंगलवार को यहां एक होटल में जच्चा-बच्चा व किशोर स्वास्थ्य पर आयोजित कार्यशाला में प्रमुख सचिव ने बताया कि राज्य के 4500 अस्पतालों में इस समय इलाज के लिए चालीस हजार बेड उपलब्ध हैं। एक साल के भीतर इनमें 12 हजार की वृद्धि हो जाएगी। इनमें भी आठ हजार बेड जच्चा-बच्चा के लिए आरक्षित होंगे। इसके अलावा 20 हजार स्वास्थ्य उपकेंद्रों व डेढ़ लाख आशा कार्यकर्ताओं का नेटवर्क जमीनी स्तर तक सेहत सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश में लगा है। राज्य को सेहत के स्तर पर जागरूकता की अत्यधिक जरूरत है और वह अकेले सरकार के वश में नहीं है। उन्होंने बताया कि राज्य के 67 प्रतिशत बच्चों का संपूर्ण टीकाकरण हो रहा है। अब यह संख्या हर माह एक प्रतिशत बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक अमित घोष ने कहा कि यह वर्ष मातृ-शिशु स्वास्थ्य वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। इसके साथ ही अब किशोरावस्था से ही सेहत की चिंता की जा रही है। सुविधाओं और समाज से सीधे जुड़ाव पर फोकस किया जा रहा है। स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति बीस प्रतिशत ज्यादा खर्च करने का फैसला हुआ है। राज्य में प्रति वर्ष 23 लाख 80 हजार बच्चे सरकारी अस्पतालों में पैदा होते हैं। ऐसे में एक साल से कम उम्र के बच्चों की जान बचाने का लक्ष्य रखा गया है, क्योंकि इससे परिवार कल्याण में भी सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। उत्तर प्रदेश तकनीकी सहायता इकाई के कार्यकारी निदेशक विकास गोठलवाल ने जच्चा-बच्चा की सेहत सुधारने के लिए 'जीवन चक्रÓ पद्धति पर जोर दिया जा रहा है। इसमें नियमों से कार्यप्रणाली तक को मूर्त रूप देना प्राथमिकता में शामिल है। यह कठिन तो हैै, किन्तु अब सामूहिक प्रयासों से संभव हो रहा है। इसके लिए राज्य के उन 100 ब्लाकों पर फोकस किया जा रहा है, जहां जच्चा-बच्चा की सेहत व परिवार कल्याण की दृष्टि से स्थितियां बहुत खराब थीं। वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वद्र्धराजन ने स्काइप के माध्यम से संबोधित करते हुए अग्र्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की आवाज बुलंद करने पर जोर दिया। परियोजना निदेशक डॉ.बीएम रमेश ने मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में प्रभावी कमी लाने के लिए स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर तक प्रयास किये जा रहे हैं। कम्युनिटी प्रोसेस टीम के मुखिया भरतलाल पाण्डेय ने कहा कि आशा, आंगनवाड़ी व एएनएम में प्रभावी संवाद से स्थितियां सुधर रही हैं। संयोजन सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च की अधिशासी निदेशक अखिला शिवदास व संचालन परियोजना प्रबंधक रश्मि काला ने किया।
...जब आशा कार्यकर्ता को खुद करानी पड़ी नसबंदी
लखनऊ: कार्यशाला में बाराबंकी से आयी आशा कार्यकर्ता पूनम ने अपने अनुभव बताकर वहां मौजूद लोगों के साथ सीधे संवाद किया। उन्होंने बताया कि वे महिलाओं से नसबंदी के लिए कहती थीं, तो लोग कहते, पहले खुद कराओ। उनकी सास उन्हें नसबंदी कराने नहीं दे रही थीं। बाद में सबको तैयार कर पहले खुद नसबंदी कराई, फिर गांव के अन्य लोगों को तैयार किया। यही नहीं घर की दीवाल पर भी लिखवा दिया, 'मैंने नसबंदी करवा ली हैÓ। सीतापुर की नर्स मेंटर प्रियंका, बाराबंकी की नर्स मेंटर ऋचा और बाराबंकी की स्वास्थ्य कार्यकर्ता आरती जायसवाल व गुलप्सा बानो ने भी अपने अनुभव बांटे।

पांच सौ करोड़ से चमकेंगे पुराने मेडिकल कालेज


-मुख्यमंत्री की सहमति के बाद मांगे गए प्रस्ताव
-जर्जर इमारतों को गिराने व विस्तार की तैयारी
डॉ.संजीव, लखनऊ
राज्य में नए खुल रहे मेडिकल कालेजों के साथ पुराने मेडिकल कालेजों को भी चमकाने की पहल हो रही है। मुख्यमंत्री की सहमति के बाद इन कालेजों के प्राचार्यों से इस बाबत प्रस्ताव मांगा गया है। सभी छह मेडिकल कालेजों पर पांच सौ करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
प्रदेश में वर्ष 2006 में इटावा के सैफई में आयुर्विज्ञान संस्थान खुलने के बाद बीते पांच वर्षों में अम्बेडकर नगर, कन्नौज, आजमगढ़, जालौन व सहारनपुर में मेडिकल कालेज शुरू हुए हैं। नए मेडिकल कालेजों की स्थापना के बीच पुराने मेडिकल कालेजों की उपेक्षा और वहां से शिक्षकों के स्थानांतरण के कारण मान्यता पर संकट पैदा किये जाने जैसा आरोप भी लगने लगे थे। अब मुख्यमंत्री के साथ चिकित्सा शिक्षा महकमे की हुई चर्चा में सभी पुराने मेडिकल कालेजों को भी चमकाने पर सहमति बनी है। इसके लिए आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, गोरखपुर, मेरठ व झांसी मेडिकल कालेजों के प्राचार्यों से विस्तृत प्रस्ताव मांगा गया है। 1947 में स्थापित आगरा व 1956 में स्थापित कानपुर मेडिकल कालेजों में तो भवन तक खासे जर्जर हो चुके हैं। यही स्थिति अन्य कालेजों की भी है। ऐसे में इन कालेजों व उनसे संबद्ध अस्पतालों के जीर्णोद्धार के साथ उपचार के विस्तार के प्रस्ताव भी मांगे गए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में पांच सौ करोड़ रुपये के आसपास खर्च आने की उम्मीद जताई गयी है। इसे चरणबद्ध ढंग से खर्च किया जाएगा। इस दौरान बहुमंजिले चिकित्सकीय ब्लाक बनाने से लेकर मौजूदा संसाधनों का विस्तार करने तक की बात प्रस्ताव में शामिल करने को कहा गया है।
संविदा पर भर्ती करें कर्मचारी
लखनऊ: प्रदेश के सभी मेडिकल कालेजों में पैरामेडिकल व नर्सिंग स्टॉफ की कमी को लेकर सरकार गंभीर है। सभी कालेजों से इस बाबत अधीनस्थ सेवा चयन आयोग को अधियाचन भेजने को कहा गया है। वहां से भर्ती होने तक इन पदों पर संविदा के आधार पर भर्ती करने को कहा गया है। प्राचार्यों से यह कार्य समयबद्ध ढंग से करने को कहा गया है, ताकि उपचार में दिक्कत न हो।
अगले साल बांदा में भी एमबीबीएस
लखनऊ: अगले साल सरकारी क्षेत्र का एक और मेडिकल कालेज सक्रिय हो जाएगा। मुख्यमंत्री ने बांदा मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की कक्षा जुलाई 2016 से हर हाल में शुरू कराने को कहा है। अभी वहां प्राचार्य सहित कुछ कर्मचारियों की नियुक्ति हो चुकी है और बाह्यï रोगी विभाग (ओपीडी) में मरीज देखे जा रहे हैं।
दवाओं व सुविधाओं पर जोर
सभी मेडिकल कालेजों में दवाओं की उपलब्धता व अनुरक्षण में कोई कमी न रखने पर जोर दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री स्वयं इसे लेकर गंभीर हैं। इसके अलावा सभी छह पुराने मेडिकल कालेजों से जीर्णोद्धार व विकास के लिए विस्तृत प्रस्ताव मांगे गए हैं, जिन पर समयबद्ध ढंग से अनुपालन होगा।  -डॉ.वीएन त्रिपाठी, चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक

काली सूची के लिए 200 संस्थान चिह्नित

-छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में गड़बड़ी
-सुनवाई के बाद जारी होगी अंतिम सूची
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में गड़बड़ी करने वाले 200 संस्थानों को काली सूची के लिए चिह्नित किया गया है। अब समाज कल्याण निदेशक की अगुवाई में चल रही सुनवाई के बाद अंतिम सूची जारी की जाएगी।
राज्य में दसवीं के बाद पढ़ाई के रास्ते में कोई बाधा न पडऩे देने के लिए सरकार द्वारा छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति देने का प्रावधान है। समाज कल्याण विभाग द्वारा सामान्य व अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं को इस राशि का भुगतान किया जाता है। छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में करोड़ों रुपये के गोलमाल की पड़ताल में पता चला कि तमाम संस्थानों ने फर्जीवाड़ा कर शासन से शुल्क प्रतिपूर्ति प्राप्त कर ली है। इसके बाद इन संस्थानों की जांच शुरू हुई, तमाम चौंकाने वाले मामले सामने आए। ऐसे में शासन स्तर पर गड़बड़ी करने वाले सभी संस्थानों को काली सूची में डालने का फैसला हुआ था।
इसके बाद तीनों विभागों ने अपने-अपने स्तर पर दागी संस्थानों की सूची बनाकर समाज कल्याण निदेशालय भेजी है। निदेशालय के छात्रवृत्ति प्रभारी सिद्धार्थ मिश्र के मुताबिक हाथरस व आसपास के ही 22 संस्थान पहले ही काली सूची में डाले जा चुके हैं। समाज कल्याण निदेशालय से होने वाली शुल्क प्रतिपूर्ति में गड़बड़ी करने वाले 57 अन्य संस्थानों को सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया है। इनके अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग व अल्पसंख्यक कल्याण विभाग से आयी सूची को मिलाकर काली सूची के लिए कुल मिलाकर 200 संस्थान चिह्नित किये गए हैं। प्रदेश के समाज कल्याण निदेशक जी. राम के मुताबिक इन सभी संस्थानों को नोटिस जारी कर सुनवाई के लिए बुलाया गया है। इस समय सुनवाई की प्रक्रिया चल रही है। सुनवाई पूरी होने के बाद काली सूची में शामिल संस्थानों की अंतिम सूची जारी की जाएगी।

