Thursday, 10 November 2016

बेटियां मरें तो मरें, नहीं ले जाएंगे अस्पताल


- गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचे नवजात बच्चों में बेटियां आधी
- इटावा व ललितपुर में तो भर्ती बच्चियां तीस फीसद से भी कम
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डॉ.संजीव, लखनऊ:
बेटी बचाने को लेकर हो रही बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद अभिभावक बेटियों की जिंदगी बचाने को लेकर गंभीर नहीं हैं। हालत ये है कि गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचने वाली बेटियों की संख्या बेटों की तुलना में लगभग आधी है।
देश में इस समय बेटी बचाओ नारे के साथ बड़ा अभियान चल रहा है। इसके बावजूद बेटियों के साथ अन्याय थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में इस बाबत जारी स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े इस तथ्य की पुष्टि कर रहे हैं। प्रदेश में गंभीर अवस्था में पैदा होने वाले नवजात शिशुओं में यदि बेटी बीमार होती है तो घर वाले उसे अस्पताल ले जाने में भी कोताही करते हैं। प्रदेश के सभी जिलों में स्थापित नवजात शिशु रक्षा इकाई में भर्ती होने वाले कुल बच्चों में से बेटों की संख्या हर माह औसतन 63 फीसद रहती है, वहीं बेटियों की संख्या 37 फीसद पर सिमटी है। कुछ जिलों में तो यह स्थिति बहुत खराब है। इटावा में भर्ती होने वाले गंभीर नवजात शिशुओं में महज 25 फीसद बेटियां होती हैं और ललितपुर में यह आंकड़ा 29 फीसद है। अधिकारी भी इस स्थिति को स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि इनमें 37 फीसद बेटियां इसलिए अस्पताल में इलाज पा जाती हैं, क्योंकि अस्पताल पहुंचने वाले कुल बच्चों में से वहीं पैदा हुए बच्चों की संख्या 53 फीसद होती है। प्रदेश स्तर पर नवजात शिशु इकाइयों में कुल भर्ती हुए बच्चों में से बाहर पैदा हुए बच्चों की संख्या भले ही 47 फीसद हो, किन्तु कई जिलों की स्थिति बहुत खराब है। मीरजापुर में सिर्फ 6 फीसद बच्चे ही अस्पताल पहुंचते हैं, वहीं मुरादाबाद में सात फीसद व बुलंदशहर में 15 फीसद बच्चे अस्पताल तक पहुंच पाते हैं।
उपकरण खराब, फोन बंद
वैसे प्रदेश के नवजात शिशुओं के इलाज में लापरवाही भी जबर्दस्त हो रही है। अधिकांश इकाइयों में बच्चों के इलाज के लिए जरूरी उपकरण ही काम नहीं करते हैं। आगरा मेडिकल कालेज की नवजात शिशु इकाई में 58 फीसद व मेरठ मेडिकल कालेज में 39 फीसद बार बच्चों के लिए जरूरी रेडियेंट वार्मर काम करता नहीं मिला। शाहजहांपुर जिला महिला अस्पताल में बच्चों का पल्स ऑक्सीमीटर लंबे समय से खराब पड़ा है तो राजधानी लखनऊ के वीरांगना अवंतीबाई अस्पताल, प्रतापगढ़ व अलीगढ़ के जिला महिला अस्पतालों का पल्स ऑक्सीमीटर 60 फीसद बार जरूरत के समय काम ही नहीं कर सका। राजधानी के वीरांगना अवंती बाई अस्पताल और प्रतापगढ़, शाहजहांपुर, मेरठ व अलीगढ़ के जिला महिला अस्पतालों में शिशु उपचार इकाई का एयरकंडीशनर भी अक्सर खराब रहता है। मेरठ, प्रतापगढ़, फैजाबाद, शाहजहांपुर, ललितपुर, बांदा, इटावा व बुलंदशहर के जिला महिला अस्पतालों और गोरखपुर व आगरा मेडिकल कालेजों की नवजात शिशु उपचार इकाइयों में टेलीफोन भी बंद पड़े हैं।