अब हर मेडिकल कालेज और मंडल मुख्यालय पर हीमोफीलिया का इलाज

-24 घंटे जरूरी 'ब्लड फैक्टर चढ़ाने की सुविधा
-शासन से मिले 22 करोड़, कमी न होने के निर्देश
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
हीमोफीलिया से प्रभावित मरीजों के लिए खुशखबरी! अब सूबे के हर मेडिकल कालेज व मंडल मुख्यालय पर हीमोफीलिया का इलाज होगा।
हीमोफीलिया एक आनुवांशिक बीमारी है, जिसमें रक्त प्रोटीन की कमी हो जाने पर खून के थक्के जमने में बाधाएं आती हैं। खून में मौजूद 'थ्राम्बोप्लास्टिन नामक पदार्थ की भरपाई के लिए रक्त प्रोटीन यानी 'क्लॉटिंग फैक्टर की जरूरत पड़ती है। सामान्यत: 'फैक्टर-8 के नाम से चर्चित खून का यह अवयव बाजार में काफी महंगा मिलता है। सभी अस्पतालों में इसे चढ़ाने की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। अब शासन स्तर पर हीमोफीलिया का उपचार सुनिश्चित करने की पहल हुई है। प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी ने बताया कि अब राज्य के हर मेडिकल कालेज और मंडल मुख्यालय के जिला अस्पताल में हीमोफीलिया के इलाज की सुविधा उपलब्ध रहेगी। यहां जांच की सुविधा तो रहेगी ही, रोगियों का पूरा इलाज भी कराया जाएगा। इसमें मरीजो को रक्त का 'फैक्टर-8 चढ़ाया जाता है। इसे नियमित रूप से चढ़वाना पड़ता है। खून निकलने या दुर्घटना की स्थिति में जल्दी-जल्दी चढ़ाना पड़ता है। इन अस्पतालों में चौबीस घंटे 'फैक्टर-8 चढ़ाने व हीमोफीलिया के अन्य इलाज की सुविधा उपलब्ध रहेगी। इसके लिए प्रदेश सरकार से 22 करोड़ रुपये जारी हो गए हैं। साथ ही इस राशि को वार्षिक रूप से जारी करने पर सहमति बन गयी है, ताकि मरीजों को दिक्कत न हो। मरीजों को किसी तरह की कमी न होने देने के निर्देश भी दिये गए हैं।
क्या है हीमोफीलिया
हीमोफीलिया एक आनुवांशिक रोग है। इसमें शरीर से खून बहना शुरू होने की स्थिति में वह जमता नहीं है। इस रोग में खून के थक्का जमने का समय बढ़ जाता है। रक्त का बहना जल्दी बंद न होने से चोट या दुर्घटना में यह रोग जानलेवा साबित होता है।
सावधान, ये हैं लक्षण
-जगह-जगह नीले निशान बनना
-नाक से बार-बार खून बहना
-आंख के अंदर खून निकलना
-शरीर के जोड़ों में सूजन होना

सूबे में होम्योपैथी के चार सौ अस्पताल बंद


--मीठी गोली का इंतजार--
-चिकित्सकों की कमी से पैदा हुआ संकट
-दवाएं न मिलने से भी हो रही दिक्कत
डॉ.संजीव, लखनऊ
कुछ मीठी गोलियां और मरीज का उपचार। होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के लिए यह बात सीधी तौर पर मानी जाती है। उत्तर प्रदेश में समूची होम्योपैथी व्यवस्था को ही मीठी गोली का इंतजार है। चिकित्सकों की कमी से राज्य के चार सौ अस्पताल बंद हो गये हैं। जो खुलते हैं, उनमें भी दवाएं न मिलने से दिक्कत हो रही है।
जानकारी के अनुसार राज्य में होम्योपैथी के छोटे-बड़े, कुल 1575 अस्पताल हैं। इन अस्पतालों में मानक के अनुसार चिकित्सक व फार्मेसिस्ट के पद सृजित हैं। सभी मरीजों को अस्पतालों से ही दवाएं उपलब्ध कराने के नियम हैं। बीते कुछ महीनों से ये अस्पताल चिकित्सकों की कमी के कारण दोहरे संकट से जूझ रहे हैं। होम्योपैथी विभाग के पास इस समय पूरे राज्य में बमुश्किल 1200 चिकित्सक हैं। इसमें भी लगातार सेवानिवृत्त होने से हर माह संख्या घटती जा रही है। ऐसे में चार सौ अस्पताल तो बिना डॉक्टर के होने के कारण बंद हो गये हैं। अधिकारियों का कहना है कि जिन अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, वहां आसपास से डॉक्टर भेजे जाते हैं। अगल-बगल या कुछ किलोमीटर की दूरी वाले अस्पतालों में सप्ताह के तीन-तीन दिन डॉक्टरों की ड्यूटी लगायी जानी शुरू हुई है। ऐसे में जिस अस्पताल का डॉक्टर भेजा जाता है, वह बंद हो जाता है। जिस डॉक्टर की ड्यूटी लगती है, यदि वह किसी आकस्मिक कारण से अस्पताल न जा सके तो दोनों अस्पताल बंद हो जाते हैं। इन स्थितियों के परिणामस्वरूप रोज चार सौ अस्पताल बंद ही रहते हैं। जो अस्पताल खुलते हैं, उनमें भी दवाएं न मिलने से दिक्कत हो रही है। इन स्थितियों से निपटने के लिए लोक सेवा आयोग से खाली पद भरने का अनुरोध कई बार किया गया किन्तु होम्योपैथी प्रशासन को सफलता नहीं मिली। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने हाल ही में 177 चिकित्सकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की है, किन्तु उस पर अब तक प्रक्रिया अटकी होने से बेहद संकट की स्थिति बनी हुई है।
1175 अस्पताल किराये पर
लखनऊ: होम्योपैथी अस्पतालों को अपने भवनों में शिफ्ट करने की मुहिम भी परवान नहीं चढ़ रही है। राज्य के 1575 अस्पतालों में से सिर्फ 400 अपने भवनों में हैं। शेष 1175 अस्पताल किराये के भवनों में चल रहे हैं। इन्हें सरकारी भवनों में शिफ्ट करने के लिए जिला योजनाओं की बैठक में भी तमाम बार प्रस्ताव लाए गए किन्तु सफलता नहीं मिली। अधिकारी इसे हर स्तर पर उपेक्षा का परिणाम मानते हैं।
आयुष मिशन से जगी उम्मीद
अस्पतालों में दवाओं व चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के प्रयास हो रहे हैं। चिकित्सकों की कमी पूरी करने के लिए लोक सेवा आयोग से जल्द ही भर्तियां होंगी। दवाओं आदि के लिए आयुष मिशन से उम्मीद बंधी है। आयुष मिशन से होम्योपैथी को जो अनुदान मिलेगा, उससे दवाओं व अस्पतालों का ढांचागत सुधार किया जाएगा। -डॉ. विक्रमा प्रसाद, निदेशक होम्योपैथी, उत्तर प्रदेश

सूर्यप्रताप ने कहा, सुनो सरजी मार डालो पर.. डराओ मत!

राज्य ब्यूरो, लखनऊ
अमिताभ ठाकुर की तर्ज पर प्रदेश सरकार से मोर्चा खोले सार्वजनिक उद्यम विभाग के प्रमुख सचिव सूर्यप्रताप सिंह ने गुरुवार को एक बार फिर सरकार पर हमला बोला। उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा, 'सुनो सरजी, मार डालो... डराओ मतÓ।
सूर्यप्रताप ने कहा कि उनको लेकर किया जा रहा पूर्वाग्रह ग्रस्त प्रचार मानवीय संवेदना को कुचलने, मानसिक उत्पीडऩ और कलंकित करने का प्रयास है। ये सब गंभीर दर्द देता है, पीड़ा देता है। इससे जनभावनाओं से साथ खिलवाड़ होता है, भावनात्मक शोषण होता है। 'सरजीÓ को संबोधित करते हुए उन्होंने आशंका जताई है कि इससे पार्टी कार्यकर्ताओं सहित कुछ लोग अपने 'आकाओंÓ को खुश करने के लिए उनकी हत्या भी कर सकते हैं। इसका ख्याल रखा जाना चाहिए कि यह सब किसी व्यक्ति के प्रति जनविश्वास को कम करने, फेसबुक पर लिखने वाले किसी लेखक की कलम तोडऩे या एक अधिकारी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने का प्रयास हो सकता है। उन्होंने दावा किया है कि वे जनमानस की मौन स्वीकृति के साथ व्यवस्था के डर, दर्द और यातना को एक जनसेवक के रूप में उठा रहे हैं। उन्होंने कोई भी मुद्दा किसी व्यक्ति या संस्था की आलोचना के उद्देश्य से नहीं उठाया है। उन्होंने अपने स्टेटस का समापन इससे पूर्व में भी 5, कालिदास पर मेरे जैसे च्महत्वहीनच् विभाग की समीक्षा के बहाने बुलाकर मेरा अपमान भी किया गया 7 फ़ोन पर तो मुझे गाली-गलोच लगभग रोज ही दी जाती है 7 नक़ल रोको अभियान के दौरान एक ङ्कढ्ढक्क जनपद तथा एक पूर्वी उ.प्र. के जनपद में मारने पीटने के उदेश्य से घेरा भी गया था 7 मेरे घर पर भी लोग भेजे गए7 मैं इस सब को यद्यपि अति-गंभीरता से नहीं लेता हूँ....इसलिए नहीं कि... मैं बहुत निर्भीक हूँ...और न ही अहंकारवश ..यह सब कह रहा हूँ... मैं अपने मन को समझाने के लिए ..नियति पर भरोसा कर लेता हूँ .. बस इतना ही मात्र है 7
मैंने एक काल्पनिक पात्र विकसित किया है: च्सर जीच् - यह मेरा स्वमं से बात करने (ह्यद्गद्यद्घ-ह्लड्डद्यद्मद्बठ्ठद्द) का एक तरीका है ...यह पात्र कोई व्यक्ति हो भी सकता और नहीं भी .....
उपरोक्त च्गंभीरच् प्रकरण को लिखते हुए माहोल काफी च्नीरसच् हो गया, जान पड़ता है अत: नीचे संलग्न तीसरी फोटो को देखें ...... चलो हम सब मिलकर अपने च्सर जीच् से पूंछतें है ..... क्यों कर रहे हो ये सब......सर जी......... क्या टल्ली हो गए हो ?......टल्ली होना अच्छी बात नहीं.... जनमानस की भावना...पीड़ा...दर्द... को गंभीरता से लेना चाहिए....यु.....वाह ..वा...वा ....जोश के साथ होश हो तो मजा आ जाये....वलात्कार... भ्रष्टाचार.... जातिवाद ....छेत्रवाद.....झुटा प्रचारवाद....का फल ...मीठा नहीं होता...... गरीब..असहाय....निर्बल...को न सताईये जाकी मोटी हाय..... बिना स्वांस की खाल से....लोह भस्म हो जाये...
मेरे लिखने व कहने का .. उदेश्य जनमानस की भावनायों को भड़काना कभी नहीं रहा ..हाँ जनमानस को उनकी शक्ति का आभास कराने ....जगाने का उदेश्य अवश्य रहा है....और यह मैं जब तक स्वांस है शायद ..जरूर करूँगा...ऐसा संकल्प है...सर जी...गलती हो तो मांफ कर देना 7
(इनसेट-1)
अपमान व गालियां तो रोज की बात
लखनऊ: सूर्यप्रताप सिंग का कहना है कि उन्हें समीक्षा के बहाने बुलाकर अपमानित किया गया, फोन पर तो मुझे रोज ही गालियां दी जाती हैं। नक़ल रोको अभियान के दौरान उन्हें दो जिलों में पीटने के उद्देश्य से घेरा गया। उनके घर पर भी लोग भेजे गए। उन्होंने कहा कि वे इस सब को अति-गंभीरता से नहीं लेता। ऐसा अहंकार या निर्भीक होने की वजह से नहीं, बल्कि नियति पर भरोसे के कारण कर रहा हूं।


मैंने एक काल्पनिक पात्र विकसित किया है: च्सर जीच् - यह मेरा स्वमं से बात करने (ह्यद्गद्यद्घ-ह्लड्डद्यद्मद्बठ्ठद्द) का एक तरीका है ...यह पात्र कोई व्यक्ति हो भी सकता और नहीं भी .....
उपरोक्त च्गंभीरच् प्रकरण को लिखते हुए माहोल काफी च्नीरसच् हो गया, जान पड़ता है अत: नीचे संलग्न तीसरी फोटो को देखें ...... चलो हम सब मिलकर अपने च्सर जीच् से पूंछतें है ..... क्यों कर रहे हो ये सब......सर जी......... क्या टल्ली हो गए हो ?......टल्ली होना अच्छी बात नहीं.... जनमानस की भावना...पीड़ा...दर्द... को गंभीरता से लेना चाहिए....यु.....वाह ..वा...वा ....जोश के साथ होश हो तो मजा आ जाये....वलात्कार... भ्रष्टाचार.... जातिवाद ....छेत्रवाद.....झुटा प्रचारवाद....का फल ...मीठा नहीं होता...... गरीब..असहाय....निर्बल...को न सताईये जाकी मोटी हाय..... बिना स्वांस की खाल से....लोह भस्म हो जाये...
मेरे लिखने व कहने का .. उदेश्य जनमानस की भावनायों को भड़काना कभी नहीं रहा ..हाँ जनमानस को उनकी शक्ति का आभास कराने ....जगाने का उदेश्य अवश्य रहा है....और यह मैं जब तक स्वांस है शायद ..जरूर करूँगा...ऐसा संकल्प है...सर जी...गलती हो तो मांफ कर देना 7
उठाए ये मुद्दे
-प्रदेश में बोर्ड परीक्षाओं में व्याप्त नकल का मुद्दा उठाकर 'नकल रोको अभियानÓ चलाया।
-किसानों को ओलावृष्टि से हुई 7,500 करोड़ रुपये की क्षति के बदले मुआवजे का मुद्दा उठाया।
-बीते वर्ष घोषणा के अनुरूप सूखा राहत के मद में किसानों को 450 करोड़ रुपये न मिलने का मुद्दा उठाया।
-गन्ना किसानों का 11 हजार करोड़ रुपया बकाया होने के बावजूद भुगतान न किये जाने का मुद्दा उठाया।
-प्रदेश में बिजली मूल्य में हुई वृद्धि के बाद विभागीय भ्रष्टाचार व बिजली चोरी की छूट का मुद्दा उठाया।
-लोकसेवा आयोग में अध्यक्ष अनिल यादव के भ्रष्टाचार, जातिवाद और हो रहे कदाचार का मुद्दा उठाया।
-विभिन्न चयन आयोगों में एक ही जाति के अध्यक्षों व नियम विरुद्ध हो रही भर्तियों का मुद्दा उठाया।
-शाहजहांपुर में पत्रकार व बाराबंकी में पत्रकार की मां को जलाकर मारने के बाद गिरफ्तारी न होने का मुद्दा उठाया।
-आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे को लेकर कुछ जनपदों व एक गांव को ही लाभ दिये जाने की बात उजागर की।

अब भूमिहीनों को सबसे पहले मिलेगी समाजवादी पेंशन

--बदल गए नियम--
-अब तक नहीं पूरा हो सका पिछले वर्ष का लक्ष्य
-इस साल पांच लाख अधिक लोगों को मिलेगा लाभ
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
समाजवादी पेंशन योजना में बीते वित्तीय वर्ष के लिए निर्धारित लक्ष्य समाज कल्याण विभाग अब तक नहीं प्राप्त कर सका है। अब योजना के नियमों में बदलाव कर इस वर्ष के लिए लक्ष्य बढ़ाया गया है।
समाजवादी पेंशन योजना में पिछले वित्तीय वर्ष 2014-15 में 40 लाख लाभार्थियों को 500 रुपये प्रति माह पेंशन देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। उनमें से 33,66,056 को 19 करोड़ 99 लाख 35 हजार रुपये खर्च करके पेंशन का भुगतान किया गया था। शेष 6,58,894 लाभार्थियों को अब तक पेंशन नहीं दी जा सकी है। ऊपर से इस बार लाभार्थियों का लक्ष्य बीते वर्ष की तुलना में पांच लाख बढ़ाकर 45 लाख कर दिया गया है। इसी बीच गत दिनों एक शासनादेश जारी कर समाजवादी पेंशन की शर्तें भी बदल दी गयी हैं। ग्र्रामीण क्षेत्रों के लिए अब तक वरीयता क्रम निर्धारण में दूसरे स्थान पर रहने वाली भूमिहीन होने की शर्त को पहले स्थान पर कर दिया गया है। इसी तरह शहरी क्षेत्र में वरीयता क्रम निर्धारण में अब हाथ से मैला ढोने वाले स्वच्छकारों को पहली वरीयता दी जाएगी। इसी आधार पर वित्तीय वर्ष 2014-15 में लाभार्थियों का चयन करने का निर्देश दिया गया है। इस वर्ष लाभार्थियों की संख्या के मामले में लक्ष्य पांच लाख बढ़ाकर 45 लाख कर दिया गया है। प्रमुख सचिव (समाज कल्याण) सुनील कुमार ने बताया कि समाजवादी पेंशन के लिए 2727 करोड़ रुपये बजट की व्यवस्था की गयी है। पांच लाख नये लाभार्थियों के चयन में अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति एवं जनजाति तथा अन्य वर्गों का ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में जनपदवार तथा वर्गवार अलग-अलग लक्ष्य निर्धारित किया गया है। योजना के अंतर्गत 45 लाख परिवारों में से अनुसूचित जाति/जनजाति के 13.50 लाख (30 प्रतिशत), अल्पसंख्यक वर्ग के 11.25 लाख (25 प्रतिशत), अन्य पिछड़ा वर्ग एवं सामान्य वर्ग के 20.25 लाख (45 प्रतिशत) लोग लाभान्वित होंगे।  पिछले वर्ष के शेष लाभार्थियों के आवेदन पत्रों की पुन: जांच कर उनके पात्र पाए जाने पर पेंशन दी जाएगी।
इन्हें भी मिलेगी पेंशन
-18 वर्ष से कम आयु के विकलांग बच्चे जिनके माता-पिता मानक पूरे कर रहे हों
-कृषि संकट, कर्ज या उत्पीडऩ के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों के परिजन
-सदमे से असामयिक मृत्यु की घटना घटित होने वाले किसानों के परिजन
-एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों, परिवारों व अनाथ संक्रमित बच्चों के संरक्षक
-शारीरिक रूप से अक्षम व विकृत चेहरे वाले एसिड अटैक के पीडि़तों को