सरकारी दफ्तरों में चलता रहा नोट मैनेजमेंट

-कहीं अपनों को सूचना देने की खीज, तो कहीं पैसे जाने का दर्द
-आइएएस अफसरों को याद आया महाभ्रष्ट चुनने का अभियान
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : फलां अफसर के पास तो बड़े नोटों की कई गड्डियां होंगी, अब वह क्या करेंगे? अरे नहीं, उनसे ज्यादा गड्डियां तो अमुक अफसर के पास होंगी, जरा सोचो उनका क्या हाल होगा। सचिवालय के एक कमरे में बुधवार को दो वरिष्ठ आइएएस अफसरों का नाम लेकर यह चर्चा हो रही थी। बुधवार सुबह से सचिवालय ही नहीं, सभी सरकारी दफ्तरों में कमोवेश इसी तरह के नोट मैनेजमेंट पर फोकस रहा।
मंगलवार रात अचानक पांच सौ व एक हजार के नोटों का चलन बंद करने की घोषणा के बाद बुधवार सुबह सरकारी दफ्तर खुले तो चर्चाएं भी इसी फैसले पर सिमटी थीं। एक बार फिर आइएएस अफसरों को कुछ वर्ष पहले चला महाभ्रष्ट चुनने का अभियान याद आ गया। एक वरिष्ठ अफसर का कहना था कि उस समय कई ईमानदार अफसर भी महाभ्रष्ट चुनने की मुहिम का विरोध इसलिए नहीं कर रहे थे, क्योंकि इससे उन पर भ्रष्ट होने का ठप्पा लग सकता था। इसी तरह कई भ्रष्ट माने जाने वाले अफसर भी मुहिम के समर्थन में खड़े होकर स्वयं को ईमानदार साबित कर रहे थे। ठीक उसी तरह इस समय यदि कोई नोट बंद किये जाने का विरोध करे, तो उसे बेईमान मान लिया जाएगा। एक अफसर ने तो देश के दो बड़े उद्यमियों का नाम लेकर कहा, उन्हें सब कुछ पता होगा। उनके सहित सरकार के निकटस्थ लोग अपना पूरा नोट मैनेजमेंट कर चुके होंगे, तब जाकर पाबंदी लगी होगी। एक अफसर ने कहा, अपनों को बताने के बाद हमारे पास जो थोड़ा-बहुत है, उस पर नजर गड़ाई गयी है। मातहत कर्मचारी भी तरह-तरह की बातें कर रहे थे। एक कर्मचारी ने दूसरे के बॉस के  बारे में कहा, तुम्हारे साहब कैसे करेंगे नोट मैनेजमेंट, तो दूसरा बोला, अपने साहब की चिंता करो, जो पूरी पूरी गड्डियां मैनेज होती हैं।
जब बख्शीश से किया इन्कार
सचिवालय व एनेक्सी आदि में लिफ्ट से लेकर अफसरों के कमरों के बाहर तक बख्शीश का दौर चलता है। महंगाई के दौर में बख्शीश भी पांच सौ व हजार के नोट तक पहुंच चुकी थी, किंतु बुधवार को एक कर्मचारी ने पांच सौ का नोट लेने से यह कहकर इन्कार कर दिया कि साहब यह नोट तो चलेगा ही नहीं, हम इसका क्या करेंगे। कुछ कर्मचारियों ने काम के लिए जो एडवांस ले रखा था, उस धनराशि के प्रबंधन की चर्चाएं भी होती रहीं। 