परिवार नियोजन में अब लक्ष्य नहीं, संवाद पर जोर

-25 जिलों में 100 ब्लाकों में अधिक सक्रियता
-नवदंपतियों से जुड़ेंगी 18408 आशा कार्यकर्ता
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
तमाम कोशिशों के बावजूद उत्तर प्रदेश परिवार नियोजन के मामले में अपेक्षित सफलताएं नहीं प्राप्त हो रही हैं। ऐसे में रणनीतिक रूप से अब लक्ष्य की जगह संवाद पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए राज्य के 25 जिलों के 100 ब्लाकों में अधिक सक्रियता बरतने का फैसला किया गया है।
संतानोत्पत्ति के मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति सुधरने की नाम नहीं ले रही है। प्रति दंपति प्रजनन दर के लिए 2.1 लक्ष्य आदर्श माना जाता है, किन्तु उत्तर प्रदेश में अभी प्रति दंपति प्रजनन दर 3.1 है। इन स्थितियों से निपटने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2020 तक हर हाल में 4.8 करोड़ नए लोगों को परिवार कल्याण कार्यक्रमों से जोडऩे का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसमें से एक चौथाई, यानी 1.2 करोड़ नए लोग उत्तर प्रदेश में जोड़े जाने हैं। का कहना है कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ग्र्राम स्तर तक सक्रियता का फैसला लिया गया है। सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च की प्रदेश परियोजना प्रबंधक रश्मि काला के मुताबिक प्रदेश सरकार के साथ मिलकर टीएसयू ने परिवार कल्याण के मामले में पिछड़े 25 जिले चिह्नित किये हैं। हर जिले में ऐसे चार ब्लाक लिए गए हैं, जिससे जिले की लगभग आधी आबादी को जोड़ा जा सके।
प्रदेश में इस काम में सरकार के साथ जुड़ी तकनीकी सपोर्ट यूनिट (टीएसयू) की परिवार कल्याण परियोजना निदेशक प्रीति आनंद ने बताया कि हर गांव के नवदंपतियों पर फोकस करते हुए परिवार नियोजन साधन प्रयोग करने वाले जोड़ों से सीधे संवाद की प्रक्रिया शुरू करने पर जोर दिया जा रहा है। फोकस वाले 25 जिलों में दंपतियों को चिह्नित कर 18,408 आशा कार्यकर्ता उनसे नियमित संपर्क में रहेंगी। इस दौरान हर
ये हैं 25 जिले
इलाहाबाद, कौशाम्बी, मिर्जापुर, सोनभद्र, बहराइच, बाराबंकी, फैजाबाद, खीरी, सीतापुर, बदायूं, बरेली, पीलीभीत, रामपुर, शाहजहांपुर, एटा, फर्रूखाबाद, हरदोई, कन्नौज, काशीराम नगर, बलरामपुर, गोंडा महाराजगंज, संत कबीर नगर, श्रावस्ती, सिद्धार्थ नगर

इस साल 45 लाख परिवारों को समाजवादी पेंशन

-पहले तीन माह के लिए 505 करोड़ रुपये जारी
-31 जुलाई तक हर हाल में चिह्नित हों लाभार्थी
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
प्रदेश सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष 2015-16 के लिए समाजवादी पेंशन का दायरा बढ़ा दिया है। इस वर्ष 45 लाख लोगों को यह पेंशन मिलेगी। शासन ने पहले तीन माह की पेंशन का भुगतान करने के लिए 505 करोड़ रुपये जारी भी कर दिये हैं। साथ ही 31 जुलाई तक हर हाल में सभी लाभार्थियों को चिह्नित करने के निर्देश भी दिये गए हैं।
समाजवादी पेंशन योजना में पिछले वित्तीय वर्ष 2014-15 में 40 लाख लाभार्थियों को 500 रुपये प्रति माह पेंशन देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। उनमें से 33 लाख 35 हजार को पेंशन का भुगतान किया गया था। इस वर्ष लाभार्थियों की संख्या के मामले में लक्ष्य पांच लाख बढ़ाकर 45 लाख कर दिया गया है।
 प्रदेश सरकार की महत्वपूर्ण एवं प्राथमिकतापरक समाजवादी पेंशन योजना से वित्तीय वर्ष 2015-16 में 05 लाख नये लाभार्थियों सहित कुल 45 लाख परिवारों को लाभान्वित किये जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसके लिए 2727 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था की गयी है। समाजवादी पेंशन के लिए 05 लाख नये लाभार्थियों के चयन में अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति एवं जनजाति तथा अन्य वर्गों का ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में जनपदवार तथा वर्गवार अलग-अलग लक्ष्य निर्धारित किया गया है। योजनान्तर्गत 45 लाख परिवारों में से अनुसूचित जाति/जनजातियों के 13.50 लाख (30 प्रतिशत), अल्पसंख्यक वर्ग के 11.25 लाख (25 प्रतिशत), अन्य पिछड़ा वर्ग एवं सामान्य वर्ग के 20.25 लाख (45 प्रतिशत) लाभार्थी लाभान्वित होंगे। वर्तमान वित्तीय वर्ष में समाजवादी पेंशन के लिए पात्र 33,66,056 लाभार्थियों को तीन महीने की किश्त देने के लिए 504.90 करोड़ रुपये की धनराशि समाज कल्याण विभाग द्वारा जारी कर दी गयी।
प्रमुख सचिव समाज कल्याण श्री सुनील कुमार ने यह जानकारी दी। उन्होंने समस्त जिलाधिकारियों को निर्देश दिये हैं कि समाजवादी पेंशन योजना अन्तर्गत निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप सभी पात्रों का चयन 31 जुलाई 2015 तक हर-हाल में पूरा कर लिया जाय, तत्पश्चात इन सभी का सी0बी0एस0 बैंक खाता खुलवाकर 31 अगस्त 2015 तक सम्ूपर्ण डाटा वेबसाइट पर ऑनलाइन अपलोड करा लिया जाय। उन्होंने बताया कि जनपद स्तर पर जिलाधिकारी इस योजना के सफल एवं समयबद्ध क्रियान्वयन हेतु प्राथमिकता पर कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए स्वयं उत्तरदायी हैं। जिलाधिकारी द्वारा योजना का नियमित रूप से अनुश्रवण किया जाना भी सुनिश्चित किया गया है।
ज्ञातव्य हो कि वित्तीय वर्ष 2014-15 से समाजवादी पेंशन योजना से 19 करोड़ 99 लाख 35 हजार रुपये खर्च करके 33,35,274 पात्र परिवारों को लाभान्वित किया गया तथा शेष 06,58,894 लाभार्थियों के आवेदन पत्रों की पुन: जांच करनेे के पश्चात पात्र पाये जाने पर पेंशन देय होगी।

राज्य के पांच मेडिकल कालेजों को केंद्र की मंजूरी का इंतजार

-बहराइच, फैजाबाद, शाहजहांपुर, फिरोजाबाद और बस्ती के प्रस्ताव
-चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय से भेजी जा चुकी परियोजना रिपोर्ट
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
सरकारी क्षेत्र के पांच मेडिकल कालेजों को केंद्र सरकार की मंजूरी का इंतजार है। बहराइच, फैजाबाद, शाहजहांपुर, फिरोजाबाद और बस्ती में ये मेडिकल कालेज खोलने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय से भेजी जा चुकी है।
जानकारी के मुताबिक अनुसूचित जाति के छात्र-छात्राओं को अधिक 70 प्रतिशत आरक्षण की शर्त के साथ केंद्र सरकार स्पेशल कंपोनेंट प्लान के तहत विशेष आर्थिक सहायता देकर नए मेडिकल कालेज खोलने की अनुमति देती है। इनके निर्माण व संचालन में आने वाले खर्च का 70 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करती है और शेष 30 प्रतिशत की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश सरकार की होती है। प्रदेश में अब तक चार जिलों, अम्बेडकर नगर, कन्नौज, जालौन, सहारनपुर में इसी योजना के तहत मेडिकल कालेज खुल चुके हैं।
इसी कड़ी में प्रदेश सरकार ने बहराइच, फैजाबाद, शाहजहांपुर, फिरोजाबाद व बस्ती में मेडिकल कालेज खोलने का प्रस्ताव किया था। साथ ही तय हुआ था कि इन जिलों के जिला अस्पतालों को मेडिकल कालेज से संबद्ध कर मेडिकल कालेज अस्पताल का दर्जा दे दिया जाएगा। इससे प्रदेश सरकार अपने हिस्से के तीस फीसदी खर्चे में समायोजित करने में भी सफल हो जाती। केंद्रीय स्तर पर सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद प्रदेश सरकार की ओर चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय ने इन सभी प्रस्तावित मेडिकल कालेजों की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) बनाकर भेज भी दी है। इसके बावजूद अब तक केंद्र की ओर से मंजूरी न मिलने के कारण इन कालेजों का काम नहीं शुरू हुआ है। प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी के मुताबिक प्रदेश शासन स्तर पर ये कालेज खोलने को सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है। अब केंद्र से अनुमति मिलते ही स्पेशल कम्पोनेंट योजना के तहत ये कालेज खोल दिये जाएंगे।
एक कालेज पर 500 करोड़ खर्च
लखनऊ: एक मेडिकल कालेज बनाने में औसत खर्च 500 करोड़ रुपये के आसपास आने की उम्मीद है। केंद्र से इस राशि का बड़ा हिस्सा मिल जाने से इनका निर्माण आसान हो जाएगा। हाल ही में बने या निर्माणाधीन कालेजों की बात करें तो सहारनपुर मेडिकल कालेज के लिए 510 करोड़, बांदा के लिए 404 करोड़, जालौन के लिए 388 करोड़, बदायूं के लिए 542 करोड़, आजमगढ़ के लिए 497 करोड़, अम्बेडकर नगर के लिए 496 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गयी है।