मच्छर काटने से होने वाली हर बीमारी, अब महामारी


-कैबिनेट बाय सर्कुलेशन हुआ फैसला, निजी क्षेत्र पर भी सख्ती
-डेंगू, चिकुनगुनिया, फाइलेरिया व मलेरिया जैसी बीमारियां शामिल
-संक्रमित क्षेत्र हो सकेंगे अधिसूचित, सूचना देना होगा जरूरी
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: डेंगू के प्रसार पर लगातार उच्च न्यायालय की डांट खा रही प्रदेश सरकार ने मच्छर काटने से होने वाली हर बीमारी को महामारी के रूप में अधिसूचित किया है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अध्यक्षता में फिलहाल कैबिनेट की बैठक प्रस्तावित न होने के चलते कैबिनेट बाय सर्कुलेशन हुए इस फैसले में डेंगू, चिकुनगुनिया, फाइलेरिया व मलेरिया जैसी बीमारियों को महामारी घोषित करने और निजी क्षेत्र पर भी सख्ती करने की बात कही गयी है। डेंगू की भयावहता पर गंभीर उच्च न्यायालय ने पिछले माह मुख्य सचिव तक को तलब कर लिया गया था। मुख्य सचिव राहुल भटनागर ने न्यायालय के समक्ष सरकार की गलती मानने के साथ डेंगू से निपटने के लिए पूरा एक्शन प्लान पेश किया था। इस एक्शन प्लान में डेंगू सहित संक्रामक बीमारियों को महामारी की श्रेणी में लाने की बात शामिल थी। सरकार को 16 नवंबर को इस मामले में पूरी कार्रवाई की जानकारी उच्च न्यायालय को देनी है। इससे पहले ही मंगलवार को सरकार ने कैबिनेट बाय सर्कुलेशन इन बीमारियों को महामारी घोषित करने के लिए एपेडमिक डिजीज एक्ट 1897 के अंतर्गत रेग्युलेशन 2016 को मंजूरी दे दी। इसके बाद बुधवार को डेंगू, चिकुनगुनिया, मलेरिया, फाइलेरिया व अन्य मच्छरजनित बीमारियों को एपिडिमिक डिजीज एक्ट, 1897 की परिधि में लाने की अधिसूचना जारी कर दी गयी।
केंद्र सरकार इसी वर्ष जून में इन बीमारियों महामारी की श्रेणी में घोषित कर चुकी है। केंद्र की अधिसूचना को उत्तर प्रदेश को अंगीकार करना था, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। अधिसूचना जारी होने के बाद सरकार इनमें से किसी भी बीमारी के मरीज बढऩे पर संबंधित क्षेत्र को संक्रमित क्षेत्र घोषित कर सकेगी। इसके बाद उस बीमारी की तुरंत सूचना देना जरूरी हो जाएगा। ऐसा न करने वाले निजी अस्पतालों व अन्य निजी संस्थानों पर भी कार्रवाई हो सकेगी। बीमारियां फैलाने के कारक बनने वालों, जैसे जलभराव करने वालों, गंदगी फैलाने वालों आदि तत्वों को चिह्नित कर उनके खिलाफ दंडनीय कार्रवाई भी संभव होगी। इसके लिए हर जिले में एक नियंत्रण अधिकारी की तैनाती भी की जाएगी।

दस मेडिकल कालेजों में कौशल विकास केंद्र

-केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मुख्य सचिव से मांगे प्रस्ताव
-आपातकालीन चिकित्सा सहायता पर रहेगा पूरा फोकस
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: प्रदेश के दस सरकारी मेडिकल कालेजों में कौशल विकास केंद्र खोले जाएंगे। केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसके लिए प्रदेश के मुख्य सचिव से प्रस्ताव मांगे हैं। इन केंद्रों में पूरा फोकस आपातकालीन चिकित्सा सहायता से जुड़े कौशल विकास पर रहेगा।
केंद्र सरकार ने देश भर के सरकारी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में कौशल विकास केंद्र खोलने का फैसला लिया है। उत्तर प्रदेश के हिस्से में ऐसे दस कौशल विकास केंद्र आए हैं। इन केंद्रों में प्रदेश के चिकित्सकों, नर्सों व पैरामेडिकल कर्मियों को आपातकालीन चिकित्सा सहायता से जुड़े प्रशिक्षण दिये जाएंगे। इस पूरी परियोजना पर होने वाला खर्च केंद्र सरकार उठाएगी। दरअसल समय पर इलाज न पहुंच पाने जैसी आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं की राह में आ रही बाधाओं और कई बार चिकित्सकों को भी आपातकालीन चिकित्सा के मूल तत्वों की जानकारी न होने जैसी समस्याओं का समाधान करने के लिए केंद्र सरकार ने यह योजना प्रस्तावित की है। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने इस बाबत मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कौशल विकास केंद्र के लिए दस कालेज चिह्नित कर तत्काल सूची भेजने को कहा है। इन केंद्रों की स्थापना में विलंब न हो, इसके लिए स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ क्षेत्रीय निदेशक को इसके लिए नोडल अफसर के रूप में जिम्मेदारी सौंपी गयी है। उन्होंने प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) को पत्र लिखकर तुरंत नाम भेजने को कहा है।
सुधरेगी ट्रामा की हालत
प्रदेश सरकार दस पुराने मेडिकल कालेजों में ही ये स्किल डेवलपमेंट सेंटर बनाने की पहल कर रही है। दरअसल ये सेंटर वहीं खुलने हैं, जहां एमबीबीएस स्तर की पढ़ाई हो रही हो। ऐसे में प्रदेश के 11 मेडिकल कालेज इसके दायरे में आते हैं। अधिकारियों का मानना है कि इससे ट्रामा की हालत सुधरेगी। नर्स व पैरामेडिकल स्टाफ को प्रशिक्षण देने से उपचार की राह भी आसान होगी।
14 महीने से नाम मांग रहा केंद्र
केंद्र की चिट्ठियों पर राज्य के स्तर पर ढिलाई का नमूना भी इन कौशल विकास केंद्रों की पहल से सामने आया है। पिछले वर्ष 10 सितंबर को केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डॉ.जगदीश प्रसाद ने प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) को पत्र लिखकर कालेजों के नाम मांगे थे। यहां कालेजों का जिम्मा चिकित्सा शिक्षा विभाग के पास होने के कारण वे नाम गए ही नहीं। इसके बाद इस वर्ष 24 जून के केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव बीपी शर्मा ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर नाम मांगने के साथ प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) द्वारा नाम न भेजने की बात बताई। चार माह से अधिक बीत जाने पर भी मेडिकल कालेज न चिह्नित किये जाने पर वरिष्ठ क्षेत्रीय निदेशक ने सीधे प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) को चिट्ठी लिखी। अब शासन स्तर पर कालेजों के नाम चिह्नित करने की प्रक्रिया शुरू हुई है।

54 साल बाद पॉलीटेक्निक के पर्चों का प्रारूप बदला


-पूरे पाठ्यक्रम को हिस्सा बनाने पर फोकस
-सभी संस्थाओं को भेजे जाएंगे मॉडल पेपर
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: प्रदेश की पॉलीटेक्निक संस्थाओं में पर्चों का प्रारूप 54 साल बाद बदला जा रहा है। इस बार पूरे पाठ्यक्रम को हिस्सा बनाने पर पूरा जोर दिया गया है। अब सभी निजी व सरकारी संस्थाओं को मॉडल पेपर भेजे जाएंगे, ताकि विद्यार्थी तदनुरूप तैयारी कर सकें।
उत्तर प्रदेश में प्राविधिक शिक्षा विभाग पॉलीटेक्निक संस्थाओं में एक, दो व तीन वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रमों का संचालन करता है।  इन पाठ्यक्रमों के लिए 1962 में पर्चों का प्रारूप बनाया गया था। तब से उसी पैटर्न पर परीक्षा हो रही थी। प्रमुख सचिव (प्राविधिक शिक्षा) मोनिका एस गर्ग के मुताबिक इस बार सेमेस्टर प्रणाली लागू करने के साथ पर्चों का प्रारूप बदलने की जरूरत भी सामने आयी थी। आंकलन में पता चला था कि बीते वर्षों में कई पाठ्यक्रमों में परिवर्तन व सुधार किया गया, उन्हें बदले परिवेश के हिसाब से उच्चीकृत किया गया, किन्तु पर्चों का प्रारूप न बदलने से उनमें पूरा पाठ्यक्रम समाहित ही नहीं होता था।
अब मौजूदा शैक्षिक सत्र से ही पर्चों का प्रारूप बदलने के साथ पूरा फोकस इस बात पर होगा कि विद्यार्थियों का परीक्षण उनके पूरे पाठ्यक्रम को आधार बनाकर किया जा सके। साथ ही तात्कालिक जरूरतों के अनुसार उनका मूल्यांकन करने पर भी जोर दिया गया है। बदले प्रारूप के हिसाब से मॉडल पेपर सभी राजकीय व निजी पॉलीटेक्निक संस्थाओं को भेजे जा रहे हैं। इनके साथ मॉडल उत्तर भी भेजे जाएंगे, ताकि शिक्षक उसी हिसाब से तैयारी करा सकें और विद्यार्थी तैयारी कर सकें। मॉडल पेपर प्राविधिक शिक्षा परिषद की वेबसाइट पर भी अपलोड कर दिये गए हैं। प्रदेश के 126 सरकारी, 18 अनुदानित व 362 निजी पॉलीटेक्निक संस्थाओं में दो लाख पांच हजार विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इनमें से पहले सेमेस्टर के एक लाख पांच हजार विद्यार्थियों को नए प्रारूप से परीक्षा देनी होगी।
50 नंबर का पर्चा
अगले माह, दिसंबर में होने वाली सेमेस्टर परीक्षा नए प्रारूप से ही होगी। पर्चा 50 नंबर का होगा। इसमें एप्लाइड मैथ, एप्लाइड केमिस्ट्री, एप्लाइड फिजिक्स, प्रोफेशनल कम्युनिकेशन व फाउंडेशन कम्युनिकेशन विषयों के प्रश्नपत्रों को तीन हिस्सों में बांटा गया है। पहले हिस्से में बारह अतिलघु उत्तरीय प्रश्न होंगे, जिसमें से दस हल करने होंगे। हर प्रश्न एक नंबर का होगा। दूसरे हिस्से में लघु उत्तरीय प्रश्न होंगे। इसमें सात में से पांच सवाल हल करने होंगे और हर सवाल दो नंबर का होगा। तीसरा हिस्सा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का होगा। इसमें तीन-तीन सवालों के तीन समूह होंगे और हर समूह से दो-दो सवाल हल करने होंगे। हर सवाल पांच नंबर का होगा। 