स्वयंसेवकों संग गूंजतीं 'अल्लाह हो अकबर की सदाएं


-राज्य के सौ स्थानों पर आरएसएस का रोजा इफ्तार
-'मुहिब्बे वतन मुस्लिम तहरीक ने संभाली कमान
डॉ.संजीव, लखनऊ
शाम के सात बजने वाले हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक शाखा लगाने या विकिर करने की जल्दबाजी में न होकर रोजेदारों के लिए तैयारी में व्यस्त हैं। अचानक अजान होती है और सभी स्वयंसेवक चुप से हो जाते हैं। 'अल्लाह हो अकबर की सदाओं के बाद रोजा खोलकर मगरिब की नमाज पढ़ी जाती है और फिर सब मिलकर राष्ट्रनिर्माण की दुआ करते हैं।
बीते कुछ दिनों से यह दृश्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों में आम सा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने अनुषंगिक संगठन 'मुहिब्बे वतन मुस्लिम तहरीक (मुस्लिम राष्ट्रीय मंच) के जरिये देश के मुसलमानों से संवाद की प्रक्रिया बढ़ा रहा है। इस बार उत्तर प्रदेश पर पूरा जोर है। पाक रमजान में पूरे प्रदेश में सौ स्थानों पर यह तहरीक रोजा इफ्तार का आयोजन कर रही है। इस दौरान संबंधित शहर, जिले, महानगर या कस्बे के प्रमुख मुस्लिमों को रोजा इफ्तार का न्योता दिया जाता है। वे वहां आते हैं तो संघ के स्वयंसेवक उनके लिए खजूर, पकौडिय़ों व अन्य खाद्य सामग्र्री का प्रबंध करके रखते हैं। ऐसे में नमाज और रोजा खोलते समय का दृश्य विशिष्टता लिए ही होता है। इस दौरान संघ की आम छवि के विपरीत स्वयंसेवक व रोजेदार एक दूसरे के साथ न सिर्फ रोजा खोलते हैं, बल्कि देश-दुनिया की चर्चा भी करते हैं।
तहरीक के उत्तरप्रदेश-उत्तराखंड प्रभारी महिरध्वज सिंह के मुताबिक इफ्तार के बाद राष्ट्र निर्माण व सुरक्षा की दुआ भी रोजेदार करते हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश के सभी जिलों के साथ तहसील व ब्लाक स्तर तक रोजा इफ्तार के आयोजन रमजान के पवित्र महीने में किये जा रहे हैं। प्रदेश भर में सौ से अधिक आयोजनों के साथ राष्ट्रवादी मुस्लिमों को जोड़ा जा रहा है। इन कार्यक्रमों में तहरीक के संयोजक मो.अफजल, सह संयोजक शहजाद अली, इमरान चौधरी के अलावा संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार आदि भाग ले रहे हैं। मंगलवार को लखनऊ में भी रोजा इफ्तार हुआ। इसके बाद ईद मिलन के समारोह भी होंगे। महिरध्वज के मुताबिक स्वयंसेवकों व मुस्लिमों के बीच संवाद की यह प्रक्रिया निश्चित रूप से राष्ट्र के लिए लाभकारी साबित होगी। आयोजनों में वर्तमान भारतीय परिवेश में मुस्लिमों की भूमिका बढ़ाने पर संवाद होता है। चर्चा होती है कि इस्लाम के मायने अमन, भाईचारा, खुशहाली व सलामती है और आम मुसलमान यही चाहता है।

Thursday, 27 August 2015

चिकित्सा पर्यटन की राह, डॉलर कमाने की चाह


-दुनिया में सबसे सस्ते व अच्छे इलाज ने बढ़ायीं उम्मीदें
-संतुष्ट होकर जाते हैं आसपास के देशों से आए मरीज
डॉ.संजीव, लखनऊ
घुटना खराब होने के कारण चलने से मोहताज वसीम दुबई से घुटना प्रत्यारोपण करवाने कानपुर आया। घुटना बदलवाकर वह लौटा तो खासा प्रफुल्लित था। वह तुलनात्मक रूप से काफी कम पैसे खर्च कर अपनी चाल दुरुस्त कर चुका था। प्रदेश में अब चिकित्सा पर्यटन की इसी राह को और मजबूत करने की तैयारी है। इसके पीछे यहां की मेधा को अवसर देने के साथ डॉलर कमाने की चाह भी बड़ा कारण है।
उत्तर प्रदेश में दो दर्जन से अधिक सरकारी व निजी मेडिकल कालेजों के अलावा उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधाओं वाले अस्पताल खुल चुके हैं। ऐसे में अब स्वास्थ्य महकमे की नजर इन अस्पतालों व चिकित्सकों का अधिकाधिक प्रयोग कर सूबे को चिकित्सा पर्यटन का हब बनाने पर है। पहले से ही यहां दुनिया के कई देशों से मरीज आ रहे हैं। सस्ते व अच्छे इलाज के कारण भारतीय चिकित्सा व्यवस्था लोकप्रिय हो रही है। आसपास के देशों में यहां से इलाज कराकर गए लोग प्रसन्न दिखते हैं तो और भी लोग यहां आते हैं। शासन स्तर पर इसे नियोजित चिकित्सा पर्यटन के रूप में विकसित करने की तैयारी है।
चिकित्सकों के मुताबिक हृदय की बाईपास सर्जरी या वाल्व प्रत्यारोपण पर अमेरिका में 1 लाख 30 हजार से 1 लाख 60 हजार डॉलर तक खर्च होते हैं, वहीं यूपी मइस पर छह हजार डॉलर खर्च आता है। इसी तरह एंजियोप्लास्टी पर अमेरिका में 57 हजार डॉलर के आसपास खर्च आता है, जबकि यूपी में चार हजार डॉलर में उत्कृष्ट सुविधाओं के साथ एंजियोप्लास्टी हो जाती है। घुटना व कूल्हा प्रत्यारोपण पर अमेरिका में 40 से 43 हजार डॉलर खर्च आता है, जबकि यूपी में इसका खर्च चार से पांच हजार डॉलर के बीच में है। अमेरिका की तुलना में सिंगापुर व थाइलैंड में इलाज सस्ता है, किन्तु भारत से फिर भी अत्यधिक महंगा है।
वरिष्ठ अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ.एएस प्रसाद के मुताबिक उनके पास बांग्लादेश, नेपाल व दुबई तक से मरीज प्रत्यारोपण कराने आते हैं। उन्हें यहां अपने देशों की तुलना में काफी कम धन खर्च करना पड़ता है, जबकि प्रत्यारोपण अंतर्राष्ट्रीय स्तर का होता है। यदि हम मरीजों का भरोसा जीत लें, तो इनकी संख्या और बढ़ सकती है। वरिष्ठ चिकित्सक डॉ.सौरभ शुक्ला के मुताबिक यहां सऊदी अरब, ओमान, अमेरिका व इंग्लैण्ड तक से मरीज इलाज के लिए आते हैं। इनकी संख्या बढ़ सकती है, बशर्ते अस्पतालों की देखरेख के लिए नियमों का सख्ती से पालन हो और भारतीय चिकित्सा परिषद जैसी संस्थाओं को ईमानदारी से स्वायत्तता दी जाए।
मजबूत करेंगे आधारभूत ढांचा
उत्तर प्रदेश में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी नहीं है। दुनिया भर में यहां के चिकित्सकों ने अपना डंका बजाया है। अब हमारा जोर विशेषज्ञता वाले अस्पतालों आधारभूत ढांचा मजबूत कर गुणवत्ता वाली चिकित्सा प्रक्रिया उपलब्ध कराने पर है। इसके बाद निश्चित रूप से लोग दुनिया भर से यहां इलाज कराने आएंगे। जिससे न सिर्फ उत्तर प्रदेश का नाम रोशन होगा, बल्कि रोजगार सृजन के साथ आर्थिक समृद्धि बढ़ेगी। -अरविन्द कुमार, प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य)
मेडिकल कालेजों में बढ़ाएंगे सुविधाएं
चिकित्सा पर्यटन के लिए सबसे जरूरी गुणवत्ता व संख्या का नियोजन है। प्रदेश के मेडिकल कालेजों व उच्चस्तरीय संस्थानों में विश्वस्तरीय शिक्षक व चिकित्सक हैं। अब हमारी कोशिश है कि किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी व संजय गांधी आयुविज्ञान संस्थान की तर्ज पर प्रदेश के हर मेडिकल कालेज में सुविधाएं बढ़ाकर कम से कम दो-दो अतिविशिष्टताओं वाले विभागों को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित किया जाए। -डॉ.वीएन त्रिपाठी, चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक

पैसे की कमी बनी छात्रवृत्ति भुगतान में बाधा

-शासन से धन नहीं मिला तो निरस्त हो गए लाखों आवेदन
-अनुसूचित जाति को बंधाई उम्मीद, अन्य भेज रहे प्रस्ताव
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
आर्थिक रूप से पिछड़े अभ्यर्थियों को छात्रवृत्ति देकर उनकी आगे की पढ़ाई न रुकने देने की दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजना की राह पैसे की कमी से रुक गयी है। शासन से धन न मिलने के कारण लाखों आवेदन निरस्त हो गए हैं। अब अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों को तो उम्मीद बंधाई जा रही है, वहीं अन्य के मामले में प्रस्ताव भेजे जा रहे हैं।
दसवीं उत्तीर्ण करने के बाद धन की कमी के कारण पढ़ाई न रुकने देने के लिए सभी वर्गों के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की योजना प्रदेश सरकार द्वारा संचालित की जाती है। इनमें 11वीं व 12वीं में अध्ययन के अलावा सामान्य स्नातक, बीटेक, एमबीबीएस आदि व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों को भी शामिल किया जाता है और उनकी शुल्क प्रतिपूर्ति की जाती है। इस वर्ष कुल 59 लाख छात्र-छात्राओं ने दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया था। इनमें से महज 26.9 लाख को छात्रवृत्ति मिली है और शेष 32.1 लाख आवेदन निरस्त कर दिये गए हैं।
अधिकारियों के मुताबिक आर्थिक संकट भी छात्रवृत्ति न मिलने का बड़ा कारण बन रही है। अब तक शासन स्तर पर जो धन जारी हुआ है, उससे 26.9 लाख छात्र-छात्राओं की छात्रवृत्ति को मंजूरी मिल चुकी है। अनुसूचित जाति के लिए सर्वाधिक 1261 करोड़ रुपये जारी हुए थे, जिससे 8.6 लाख छात्र लाभान्वित हुए हैं। इसके अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए मिले 1028 करोड़ रुपये से 12.7 लाख,  सामान्य वर्ग के लिए मिले 465 करोड़ रुपये से 3.7 लाख व अल्पसंख्यकों के लिए मिले 85 करोड़ रुपये से 1.9 लाख अभ्यर्थियों को छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति मिली है।
जिन अभ्यर्थियों के आवेदन निरस्त हुए हैं, वे समाज कल्याण, अल्पसंख्यक कल्याण व पिछड़ा वर्ग कल्याण विभागों के दफ्तरों पर पहुंच कर हंगामा कर रहे हैं। इसके बावजूद उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। फिलहाल अधिकारी भी हाथ खड़े कर रहे हैं। उनका कहना है कि अनुसूचित जाति वर्ग के बचे छात्र-छात्राओं की तो छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान हो जाएगा किन्तु अन्य के लिए फिलहाल कोई निर्देश नहीं हैं। अनुसूचित वर्ग के छात्र-छात्राओं के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समित से अनुमोदन कराकर 31 जुलाई तक प्रत्यावेदन भी मांगे गए हैं। हालांकि पिछड़ा वर्ग व अल्पसंख्यक कल्याण विभागों ने शासन से शेष बच्चे अभ्यर्थियों के लिए भी धन की मांग का प्रस्ताव भेजा है।
वर्ग - मिला धन - निरस्त आवेदन
अल्पसंख्यक - 85 करोड़ - 3.6 लाख
सामान्य - 465 करोड़ - 5.3 लाख
पिछड़ा - 1028 करोड़ - 13.8 लाख
अनुसू्चित - 1261 करोड़ - 9.4 लाख

सूबे की 59 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी

-तीन माह भीतर घोषित होगी राज्य की नयी जनसंख्या नीति
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
राज्य की 59 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है। स्वास्थ्य विभाग जनसंख्या नियोजन के साथ उनकी सेहत ठीक रखना सुनिश्चित करने की भी रणनीति बना रहा है। शुक्रवार को यहां राज्य परिवार नियोजन सेवा अभिनवीकरण परियोजना एजेन्सी (सिफ्सा)की पहल पर आयोजित मीडिया कार्यशाला में यह जानकारी दी गयी।
राज्य के प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविन्द कुमार ने बताया कि शनिवार को विश्व जनसंख्या दिवस पर पूरे प्रदेश में रैलियां निकाली जाएंगी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने 5, कालीदास मार्ग स्थित आवास से राज्य स्तरीय रैली को रवाना करेंगे। उन्होंने बताया कि राज्य की नयी जनसंख्या नीति अगले तीन माह के भीतर घोषित होगी। अब पूरा जोर प्रजनन दर को 3.1 से 2.1 करने पर है। इसके लिए 11 से 24 जुलाई तक जनसंख्या स्थिरता पखवाड़ा मनाया जाएगा। इस दौरान जनपद स्तर पर स्वास्थ्य मेले भी लगाए जाएंगे।
हर जोड़े व गांव तक कार्ययोजना
प्रमुख सचिव ने बताया कि गांव तक परिवार कल्याण कार्यक्रमों को लागू करने के लिए विशेष कार्ययोजना बनाई गयी है। इसके अंतर्गत स्वास्थ्य विभाग के कार्यकर्ता हर जोड़े से मिलकर उसे परिवार नियोजन का महत्व समझाएंगे। इस समय राज्य में 260 परिवार नियोजन सलाहकार काम कर रहे हैं। उन्हें विशेष सफलता मिलने पर इन्सेन्टिव देने पर भी विचार हो रहा है। उन्होंने बताया कि अवैध ढंग से चल रहे अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर नियंत्रण के लिए जनता सीधे शिकायत कर सकती है। क्लीनिकल इस्टेबलिशमेंट एक्ट बनाने की प्रक्रिया चल रही है, उसे लागू करने में अभी समय लगेगा।
अभी जोडऩे होंगे 1.24 करोड़ दंपति
प्रदेश की परिवार कल्याण निदेशक डॉ.मीनू सागर ने कहा कि वर्ष 2020 तक परिवार नियोजन का अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हमें 1.24 करोड़ दंपति और इस अभियान से जोडऩे होंगे। अभी तक हम 1.21 करोड़ लोग जोड़ चुके हैं। सिफ्सा के अपर अधिशासी निदेशक रिग्जियान सैम्फिल ने बताया कि 102 नंबर डायल की 2000 व 108 नंबर डायल की 1000 एम्बुलेंस सक्रिय हैं। राज्य के 25 जिलों में परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के विशेष प्रयास हो रहे हैं। प्रदेश की स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ.विजय लक्ष्मी ने कहा कि जच्चा-बच्चा की सेहत को लेकर ब्लाक स्तर तक समीक्षा की जा रही है। साथ ही टीकाकरण पर भी फोकस है।
'आबादी कम वृक्ष हजार, बेटी को दो जन्म का अधिकार
लखनऊ: सिफ्सा के अधिशासी निदेशक अमित घोष ने बताया कि इस वर्ष 'आबादी कम वृक्ष हजार, बेटी को दो जन्म का अधिकारÓ नारे के साथ मातृ-शिशु वर्ष मनाया जा रहा है। इसके अलावा परिवार कल्याण के लिए नये कार्यक्रम हौसला साझेदारी की शुरुआत भी की गयी है, जिसमें निजी क्षेत्र को भी जोड़ा जाएगा। उन्होंने बताया कि सुरक्षित मातृत्व से परिवार नियोजन का रास्ता खुलता है। इसके आंकलन के लिए जिलावार ऑडिट कराया जाएगा।

मलिन बस्तियों में खुलेंगे 548 अस्पताल

-शहरी क्षेत्रों में होगी 6600 आशा कार्यकर्ताओं की नियुक्ति
-24 करोड़ खर्च कर आशा-एएनएम को तीन माह प्रशिक्षण
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्पूर्ण इलाज की सुविधाएं पहुंचाने के लिए राज्य की मलिन बस्तियों में 548 अस्पताल खोले जाएंगे। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में 6600 आशा कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की जाएगी।
शासन स्तर पर यह बात गंभीरता से महसूस की जा रही है कि ग्र्रामीण क्षेत्रों के साथ शहरी क्षेत्रों की मलिन बस्तियां भी इलाज के मामले में उपेक्षित हैं। इसीलिए अब शहरी क्षेत्रों में मलिन बस्तियों में रहने वालों के इलाज व उनके फालोअप पर विशेष जोर देने की रणनीति बनाई गयी है। प्रदेश के प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अरविंद कुमार ने बताया कि ग्र्रामीण क्षेत्रों में ब्लाक स्तर तक अस्पताल खोलने के बाद अब शहरी क्षेत्र में 548 मलिन बस्तियों में स्वास्थ्य केंद्र खोले जाएंगे। इस मुद्दे पर फैसला हो गया है और अगले तीन-चार महीनों के भीतर अमल हो जाएगा। इससे इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को न सिर्फ इलाज में आसानी होगी, बल्कि वे सरकारी योजनाओं का लाभ भी अधिक उठा सकेंगे।
प्रमुख सचिव ने बताया कि ग्र्रामीण क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ताओं के महिलाओं से सीधे संवाद का लाभ स्वास्थ्य विभाग को मिल रहा है। अब शहरी क्षेत्रों में 6600 आशा कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की जाएगी। इसके अलावा महिला आरोग्य समितियों का गठन कर हर मरीज का इलाज सुनिश्चित कराया जाएगा। उन्होंने बताया कि इन आशा कार्यकर्ताओं की नियुक्ति के साथ ही सूबे में आशा व एएनएम के रूप में कार्यरत स्वास्थ्य कर्मियों को तीन महीने का विशेष प्रशिक्षण दिलाया जाएगा। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम पर 24 करोड़ रुपये खर्च होंगे। हाल ही में राज्य के 59 जनपदों में 4970 आशा कार्यकर्ताओं और 39 जनपदों के 1.66 लाख स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया, ताकि वे प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत कर सकें।

सीबीआइ छापों के बाद स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप

-स्वास्थ्य भवन की आग से भी जोड़े जा रहे तार
-निशाने पर आ सकते कई गैरसरकारी संगठन
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
राष्ट्रीय ग्र्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाले की तपिश एक बार फिर स्वास्थ्य महकमे में दिखाई दे रही है। बुधवार को सीबीआइ छापों के बाद विभाग में हड़कंप मचा है। वहीं बीते दिनों स्वास्थ्य भवन में लगी आग को भी इन छापों से जोड़ा जा रहा है।
एनआरएचएम घोटाले की जांच कर रही सीबीआइ ने बुधवार को लखनऊ, गोरखपुर और कानपुर में आठ ठिकानों पर छापेमारी थे। इस बार निशाने पर कुष्ठ निवारण व जननी सुरक्षा के नाम पर हुई हेराफेरी थी। इसके बाद गुरुवार को स्वास्थ्य भवन से लेकर परिवार कल्याण निदेशालय तक हड़कंप मचा रहा। सीबीआइ ने कई आपूर्तिकर्ताओं के साथ स्वास्थ्य विभाग के पांच पूर्व राज्य स्तरीय अधिकारियों के घर छापे मारकर उनसे पूछताछ की है। इन छापों के बाद की स्थितियों पर भी विश्लेषण शुरू हो गया है। बीते दिनों स्वास्थ्य भवन में लगी आग से भी इन छापों को जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि स्वास्थ्य भवन में लगी आग में एनआरएचएम घोटाले से जुड़ी कई महत्वपूर्ण फाइलें जल गयी हैं। उस आग के पीछे एक राजनीतिक दल के कुछ लोगों व कुछ आपूर्तिकर्ताओं की संबद्धता भी बताई जा रही है। यही कारण है कि सीबीआइ ने इस बार छापों में स्वास्थ्य विभाग के पूर्व अधिकारियों के साथ आपूर्तिकर्ताओं व प्रचार प्रसार सामग्र्री छापने वालों पर भी नजर गड़ाई है।
मामला कुष्ठ निवारण और जननी सुरक्षा योजना में धांधली से जुड़ा होने के कारण कुछ गैरसरकारी संगठनों के भी निशाने पर आ जाने की उम्मीद जताई जा रही है। जननी सुरक्षा व कुष्ठ निवारण अभियानों से तमाम गैरसरकारी संगठन जुड़े हैं। ऐसे में सीबीआइ उनके कामकाज व घोटाले में उनकी संलिप्
एनआरएचएम के मद से कुष्ठ निवारण में धांधली किए जाने और करीब एक करोड़ रुपये की हेराफेरी के मामले में तत्कालीन राच्य कुष्ठ निवारण अधिकारी पीके श्रीवास्तव समेत कई लोगों के खिलाफ सीबीआइ ने मुकदमा दर्ज किया था। इन अधिकारियों पर कुष्ठ निवारण विज्ञापन के प्रचार-प्रसार, इससे प्रभावित लोगों को जागरूक करने और इलाज के लिए प्रेरित करने के मद में बंदरबांट किए जाने का आरोप है। यह भी आरोप है कि बिना विज्ञापन किए ही निविदा मंजूर कर दोनों मदों के तीन करोड़ रुपये से ज्यादा की बंदरबांट की गयी।