संस्थानों की ढिलाई से लटकी दस लाख की छात्रवृत्ति

-छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति योजना में सख्ती का परिणाम
-64 लाख विद्यार्थियों के आवेदनों की जांच का काम शुरू
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति योजना में सख्ती क्या हुई, शिक्षण संस्थानों ने इस ओर ढिलाई शुरू कर दी है। इस वर्ष विद्यार्थियों द्वारा पूरी तरह भरे जाने के बाद भी शिक्षण संस्थानों द्वारा शासन को आवेदन न अग्र्रसारित किये जाने से दस लाख विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति लटक गयी है। अब शासन स्तर पर 64 लाख आवेदनों की जांच शुरू की गयी है, ताकि समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जा सके।
प्रदेश में आठवीं के बाद स्कूल छोड़ जाने की समस्या से निपटने के लिए पूर्वदशम् छात्रवृत्ति का प्रावधान है। नौवीं व दसवीं में पूर्वदशम् छात्रवृत्ति के बाद 11वीं, 12वीं में दशमोत्तर छात्रवृत्ति और 12वीं के बाद प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों के लिए शुल्क प्रतिपूर्ति का प्रावधान है। पिछले तीन वर्षों में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति में गड़बडिय़ों के तमाम मामले सामने आने के बाद सख्ती के साथ कई प्रक्रियागत बदलाव भी किये गए। संस्थानों की जिम्मेदारी निर्धारित की गयी, ताकि वे आवेदन अग्र्रसारित करने से पहले पर्याप्त जांच पड़ताल कर लें। ऐसा न करने वाले तमाम संस्थानों को काली सूची में भी डाला गया और मुकदमे तक कायम हुए।
सख्ती का परिणाम यह हुआ कि विद्यार्थियों के आवेदन के बाद भी इन संस्थानों ने फार्म अग्र्रसारित कर शासन स्तर तक भेजे ही नहीं। इस कारण दो बार आवेदन की अंतिम तिथि भी बढ़ाई गयी किन्तु स्थितियों में बहुत परिवर्तन नहीं आया। इस बार नौवीं-दसवीं के 30,403 स्कूलों में 27.2 लाख विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया, जिसमें से 16.6 लाख ने फार्म भरे और 14.6 लाख ने अंतिम आवेदन किया। स्कूलों ने इनमें से 12.6 लाख आवेदन ही अग्र्रसारित किये। इसी तरह 11वीं-12वीं के 16,510 विद्यालयों में 24.8 लाख विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया, जिसमें से 18 लाख ने फार्म भरे और 15.9 लाख ने अंतिम आवेदन किया। विद्यालयों ने इनमें से 13.8 लाख आवेदन ही अग्र्रसारित किये। दशमोत्तर शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए 11,263 संस्थानों में 64.4 लाख विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया। पंजीकरण के बाद 47.8 लाख ने फार्म भरे और सभी जरूरी संलग्नकों के साथ 43.6 लाख ने अंतिम रूप से आवेदन किया। इनमें भी संस्थानों ने सिर्फ 38 लाख विद्यार्थियों के आवेदन ही शासन को अग्र्रसारित किये। इस तरह प्रदेश में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए कुल 58,176 संस्थानों के 1.16 करोड़ विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया। पंजीकरण के बाद इनमें से 34 लाख विद्यार्थी फार्म भरने के पहले ही गायब हो गए और सिर्फ 82.4 लाख विद्यार्थियों ने ही फार्म भरे। इनमें से 74 लाख ने अंतिम रूप से आवेदन किया, किन्तु संस्थानों ने दस लाख आवेदन शासन को भेजे ही नहीं। अब शासन स्तर पर 64 लाख आवेदनों की जांच शुरू की गयी है, ताकि उन्हें समय पर छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान किया जा सके। इस संबंध में समाज कल्याण विभाग के उपनिदेशक पीके त्रिपाठी ने बताया कि सोमवार से ऐसे मामलों की जांच शुरू कराई जाएगी। दोषी पाए जाने वाले संस्थानों पर कठोर कार्रवाई होगी।