छात्रवृत्ति के 32 लाख से ज्यादा आवेदन निरस्त


--दशमोत्तर छात्रवृत्ति--
-अनुसूचित जाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के 52 प्रतिशत अभ्यर्थी खाली हाथ
-अल्पसंख्यक वर्ग के 65 व सामान्य वर्ग 59 प्रतिशत को मिली निराशा
डॉ.संजीव, लखनऊ
आर्थिक रूप से पिछड़े अभ्यर्थियों को छात्रवृत्ति देकर उनकी आगे की पढ़ाई न रुकने देने की दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजना जोरदार फर्जीवाड़े का शिकार हो गयी है। इस वर्ष इस योजना के तहत आए 32 लाख से ज्यादा आवेदन निरस्त किये गए हैं।
दसवीं उत्तीर्ण करने के बाद धन की कमी के कारण पढ़ाई न रुकने देने के लिए सभी वर्गों के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की योजना प्रदेश सरकार द्वारा संचालित की जाती है। इनमें 11वीं व 12वीं में अध्ययन के अलावा सामान्य स्नातक, बीटेक, एमबीबीएस आदि व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों को भी शामिल किया जाता है और उनकी शुल्क प्रतिपूर्ति की जाती है। इसमें ऐसे सभी छात्र-छात्राएं आवेदन कर सकते हैं, जिनके अभिभावकों की आय दो लाख रुपये वार्षिक या उससे कम है। बीते पांच वर्षों से इस योजना में तमाम गड़बडिय़ों की शिकायतें मिल रही थीं। इस बार जबर्दस्त स्क्रीनिंग करने के साथ ऑन लाइन आवेदन की प्रक्रिया शुरू की गयी। स्क्रीनिगं व ऑनलाइन आवेदन से पहले ही आवेदन करने वालों की संख्या खासी कम हो गयी थी, ऊपर से अब आधे से ज्यादा आवेदन निरस्त हो गये हैं।
जानकारी के मुताबिक इस वर्ष कुल 59 लाख छात्र-छात्राओं ने दशमोत्तर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया था। इनमें से महज 26.9 लाख को छात्रवृत्ति मिली है और शेष 32.1 लाख आवेदन निरस्त कर दिये गए हैं। इस तरह कुल मिलाकर 54.4 प्रतिशत आवेदन निरस्त हुए हैं। जहां तक अलग-अलग वर्गों के आवेदनों की बात है तो अनूसचित जाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के 52-52 प्रतिशत, अल्पसंख्यकों के 65 प्रतिशत व सामान्य वर्ग के 59 प्रतिशत आवेदन निरस्त हुए हैं। अनूसचित जाति के 18 लाख आवेदनों में से 8.6 लाख, अन्य पिछड़ा वर्ग के 26.5 लाख में से 12.7 लाख, अल्पसंख्यकों के 5.5 लाख में से 1.9 लाख व सामान्य वर्ग के 9 लाख आवेदनों में से 3.7 लाख को छात्रवृत्ति मिली है। ऐसे में जिन छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति या शुल्क प्रतिपूर्ति नहीं मिली है, वे परेशान हैं।
सही हैं तो करें प्रत्यावेदन
लखनऊ: इतनी अधिक संख्या में आवेदन निरस्त होने के बाद संबंधित विभागों में हड़कंप की स्थिति है। इस संबंध में प्रमुख सचिव (समाज कल्याण) सुनील कुमार के साथ हुई बैठक में तय हुआ कि जो अभ्यर्थी अपने आवेदन को पूरी तरह सही मानते हैं वे तुरंत प्रत्यावेदन करें। उनके आवेदन पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति विचार कर 31 जुलाई तक हर हाल में राज्य मुख्यालय भेज देगी। उन सभी आवेदनों को छात्रवृत्ति देने के लिए नए सिरे से प्रक्रिया शुरू होगी।
स्क्रुटनी से हुई छंटनी
छात्रवृत्ति आवेदन में धांधली रोकने के सार्थक प्रयास हुए हैं। छब्बीस बिन्दुओं के आधार पर स्क्रुटनी की गयी है। उसी के परिणाम स्वरूप आवेदन निरस्त हुए हैं। प्रत्यावेदनों पर भी विचार होगा, ताकि कोई सही अभ्यर्थी निराश न हो। -जी राम, निदेशक, समाज कल्याण

कानपुर सहित आठ मेडिकल कालेजों की मान्यता पर संकट

-एमसीआई ने जीएसवीएम को दिया नोटिस
-सात निजी कालेजों में प्रवेश पर लगी पाबंदी
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक (जीएसवीएम) चिकित्सा महाविद्यालय, कानपुर सहित राज्य के आठ मेडिकल कालेजों की मान्यता पर संकट छा गया है। भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने जीएसवीएम को मान्यता समाप्ति का नोटिस दिया है। साथ ही सात निजी मेडिकल कालेजों में तो प्रवेश पर ही पाबंदी लगा दी गयी है।
जानकारी के मुताबिक साठ साल पुराने कानपुर मेडिकल कालेज की मान्यता एक बार फिर खतरे में है। चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे इस कालेज को भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने मान्यता समाप्ति की नोटिस दी है। बताया गया कि यह स्थिति शिक्षकों की अत्यधिक कमी के कारण आयी है। एमसीआई की टीम को हर विभाग में शिक्षक कम मिले, किन्तु मेडिसिन व नाक-कान-गला विभाग में तो एक भी प्रोफेसर नहीं है। इसके अलावा हर विभाग में शिक्षक कम हैं। यह कमी राज्य के अन्य मेडिकल कालेजों को मान्यता दिलाने के चक्कर में आयी है। हालात ये हैं कि 13 राज्य के सरकारी मेडिकल कालेजों में से कन्नौज, जालौन, बांदा, अम्बेडकर नगर के प्राचार्य कानपुर से ही स्थानांतरित कर भेजे गए हैं। इसके अलावा दर्जनों प्रोफेसरों व शिक्षकों की नियुक्ति भी कानपुर से स्थानांतरण कर की गयी है।
इसके अलावा आधारभूत ढांचे में कमजोरी पाए जाने पर एमसीआई ने राज्य के सात निजी मेडिकल कालेजों में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है। इनमें लखनऊ के कैरियर व इंटिग्र्रल मेडिकल कालेज, फिरोजाबाद का एफएच मेडिकल कालेज, फर्रूखाबाद का मेजर एसडी सिंह मेडिकल कालेज, बाराबंकी का मेयो मेडिकल कालेज, बरेली का राजश्री मेडिकल कालेज, गाजियाबाद का रामा मेडिकल कालेज शामिल हैं। यह स्थिति तब है, जबकि इस समय सभी कालेजों में प्रवेश प्रक्रिया चल रही है।
बढ़ भी गयीं 637 सीटें
एमसीआई ने इस वर्ष राज्य में तमाम मेडिकल कालेजों पर सख्त कार्रवाई करने के साथ ही 637 सीटें बढ़ाने को भी मंजूरी दी है। सहानपुर में एक नये सरकारी मेडिकल कालेज को मंजूरी दी गयी है, जिसमें एमबीबीएस की 100 सीटें हैं। इलाहाबाद मेडिकल कालेज में 100 की मान्यता के विपरीत 150, गोरखपुर में 50 की जगह 100, केजीएमयू लखनऊ में 185 की जगह 250, मेरठ में 100 की जगह 150, झांसी में 50 की जगह 100 और आगरा मेडिकल कालेज में 128 की मान्यता के विपरीत 150 सीटों को मंजूरी दी गयी है। इसी तरह मुजफ्फर नगर मेडिकल कालेज, बरेली के रुहेलखंड मेडिकल कालेज, शारदा विश्वविद्यालय नोएडा के मेडिकल कालेज, लखनऊ के इरा व मुरादाबाद के तीर्थंकर महावीर मेडिकल कालेजों को 100 सीटों की मान्यता के विपरीत सत्र 2015-16 के लिए 150 सीटों की मंजूरी दी गयी है। एमसीआई ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कालेज को दिया कारण बताओ नोटिस वापस भी ले लिया है।