Thursday, 3 November 2016

...तो नए साल में मिल पाएगा सातवां वेतनमान


-दीवाली के आसपास कर्मचारियों को लाभ देने की रणनीति सफल नहीं
-अभी प्रारंभिक रिपोर्ट ही तैयार नहीं, ऐसे में विलंब होना लगभग निश्चित
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ: कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की संस्तुतियों का लाभ दीवाली के आसपास तक देने के लिए राज्य सरकार ने तेजी तो की थी किन्तु वह दीवाली के बाद भी प्रभावी साबित होती नहीं दिख रही है। माना जा रहा है कि कर्मचारियों को नए साल में ही सातवें वेतनमान का लाभ मिल पाएगा।
केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग की संस्तुतियों को लागू कर दिया था। इसके बाद सितंबर में प्रदेश सरकार ने भी इन्हें स्वीकार करने के साथ सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी गोपबंधु पटनायक की अध्यक्षता में समीक्षा समिति भी गठित कर दी थी। पटनायक ने 11 अगस्त को काम भी संभाल लिया था। सरकार ने समीक्षा समिति के गठन का आदेश जारी करने के साथ तीन माह के भीतर प्रारंभिक रिपोर्ट भी मांगी थी। इसके आधार पर अनुमान लगाया जा रहा था कि दीवाली के आसपास राज्य कर्मचारियों को सातवें वेतनमान का लाभ मिल जाएगा। समिति ने राज्य कर्मचारियों के विभिन्न संगठनों के साथ आम जनता का पक्ष सुनने की भी पहल की। तीन सौ से अधिक कर्मचारी संगठनों की बात सुनने के बाद समीक्षा समिति ने विभिन्न सरकारी विभागों का पक्ष सुनना शुरू किया है। वित्त विभाग से वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता व संभावित खर्चे पर एक चक्र विचार विमर्श भी हो चुका है।
अब तक प्रारंभिक संस्तुतियां भी न तैयार हो पाने के कारण दीपावली के आसपास ही नहीं, पूरे नवंबर में भी कर्मचारियों को इसका लाभ मिल पाने की उम्मीद नहीं लग रही है। स्वयं समीक्षा समिति के अध्यक्ष ने 15 नवंबर तक प्रारंभिक रिपोर्ट देने का लक्ष्य निर्धारित किया था। उनका कहना है कि जल्द से जल्द रिपोर्ट देने की कोशिश हो रही है। अधिकारियों के मुताबिक प्रारंभिक रिपोर्ट मिलने के बाद भी इसे लागू करने की प्रक्रिया खासी लंबी है। नवंबर के अंत तक यदि प्रारंभिक रिपोर्ट मिल भी गयी तो उस पर अमल का फार्मूला तैयार कर कैबिनेट में लाया जाएगा। कैबिनेट से पास होने के बाद दिसंबर में यदि अमल की घोषणा भी हुई तो जनवरी से पहले कर्मचारियों को सातवें वेतनमान के अनुरूप वेतन नहीं मिल पाएगा। इस बीच चुनाव की घोषणा होने की स्थिति में भत्तों आदि से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट बाद में आएगी, जिस पर नयी सरकार ही फैसला लेगी।
वेतनमान में फंसा डीए
केंद्र सरकार के कर्मचारियों को पिछले दिनों दो फीसद महंगाई भत्ता (डीए) मिल चुका है। राज्य कर्मचारियों को वह भत्ता भी नहीं मिल पा रहा है। दरअसल केंद्रीय कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग की संस्तुतियां लागू होने के साथ ही उन्हें मिल रहा 125 फीसद महंगाई भत्ता उनके मूल वेतन में जोड़ दिया गया था। ऐसे में उन्हें मिला दो फीसद महंगाई भत्ता छठे वेतनमान के फार्मूले के हिसाब से पांच फीसद से ऊपर बैठता है। उत्तर प्रदेश के मामले में अधिकारी अभी इस पर फैसला नहीं कर पा रहे हैं।