एक छानबीन और घट गए छात्रवृत्ति के दावेदार

वर्ष 2013-14 की तुलना में 22 प्रतिशत घटी संख्या
सिर्फ अल्पसंयख्यक वर्ग के दावेदार ही लगातार बढ़े
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
ज्ञानेन्द्र प्रकाश ने वर्ष 2013-14 में इलाहाबाद के एक इंजीनियङ्क्षरग कालेज में बीटेक प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था। उसके अगले वर्ष 2014-15 में वह वहीं के एक महाविद्यालय में बीए द्वितीय वर्ष का छात्र था। समाज कल्याण विभाग की दशमोत्तर छात्रवृत्ति के लिए आए आवेदनों की छानबीन के दौरान यह खुलासा हुआ। हां, इस सघन छानबीन का परिणाम यह जरूर हुआ कि छात्रवृत्ति मांगने वालों की संख्या अचानक घट गयी है।
यह स्थिति महज इलाहाबाद के उक्त इंजीनियङ्क्षरग कालेज या उक्त छात्र की नहीं है। प्रदेश में भारी संख्या में छात्र-छात्राएं अवैध ढंग से प्रवेश लेकर शैक्षिक संस्थानों की मदद से छात्रवृत्ति डकारने के धंधे मेें लगे हैं। समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों के मुताबिक छात्रवृत्ति के लिए आवेदन करने वालों की लगातार स्क्रुटनी (छानबीन) का ही परिणाम है कि वर्ष 2013-14 की तुलना में वर्ष 2014-15 में अचानक छात्रवृत्ति आवेदकों की संख्या घट गयी। वर्ष 2013-14 में जहां कुल 34.38 लाख छात्र-छात्राओं ने छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया था, वर्ष 20140-15 में इसके लिए आवेदन करने वालों की संख्या 22 प्रतिशत घटकर 26.83 लाख रह गयी। यह संख्या बीते पांच वर्षों में सबसे कम है। इससे पहले वर्ष 2011-12 में सर्वाधिक 28.54 लाख छात्र-छात्राओं ने आवेदन किया था। वर्ष 2010-11 में 27.04 लाख तथा वर्ष 2012-13 में 27.06 लाख छात्र-छात्राओं ने छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया था।
बीते पांच वर्षों के आंकड़ों को देखें तो सिर्फ अल्पसंख्यक वर्ग के अभ्यर्थियों की संख्या लगातार बढ़ी है। वर्ष 2010-11 में 1.13 लाख, 2011-12 में 1.20 लाख, 2012-13 में 1.31 लाख, 2013-14 में 1.73 लाख और फिर वर्ष 2014-15 में 1.78 लाख अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं ने छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया था। अन्य समूहों में आवेदन करने वालों की संख्या छानबीन के बाद तेजी से घटी है। वर्ष 2013-14 में सामान्य वर्ग से जहां 6.63 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था, वहीं 2014-15 में यह संख्या घटकर 3.71 लाख हो गयी। दशमोत्तर छात्रवृत्ति के लिए आवेदन करने वाले सर्वाधिक छात्र-छात्राएं अन्य पिछड़ा वर्ग के रहते हैं। वर्ष 2013-14 में अन्य पिछड़ा वर्ग के सर्वाधिक 15.06 लाख छात्र-छात्राओं ने आवेदन किया था, किन्तु वर्ष 2014-15 में उनकी संख्या भी घटकर 12.73 लाख रह गयी। अनुसूचित जाति वर्ग का भी कमोवेश यही हाल है। इस वर्ग के 10.95 लाख छात्र-छात्राओं ने वर्ष 2013-14 में आवेदन किया था, जबकि वर्ष 2014-15 में आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों की संख्या 8.61 लाख रह गयी।
(इनसेट)
पकड़े गए कुछ मामले
-एक कालेज से वर्ष 2011-12 में 202 छात्र-छात्राओं ने बीटेक प्रथम वर्ष के छात्र-छात्राओं के रूप में आवेदन किया, दो वर्ष बाद वर्ष 2014-15 में इनमें से महज 21 ने आवेदन किया।
-एक संस्था के 290 अभ्यर्थियों ने वर्ष 2012-13 में बीटेक प्रथम व द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी के रूप में आवेदन किया, किन्तु इनमें से सिर्फ 98 वर्ष 2013-14 व 21 वर्ष 2014-15 में दर्शाए गए।
-एक कालेज के 650 विद्यार्थियों में से 219 ने अन्य संस्थाओं में वर्ष 2013-14 में स्वयं को अध्ययनरत दिखाया और 25 ने 2014-15 में अन्य संस्थाओं से आवेदन भी किए।
-एक छात्र उत्तम सिंह वर्ष 2013-14 में एक इंजीनियङ्क्षरग कालेज में बीटेक प्रथम वर्ष के साथ एक महाविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष का छात्र पाया गया, वही छात्र वर्ष 2014-15 में एक अन्य कालेज में बीए द्वितीय वर्ष का छात्र पाया गया।
-एक छात्र देव नारायण वर्ष 2013-14 में एक इंजीनियङ्क्षरग कालेज में बीटेक द्वितीय वर्ष का छात्र था तो उसी वर्ष वह एक दूसरे जिले में बीए प्रथम वर्ष के छात्र के रूप में पंजीकृत था।

अब सता रही मेडिकल छात्रों की जिंदगी की फिक्र

-व्यापमं घोटाले में हो रही मौतों से हैरान मेडिकल कालेज
-ढूंढ़े जा रहे आरोपी, मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग की तैयारी
राज्य ब्यूरो, लखनऊ
मध्य प्रदेश के व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) घोटाले लगातार में हो रही मौतों से राज्य के मेडिकल कालेज खासे हैरान हैं। अब उन्हें इस घोटाले में फंसे अपने छात्रों की जिंदगी की फिक्र सता रही है। अब उन्हें ढूंढऩे के साथ उनकी मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग की भी तैयारी है।
व्यापमं फर्जीवाड़े में प्रदेश के मेडिकल कालेजों के सौ से अधिक छात्र फंसे हुए है। सिर्फ किंग जार्जेज चिकित्सा विश्वविद्यालय लखनऊ के ही 19 छात्र इस मामले में फंसे हैं। इसी तरह कानपुर मेडिकल कालेज के दस, मेरठ मेडिकल कालेज के 12 छात्रों सहित आगरा, झांसी व इलाहाबाद मेडिकल कालेजों के छात्र भी एसआईटी के निशाने पर हैं। इधर अचानक व्यापमं घोटाले से जुड़े लोगों की मौत होने से सभी मेडिकल कालेजों में डर का वातावरण व्याप्त हो गया है। मेडिकल कालेजों के अधिकारी आरोपी छात्रों की जिंदगी को लेकर बेहद फिक्रमंद हैं। ऐसे तमाम छात्रों के अभिभावक कालेजों के प्राचार्यों से भी संपर्क कर उनके अवसाद में होने की जानकारी दे रहे हैं।
इन स्थितियों से निपटने के लिए मेडिकल कालेजों ने उन छात्रों से संपर्क करना शुरू कर दिया है, जिनसे एसआईटी ने पूछताछ की है। व्यापमं घोटाले की जांच के दौरान तमाम छात्र ऐसे हैं, जिनसे पूछताछ की गयी है, किन्तु उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है। इन सभी छात्रों से मेडिकल कालेज प्रशासन अलग-अलग बात कर रहे हैं। इसके अलावा जो छात्र जमानत पर छूट कर आए हैं, उनसे भी बात हो रही है। कानपुर मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ.नवनीत कुमार का कहना है कि छात्र अत्यधिक परेशान हैं। ऐसे में मेडिकल कालेजों का प्रशासन कतई नहीं चाहता कि उनके मस्तिष्क पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़े। इसीलिए इन सभी छात्रों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण कर उनके काउंसिलिंग की रणनीति बनाई गयी है। किंग जार्जेज मेडिकल यूनिवर्सिटी के मानसिक स्वास्थ्य विभागाध्यक्ष डॉ.एससी तिवारी का कहना है कि छात्र बेहद डरे हुए हैं। जिस तरह से हर रोज मौतें हो रही हैं, उससे वे सकते में हैं। हाल ही में एक छात्र जेल में बंद छात्रों से मिलकर आया था। उसने बताया कि सभी छात्र किसी अनहोनी की आशंका से डरे हुए हैं। तमाम अभिभावक भी संपर्क में हैं। एसआईटी ने जिन छात्रों से पूछताछ कर प्रथमदृष्ट्या क्लीनचिट दे दी है, वे भी खासे परेशान हैं। जमानत पर छूट कर आए छात्र तो बेहद दहशत में हैं। ऐसे सभी छात्रों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण कर उनकी काउंसिलिंग की जाएगी।

मौत का एक फैसला बचाएगा कई जिंदगियां


-प्रदेश सरकार बना रही 'ब्रेन डेड घोषित करने की नीति
-संभव होगा अंगदान, कई लोगों को मिलेगा जीवनदान
डॉ.संजीव, लखनऊ
एक जिंदगी जाते-जाते कई जिंदगियों को संजीवनी दे सकती है, बशर्ते समय पर उसका नियोजन हो सके। प्रदेश सरकार इस दिशा में सकारात्मक काम कर मौत के एक फैसले से कई जिंदगिया बचाने का रास्ता निकाल रही है। जल्द ही सूबे में मृत्यु से हार चुके लोगों को 'ब्रेन डेड घोषित करने की नीति सामने आएगी, जिससे अंगदान कर कई लोगों को जीवनदान दिया जा सके।
अभी राज्य में 'ब्रेन डेडÓ घोषित करने की कोई नीति न होने के कारण दुर्घटनाओं में गंभीर हालत में पहुंचने वालों से लेकर तमाम अन्य मरीज भी मौत से लड़ाई लड़ते रहते हैं, जिनकी मृत्यु न सिर्फ तय हो चुकी होती है, बल्कि मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है। चिकित्सकों का मानना है कि 'ब्रेन डेड होने की स्थिति में भी यदि मरीज को मृत घोषित कर दिया जाए तो उसके गुर्दे, दिल, यकृत, त्वचा, नेत्र और हड्डियों के कुछ हिस्सों को लेकर उनका प्रत्यारोपण किया जा सकता है। ऐसे में इन समस्याओं से जूझ रहे लोगों को न सिर्फ राहत मिल सकती है, बल्कि एक शरीर तमाम नई जिंदगियां दे सकने में सफल हो सकता है।
चिकित्सकों के मुताबिक कई बार मरीजों के परिजन तैयार होते हैं, फिर भी कानूनी डर से डॉक्टर इस दिशा में पहल नहीं करते। इसके अलावा तमाम अज्ञात गंभीर अवस्था में आते हैं, जिनकी 'ब्रेन डेथ हो जाने के बाद भी उनके शरीर के अंगों का प्रयोग नहीं हो पाता है। उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के अन्य राज्य भी इस समस्या से लंबे समय से जूझ रहे हैं। इस पर तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश व महाराष्ट्र ने 'ब्रेन डेड घोषित करने की अपनी नीति बना ली है। यहां भी लगातार मांग उठने पर प्रदेश शासन ने इस बाबत नीति बनाने का जिम्मा प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय को सौंपा। महानिदेशालय ने इस बाबत प्रस्ताव शासन को सौंप दिया है और जल्द ही इस पर फैसला हो जाएगा।
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विशेषज्ञों की समिति ने बनाई नीति
प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त सुविधाएं जुटाने के साथ गंभीर हालत में पहुंचे मरीजों के अंग-अंग का सदुपयोग किये जाने की दृष्टि से इस नीति को अंतिम रूप दिया गया है। इसमें संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान व किंग जार्जेज चिकित्सा विश्वविद्यालय के प्रत्यारोपण शल्य चिकित्सकों के साथ मिलकर बनी समिति ने विस्तृत नीति बनाई है।
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जिनका कोई नहीं, उन्हें लाभ
इस नीति के अमल में आने के बाद ऐसे मरीजों को अंग प्रत्यारोपण में ज्यादा लाभ मिलेगा, जिन्हें अंगदान करने वाला कोई नहीं होता। कई बार अंगदान के अभाव में उनकी मौत भी हो जाती है। नीति बन जाने से ऐसे लोगों को लाभ मिलेगा और तमाम जिंदगियां बचाई जा सकेंगी। -डॉ.जीके अनेजा, अपर चिकित्सा शिक्षा निदेशक